24.4.13

आह ! हंगामेदार देश हमारा



आह ! हंगामेदार देश हमारा
खुल गया मानो मुद्दों का पिटारा
उत्तर से दक्खन तक सब-हारा सब-हारा

संस्कारहीन युवा – सम दुश्शासन चरितर
राहती रहीं बेटियां और शर्मशार हुई नार
रक्षक, व्यवस्था, कानून - सब हुए लाचार

6.4.13

जय प्रकाश उर्फ जे पी

अरे भाई रे, नीचे से उपर आते आते इतने कागज के बंडल दिखे – मुझे तो घबराहट होने लगी,– ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी कागज की फेक्ट्री में आ गया हूँ, वैसे आप क्या छापते हैं,
सफ़ेद बाल मोटा चश्मा और उम्र लगभग ७०-७२ साल, प्रश्न के साथ मुस्कुराहट थी,
मैंने टेबल से टिफिन एक किनारे किया कि पहले इस महानुभव से निपटा जाए भोजन थोड़ी देर बाद लेंगे.
कहिये अंकलजी (अंकलजी - दिल्ली में किसी भी अजनबी के लिए प्रचलित शब्द) आप कहाँ से और कैसे आना हुआ.
उसने उल्टा मेरा ही नाम पूछ लिया,
आनंद सभी एक ही जगह से आते है, पानी पिलाओ. आदेश के साथ बुड्डे ने कुर्सी कब्जियाई. मैंने पानी का गिलास उसके सामने कर दिया.
उसके बाद प्रेस और छपने वाले जॉब के विषय में बताया.
समय हो गया था कर्मचारियों के लिए ३ बजे वाली चाय आ गयी...
अंकलजी ने चाय मना कर दी, बोले भोजन का समय है.
प्रिंटिंग से शुरू हुई बातें सामाजिक सरोकार और बच्चों के संस्कारों पर होने लगी ..
आप खाना खायेंगे...