6 अक्टू॰ 2012

फिर से वही झील और वही छठ पूजन

एक बार फिर से घोषित करना चाहता हूँ कि मैं तिहाड़ गाँव झील वाले पार्क में रोज सुबह जाता हूँ, और सूर्य देव के विपरीत मेरी सुबह का कोई समय नहीं है. जब जागो तभी सवेरा... आज ८.४० पर गया... और पार्क के गेट पर ही ठिटक गया ...
तिहाड़ झील के घाट पर भई नेतन की भीड़.
अधिकारी सब मनन करें कि दे नेता बहुते पीड़
   लाल बत्ती वाली गाडी और माननीय नेता, युवा नेता, छोटे नेता, बड़े नेता, अफसर नेता, मजदूर नेता, पूंजीवादी नेता और समाजवादी नेता जैसे लोगों की भीड़ थी. छठ पूजा की तैयारी को लेकर पशिचमी दिल्ली से सांसद श्री महाबल मिश्र जी का दौरा था.

गत वर्ष - छठ पूजा के लिए अपनी मेहनत से बना घाट.



गत वर्ष : छठ पूजन के लिए तैयारी करता श्रद्धालु
   49 एकड़ में फैले हुआ यह पार्क, जिसमे पुराना जोहड भी है, डीडीए के अंतर्गत है. पिछले कई दिनों से इस जोहड (जिसे झील का नाम दे दिया गया है J) में उगी घास को हटाया जा रहा था. वैसे ही मैं समझ गया था कि छठ पूजा नज़दीक है अत: उसी के तैयारी हेतु इस घास को हटाया जा रहा है. वैसे हमारे देश की की अफसरशाही संसार में सबसे विचित्र है. ये जोहड सुखा पड़ा था तो इसमें कोई घास फूस नहीं थी, जैसे जैसे बारिश आयी इसमें पानी भरने लगा और कुछ पानी आसपास लगे ट्यूववेल से भरा जाने लगा तो ये घास भी उगनी शुरू हो गई.... उसी समय इसका सफाया क्यों नहीं हुआ ? जब बारिश रीत चुकी है और ये घास बड़ी होकर गलने लग गयी तो जो थोडा बहुत पानी जोहड में है वो सड़कर काले रंग का हो, बदबू मारने लगा है - कैसे पूजा होगी? अब इसमें से से घास निकालनी शुरू कर दी गयी है..... पुरे तालाब में से तो घास निकालना बहुत दुरह कार्य है... छठ पूजा निम्मित मात्र किनारों से निकाली जायेगी.

4 अक्टू॰ 2012

मैंने भी खैनी खाना शुरू किया.

कई दिन से कोई भी पोस्ट या टीप लिखते हुए आलस सा आता है... पता नहीं क्यों. अत: कुछ लिखने की कवायद के नाम से बक बक शुरू कर रहा हूँ, मित्रजन संभाल लेंगे :)

अस्वीकरण :  इस पोस्ट में तम्बाकू या उससे जुड़े हुए कोई भी प्रोडक्ट की मार्केटिंग का प्रपंच नहीं रचा जा रहा. तम्बाकू को लेकर जो जी में बार बार बातें  याद आती हैं उन्हीं को शब्द रूप देने हेतू इस पोस्ट को लिखने बैठा हूँ.

