29.7.11

हवाओं में कुछ जुल्फे ऐसे लहराई - बेनजीर तुम बहुत याद आयी

हवाओं में कुछ जुल्फे ऐसे लहराई
कि बेनजीर तुम बहुत याद आयी

कि जुल्फों वाली पडोसी गर घर में आ जाए .. तो जाहिर है कि नींद तो खराब हो ही ज़ाती है...... हाँ नींद खराब हो ही गयी ... आचारज की और सफ़ेद घर में पंचम जी की.

अब कुछ नहीं हो सकता..... दोनों ने अपने अपने तरीके से सभालने को कहा. पर क्या करे भावुक मन मेरा ... कहाँ कहाँ गोते लगाने लगा..... शायद १२ कक्षा का छात्र रहा हूँगा .... जब पड़ोस से एक और बला आयी थी...... जुल्फे तब भी लहराई थी.... पर क्या किया जाए गूगल बाबा नहीं थे.... जो अपने अपने दिलों का हाल सभी लोग लिख देते.

याद कीजिए गुजरा जमाना : चंद तस्वीरे हैं जो नेट से कॉपी की हैं.... वेबसाइट के नाम ध्यान नहीं आ रहे



ब्लेक एंड वाईट के जमाने की वो रुमानियत याद आ गयी न....... हाँ मुझे तो याद आ गयी..... आवारा .... श्री ४२० वगैरा वगैरा .....


लीजिए कुछ रंगीन तस्वीरें भी हाज़िर हैं......



माफ़ी चाहते हैं पड़ोसियों से ....... इस दोस्ती... सहअस्तित्व ..... प्राचीन सभ्यता... आपसी सोहार्द ....... रंजिश को भूलने वाले.... धर्म निरपेक्ष ... तेज़ी से उभरता..... विकसित..... शक्तिशाली देश, इन जुल्फों की क़द्र नहीं कर पाया.....

उन हसीन जुल्फों को बेहद ही उबाऊ और नीरस व्यक्तिव से उलझा दिया ...
इतिहास कभी माफ नहीं करेगा.. :)


सभी चित्र गु्गल से साभार


गीत याद आ गया : बिन बादल बरसात का ..
जब जाग उठे अरमान तो किसे नींद आये......

जय राम जी की.........

28.7.11

वाहिहात बातें .....

क्या बात है सुस्त बैठे हो...... रात सोये नहीं....
नहीं ऐसा कुछ नहीं है.
तो लगता है.... थक गए होगे.
नहीं ऐसा भी.....
अच्छा कविता-शविता पढ़ रहे हो.... तभी आँखे लाल....... हैं..
नहीं यार.
नहीं यार नहीं यार.......
कल शाम को रोड पर खड़े खड़े कुछ ज्यादा ही नैन सिकाई कर ली होगी.

छोडो वाहिहात बातों को...
कैसे छोड़ें.......


खत न आने के दो कारन है - 
या तो डाकखाने बंद हैं या फिर मोहब्बत कम है....

रवि रस्तोगी जी उवाच रहे हैं.......

बहुत मुश्किल है....... इनके सवालों का जवाब नहीं दिया जा सकता...... 

पर बातों का सिलसिला चल पड़ा तो मैंने भी सोचा .... चलो आज की पोस्ट यही सही 

अब कुछ भी नहीं हो सकता...... जो होना था वो हो गया.... बस सभी लोग इन्तेज़ार कर रहे है.... - कुछ (अच्छा) होने का . और तुम भी. यही सोच रहे हो न...

देखो - खाने-पीने को सभी कुछ है इतना पैसे दिल्ली में हरएक के पास हैं.. पर इंसान सोचता रहता है... हर दम..... कुछ और करने को..  ससुरा लगता इस दुनिया में लोगों के पास दिमाग बहुत है. जब तक मरेंगे नहीं - सोचते ही रहेंगे.... कुछ भी.

दिन रात लगे रहो........ कल औलाद तो यही कहेगी न पापा ने कुछ नहीं किया ..... कुछ भी नहीं. देखो पड़ोस वाले शर्मा अंकल को........ कितनी प्रोपर्टी खड़ी कर गए है...... खुद तो मर गए ... पर उनके बच्चो को कितना किराया आता है ...... मौज कर रहे है. बाप की पुण्यतिथि पर लंगर भी कर देते हैं.

