25.3.11

ब्लॉग्गिंग में मेरा सफ़र.........3

ब्लॉग्गिंग में यूँ तो कई तरह का लेखन हो रहा है, बहुत महीन से लेकर बहुत मोटा, संस्कृत निषठ शब्दों वाले शुद्ध व्याकरण के आजकल की बोलचाल वाली हिंदी (हिंगलिश) तक.

जाहिर है, जब मैंने इस ब्लॉग दुनिया और आसिलियत वाली दुनिया से मिलाने की कोशिश की या फिर ऐसा है भी. फिर जैसे की दुनिया में कुछ मोरल थानेदारी (कुछ देशों ने ठेका ले रखा है) हो रही है – तो फिर ब्लॉग जगत में भी होगी. यहाँ पर भी कुछ मठाधीशों ने ऐसा ही ठेका ले रखा है. पर शुक्र है यहाँ कोई ठेकेदारी (संयुक्त राष्ट्र) नहीं है........

कल ही सलिलजी ने टीप द्वारा मुझे चेताया था, की ब्लॉगलेखन कोई सामान्य लेखन नहीं है, उन्होंने मिश्र का उधारहण भी दिया था. और वाकाई मैं मानता हूँ की ये कोई साधारण लेखन नहीं है, मात्र एक पुश बटन द्वारा ही आपका मेसेज ग्लोबल हो जाता है. और आपके निजी विचार – निजी नहीं रहते ....... जैसा की व्यक्तिगत दायारी में लिखा होता है........ कोई भी नहीं पढ़ सकता, आप खुद ही पढते है और सिसक सिसक कर तकिये के नीचे रख देते हैं.

आज हमारी सोच कैसी है और कल कैसी होगी..... ये समझ पाना बहुत मुश्किल है. सुनने में आया है की भारत सरकार भी ब्लॉग्गिंग को सेंसर करने के मूड में हैं. करना ही चाहिए. पर वो तो जब भी करेंगे.... तब करेंगे.... पर उससे पहले ब्लॉग जगत के कुछ मठाधीशों ने मोरल मुद्दे को उठाते हुए एक आगाज़ किया है की लेखन की एक मर्यादा होनी चाहिए........ यानी आप परिवार के साथ बैठकर किसी के भी ब्लॉग को पढ़ सकें.

लेकिन एक बात है, जिस भी बच्चे के घर में अगर नेट कनेशन है, तो वो मात्र ब्लॉग जगत का मोहताज़ नहीं है. गूगल बाबा की कृपा से अपना मनोवांछित शब्द लिख देने से ही सेकडों साईट खुल कर आ जाती हैं...... आप बच्चे पर सेंसर नहीं कर सकते......... हाँ उसे कुछ अच्छी शिक्षा दे सकते है की हर वक्त ऐसे ही साईट खोल का न देखे.

मैं पिछले ३ वर्षों से ब्लॉग जगत को बारीकी से तो नहीं, पर मोटा मोटा जरूर देख रहा हूँ, और जो सबसे ज्यादा परेशान करती है वो है अपनी कारीगरी (लेखन) द्वारा किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना. खासकर ये आदत कुछ मुस्लिम ब्लोग्गर भाइयों की है. आज तक किसी भी मठाधीश ने उन पर कोई पोस्ट नहीं लिखी...... . क्यों नहीं लिखी इसका भी कारण है...... उन धर्मान्ध लोगो के आक्रमण से सभी घबराते हैं. – और बर्रे के छते में हाथ नहीं देना चाहते.

वैश्विक और हिंदी साहित्य में नए नए प्रयोग हो रहे है....... मन की वो गहन/महीन भावना जो मात्र मन मैं ही रहती थी, अब उसे कागज/रील या फिर कहें धरातल पर उतरा जा रहा है...... बहुत कुछ नए नए अनुभव हो रहे हैं – देखना ये है या फिर हम खुले दिल से उसका स्वागत करते हैं या फिर हमेशा की तरह आँख बंद करके शुचितावादी बनाने का ढोंग करते हुए उसके खिलाफ खड़े होते हैं.

