23 मई 2013

छडो जी, सानु की... वडे लोकां दियां वडी गल्लां....


मैं कब से बकवास करता आ रहा हूँ, पर अब सरकार को भी पता चला है कि आई पी एल वाकई एक गन्दा खेल है. क्रिकेटर, उनकी पत्नियाँ, उनकी माशुकें, उनके मित्र, उनके लोग, उनके बुकी, उनके सौदे और उनके सट्टे और कहीं तों दामाद भी सभी – सभी इस हमाम में नंगे नज़र आ रहे हैं, और मज़े की बात ये कि उनको इस बात पर लज्जा भी नहीं आ रही, छडो जी, सानु की... वडे लोकां दियां वडी गल्लां....

20 मई 2013

कविता, औरत और क्रांति

क्या ये जरूरी है कि कवि बना जाए
क्यों न एक इंसान बना जाए
या फिर सवेदनशील पाठक
जो अच्छे कवियों की रचनाओं को पढ़े
खाली समय में उन्हें गाये गुनगुनाये
मनन करे, पर इससे अच्छा 
एक नागरिक भी तो बना जा सकता है
जो जब कहीं अपनी ही जुस्तजू में
धक्के खाता रहे
फिर भी दुष्यंत को गुनगुनाता रहे
सोचो कवियों, सोचो
गर अच्छे नागरिक नहीं होंगे,
तो कहाँ से आयेंगे क्रांतिवीर
कौन तुम्हे पढेंगें, मनन करेंगे
तुम्हारी अग्नि से उर्जा पायेंगे  

24 अप्रैल 2013

आह ! हंगामेदार देश हमारा



आह ! हंगामेदार देश हमारा
खुल गया मानो मुद्दों का पिटारा
उत्तर से दक्खन तक सब-हारा सब-हारा

संस्कारहीन युवा – सम दुश्शासन चरितर
राहती रहीं बेटियां और शर्मशार हुई नार
रक्षक, व्यवस्था, कानून - सब हुए लाचार

6 अप्रैल 2013

जय प्रकाश उर्फ जे पी

अरे भाई रे, नीचे से उपर आते आते इतने कागज के बंडल दिखे – मुझे तो घबराहट होने लगी,– ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी कागज की फेक्ट्री में आ गया हूँ, वैसे आप क्या छापते हैं,
सफ़ेद बाल मोटा चश्मा और उम्र लगभग ७०-७२ साल, प्रश्न के साथ मुस्कुराहट थी,
मैंने टेबल से टिफिन एक किनारे किया कि पहले इस महानुभव से निपटा जाए भोजन थोड़ी देर बाद लेंगे.
कहिये अंकलजी (अंकलजी - दिल्ली में किसी भी अजनबी के लिए प्रचलित शब्द) आप कहाँ से और कैसे आना हुआ.
उसने उल्टा मेरा ही नाम पूछ लिया,
आनंद सभी एक ही जगह से आते है, पानी पिलाओ. आदेश के साथ बुड्डे ने कुर्सी कब्जियाई. मैंने पानी का गिलास उसके सामने कर दिया.
उसके बाद प्रेस और छपने वाले जॉब के विषय में बताया.
समय हो गया था कर्मचारियों के लिए ३ बजे वाली चाय आ गयी...
अंकलजी ने चाय मना कर दी, बोले भोजन का समय है.
प्रिंटिंग से शुरू हुई बातें सामाजिक सरोकार और बच्चों के संस्कारों पर होने लगी ..
आप खाना खायेंगे...

8 मार्च 2013

प्रणाम


सुबह चार बजे से रात्री दस बजे तक ....
तुम्हारे अथक परिश्रम को प्रणाम 

6 मार्च 2013

जफर की मौत...

इस सेंट्रल पार्क में बहुत गंदगी थी, झील में पास के गाँव की भेंसे, सूअर पड़े रहते. जहाँ तहां पालतू कुत्तों की शीट नज़र आती. पर एक पालतू कुत्तों की शिट को नज़र अंदाज़ कर लें यानि नाक रुमाल से ढकने की बजाय नज़र को रुमाल से ढक दे तो पार्क साफ़ सुथरा मालूम होता है. पार्क की थोड़ी बदली तस्वीर से नए नए आये एस ओ साहेब खुश हैं. पर अपनी खुशी किस्से बांटे – सैर करने वाले बुद्धिजीवियों का काम है मीन मेख निकलना. सोचा लोकल मीडिया मोहल्ला4यू को ही बुला लिया जाए जो पिछले वर्ष आकर पार्क में फैली गंदगी को लेकर महकमे की बहुत छिछ्लेदार कर गया था.
सेंट्रल पार्क के इस नए रूप से परिचय करवाया जाए. एस ओ साहेब से किसी तरह मोहल्ला4यू लेनल वालों से संपर्क किया जो गत वर्ष आये थे. और सुबह ११ बजे का समय मिला.
इतर फुलेल लगा कर एस ओ साहेब सुबह शार्प नाइन थर्टी पार्क के मैन गेट पर थे, कल ही सभी मालियों और चोकिदारों को तक्सीद कर दिया गया था. मीडिया आ रहा सभी समय पर पहुँच कर अपने अपने में कार्य में ढंग से लग जाए और राष्ट्रीय खेल ‘सीप’ (उत्तर भारत  में ताश का खेल) पर विराम रहेगा.
एस ओ साहेब ने बाइक का सेल्फ दबाया और रोजाना की तरह पार्क के दौरे पर निकले. पार्क का जो हिस्सा गाँव को लगता था वहाँ काफी बदबू महसूस हुई.
रामपाल ने बताया कि कुत्ता मरा पड़ा है.