हमारे बच्चे क्या ख़ाक लंगर करेंगे........ कोसा करेंगे. मम्मी कहती है कि रोज रात को लेट आते थे - दारू पीकर..... हाँ सारा पैसा दारू में उडा दिया होगा..... हमारे लिए क्या छोड़ कर गए.:)

भैया यही होना है - लिखवा लो. इसलिए टेंशन लेना छोड़ दो यार.  अब बाबा की ही बात लो... कल तक खूब कहे कहे लगा रहे थे....... 

अच्छे खासे बाबा जी थे..... योग करवा रहे थे..... आज पड़ गए सरकार के फेर में. कहाँ रहते है - क्या करते है -कहाँ हगते मूतते है..... सभी कुछ सरकार की  निगरानी में हो रहा है...... सरकार को कम मत समझो भाई - ये कोर्ट शोर्ट सब इन्ही का है...... चाहे किसी की भी सत्ता क्यों न हो.... हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ........ अलां कोर्ट - बला कोर्ट - सभी कुछ... 

कल तक कोई बात नहीं थी. आज इन्कुआरी हो रही है - तुम कहाँ से दसवी पास किये हो....... कौन सी दाई आयी थी तुम्हारी माँ  के पास......  लुंगी कौन से दर्जी से सिलवाई थी :) आज सभी कुछ खंगाला रहा जा रहा है..... 

बाबा भी पागल........ राजकुमार का पुराना डाईलोग भूल गया ... जिनके घर शीशे के हों वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते........ बाबा को क्या मालूम था ...... फर्जी डिग्री ही इतना बड़ा अपराध हो जायेगी की शासन पूरी एड़ी चोटी का जोर लगा देगा.... फर्जी डिग्री ...... फर्जी डिग्री..... अच्छा भला व्यक्ति - कल तक आयुर्वेद के पुराने तरीकों से बीमारियों के इलाज़ बता रहे थे....... खांसी जुकाम से कब्ज बवासीर तक ..... आज जान के लाले पड़ गए है...... भाग रहे है..... 

बाबा राम देव गलत कर गए .... जो ला-इलाज़ बिमारी (पैसा) है  सत्ता मैं बैठे लोगो को उसका इलाज़ करने बैठ गए - पुराने जख्मो को छेड़ दिया........ यानी मधुमखियों के छत्ते में हाथ दे दिया......  भुगतो........ बाबा ... भुगतो .... 

जय राम जी की....

रवि रस्तोगी = पुराने मित्र है - और बक बक में मुझसे भी आगे.... 

20.7.11

वक्त का तकाज़ा था, और हम निभाते चले गए.

हम और तुम 
यूँ साथ साथ चलते रहे ..
ताउम्र ...
बिना किसी शिकवे शिकायत के...

वक्त का तकाज़ा था, और हम निभाते चले गए.


हम और तुम 
बैठे रहे दरिया किनारे...
नयनो की भाषा जब नयन समझते रहे...
हरदय के तार दूर तक खनकते रहे..
कितनी विराट जलराशि थी 
दोनों किनारों की बीच ..
और दिलों में - भावनाओं का समुन्द्र ...

वक्त का तकाज़ा था, और हम निभाते चले गए.

हम और तुम 
हाथों में लिए वो एन-सीरीज
हम अपने ऑफिस में और 
तुम आलिशान उस मॉल में 
पढ़ते रहे दिलों में आये तुफानो को.
लूटा दिया अपने दिल के अरमानो को..
उस सुहानी शाम को 
तुम भी अपने 'उनके' साथ चल दी 
और हम भी अपनी उनके लिए चल दिए ..

वक्त का तकाज़ा था, और हम निभाते चले गए.