आज जिसको हम अश्लील कह कर हीय दृष्टी से देखते है...... आने वाली पीढ़ी के लिए मजाक का विषय हो....... और अपने मित्रों के साथ विवेचना करे....... हमारे पूर्वज कितने भोले थे......... 


फिलहाल जय राम जी की.

22.3.11

ब्लॉग्गिंग में मेरा सफ़र.........2


cartoon from www.weblogcartoons.comकिसी ब्लॉग में हल्का फुल्का व्यंग लिखा जा रहा है, कहीं धीर-गंभीर विषयों को सरलता से पेश किया जा रहा है, वहीँ सरल विषयों की ऐसी जलेबी बनाए जा रही है की पाठक बिचारा परेशान हो जाता है. अधिकतर ब्लोग्गर कवी-ह्रदय है, लेख के साथ कविताई कर के दिल की भड़ास निकाल देते है, कहीं सामाजिक सरोकारों पर सार्थक बहस हो रही है - याहीं अधिकतर ब्लॉग लेखक अपने अपने लेखन में लगे है......

जहाँ अच्छी खासी डिग्री लिए हुई विद्वान इन्जिनीर, डाक्टर, विज्ञानिक, वकील, लेखाकार व् अन्य पेशों में परवीन लोग है , इत्यादि, वहीँ विद्यार्थी, शोधार्थी, और सेवानिरवत, गृहणी, कामकाजी, बैंक और रेलवे अधिकार, और हाँ निट्ठले भी. यानी दुनिया चलाने के लिए सब कुछ है..... और तो और चोर भी है सरे आम चोरी के लिए..... और गन्दी अंधधार्मिकता मानसिकता वाले लोग भी - जो माहौल खराब करने पे तुले रहते थे.........

हिंदी सिनेमा की तरह सब कुछ है - प्यार मोहब्बत लड़ाई झगडा, पुरानी दुश्मनी, , माँ, बहिन, दोस्त, दद्दा, बड़े भैया, छोटा भाई, उस्ताद सरजी, ........  सभी कुछ. सब रंगमंच की भांति चल रहा है......... देश दुनिया की सीमाओं से उठा ये ब्लॉग जगत. और हाँ एक तो बंटी  चोर भी थे, पर पता नहीं आजकल कहाँ गायब हो गए. एगो उस्ताद जी भी थे, हर पोस्ट पर न० देते थे, वो भी गोल हो गए.

मेरे ख्याल से ब्लॉग्गिंग के दो स्टेप हैं, एक तो पोस्ट लिखना ...... दुसरे टिपण्णी देना. पोस्ट तो सभी लिखना चाहते है, पर टीप के रस्ते से खुद को बचा कर ले जाते है...... फिर बाबा की तरह सर पकड़ कर रोते है, मेरे ब्लॉग पर कोई टीप नहीं देता. महान ब्लोग्गर श्री फुरसतिया जी कहते हैंबिना टिप्पणी के पोस्ट विधवा की सूनी मांग की तरह होती है।  पर इन सूनी मांगो का क्या किया जाए, मेरे जैसा, कोई भी तरस नहीं खाता. कोई ब्लोगर बिचारा की-बोर्ड पर की-बोर्ड तोड़ रहा पर  टिप्पणियों का महा आकाल है, तो कहीं ब्लोगर ऐसी भी कलाकारी जानता है की मात्र २ पहरा लिख कर टिप्पणियों की बाढ़ आयी हुई है.

कहते है, इश्वर के हर कर्म में कुछ न कुछ अच्छा होता है, चिट्ठाजगत बंद हो गया......... बहुत दुःख हुआ, पर हमसे ज्यादा तो दुःख तो नए नए ब्लोग्गर को होगा......... जो ५-७ पोस्ट में स्थापित हो जाते थे, अब बहुत महनत करनी पड़ेगी, पर कई मुस्लिम अंधधार्मिकता मानसिकता वाले ब्लोग्गरों से छुटकारा तो मिल गया...... आप सभी समझ सकते है की मेरा इशारा किस और है......... नाम लेकर मैं बर्र्रे के छते में हाथ नहीं देना चाहता.

