30.12.11

राजधानी में सर्दी का प्रकोप - नपुंसक जनता एक बार फिर गिलाफ में गुस गयी

कारवाँ गुजर गया – गुबार देखते रहे .. वो निकल गयी बस से और हम बस देखते रहे. रोड पर साये उस कुहासे को दिमाग में औड लिया, माने, औड ली चुनरिया तेरे नाम की. रोड पर छाई पीलिया लिए वो प्रकाश स्तंभ भी मात्र देखते रहे ... गवाह बने रहे जो वक्त आने पर गवाही नहीं देंगे (पता नहीं क्यों – उनका पुख्ता वायदा लग रहा है), कि वो तेरे लिए खड़ा था जालिम – तेरे लिए, मैं ये जानता हूँ – तेरे बस में जाने के बाद वो बोझिल क़दमों से चल दिया था. न दामन ही पकड़ा, न उसने पुकारा, मैं आहिस्ता आहिस्ता सा चलता ही आया – बस तेज रफ़्तार से निकल गयी – और मैं – और मैं उससे जुदा हो गया – मैं जुदा हो गया. बेवफा कुछ तो ध्यान दिया होता. नहीं. ये दिल्ली है. सुना है चच्चा ग़ालिब की भी दिल्ली थी और पर हसीनाएं तब भी बेवफा थी और आज भी हैं... बड़े बेआबरू होकर तेरी कुचे से हम निकले ग़ालिब. चच्चा ने जब ये शयर इन बेमुर्रव्त बगेरत के लिए लिखा होगा तब भी शर्म नहीं आयी थी और आज क्या आएगी – जब शोर्ट्स पहन कर देर रात महानगरीय सडकों पर चहलकदमी करती हैं.

दिल वालों की है दिल्ली.. जी साहेब, अब मान गए... तभी तो यहाँ आकर बना हीरो मुंबई में जाके जीरो हो जाता है और देश के बाकी हिस्सों के जीरो (जो चुनाव नहीं जीत पाते) यहाँ दिल्ली में (उच्च सदन) में हीरो हो जाते हैं - कि दुनिया तमाशा देखती है रात के बारह बजे तक ... मुआ राज्य सभा न हुआ फिरोजशाह कोटला का मैदान हो और पाक-हिंद का क्रिकेट का मैच हो.


28.12.11

सांप

शनिवारी रात भयंकर तरीके से गुजरी ... नहीं वैसे नहीं. सांपला ब्लोग्गर मीट से वापसी में आशुतोष की गाडी खराब हो गयी ... और मंथर गति से चलने लगी.. कई जगह ऊँचाई पर जाने के लिए धक्का भी लगाना पड़ा.. जैसे तैसे कीर्ति नगर मेट्रो स्टेशन तक उसे पार्क किया. उसके बाद दिल्ली के औटोरिक्शा वालों से सर खपाई अलग... घर पहुँचते पहुँचते रात के १२ बज़ गए.. जाहिर है अगले अगले दिन चेहरे पर १२ बजने ही थे... सो मूड ठीक करने की गरज से आवारागर्दी करने झील पार्क की तरफ निकल गया. सांपला से आते समय जो जो घटित हुआ उस पर पोस्ट पता नहीं कौन लिखेगा – संजय या आशुतोष, या फिर बाकी कई यादगारी घटनाओं की तरह ये भी बताने को रह जायेगी.

झील - जो सूख चुकी है, उसी सूखी झील के किनारे धूप में बैठ कर बातें करना बहुत अच्छा लगता है. गुनगुनी सी धूप में बैठकर बतिया करना या गप्पे मारना या खुद को टटोलना - कभी कभार ही ये मौका मिलता है – जैसे चुराए पल. पर इन पलों में भी शांति भंग की उस चूहे मार सांप ने. शायद मेरी ही तरह धूप में विचरण करने निकला हो और ठीक मेरे पैरों के आगे से निकल गया. महाशय सफाई से मेरे सामने से निकल गये - बिना मेरा हालचाल पूछे. स्तब्ध रह गया मैं, कई दिन से सांप ला सांपला हो रहा था, और हम तो लाये नहीं, महाराज खुद मेरे सामने उपस्थित थे. :) ... ध्रुव बेटा सांप देखना है तो झील के पास आ जाओ - मैंने ध्रुव को फोन कर बताया और आते ही वह तुरंत फोटू खिचने लगा ... पहले क्लिक के साथ उसमे वाइल्ड डिस्कवरी फोटोग्राफर का दंभ नज़र आने लगा. आजकल की जेनरेशन के साथ चूहा, हल्दी की गाँठ और पंसारी वाली बात क्यों है. कुछ और बालक भी आ गए... पत्थर मारने का उपकर्म करने लगे अशांति सी हो गयी उस सूखी झील में. (पता नहीं क्यों वो बच्चे सब हमारे महान राजनीतिज्ञ और सांप अन्ना हजारे लगने लगा - जैसे अन्ना घर से बाहर निकलते हैं और उनमे अशांति सी हो जाती है) बेचारा सांप... हैरान परेशान दायें बायें भागने लगा... मैं थोडा परेशान हुआ, सांप की बाबत; बच्चो को पत्थर मारने से मना किया और उन्हें बताया की सभी सांप जहरीले नहीं होते... ये बेचारे तो चूहों को खा कर जीवन यापन करते हैं. उन्हीं चूहों को जो हमारे घर और रसोई में कोहराम मचाये रखते हैं.

25.12.11

राजू का जवाबी पत्र

राजू, 
कैम्प कार्यालय : खुंदकपुर
दिनाक : २५ दिसंबर २०११ 

अंधकपुर

दिखिए कैसी विडंबना है कि आपको अपने कुल का नाम अभी तक याद है... जबकि अभी तक कई लोग कुलनाम याद रखते हुए भी अपने कुल को भूले बैठे हैं... और इसके लिए वो उक्त जानकारी गूगल बाबा के साभार प्राप्त कर रहे हैं, और मज़े की बात तो यह है कि तमाम तरह की दिमागी हार्ड डिस्क, पेन ड्राइव के स्पेसे फुल होने के बाद भी उसी में भरने का विफल प्रयास कर रहे हैं जैसे रुकमनी की  ख़ुशी कि भांति. पर अमृत तो चलनी में न रुका है और न रुकेगा...
आपका पत्र प्राप्त हुए कई दिन बीत गए -  सोचते विचारते, कई विचार मन के सागर में, जो अपने लिए शब्द तलाशने उतरे थे, वापिस न पाए और इस खुंदकपुर में कैम्प लगने के कारन खुद पर और खुंदक बढ़ चली गयी.... जो कल सांपला में जाकर भी नहीं उतरी... 
आचार्य, खुद को टुकड़ों में बाँट कर देखना और फिर से टुकड़ों को एकत्र कर अपना एक नया रूप बनाने की कला में आप विशेष रूप से दक्ष हैं ... और ये हुनर मैं भी सीखता रहता हूँ, पर जब अपने ही हिस्से का एक टुकड़ा कोई लेकर उड़ जाए तो बहुत विडंबना होती है... कैसे अपने को पूर्णता एकीकृत करें,.... खासकर तब जब जमीर ही खंड-खंड विभक्त हो.