21.10.11

जुगाड वैभव यात्रा ..... आइये स्वागत कीजिए

यात्राओं का युग है जी,

सोचते हैं कि हम एक यात्रा निकाले.. पर मुश्किल है... इस अभागे देश में हर मुद्दे को कोई न कोई पार्टी अथवा दल घेर कर / हांक कर लिए जा रहा है... क्वन सा मुद्दा उठाया जाए कि एक दम सटीक बैठे, मनमाफिक... बेशक न दिलाए सत्ता, पर सत्ता के द्वार तक तो ले जाए....
भाई, ये तो गयी जमाने की बातें थी, खुद्दारी, इमानदारी, सब्र, भरोसा... वगैरह, इन्ही सब पर भाषण दिया जाता था और इन्ही सब पर नेता लोगों को राशन(वोट) मिल जाता था... पर अब पब्लिक परम की स्थिति से उबर चुकी है. अब इन शब्दों लफ़्ज़ों और नारों से काम नहीं चलता ... महान परम है उ, जो आज भी इन शब्दों पर भरोसा जता कर मैदान में डटे हैं, गरीबों के साथ खाना खा, उन्ही का गेंहू डकार कैमरों के सामने ठंडी आहें भरते हैं.
पर हम महापरम हैं की अवस्था को प्राप्त हो चुके हैं, इसलिए सोच रहे हैं, कोई तो हो जो पुराने शब्द जैसे खुद्दारी, इमानदारी, सब्र, भरोसा पर अमल कर सके, हम अमल करेंगे, पुरे प्रदेश में यात्रा निकालेंगे, ‘जुगाड वैभव यात्रा’
जी, ‘जुगाड वैभव यात्रा’, लुच्चे लोग है, जुगाड को भूल गए, जिस भरोसे राज किया, माल अंदर किया, अपनों को ठिकाने लगाया, परायों को अपनाया वो अस्त्र ‘जुगाड’ था, उसे भूल गए.
हम पुरातनपंथी हैं, - जानते हैं जुगाड का बहुत योगदान है इस देश की राजनीति में, अत: जुगाड के वैभव और विश्वास को पुन: लौटना है..... तो ‘जुगाड वैभव यात्रा’ निकालनी ही पड़ेगी.
इस देश ने ऐसे कई नेता दिए हैं ... जिनकी काबलियत एक लोकसभा चुनाव जीतने की नहीं थी, पर जुगाड कर के देश के प्रधानमन्त्री पद पर आसीन हुए हैं, प्रधान मंत्री ही क्यों, राष्ट्रपति और न जाने क्या क्या, अपनी औकात से आगे बड कर ऊँचे औह्न्दे पर आसीन हुए .... मात्र जुगाड की वजह से.
विभिन्नताओं भरे देश में, जहाँ देखा जाए तो कबीले और जाति की खापों का राज होना चाहिए, उस देश में जुगाड से हमारी विधानसभाएं और लोकसभा चल रही है... नहीं, पूरा देश चल रहा है. और उस जुगाड को हम भूल बैठे हैं, आज वक्त है कि जुगाड को पुन: उसके वैभव पर पहुंचा कर ही दम लेंगे...
देखो भाई, एक समाजवादी नेता हुए, खिचड़ी दाढ़ी रखते थे, जिंदगी में कभी मंत्री नहीं बने, बने तो सीधे प्रधानमंत्री... एक विनम्र किसान थे, जुगाड देवता ने उन पर भी कृपा करी.. उन्होंने भी सोते सोते ही सही पर प्रधानमंत्री की कुर्सी को सुशोभित किया. क्या देसी, क्या विदेशी, और तो और फ्रेंचकत दाढ़ी वाले भी तर गए. क्या क्या आपार लीला है जुगाड देवता की, उस को भूल गए...
लेफ्ट राईट सभी मंज़ूर, सभी पर कृपया हुई है, कोई अछूता नहीं रहा, अब आप का समर्थन चाहिए,  ये यात्रा जुगाड देवता के लिए है, ताकि ये देवता अपनी कृपा इस गरीब पर भी करें,
आपके क्षेत्र से भी गुजरेगी जुगाड वैभव यात्रा का..... आइये स्वागत कीजिए, और समर्थन दीजिए, इन्ही कि कृपा हुई तो आगामी विधानसभा में हम जीते या हारें, पर जुगाड देवता की कृपा से लाल बत्ती वाली गाडी जरूर प्राप्त करेंगे.
**परम = पढ़िए काशीनाथ सिंह की 'काशी के अस्सी'