ज्ञान और आनन्द का बहुत बढ़िया साधन है ये ब्लॉग्गिंग ......... बस देखना ये है कैसे इसका इस्तेमाल होता है....... पर एक बात है, इसके लिए समय बहुत चाहिए..... बहुत ज्यादा.. तभी आप एक सफल ब्लोग्गर रह सकते है.....  नहीं तो बाबा की तरह जहाँ धुनी जमा ली जमा लिए...... नहीं तो चल दिए दुसरे थोर ..........

शायद कुछ और भी है, पर फिलहाल इतना ही, जय राम जी की

19.3.11

आ बाबा के अंगना में खेले होली....


चित्र  http://blogs.sacbee.कॉम  के साभार

आ बाबा के अंगना में खेले होली....

रंग ले आज ये सफ़ेद चादर मैली ...

जहाँ हरे गुलाबी नीले पीले को न नाज़ हो 
बस अंदर के रंगों का आगाज़ हो..
बेरंग रह कर करें खुदी संग मस्ती...
दुनिया भी पुकारे - अजीब है ये हस्ती...

आ बाबा के अंगना में खेले होली

भूल जा झूठी दुनियादारी के रंग....
होली की रंगीन मस्ती, दारू-भांग के संग...
ऐसी बरसे की वो 'बाबा' भी रह जाए दंग..

आ बाबा के अंगना में खेले होली


चित्र  http://www.flickr.com/photos/sanzen  के साभार 


होली की शुभकामनाएं.

18.3.11

ब्लॉग्गिंग में मेरा सफ़र.........

कई बार अपने निर्णय पर दुःख नहीं होता, (वैसे तो कभी भी नहीं होता) लेकिन कई बार होता भी है - काश अमुक व्यक्ति की बात मान ली होती. पर एक निर्णय सोच विचार कर लिया था... और उस पर फक्र होता है - श्रीयुत  जी को आचार्य की पदवी देकर. आज मैं याद कर रहा हूँ अपने ब्लॉग जगत में पुराने दिनों को. 

दिसंबर २००७ में ब्लॉग बनाया था. कभी कभी दिल की भड़ास निकाल देता था. पर एक दिन इसी ब्लॉग जगत में डूबा हुवा था की अपने पूर्विया जी (कौशल मिश्र) प्रेस में आये ......... और मैं भी बहुत ही तन्मयता से उनको लप्पझनू  की पोस्ट पढ़ने लगा........ कौशल जी ठहरे पुराने लंठ........ लगे उसकाने ..... तुम क्यों नहीं लिखते....... 

अब मैं क्या जवाब देता, मैं तो इस विद्वासभा में खुद को उपेक्षित सा महसूस करता था, पर कौशल जी का हौसला था, लिखो यार कुछ तो लिखो ........ और क्रिस्पी पकौड़े ...... तुरंत लिखे गए. और लगे हाथ पूर्विया ब्लॉ भी बन गया .......... और ब्लोगवाणी भी बंद हो गई.... कहते है न ....... साडी वारी आयी ते प्रसाद ही ख़त्म हो गया....... :)

तब याद आये , उड़नतस्तरी ....... और नीरज जी, खूब कहते थे, कुछ लिखो कुछ लिखो.......... पर लंठ महाराज .... लिखे भी तो क्या........ टाइप करते .... और डिलीट कर देते........ पर पढ़ते रोज़ ही रहे.

