18.1.13

जैकेट


मेरी माताजी कि आदत है, कि कितनी ही रजाइयां कम्बल को संभाल कर रखती हैं. ये न केवल स्टोरेज का ही काम है वरन उनको धुप में डालना.. उनमें दवाई की गोलियाँ रख करना. मुझे बहुत कोफ़्त होती है. क्या फायदा इतना सामान संभाल कर रखना. बोलती है - एक दिन भी मुश्किल हो जाता है कि घर में कोई मेहमान आ जाएँ और कम्बल या रजाई न हो तो. यही हाल बर्तनों और क्राकरी का है.... जो साल में एक आधी बार ही इस्तेमाल होते हैं. पुरे साल संभाल कर रखना.सही में उस एक दिन के लिए कितने कष्टकर कार्य करने पड़ते हैं. पर ये कार्य भारतीय औरतों की आदत में शुमार हो जाते हैं.

पर मेरा सिद्धांत अलग है  बेकार की वस्तुओं से घर नहीं भरना चाहिए,  जब आवश्यकता हो तभी वह वस्तु खरीदनी चाहिए.

ये सिद्धांत कभी कभी नुक्सानदायक ही हो सकता है. जैसा की इस सर्दी में मेरे साथ हुआ. घर की महिलाऐं (श्रीमती, माताजी, बहन के साथ) गर्म कपड़े खरीदने मार्केट गयी थी. उन्होंने सोचा मेरे लिए भी एक जैकेट ले लिए जाए अत: एक जैकेट पसंद भी कर ली और नाप चेक करने के लिए मुझे मार्केट बुलाया गया. मेरे जैसे जंतु को दिल्ली शहर की मार्केट में वैसे भी बहुत घबराहट होती है.  न नुकर करने के बाद मार्केट जाना पड़ा.

उस समय सर्दी इतनी नहीं थी, जैकट का मूल्य ३८९९ मेरी समझ में आया नहीं, और ८-१० कि सर्दी रहती है उसके लिए क्यों ४००० का जैकेट लिया जाए. ये बात बेमानी लगी. बाद में तो बेकार ही संभल कर रखना पड़ेगा. उस दिन के वाक्या के कारण मुझे बहुत सुनना पड़ा - "१ घंटे उस दूकान पर इन्तेज़ार करवाने के पश्चात ड्रामा कर के भाग गए थे. वहाँ बेज्जती हुई वो अलग. कभी जैकेट खरीदी तो देखते हैं घर में कैसे लाते हो." स्पष्ट चेतावनी थी जी.