आर्टिस्ट (चित्रकार – ग्राफिक डिजाइनर) निरंजन
    पुरानी बात है, जब मैं प्रेस लाइन में डी टी पी ओपेरटर के रूप में कार्य करने लग गया था और ‘उस्ताद’ का खिताब भी प्राप्त कर लिया था. पर जहाँ नौकरी करता था मात्र कम्पोजिंग ही होती थी और किसी प्रेस को देखने के लिए मैं हमेशा उतावला रहता था. पर मौका नहीं मिलता. ऐसे उमंग भरे दिनों मैं राह चलते, दिवार पर चस्पे पोस्टरों को खासकर जैमिनी सर्कस के पोस्टरों को बड़े चाव से देखता था, कलात्मक तरीके से हाथ से ही लिखे और फ्लोरोसेंट इंक से छपे पोस्टरों को. उसी दौरान मेरा परिचय एक आर्टिस्ट (चित्रकार – ग्राफिक डिजाइनर) निरंजन से हुआ. बिहार या यु पी का तू पता नहीं पर था पूर्व का बाशिंदा... घोर काले रंग का. तिहाड़ गाँव में ही एक कमरा किराए पर ले कर रहता था. जिसमे कुछ उसकी ड्राईंग का सामान (रंग, कागज, ब्रुश) और कुछ स्क्रीन प्रिंटिंग का... बाकि बची जगह में एक छोटी सी फोल्डिंग चारपाई के साथ एक स्टोप और २-४ बर्तन. दूकान-मकान सभी एक १० बाई १० के कमरे में. गर मैं कभी जल्दी छुट्टी पा जाता तो घर में शक्ल दिखाने के बाद मेरा ठिकाना निरंजन का कमरा ही होता था. बेचारा बहुत गरीब आदमी था. कहीं से स्टिकर बनाने का काम मिल जाता था तो पहले डिजाइन बनाता फिर उसको खुद ही गम्मिंग शीट पर छाप कर सप्लाई करता था. जिसके पैसे भी उसे कभी मिलते कभी नहीं.. जैसे तैसे जुगाड कर जिंदगी चलाता था.

1 अक्टू॰ 2012

"क्या हिन्दुस्थान में हिंदू होना गुनाह है ?" का प्रोडक्शन.

राष्टीय गौरव संस्थान ने अशिवनी कुमार, संपादक पंजाब केसरी की पुस्तक "क्या हिन्दुस्थान में हिंदू होना गुनाह है ?"  महेश समीर जी के संपादन में प्रकाशित की. मैं पिछले सप्ताह उसी में व्यस्त रहा.

गत शुक्रवार को महेश जी का आगमन हुआ और अपने कार्यकर्म की रूप रखा बताने लगे, कि ३० सितम्बर को पंचकूला, हरियाणा में  उनका संस्थान एक कार्यक्रम कर रहा है - जिसकी डॉ सुब्रामनियन स्वामी अध्यक्षता करेंगे और श्री अशिवनी कुमार के कुछ चुनिन्दा सम्पादीय को एक पुस्तक की शक्ल में विमोचित किया जाएगा. ये मुद्रण व्यवसाय की विडंबना ही है कि कार्यकर्म के कार्ड तो पहले से ही बंट जाते है और किताब की सामग्री जिसका विमोचन होना है उसका अता-पता नहीं होता. :) 

मैं लगभग १९९० से लगभग २० वर्षों तक पंजाब केसरी का नियमित पाठक रहा हूँ, और उनकी कलम और राष्ट्रवादी विचारों से बहुत प्रभावित हुआ हूँ.  मेरे लिए ये बहुत खुशी का मौका था कि उनके लिखे लेख मेरी प्रेस में छपेंगे.

मैंने पंजाब केसरी पढ़ना क्यों छोड़ा ये भी काफी दिलचस्प है.
मैं सुबह अखबार खोल कर सबसे पहले ज्योतिष वाले पन्ने पर अपनी कर्क राशि देख कर दिन का अनुमान लगाता था ... कैरियर का उठान था, अधिकतर समय भयभीत ही रहता था. जिस दिन राशि नहीं छपी होती - उस दिन सुबह से ही परेशान रहता था. जिस दिन राशि बढिया आयी, उस दिन बोस को भी बोस नहीं समझना और जिस दिन राशि बेकार आई उस दिन चपरासी से भी डर कर रहना. :) ये बहुत ही भयानक आदत हो गयी थी. मैं अपनी आदत बदलना चाहता था, तो  लगा कि पहले पंजाब केसरी को पढ़ना छोडो. और एक बात और.... अखबार पढ़ने में दिक्कत आने लगी, एक दिन चाचा जी ने पंजाब केसरी देख कर कहा कि अंधा होना है तो ये अखबार पढ़ना. :)  ये बात मेरे घर कर गयी. पर बाद में पता चला कि मेरी नज़र कुछ कमज़ोर हो गयी थी. जो भी हो... २००९ से सभी अखबारें बदल बदल कर आने लगी... मैं अपना टेस्ट बनाने लगा. अन्त: मैं दैनिक हिन्दुस्तान रुक गयी.. पर अब अखबार पढ़ने का चाव भी कम हो गया है.

8 सित॰ 2012

फ्रस्टियाओ नहीं मूरा...