जुलाई  २०१० से ढंग से ब्लॉग फिर से चालू हुवा.......... पता ही नहीं चला कब संजय (मो सम कौन........) से दोस्ती हो गई...... कई बार चेत्तिंग हुई........ संजय (माफ़ करना संजय 'जी' नहीं कह रहा, हमउम्र है न और हाँ हम ख़याल भी ) ने कई बार संभाला और ब्लॉग्गिंग के टिप्स भी दिए.......

फिर एक अच्छी रात ? रात को सतीश सक्सेना जी ने हमारी बक बक को खंगाला ...... और सर्टिफिकट दे दिया ......... बाबा आश्रम बहुत अच्छा चलेगा...... और हम निहाल हो गए..... और मैं ये सर्टिफिकट देना चाहता हूँ की जिस ब्लॉग को लाइमलाईट में लाना हो ..... सतीश जी से संपर्क करें ..... उनके हाथों में ऐसा जादू है जिस ब्लॉग पर फ्लोवेर्स बनते है .. उस ब्लॉग के भाग खुल जाते है. 

फंसते फंसते फंस गया ....... सफ़ेदघ, जी हाँ वही अपने सतीश पंचम जी, में, अनूठी बोली मैं बहुत कुछ अपनापण था, लिखा बढ़िया लगा..... औहथकड़ में शायाद सफ़ेद घर से कुछ क्लू मिला था......... ये दोनों ब्लॉग की जिस दिन दैनिक हिन्दुस्तान में रवीश ने चर्चा की तो शायाद किशोर चौधरी और सतीश पंचम से ज्यादा ख़ुशी मुझे हुई.........  और हाँ इन्ही सतीश पंचम जी से कुछ तकरार भी हुई क़स्बा पर...... 

पता नहीं कैसे आलसी  के चिट्ठे तक पहुंचा .... और मन्नू-उर्मी प्रसंग हाथ लग गया...... रात ११ बज गए  पढ़ते पढ़ते ....... घर से फोन आने लगे...... दिल वहीँ बंध गया. उसके बाद बाऊ प्रसंग...... 

सफ़ेदघर और आलसी के चिट्ठे के पढने के साथ पूर्विया का संग ...... मेरे पर भी बहुत कुछ पूर्व रंग चढ़ गया....
नहीं आये तो श्री अनूप शुक्ल जी, माने फुरसतिया...... कभी भी नहीं....

हाँ याद आया, आदरणीय ज्ञानदत्त पाण्डेय जी की हलचल..... गंगा किनारे तो मन पहले ही लगता था.... पर एक दिन कुछ इर्ष्य हुई ..... पंडित जी कुछ लिखते नहीं थे ..... और ३०-४० टीप उनके ब्लॉग पर हो जाती थी..... मैंने भी टीप दे दी ..... पाण्डेय जी ट्वीट करते है ........ और बाकि लोग ट्वीट पर ट्वीट करते है..... 
पता नहीं कैसे डॉ दिव्या जी (जील) ने उसी पोस्ट में 'अंतिम प्रणाम' कह दिया... और मैं भी निशाने पर था..... 
बहुत दुःख हुआ........ बहुत ही .... कई बार पंडित जी से माफ़ी मांगी...... और किस्मत को कौसा .... उसी पोस्ट पर ही जील ने अंतिम प्रणाम  कहना था.

डॉ अरविन्द मिश्र से प्रभावित था, तार्किक ब्लॉग्गिंग करते थे..... अजोध्या मुद्दे पर कुछ तकरार भी हुई........ ख़ुशी हुई की एक ही पथ के राही है........ 

या आया वो दिल्ली में ब्लोग्गर मीट, कौशल जी के कहने पर जाना हुआ, १०-१५ मिनट लेट पहुंचे ........ दाखिल हुए तो लगा की प्रधानआध्यापक के कमरे में दाखिल हुए है..... सामने थे समीर लाल जी और सतीश सक्सेना जी. कुछ भी नहीं कह पाए....... हमेशा की तरह एक इन्फेरिरेती काम्प्लेक्स था........ 