17.7.11

दाढ़ी - आज़ाद या विद्रोही व्यक्तित्व -

    दाढ़ी बनाना भी एक कला (आर्ट) है – और कई तरह की कलात्मक कार्यों की तरह ये बिद्या भी मुझ से कुछ रूठी ही रही है..... काफी गहन चिंतन और मनन के बाद फैसला कर पाता हूँ कि दाढ़ी (शेव) बनाई जाए – और जब शेव बन जाती है तो कई नीचे गर्दन की तरफ कई जगह छोटे छोटे बाल (.२ या फिर ०.३ मिमी) ऐसे छूट जाते है मानो बारिश में बुंदेलखंड की धरा. ... पहली बार जब दाढ़ी बनवाई थी,  उम्र होगी १८-१९ साल, मज़े मज़े से बोला था मास्टर जी आज हमारी भी शेव कर दो. और उस वक्त के नाज़ुक चेहरे पर (जब बक्त के थपेड़े नहीं पड़े थे) फिटकरी की जलन होने लगी तो मैंने मुंह बनाया ... मास्टरजी बहुत जलन हो रही है ...... और मास्टरजी का तुरंत जवाब था .... जलन तो अभी ग**** (वहीँ जहाँ आप सोचने लग गए) में होगी जब शगुन के २१ रुपे लूँगा ........ J . भाई अभी तक मास्टरजी के २१ रुपे बकाया है. 
    बहरहाल पुरानी बात है, आज दाढ़ी तो बन भी जाती है पर मूंछों को बनाने में जो करीने से कैंची चलानी पड़ती है.... वो बहुत पेचीदा काम हो जाता है – लेफ्ट राईट दोनों देखना पड़ता है. अभी विद्वान संपादक तो हैं नहीं कि लेफ्ट राईट दोनों पर बराबर निगाह रखें J..... दफ्तर के बाबु लोगों का सही है ... रोज दाढ़ी बनाते है और मूंछे भी सफाचट, कोई चिंता नहीं. पर राजस्थान के संस्कार है..... भाई मूंछे एक बार ही मुडती हैं..... तर्क अपने अपने है... उनको किया लिखना. मुख्या मुद्दा तो दाढ़ी को लेकर है.
    दाढ़ी को विद्रोही की निशानी भी माना जाता थी – या है... कुछ कहा नहीं जा सकता. एक विद्रोही समाजवादी नेता जो बाद में प्रधानमन्त्री भी बने, चंद्रशेखर की दाढ़ी को मैं इस बात का पैमाना मानता हूँ.... और आजकल तो अपने युवराज भी कई बार दाढ़ी बड़ा कर फोटू खिचवा रहे हैं.... पता नहीं किस बात का विद्रोह दिखा या जता रहे हैं. छडो जी, सानू की.
    रविवार को अधिकतर बाबू लोग दाढ़ी नहीं बनाते, क्योंकि दफ्तर नहीं जाना..... दफ्तर नहीं जाना तो कोई बंधन नहीं ... आजादी है – सो दाढ़ी मत बनाओ... देखिये यहाँ शेविंग का मतलब आज़ादी से हो जाता है. कहीं न कहीं ये व्यक्ति के आज़ाद व्यक्तिव को तो नहीं दिखाती ... दिखाती है. पुराने अभिवाजित भारत के नक़्शे को अगर देखा जाए तो दिल्ली से शुरू और अफगानिस्तान तक फैले पंजाब के अधिकतर हिस्सों में दाढ़ी रखने का शौंक था..... ये इस्लामिक परम्परा नहीं थी. मुल्ला लोगों के फतवे भी नहीं.... एक जिंदादिली का माहौल था.. लोग दाढ़ी रखते थे.....
    कोर्पोरेट सभ्यता का चलन है. – सरकार भी आजकल कोर्पोरेट घरानों के हिसाब से चल रही है. अत: नागरिकों की जिम्मेवारी भी यही बनती है कि वो भी अपना अपेरेंस कोर्पोरेट के हिसाब से रखें. दाढ़ी रखिये – शौंक से ... पर सुन्दर लगनी चाहिए.... जाहिलों की तरह नहीं. एक दिक्कत यहाँ भी है... कि ये सुंदर उसी व्यक्ति पर लगती है जिसकी दाढ़ी में बालों का घनत्व hair density ज्यादा हो...  अपने जैसों पर दाढ़ी नहीं – की बाल ४-४ मिमी दूर दूर उगे हों – ये झाडी ही लगते है. अत: उन बालों को रखा भी नहीं जा सकता. कटवाने में ही भलाई है. समस्या शेविंग की - उस कला की फिर खड़ी हो जाती है.
    हेयर ड्रेसर (नाइ की दूकान) पर जाने में कोई उज्र नहीं है.... नाहीं कोई दुश्मनी पाल रखी है... रही बात अपने मास्टरजी की तो उनको अब २१ रुपे का कोई मलाल नहीं है .... उन्होंने साइड बाय साइड प्रोपटी डीलिंग का धंधा शुरू कर दिया है ..... और २-४ ग्राहक ही मेरे जैसे बचे है..... पर इन दुकानों पर शेव की दूसरी पारी के बाद जब फुहारे से पानी मारा जाता है और मुंह पूछने के लिए जो तौलिया इस्तेमाल में लाया जाता है – उसको देखते ही घिन्न सी आ जाती है..... ऐसा नहीं है की किसी हरेक नाइ की दूकान पर गन्दा तौलिया ही हो... कई जगह तो ऐसी भी होंगी जहाँ ग्राहक बदलते ही तौलिया भी बदल जाता होगा......
    ............ छोडो जी, अब दाढ़ी कथा को.. जा ही रहा हूँ बनवाने..... ये काम कल तक मुत्त्वी नहीं कर सकता. हाँ याद आया ... बहुत सी पारिवारिक अडचने भी हैं शेव करने में, जैसे सोम, मंगल, वीर, शनि को शेव नहीं करते. J कुछ कारन रहे होंगे. पता नहीं - दाढ़ी में तिनके वाली बात है.
बहारहाल बहुत झेला आपने मुझे खामख्वाह ....
जय राम जी की.