फ्रस्टियाओ नहीं मूरा,
नर्भासाओ नहीं मूरा, 
एनीटाइम मूडवा को 
अप्सेटाओ नहीं मूरा,

जो भी रोंग्वा है उसे - सेट राईटवा करो जी,
नहीं लूजिये जी होप, थोडा फाईटवा करो जी, मूरा .....

एनीटाइम मूडवा को 
एनीटाइम मूडवा को 
अप्सेटाओ नहीं मुरा,

ज्यादा लिखने की आवश्यकता नहीं है; आप भावनाओं को समझिए और ये गेंगस आफ वासेपुर इसी गीत सुनिए....


जय राम जी की,

27 अग॰ 2012

ध्रुव पूर्वा और हाथियों का घर


बच्चपन है साहेब,
बच्चपन.....
बस अपने धुन में मग्न रहने का समय...

ध्रुव और पूर्वा पिछले सप्ताह मेक डोनल गए थे? जी ये मेरे बच्चे हैं, और मेक डोनल गए थे, ये मैं भरी पंचायत में स्वीकृत कर रहा हूँ (थोड़ी शर्म के साथ, क्योंकि ऐसे वातावरण में, मैं अपने को एडजस्ट नहीं कर पाता). वहाँ से खाली डिब्बे/रेपर साथ ले आये, बोले पापा इसकी झोपडी बनायेंगे. (रिसाइकल और क्रेटीव के लिए आइडिया बुरा नहीं था.) निसंदेह इस झोपड़ी को बनाने में मेरा योगदान भी भरपूर है. साथ में ही इन्हें खिलोने भी मिले थे - हाथी. राम जी का शुक्र है कि एक से ही खिलोने मिले.

जब झोपड़ी बन के तैयार हो गयी तो आगे हाथी कर दिए और वे बोले पापा, ये हाथियों का घर है..

मैं मुस्कुराया....

हाँ, पडोसी राज्य में आजकल हाथी बेघर हो गए हैं. जो भी  हो, अपनों ने बेशक हाथी को दरकिनार कर दिया हो, पर बडकी मैडम का कोई भरोसा नहीं .. कब इनकी जरूरत पड़ जाए. अत: उन्हें समझाल कर रखने के लिए घर की जरूरत है. तुम लोगों ने ठीक किया जो हाथी के रहने के लिए जगह दे दी : )  
एक अफ़सोस है , हाथी नीले रंग में नहीं थे, ना ही वो झोपड़े. नहीं तो अगली बार नीली सरकार बनाने पर बहनजी से इस विषय में रोयल्टी की दरकार हो सकती थी. :)

जै राम जी की.

24 अग॰ 2012

मुस्कुराइए

मुस्कुराइए कि सरकार मुस्कुरा रही है, क्योंकि 'आपजी', २ जी से बाहर आ गए हैं, बिना किसी नुक्सान के.  मैदाम ने राहत की सांस ले, सरदार जी को भी धीरज बंधाया, जब इतनी ही जीरो वाला 2 जी सरकार की मुस्कान नहीं छीन सका तु ये मुया कोयला क्य छीनेगा : वो भी तब जब मीडिया ने इसे 'कोलगेट' नाम दिया है,

उधर सोशल मीडिया वालों पर निगाहें तो कभी से टेढ़ी थी, अच्छा ही हुआ, 'पडोसी' की हरकतों से कुछ लोगों ने  दंगा फसाद कर दिया और हमेशा की तरह फिर निशाने पर संघ है. अत: संघ परिवार के मुखपत्र के ट्विटर अकाउंट को बंद कर दिया.

18 अग॰ 2012

सोशल मिडिया : बंदर के हाथ में उस्तरा.


