भूल गए थे, ये इंडिया है,
जहाँ जिन्दा लोगों की गिनती, बस, वोटिंग के समय पार्टी के कार्यकर्ताओं को पड़ती है,
या फिर रेलवे में टिकस बुकिंग के समय या किसी शिक्षण संस्थान में फ़ार्म जमा कराते
समय अम्मुमन लोग बताते हैं की इतने लोग अभी मेरे से पहले हैं. उसके अलावा गिनती
होती है तो लाशों की. कहीं भी कोई हादसा होता है तो लाशों की गिनती से ही उसकी
भयावता का अंदाजा लगाया जाता है. और उतराखंड में जो हुआ, पहले १ दिन तक तो लाशों
की गिनती से ही अंदाज़ा हो रहा था... हाँ ५० लोग मर गए, अगले दिन ये आकड़ा १०० पार
गया, तीसरे दिन पता १२० थे. जब देश के प्रधानमंत्री और सप्रग अध्यक्षा श्रीमती
सोनिया गाँधी उतराखंड के हवाई दौरे पर निकले तो मात्र अफ़सोस जाहिर ही कर सकते
क्योंकि तब तक भी १२० शव बरामद (सरकारी भाषा में) हो चुके थे. जब ये जलजला फूटा तब
लाखों लोग वहाँ किसी न किसी के रूप (श्रद्धालु, लोकल, वहां दुकानदार
इतियादी) में थे – उस के बाद आप कैसे लाशों को गिन रहे हैं. क्यों नहीं गिनते कि
हजारों लोग नहीं मिल रहे .. और जो मिल नहीं रहे वो जिन्दा नहीं है, ये तय है, ...
पर सरकार को जब तक डेड बॉडी नहीं मिले ... सबूत नहीं मिले, मौत को मौत नहीं मानती.
और वही उतराखंड में हो रहा है.
20 जून 2013
23 मई 2013
छडो जी, सानु की... वडे लोकां दियां वडी गल्लां....
मैं कब से बकवास करता आ रहा हूँ, पर अब सरकार को
भी पता चला है कि आई पी एल वाकई एक गन्दा खेल है. क्रिकेटर, उनकी पत्नियाँ, उनकी माशुकें, उनके मित्र, उनके लोग, उनके बुकी, उनके सौदे और उनके सट्टे और कहीं तों दामाद भी सभी – सभी इस हमाम में नंगे नज़र आ रहे हैं, और मज़े की बात ये कि उनको इस बात पर
लज्जा भी नहीं आ रही, छडो जी, सानु की... वडे लोकां दियां वडी गल्लां....
20 मई 2013
कविता, औरत और क्रांति
क्या ये जरूरी है कि कवि बना जाए
क्यों न एक इंसान बना जाए
या फिर सवेदनशील पाठक
जो अच्छे कवियों की रचनाओं को पढ़े
खाली समय में उन्हें गाये गुनगुनाये
मनन करे, पर इससे अच्छा
एक नागरिक भी तो बना जा सकता है
जो जब कहीं अपनी ही जुस्तजू में
धक्के खाता रहे
फिर भी दुष्यंत को गुनगुनाता रहे
सोचो कवियों, सोचो
गर अच्छे नागरिक नहीं होंगे,
तो कहाँ से आयेंगे क्रांतिवीर
कौन तुम्हे पढेंगें, मनन करेंगे
तुम्हारी अग्नि से उर्जा पायेंगे
24 अप्रैल 2013
6 अप्रैल 2013
जय प्रकाश उर्फ जे पी
अरे भाई रे, नीचे से उपर आते आते इतने कागज के
बंडल दिखे – मुझे तो घबराहट होने लगी,– ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी कागज की
फेक्ट्री में आ गया हूँ, वैसे आप क्या छापते हैं,
सफ़ेद बाल मोटा चश्मा और उम्र लगभग ७०-७२ साल, प्रश्न के साथ मुस्कुराहट थी,
मैंने टेबल से टिफिन एक किनारे किया कि पहले इस
महानुभव से निपटा जाए भोजन थोड़ी देर बाद लेंगे.
कहिये अंकलजी (अंकलजी - दिल्ली में किसी भी अजनबी
के लिए प्रचलित शब्द) आप कहाँ से और कैसे आना हुआ.
उसने उल्टा मेरा ही नाम पूछ लिया,
आनंद सभी एक ही जगह से आते है, पानी पिलाओ. आदेश के साथ बुड्डे ने कुर्सी कब्जियाई. मैंने पानी का
गिलास उसके सामने कर दिया.
उसके बाद प्रेस और छपने वाले जॉब के विषय में बताया.
समय हो गया था कर्मचारियों के लिए ३ बजे वाली चाय आ गयी...
अंकलजी ने चाय मना कर दी, बोले भोजन का समय है.