ब्लॉग्गिंग का इतना प्रभाव था , प्रेस में कई ग्राहक मित्र समय कम होने का बहाना कह का खिसक जाते और कविता नहीं सुनना चाहते थे, एक मित्र रवि रस्तोगी जी की बातों ने तो पोस्ट लिखने पर मजबूर कर दिया.

जून से शुरू हुई यात्रा जनवरी आते आते सर्विकल के रूप से सामने आयी....... डॉ से सकत हिदायत दी की कम्पूटर पर कम से कम बैठना....... और ... इसो ला नतीजा है की पढता तो बहुत कुछ रहा पर लिखने पर बचा का ले गया ..... सबूत हो जाएगा की अभी भी कम्पुटर पर बैठ रहे है. :)

कई ब्लॉग इतना अच्छा काम कर रहे है ---- की खुद का लिखा कुछ भी झूठा लगता है...... और आचार्य  का ये  कथन की इक्सेलेंस ही साध्य होना चाहिए........ सोच सोच कर ही रह जाता .. पर कुछ न लिख पता था......

आज होली और  १०० वी पोस्ट पर आचार्य की मेल प्राप्त हुई.............. जो कई मायने में १०वी के सन्नद माफिक है........ लम्बी है पर इस पोस्ट को लिखने का मोह उसी मेल से प्राप्त हुआ.....

आचार्य की मेल : 

सौवीं पोस्ट की बधाइयाँ।
प्रकृति को खालीपन पसन्द नहीं, भर देती है। यह अच्छे लोगों का कर्तव्य है
कि खालीपन को भरने के लिये स्वयं को प्रस्तुत रखें। इसलिये सर्वाइकल पेन
के बावजूद जब भी आराम मिले लिखते रहियेगा। लेकिन पहले स्वास्थ्य ही रहना
चाहिये।

अब आप की ब्लॉग यात्रा:

जफर की ग़जल के बाद दिनांक 16 दिसम्बर 2007 की पोस्ट, जिस कोमलता के साथ
आप प्रेम का चित्रण करते हैं, कसम से ईर्ष्य़ा हो गई:

समंदर पूछता है अब वो दोंनो क्यों नही आते
जो आते थे तो अपने साथ कितने ख्वाब लाते थे
कभी साहिल से ढेरों सीपियाँ चुनते
नंगे पाँव पानी में चले आते थे
भीगी रेत से नन्हें घरोंदे भी बनाते थे
और उनमे सीपियाँ,रंगीन से कुछ संगीत यू सजाते थे
के जैसे आज के जुगनूमय लम्हे
आने वाली कल कि मूठ्ठी में छुपाते थे। ...कुछ इसी तासीर की मेरी पहली
पोस्ट थी, जो प्रेम से इतर विषय पर थी। आश्चर्य नहीं कि आप के ब्लॉग पर
पहली बार आते ही 'सट' गया :) 

कसम से मुझे मालूम नहीं की ये ग़ज़ल ज़फर की थी. एक याहू ग्रुप से प्राप्त हुई थी..... अच्छी लगी अत: ठेल दी.

और यह तेवर तो एकदम ही अलग है (दिनांक 13/12/08)
:

ये दुनिया
इसी मायावी दुनिया में रह कर जी रहे हैं हम
हम तो शायद सूरज से भी ज्यादा प्रचंड है
 ढीठ भी सूरज से ज्यादा।
....
इस बार नहीं बनने दूँगा उसे इतना लाचार
की पान की पीक और खून का फर्क ही ख़त्म हो जाए
इस बार नहीं
इस बार घावों को देखना है
गौर से थोड़ा लंबे वक्त तक
कुछ फैसले
और उसके बाद हौसले... 

ये कविता बहुत पहले एक डायरी में लिखी थी..... एक दिन ठेल दी.

मजे की बात यह है कि टाइपिंग की कठिनाइयों का जिक्र प्रेस बाबा भी करते हैं :) आचार्य को ये मालूम हो की मैं रेमिंटन की टाइपिंग करता था ..... और इनस्क्रिप्ट मेरे लिए नया अनुभव था.... और आज भी है. 