8.7.11

मनमोहनी कालिमायुक्त माया


वो संगीत बुनता था और सुनता था...... सारा दिन बैठ कर संगीत बुनता रहता, और गाँव वालों को सुनाता था.... थके हारे किसान ... उसके संगीत का आनंद लेते .... वो बुलबुल मैना और कोयल को अपने संगीत की धुनें देता और वो बुलबुल मैना कोयल मिल कर गया करती थी........ बहुत ही हसीन दिन थे... जब सूरज भी चमकने से पहले गाया करता था........
किसान अलसुबह संगीत की लय में गाते .... बैलों के गले बंधी खनखनाती घंटियों के साथ लय मिलते जंगल के मध्य होकर दूर खेतों तक जाते थे दूर .. और वो उन खेतों से कोई रास्ता शहर की तरफ से नहीं जाता था....... न ही वह खेत किन्हीं दो शहरों के बीच आते. वहाँ रहंट से निकलते पानी का संगीत भी उसी संगीतकार से बैलों के गले बंधी घंटियों की मार्फ़त मिला करते... गंवाई आदमी, पशु और प्राकृति, सभी लयबदध होकर कोरस गाते... 
रात को संगीतकार नये नए ख्याल बुनता . उनको शब्द देता ... आकार देता और लय देता  ... नया संगीत बनाकर उन सुहानी एकांत रातों में तारों को गवाह बनाकर चंदा को सुनाया करता ... चंदा भी गुनगुनाता हुवा ... सूरज को सिखा जाता बिना किसी गवाही के.... और सुबह पक्षी उसी संगीत को सूरज की लय में लय मिला कर गाया करते थे.  संगीतकार बहुत खुश था, किसान भी......... मजदूर भी... ओरतें और बच्चे भी खुश रहते थे.
दिन सुहाने जल्दी बीतते हैं अत: बीत रहे थे, और बीत गए......... 
सुहानी तस्वीरे दिखाते दिखाते मनमोहनी कालिमायुक्त माया छा गयी ....... दूर पश्चिम से चली कालिमा पूर्व तक फ़ैल गयी...... किसानो ने हल फैंक दिए, रहंट को धरती ने पानी देने से मना कर दिया ...... वो बुलबुल मैना और कोयल बस कैद होकर रह गयी. सभी जंगल और गाँव शहरों के मध्य पीसने लगे...... जो नहीं थे, नए शहर बस गए .... गाँवों को पीसने के लिए.......   
अब ओरतों और बच्चों ने भी मुस्कुराना गुनगुनाना छोड़ दिया था.... और उस क्षितिज के पार से घनी कालिमा आती दिखती...... और पूर्व को अपने आगोश में लेने को तत्पर थी,  
वो संगीतकार उदास हो गया....... दूर कहीं बैठ कर मातमी धुन बनाता – जो राजनेताओं के काम आती........ जब जब वो नेता लोग किसानो के घरों में खाना खाते... वहाँ की वीरान गलियों में पदयात्रा करने जाते तो वो धुन बजायी जाती ..........और फिर बजती ही रही . 

अस्तु, जय राम जी की............