जय रामजी की.

11.10.11

क्या आपने लालटेन की मनमोहक रौशनी में खाना खाया है...

आपने कभी किसी दूर दराज पिछड़े गाँव में खाना खाया है...
दूर कहीं, भारत के पिछड़े गाँवों में, लालटेन की फीकी लेकिन मनमोहक रौशनी में, चूल्हे के मदम मदम आंच पर बनती जीरे की छौंक लगी अरहड की दाल, और दूसरे चूल्हे पर सिकती मोटी मोटी गेंहूँ की रोटी... प्याज और हरी मिर्च का आचार, दाल पर डालने के लिए देसी घी आप संग लाये हैं,... चारपाई पर आपको ये देशज खाना परोसती किसी गरीब घर की बाला...
जी सपने मत देखिये, आज हिन्दुस्तान में ये सब युवराज कर सकता है या फिर उनके चमचे और या फिर वे गरीब ग्रामीण जिनकी जीवनचर्या ही यही है. आप घर में बैठ टीवी पर खबरें देखकर ही इस स्वाद और माहौल का आनंद ले सकते हैं.
मैं शर्त के साथ कह सकता हूँ कि आपने ऐसा खाना नहीं खाया होगा, गर खाया होता तो आप भी युवराज की तरह कुछ हफ़्तों बाद, देर सवेर पिछड़े गाँवों में पहुँच जाते और खाने की मांग करते. खाना तो खा लिया साहेब, और अखबारों व अन्य मीडिया में आ भी गया; राहुल ने दलित के घर खाया खाना

9.10.11

लो भाई अपना रावण फूंको... हम चले - संजय कान्त

हमने इस बार दशहरा नहीं मनाया .....

जी, पिछले कई वर्षों से दशहरा का कार्यकर्म बहुत ही धूमधाम से मनाते आ रहे हैं... लगभग २०-२१ वर्षों से.. उस समय तो कई लड़के बहुत छोटे थे... और कई तो पैदा ही नहीं हुए थे ... खासकर जो शोभायात्रा में राम लक्ष्मण बनते है ... जुड़वाँ भाई, गोली सोनी... जैसा नाम वैसे ही चंचल. एक समय आया कि ये लव कुश बन कर सजे हुए घोड़े की लगाम पकड़ कर चलते थे, फिर वनवासी राम लक्ष्मण, और अब तक राजसी राम लक्ष्मण के स्वरुप में दशहरा की झांकी में अपना योगदान देते थे.

पर सबसे महतवपूर्ण योगदान रहता था संजय भाई का, संजय कान्त. वो 'रावण का काल' की झांकी सजाते थे, जो कि हमारे दशहरे की मुख्य आकर्षण होती थी. आसपास कि कई कालोनियों के दशहरा कमेटियों के प्रतिनिधि उनको अपने यहाँ बुलाते थे और मन माफिक पैसा भी देने को तैयार रहते ... पर तिहाड गाँव का प्रेम संजय को कहीं जाने नहीं देता..

तिहाड़ गाँव के फ्रंटियर भवन में जहाँ, सभी किरदार तैयार होते.... पर संजय अपनी तैयार खुद करता. मेक-अप वगैरह भी... बहुत विभात्सव लगता था... उसके कमर में जंजीरें बंधी रहती... जिसे ६-७ कार्यकर्ता पकडे रहते थे... एक हाथ में मिटटी के तेल की बोतल और दूसरे हाथ में मशाल.... मिटटी के तेल को मुंह में भर कर मशाल पर फुहार सा छोड़ता जिससे कि आग का भयंकर गोला बन जाता था, पब्लिक तित्तर बित्तर हो जाती... पर 'रावण के काल' को न छोडती... उमड़ी रहती ...