प्रधानमंत्री से अपील करते जलते हुये सच को कहने से बाबा को परहेज नहीं:
.. देही शिवा वर मोहे एही
शुभ कर्मन से कबहूँ न टरों
न डरों अरि जब जाय लरों
निश्चय कर अपनी जीत करूँ
पड़ोसी की नियत शुरू से ही खोटी रही है. आज की बात नहीं है ... हरामजादे
शुरू से ही उर्दू की मुशायेरे और क्रिकेट की बातें करते करते पीठ में
छुरी घोंप जाते है (दिनांक 12/03/08).

केरल के सी एम की कारस्तानी पर तीखापन एक आम अबौद्धिक सीधे साधे आदमी का
है (दि. 12/02/08)
... भारत वंशी का होश नहीं गंगा की सोच नहीं मिटटी का लगाव नही वतन पर
नाज़ नही बस राज करना चाहते हैं - दोस्तों मेरा ये वादा है की जिस दिन ये
लोग आपने तरीके से इस देश पर राज करने लगे तो भारत के ३८० टुकड़े होंगे
और इनका मुख्यालय पेचिंग (चाइना) में होगा। ....

और हास्य का यह रंग (दि. 13/07/10)
मोटी मोटी स्त्रियों को पार्क में यूँ भाग रही होती हैं की मनो आज ही
सारा कोलेस्ट्रोल ख़त्म कर देंगी और नयी उम्र की लोंदियों की नज़र आएँगी.
कुछेक के साथ उनके टौमी को और कुछ एक के साथ तो उनके 'उनके' को भी मजबूरी
वश हाँफते हाँफते भागना पड़ता है। जो की सब से नज़र बचा कर और झुका कर चल
रहे होते है.फिर थोड़ी ही दूर ... उम्र के अंतिम पड़ाव पर कुछ बुजुर्ग
जोर जोर से ठहाके लगा रहे होते है : जोर जोर से ठहाके लगाने से या तो
उनके नकली दांत गिर गए होते हैं या फिर पहेले से ही घर में रख कर आते है.
वहां रुक कर देखने में बड़ा ही आनंद आता है. थोडा आगे जाने पर ....
मोर्निग वाल्क का बहाना कर के निकली मेनका ... किसी इंद्र को लुभा रही
होती है या फिर कोई देवदास पारो नयनो के तीर एक दुसरे पर चला रहे होते
हैं। दूर एक बेंच पर एक सरदार जी, जिनकी नज़ारे तो उक्त प्रेमी युगल पर
होती पर साँसे बाबा रामदेव का आलोम वियोम कर रही होती है। :) अनुलोम
विलोम लिखना था बाबा!

तिहाड़ गाँव के जोहड़ की यह कविता( 12/07/10) सोचने पर मजबूर करती है:
पानी का लबालब तालाब -
तब बिना टेंडर के भी मछलियाँ उपजता था
जहाँ सर्दियों में सारस अपने वतन से दूर
मेरे गाँव आते थे.
उन सारस को देखने की चाहत
फिर बन जाती है
इन कड़कती बिज़लियों को देखकर
एक दिन बारिश जोर से हो रही थी, और प्रेस में मैं खिड़की से देख रहा था..... और तालाब की याद आई..... 

लंठई (दि. 19/06/10)
... पकोड़े का लिफाफा हिलाते हुवे स्कूल ला रहे थे की लिफाफा हाथ से छूट
कर रोड पर गिर गया और पकोड़े बिखर गए. अब बिखर गए तो कोई बात नहीं - पर
बिखरे वहां थे जहाँ पर गोबर (सुखा) पड़ा था. हमने बड़े जतन से पकोड़े
एकठे किये पर उनमें गोबर का बुरादा लग गया था. समझ नहीं आया क्या करें.
फिर भी दिमाग(?) था .. पकोड़े दूकानदार को वापिस दे कर बोले की मा'साब
नें बोला है दुबारा गर्म कर दो. दूकानदार नें दुबारा गर्म के दे दिए और
हमने कांपते हाथों से मा'साब को दिए. शुक्र है पकोड़े ज्यादा क्रिस्पी बन
गए थे...यह किस्सा तो एफ एम के 'सुड' को भेजना चाहिये ;)