प्रिंटिंग से शुरू हुई बातें सामाजिक सरोकार और बच्चों के संस्कारों पर होने लगी ..
आप खाना खायेंगे...
8 मार्च 2013
6 मार्च 2013
जफर की मौत...
इस सेंट्रल पार्क में बहुत
गंदगी थी, झील में पास के गाँव की भेंसे, सूअर पड़े रहते. जहाँ तहां पालतू कुत्तों
की शीट नज़र आती. पर एक पालतू कुत्तों की शिट को नज़र अंदाज़ कर लें यानि नाक रुमाल
से ढकने की बजाय नज़र को रुमाल से ढक दे तो पार्क साफ़ सुथरा मालूम होता है. पार्क
की थोड़ी बदली तस्वीर से नए नए आये एस ओ साहेब खुश हैं. पर अपनी खुशी किस्से बांटे –
सैर करने वाले बुद्धिजीवियों का काम है मीन मेख निकलना. सोचा लोकल मीडिया ‘मोहल्ला4यू’ को ही बुला लिया जाए जो पिछले वर्ष आकर पार्क
में फैली गंदगी को लेकर महकमे की बहुत छिछ्लेदार कर गया था.
सेंट्रल पार्क के इस नए रूप
से परिचय करवाया जाए. एस ओ साहेब से किसी तरह ‘मोहल्ला4यू’ लेनल वालों से संपर्क किया जो गत वर्ष आये थे. और सुबह ११
बजे का समय मिला.
इतर फुलेल लगा कर एस ओ
साहेब सुबह शार्प नाइन थर्टी पार्क के मैन गेट पर थे, कल ही सभी मालियों और चोकिदारों
को तक्सीद कर दिया गया था. मीडिया आ रहा सभी समय पर पहुँच कर अपने अपने में कार्य
में ढंग से लग जाए और राष्ट्रीय खेल ‘सीप’ (उत्तर भारत में ताश का खेल) पर विराम रहेगा.
एस ओ साहेब ने बाइक का
सेल्फ दबाया और रोजाना की तरह पार्क के दौरे पर निकले. पार्क का जो हिस्सा गाँव को
लगता था वहाँ काफी बदबू महसूस हुई.
रामपाल ने बताया कि कुत्ता मरा पड़ा है.
27 फ़र॰ 2013
पठान यार अम्मिदुल्लाह
मुझे पश्तो नहीं आती पर
पश्तो भाषा से बहुत प्यार है. मेरे दादा दादी – नाना नानी आपस में पश्तो में बात
करते थे. हालाँकि पश्तो विदेश भाषा रही होगी. क्योंकि हमारी मातभाषा किड़्रकी रही
है. वो बोली नहीं थी जैसा मैं घर मम्मी के साथ या श्रीमती के साथ बोलता हूँ – किसी
जमाने में वो पूर्ण भाषा ही थी, क्योंकि उसकी अपनी लिपि भी थी जो देखने में
गुरुमुखी के साथ मिलती जुलती दिखती है परतुं उससे जुदा है.
मुग़लकाल में पश्तो राजभाषा हो गयी होगी और उतरी पश्चिम सीमांत (North West Frontier Provinces - NWFP) इलाके के लोगों ने वही भाषा इस्तेमाल करनी शुरू कर दी होगी... जैसे आज दिल्ली में धीरे
धीरे पंजाबी की जगह हिंदी और हिंदी की जगह हिंगलिश और हिंगलिश की जगह पूर्ण रूपेण
इंग्लिश लेती जा रही है... माफ कीजियेगा पोस्ट लिखने के लिए जो भूमिका बाँधने लगा
था – वो भी अपने आप में पोस्ट से कम नहीं होने जा रही. छोडो – बहुत गंभीर विषय है –
पता नहीं कब कोई विद्वान मिलेगा थोड़ी और जानकारी होगी तो पोस्ट बनेगी.
अब इतना जान लीजिए कि पश्तो
से मुझे मुहब्बत है क्योंकि मेरे दादाजी और अन्य आदरणीय बुजुर्गों की भाषा थी,
लगभग सभी कालकलवित हो चुके हैं पश्तो के साथ.
सर गंगा राम अस्पताल में मनोरोग
विशेषज्ञ के केबिन के बाहर में अपनी बारी प्रतीक्षा कर रहा था तो अम्मिदुल्लाह (मैं
शायाद नाम का सही उच्चारण कर रहा हूँ) से मुलाकात हुई. २४-२५ साल का एक युवक आ कर
मेरे साथ बैठ गया – गर्दन झुका कर. कुछ अजीब तरह से मुझे देखते हुए कहा कि मेक्स
हॉस्पिटल से इलाज़ करवाया और ये दवाई में पिछले २ महीने से ले रहा हूँ, पर आराम
नहीं आ रहा.
क्या दिक्कत है.
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