कम से कम १२ ढोलों के शोर के बीच संजय का वो अंदाज़ देखते ही बनता था.... आस पास की कोई और शोभा यात्रा तिहाड गाँव की यात्रा के मुकाबले काफी फीकी लगती थी, चाहे उन लोगों ने जितना मर्ज़ी पैसा खर्च किया हो. वो दीवानापन... वो बिंदासपन सिर्फ तिहाड के लड़कों में ही दीखता..

हर साल की भांति संजय इस बार भी सावन में अमरनाथ की यात्रा पर गया था सेवा करने ... पर वहाँ नदी में गिर गया ... जिसे बचाया न जा सका और वो भोले का अनुरागी भोले के धाम में ही फना हो गया..

शाम सात बजे मैं चौक पर बे-मन से आया ... तो रुवांसा चुन्नू मिला.... भरआई आवाज़ में बोला ... भैया अब तक तो जलूस वापिस आ जाता और संजय रेस्ट करने घर चला गया होता, ये बोल कर लो भाई अपना रावण फूंको... हम चले,

मैंने भी यहीं जवाब दिए, हाँ चुन्नू - संजय यही कह कर अपने पक्के घर चला गया, लो भाइयों अपना रावण फूंको... पर मन नहीं माना इस बार.

1.10.11

सरकारी सांडों का निजीकरण.

निजीकरण हो गया ......

पुरे देश का..

देश, बैंक, बिजली, रोड, पुल सब कुछ किसी न किस अनुपात में निजी हाथों को सोपं जा चुके हैं... पर ये समझ नहीं आता सांड कैसे छूट गया.
बात आज जुम्मन मियां के मुंह से निकली और हमने तुरंत लपक ली. पडोसी, कल्लन मियां को कह रहे थे;
"मियां लौंडे का बियाह क्यों नहीं कर देते, कब तक दाडी-जुल्फें बड़ाए, यारों की बाईक उधार मांग सरकारी सांड की तरह आवारागर्दी करते रहेंगे"
ओउचक रह गया मैं..
"सरकारी सांड; यानी/मतलब... जुम्मन चच्चा; ये क्या बात कर दी सरकारी सांड वाली"
अरे भाई सरकारी सांड; यानी .... कहीं मुंह मार ले, किसी की भी ढकेल पलट दे, किसी के भी पीछे भाग ले जैसे दिल्ली मुन्सिपल कारपोरशन के कर्मचारी... कहीं भी... किसी भी समय.. सरकारी नुमायेंदे हैं इसीलिए ... कुछ भी कर लेते हैं.. और मन माफिक पैसा पा कर ही बच्चू जी को छोड़ते हैं... तभी सरकारी सांड कहा जाता है.
यही इन लोगों का निजीकरण हो जाए, तो तरीके से तह्सीब से पेश आते हैं जैसे कि आजकल एयरटेल, वोडाफोन, वगैर निजी कंपनियों के मुलाजिम... सर के बिना बात नहीं करते, ये नहीं देखते सामने वाला, लुंगी पहने – बिना बनियान के है क्या वो सर कहलाने के कबिल है या नहीं, पर सर कह कर बात करते हैं; क्या सरकारी सांड यानी एमटीएनएल (दिल्ली, मुंबई के इतर – बीएसएनएल पढ़े) के नुमायेंदे होते ... और सर लगा कर बात करते ... नहीं मियां वो सर पकड़ कर बोलते थे... फोन ठीक नहीं होगा... अगले १०-१५ दिन तक... समझे... इंसान वही... (सांड वही)... काम वही, पर निजी होते ही व्यवाहर बदल गए, औकात बदल गए..