अब बीच में गोल कर मेरी प्रिय
पोस्ट - बापू की बकरी से कुछ अंश:
पंडित नेहरु को भी बकरी में विशेष दिलचस्पी थी. वो बापू को खुश रखने के
लिए अधिकतर बकरी को अपने हाथ से बादाम खिलाते...
..

इस कथा ने जाने कितने आयामों से परिचय करा कर आप की प्रतिभा से परिचय करा
दिया। ... अनवरत लेखन और उत्तम स्वास्थ्य के लिये शुभकामनायें। 

बहुत बहुत आभार आचार्य...... बस आपसे एक निवेदन है..... टीप बॉक्स को खुला रखिये. और दुसरे ब्लॉग पर भी टीप दीजिए......... 

ब्लॉग्गिंग का एक असर मेरे पर ये भी हुवा की जब सुबह अखबार पढता था तो हर खबर पर टीप देने का मन करता था.

मन में बहुत अरमान थे...... पर कम लिख पाया......... कई मित्रो से और भी बढ़िया अनुभव थे....... जो श्याद इस पोस्ट में समेत नहीं पाया.... कोशिश करूंगा कल... काश कोशिश सफल हो... नहीं तो ये पोस्ट अधूरी ही रहेगी. 

जय राम जी की. 



17.3.11

आह होली - वाह होली और ये १०० वी पोस्ट

आह होली - वाह होली - फाग - फागुन - और उफ ये बेकरारी ......... नजर हमारी, जहॉं देखो - रांग नम्बर। क्या कहें। न उगलते बनता है न बोलते। पर आचारज (आचार्य) ने तो यूं फूहार छोड़ दी .... मानो कक्षा में कोई शरारती बच्चा मास्साब के खूब मना करने के बाद भी बाकी साथियों को रंग लगाना शुरु कर देता है और होली का महौल 2-3 दिन पहले ही शुरु हो जाता है।

याद आता है गांव में इस समय होली के लिए किसी के पास भी वक्त नहीं होता था - और न ही अब होता है। पर गांव के बामण, अहीर, मीणा, ठाकर सहित अन्य कमतर जातियां होली उत्सव में लग जाती थी पर पंजाबी खेत में लगे रहते थे- ‘अरे इन्हीं का त्यौहार है’ ....... सरसों की लावणी (कटाई) का मुश्किल भरा समय। बचपन था। रात को होलिका दहन के समय नगाड़ों के शोर में भयभीत होकर पर्व देखता। इतना शोर होता की कई बार कोई आवारा सांड मचल जाता और तबाही मचा देता था।

आज 200 से लेकर 1000 रुपये तक की पिचकारी आ रही है। पैसा बहुत है। दारु के खाली अध्दे में रंग भर उसके मूंह में झाडू के तीलों को छोटा छोटा कर के ढ़क्कन बनाया जाता था: और पिचकारी तैयार। 

घर के सामने खुला मैदान सा था, उसमें कई बार बुभले (गाड़ियार-लुहार) ठहरे रहते थे। उनकी होली देखने लायक होती.......... दोपहर बाद तक मिणों द्वारा निर्मित कच्ची दारु सर चढ़कर बोलती थी। और उन लोगों का लड़ाई-झगड़ा देखने लायक होता। दो-चार के सर फट्टे मिलते थे।