खबरें कहीं से भी आ सकती हैं और कुछ खबरें आपको बैचेन करती हैं – इसी बैचेनी में बन्दा बक बक करने लग जाता है यही दीपक बाबा की बक बक है.
और जब ‘बक बक’ कोई सुनने के लिए तैयार नहीं होता समय नहीं दे पाता तो ये बन्दा ब्लॉग्गिंग करने लगता है. ब्लॉग्गिंग का तात्पर्य मात्र पोस्ट लेखन से नहीं है, टिप्पणी लिखना भी ब्लॉग्गिंग का एक हिस्सा है ये मैंने माना है - पर आलस्य और कार्य दबाव अपने चरमोत्कर्ष पर है. अब देखिये जब से म्यांमार की घटनाओं पर अपने यहाँ प्रतिक्रिया हो रही है तब से मुझे अपने बिहारी लाला (श्री सलिल वर्मा) की एक टीप याद आ रही है, जिनमे वो मिस्र की घटनाओं में ब्लोग्गिंग को महत्व प्रदान करते हैं.
दीपक बाबा जी! उम्मीद है आपका सारा तकलीफ अब खतम हो गया होगा.. या फिर परहेज चल रहा होगा. तो सबसे पाहिले आपके स्वास्थ्य का कामना करने के बाद ब्लॉग्गिंग के ताकत का नमूना बताने के लिए मिस्र का उदाहरण देना चाहेंगे.. अउर टाइम्स ऑफ इंडिया के एक खबर का बिस्वास किया जाए तो एहाँ भी ब्लॉग्गिंग पर सिकंजा कसने का तैयारी चल रहा है.. टिपण्णी देना अउर उसका जो नियम कायदा है ऊ बीसी पर नहीं बोलते हुए हम तो एही कहेंगे कि टिपण्णी ब्लोगिंग में संबाद कायम करता है. जैसे जेतना लिखा जाने वाला अच्छा ही है नहीं कह सकते वैसे ही सब टिपण्णी सार्थक है, ई भी नहीं कहा जा सकता.. ब्लॉग्गिंग में मेरा सफ़र.........2 पर

8 अग॰ 2012

इक रास्ता है ज़िन्दगी जो थम गए तो कुछ नहीं


इक रास्ता है ज़िन्दगी जो थम गए तो कुछ नहीं
ये क़दम किसी मुक़ाम पे जो थम गए तो कुछ नहीं
इक रास्ता है ज़िन्दगी ..

बहुत सुंदर गीत है साहेब, जो थम गये तो कुछ नहीं, हमारा जीवन यात्रा ही तो है... ये कदम किसी मुकाम पर रूकने नहीं चहिये. चरेवेति चरेवेति... चलते रहे.... कहीं मंजिल तो होगी. नहीं नहीं, मंजिल कहीं नहीं होती, कई बार हम दिशा हीन होते है, पर मन ही मन में कहीं न कहीं एक पुकार/आवाज़ जरूर होती है .... अपने गंतव्य की तरफ, वहीँ जहाँ ढलान होती है, शायद मंजिल, किसी प्रेयसी माफिक वही कहीं हमारा इन्तेज़ार कर रही होती है .... और उसी प्रियतम/ प्रेयसी को मन में बसा चलना है... यही जिंदगी है,... नदी माफिक... जहाँ ढलान दिखी वहाँ राह बना लिया – ये मालूम होते हुए भी कि सागर या फिर वो बड़ी नदी जिसमे मिलना है बहुत दूर है. पता नहीं कितने दुःख रुपी नाले अभी और समायेंगे .... पर चलना है गर हार मान ली तो गंतव्य पर पहुंचे पहुँचते नदी नाले में भी बदल सकती है और हिम्मत हुई तो वही छोटी नदी गंगा में मिल कर गंगा जल में परिवर्तित होने का साहस भी रख सकती है. यानि जितना भी कचरा आ जाए, सभी कुछ बहा ले जाने का साहस... जिंदगी.
दुखो का तूफ़ान, प्रियों का बिछुडना, कुछ कुटिल लोगो का जिंदगी में आना, बहुत कुछ दुष्कर लग सकता है जीवन यापन के लिए. लगता है कि यहीं कहीं हम ठहर गए हैं कुछ नहीं है - इन लोगों में जीवन खराब कर दिया. पर ध्यान से सोचिये ये मंजिल नहीं, मंजिल बहुत आगे है, अत: इन लोगों को यहीं कहीं दफ़न कर दीजिए अपने विराट व्यक्तित्व में और आगे चलिए... किसी छोटी नदी माफिक - कहीं तो गंगा से संगम होगा ही.
गीत सुनते सुनते, दिमाग इसी ओर चला गया कर्म प्रधान जीवन है और ब्लॉग्गिंग ठंडी छाँव कुछ देर सुस्ता लिया और ये दो लाईने लिख दी. जय राम जी की.