27 फ़र॰ 2013

पठान यार अम्मिदुल्लाह


मुझे पश्तो नहीं आती पर पश्तो भाषा से बहुत प्यार है. मेरे दादा दादी – नाना नानी आपस में पश्तो में बात करते थे. हालाँकि पश्तो विदेश भाषा रही होगी. क्योंकि हमारी मातभाषा किड़्रकी रही है. वो बोली नहीं थी जैसा मैं घर मम्मी के साथ या श्रीमती के साथ बोलता हूँ – किसी जमाने में वो पूर्ण भाषा ही थी, क्योंकि उसकी अपनी लिपि भी थी जो देखने में गुरुमुखी के साथ मिलती जुलती दिखती है परतुं उससे जुदा है. 
    मुग़लकाल में पश्तो राजभाषा हो गयी होगी और उतरी पश्चिम सीमांत (North West Frontier Provinces - NWFP) इलाके के लोगों ने वही भाषा इस्तेमाल करनी शुरू कर दी होगी... जैसे आज दिल्ली में धीरे धीरे पंजाबी की जगह हिंदी और हिंदी की जगह हिंगलिश और हिंगलिश की जगह पूर्ण रूपेण इंग्लिश लेती जा रही है... माफ कीजियेगा पोस्ट लिखने के लिए जो भूमिका बाँधने लगा था – वो भी अपने आप में पोस्ट से कम नहीं होने जा रही. छोडो – बहुत गंभीर विषय है – पता नहीं कब कोई विद्वान मिलेगा थोड़ी और जानकारी होगी तो पोस्ट बनेगी.
अब इतना जान लीजिए कि पश्तो से मुझे मुहब्बत है क्योंकि मेरे दादाजी और अन्य आदरणीय बुजुर्गों की भाषा थी, लगभग सभी कालकलवित हो चुके हैं पश्तो के साथ.

सर गंगा राम अस्पताल में मनोरोग विशेषज्ञ के केबिन के बाहर में अपनी बारी प्रतीक्षा कर रहा था तो अम्मिदुल्लाह (मैं शायाद नाम का सही उच्चारण कर रहा हूँ) से मुलाकात हुई. २४-२५ साल का एक युवक आ कर मेरे साथ बैठ गया – गर्दन झुका कर. कुछ अजीब तरह से मुझे देखते हुए कहा कि मेक्स हॉस्पिटल से इलाज़ करवाया और ये दवाई में पिछले २ महीने से ले रहा हूँ, पर आराम नहीं आ रहा.
क्या दिक्कत है.

18 जन॰ 2013

जैकेट


मेरी माताजी कि आदत है, कि कितनी ही रजाइयां कम्बल को संभाल कर रखती हैं. ये न केवल स्टोरेज का ही काम है वरन उनको धुप में डालना.. उनमें दवाई की गोलियाँ रख करना. मुझे बहुत कोफ़्त होती है. क्या फायदा इतना सामान संभाल कर रखना. बोलती है - एक दिन भी मुश्किल हो जाता है कि घर में कोई मेहमान आ जाएँ और कम्बल या रजाई न हो तो. यही हाल बर्तनों और क्राकरी का है.... जो साल में एक आधी बार ही इस्तेमाल होते हैं. पुरे साल संभाल कर रखना.सही में उस एक दिन के लिए कितने कष्टकर कार्य करने पड़ते हैं. पर ये कार्य भारतीय औरतों की आदत में शुमार हो जाते हैं.

पर मेरा सिद्धांत अलग है  बेकार की वस्तुओं से घर नहीं भरना चाहिए,  जब आवश्यकता हो तभी वह वस्तु खरीदनी चाहिए.

ये सिद्धांत कभी कभी नुक्सानदायक ही हो सकता है. जैसा की इस सर्दी में मेरे साथ हुआ. घर की महिलाऐं (श्रीमती, माताजी, बहन के साथ) गर्म कपड़े खरीदने मार्केट गयी थी. उन्होंने सोचा मेरे लिए भी एक जैकेट ले लिए जाए अत: एक जैकेट पसंद भी कर ली और नाप चेक करने के लिए मुझे मार्केट बुलाया गया. मेरे जैसे जंतु को दिल्ली शहर की मार्केट में वैसे भी बहुत घबराहट होती है.  न नुकर करने के बाद मार्केट जाना पड़ा.

उस समय सर्दी इतनी नहीं थी, जैकट का मूल्य ३८९९ मेरी समझ में आया नहीं, और ८-१० कि सर्दी रहती है उसके लिए क्यों ४००० का जैकेट लिया जाए. ये बात बेमानी लगी. बाद में तो बेकार ही संभल कर रखना पड़ेगा. उस दिन के वाक्या के कारण मुझे बहुत सुनना पड़ा - "१ घंटे उस दूकान पर इन्तेज़ार करवाने के पश्चात ड्रामा कर के भाग गए थे. वहाँ बेज्जती हुई वो अलग. कभी जैकेट खरीदी तो देखते हैं घर में कैसे लाते हो." स्पष्ट चेतावनी थी जी.