दिल्ली आये, पर दिल्ली का ये गांव अपने शहरीकृत स्वरुप को पाने के लिए प्रसवास्वथा से गुजर रहा था। ऐक आंटी थी - अपने से बड़ों के मूंह से सुनते थे - सही औरत नहीं है: पूरे गांव के आवारा किस्म के लड़के सुबह से उसके घर के आगे फेरा लगाना शुरु कर देते थे - आंटी का किसी पर मन होता तो रंग लगवा देती अन्यथा बेरंग मोड़ देती - सुधा चला जा-तेरे जैसे कई हांडे फिरे। और तथाकथित शरीफ लोग एक किनारे खड़े होकर मन मोस कर मजा लेते - उनका बस चलता तो वो कौन सा पीछे रहने वाले थे। 

होली है - मस्ती है: समस्त चालाकियां, शराफतें, दुश्वारियां,  इत्यादि को छोड़ कर, बस अपने अंदर के रंग को पहचान कर बाहर निकालता हूं। अल्सुबह से दोपहर 2 बजे तक: आप आमन्त्रित हैं होली मनाने के लिए तिहाड़ गांव में - बाबा को पहचान लेगें - ये गारंटी है।

दुसरी बात, आज सवा तीन साल बाद 100वीं पोस्ट लिखने को मौका आया है। शायद इस ब्लाग जगत में मो सम कौन आलसी मैं ही  दूसरा कोई नहीं।  पता नहीं कब आप लोगों को पढ़ते पढ़ते स्वयं का ब्लाग बना दिया पर लिखने के नाम पर सिफर - जो अब भी हूं। आप सब मित्र मिले: धन्यवाद करता हूं कि मुझे प्रेरणा दी - और ब्लागिंग का ये सफर धक्के खाते खाते चालू हुआ। ब्लॉगिग ने बहुत से मित्र दिये और मित्रों के अलावा एक दर्द भी दिया: र्सवाईकल का। पर मित्रों की मिठास के आगे ये दर्द कुछ भी नहीं।

ब्लॉग्गिंग के सफ़र में मेरे साथ रहे, मेरा उत्साह बनाए रखा, आप सभी मित्रों का धन्यवाद, हो सकता कही मेरे से कुछ नाम छूट रहे हो, तो कृपया अन्यथा न लें.ents:


सोमेश सक्सेना 
Kajal Kumar 
Sawai Singh Raj. 
सम्वेदना के स्वर 
Satish Chandra Satyarthi 
Deepak Saini 
वन्दना 
संजय @ मो सम कौन ? 
संजय कुमार चौरसिया 
Dr. shyam gupta 
Poorviya 
सतीश सक्सेना 
anshumala 
पद्म सिंह 
उपेन्द्र ' उपेन ' 
हरकीरत ' हीर' 
नीरज गोस्वामी 
सुरेन्द्र सिंह " झंझट " 
मनोज कुमार 
ajit gupta 
दिगम्बर नासवा 
रंजना 
सतीश सक्सेना 
Smart Indian - स्मार्ट इंडियन 
Dr (Miss) Sharad Singh 
Sunil Kumar 
अरुण चन्द्र रॉय 
सतीश पंचम 
चला बिहारी ब्लॉगर बनने 
शिवम् मिश्रा 
प्रेम सरोवर 
संगीता स्वरुप ( गीत ) 
ज्ञानचंद मर्मज्ञ 
abhi 
JHAROKHA 
Man 
ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ 
दिनेश वशिष्ठ 
M VERMA 
Indranil Bhattacharjee ........."सैल" 
नरेश सिह राठौड़ 
 
Suresh Chiplunkar 
गिरिजेश राव 
शरद कोकास 
संजय भास्कर 
Udan Tashtari 
Arvind Mishra 
नीरज बसलियाल 

जय राम जी की..........

रंगों से सराबोर मस्ती भरी होली की बधाई हो. 


P.S. 
अपने ब्लॉग को खंगालते खंगालते - इन दो टीप पर अभी नज़र गई :
नीरज गोस्वामी ने कहा…जय राम जी की...इतनी लम्बी छुट्टी ब्लॉग जगत में मंजूर नहीं की जाती...कुछ न कुछ लिखते रहन करें...