6 दिस॰ 2013

मेरी दिल्ली - रफ़्तार और चुनावी समर


दिल्ली सहित पाँचों राज्यों में चुनाव समाप्त हो चुके हैं. लड़की की शादी के बाद घर में जो थकान रहती है वही नेता लोगों के घरों में पसरी पड़ी है. एग्जिट पोल रिसल्ट सभी टीवी चेनलों पर दिखाई दे रहे हैं सभी के अपने अपने दावे हैं जो दूसरों के दावों पर भारी पड़ना चाहते हैं. जहाँ चार राज्यों में सभी राजनीति पंडित एक सी भविष्यवाणी कर रहे हैं वहीँ दिल्ली का मसला आने पर सभी के सुर अलग निकलने लगते हैं.
मेरी दिल्ली
दिल्ली अनेक प्रकार की विभिन्नताएं लिए हुए है जो उसे बाकि राज्यों से अलग करती हैं. बाकि राज्यों में छाये जाति समीकरणों के अतिरिक्त यहाँ विभिन्न राज्यों से आये हुए प्रवासी अपने राज्य की क्षेत्रीय पार्टिओं से अपनत्व रखते हैं. मयूर विहार द्वारका जैसे विभिन्न सोसाइटी फ्लेट्स दिल्ली को महानगर की केटेगिरी में रखने की असफल कोशिश करते हैं वहीँ दिल्ली की पुरानी रिहाशी कालोनियां अपने पुराने मिथ को टूटने नहीं देना चाहती कि यही दिल्ली है. जहाँ सड़क पानी और यातायात के सिमित साधनों जैसी बुनियादी समस्यों से जूझता दिल्ली का ग्रामीण इलाका

13 नव॰ 2013

सिख राजनीति में उलझी हरिनगर विधानसभा सीट

दिल्ली के चुनावों में हरिनगर विधानसभा सीट सिख राजनीति अखाड़े में ऐसे उलझी कि कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए निकालनी भारी पड़ रही है. भाजपा विधायक और दिल्ली सरकार में पूर्व उद्योग मंत्री रहे सरदार हरशरण सिंह बल्ली ने अपनी टिकट कटती देख कांग्रेस की और रुख किया है. कांग्रेस से अभी तक सुरेन्द्र सेतिया की टिकट पक्की लग रही थी – और जब दिल्ली प्रदेश कांग्रेस ने 52 सीटों की पहली लिस्ट जारी की थी तो उसमे भी सुरेन्द्र सेतिया का नाम था. लग रहा था बल्ली भाजपा छोड़ कर कांग्रेस से भी रह गये. राजनीति सदा रात के अँधेरे में करवट लेती है – और यही सुरेन्द्र सेतिया के साथ हुआ. उनके जो समर्थक कल तक लड्डू बाँट कर ख़ुशी का अहसास कर रहे थे – उनके चेहरे उतर गए कि पंजे का निशान बल्ली को अलाट हो गया है.

श्याम शर्मा :: हरशरण सिंह बल्ली :: जगदीप सिंह 
२००८ के चुनावों में हरिनगर विधान सभा क्षेत्र के 1,45,780 से 51,364 वोट भाजपा के हरशरण सिंह बल्ली को मिले थे, जिसकी बदौलत उन्होंने अपने नजदीकी प्रतिद्वंदी कांग्रेस के रमेश लम्बा को 28,758  वोटों के अंतर के हराया था. इस विधानसभा क्षेत्र में लगभग 54,00 सिख वोटर हैं... जिनके दम पर अकाली दल ने भाजपा से ये सीट मांगी है. सिख बिरादरी को यहाँ नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता – ये बात आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल जैसे नए खिलाडी भी समझ गए और सरदार जगदीप सिंह को यहाँ से टिकट दी है.

24 अग॰ 2013

सब मिथ्या... सब माया... सब बकवास/गल्प....


बालक जो तू देख रहा है सब मिथ्या... जो पढ़ रहा है वो सब माया. जो सुनता है – वो सब बकवास/गल्प कथा माफिक. इन तुच्छ भौतिक पदार्थों में मन नहीं लगा. ओये पुतर जी कंट्रोल करना सीख.  घर की औरतों से सीख जो टी वी के सीरियल देख उसके पात्रों को तुरंत भुला चूल्हे पर दाल की पतीली चड़ा देती हैं. तू टी वी के सीरियल देखना सीख. उसके बाद मनन कर कि खलनायक ने नायक के खिलाफ जो भी साज़िश रची, तेरे बाप का कुछ नहीं गया. उसके बाद खाना पीना नहाना धोना, दारु सुट्टा सब कुछ मिला ही न. इन सीरियल को देखने से तू दुनियादारी भी सीख जाएगा. कुछ दिन या महिना-एक ख़बरों से छुटकारा पा कर एकता कपूर टाईप सीरियल पर मन लगा.
तत्पश्चात अन्य ग्यानी पुरुषों की तरह तू भी मानने लगेगा कि यहाँ प्रभु ने एक तमाशा रचा है – भांति भांति के किरदार हैं. उन सब को झेलने के बाद भी खाना मिलेगा और हज़म भी होगा. बिस्तर पर ऐसे किरदारों को ले कर अपनी नींद चौपट करने की जरूरत नहीं है.

धूमिल याद आये :
हर तरफ धुआं है  - हर तरफ कुहासा है
जो दांतों और दलदलों का दलाल है
वही देशभक्त है
अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है- तटस्थता।
यहां कायरता के चेहरे पर सबसे ज्यादा रक्त है
जिसके पास थाली है
हर भूखा आदमी उसके लिए,
सबसे भद्दी गाली है
हर तरफ कुआं है - हर तरफ खाईं है
यहां, सिर्फ, वह आदमी, देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है
या फिर गरीब है
 जय राम जी की.

17 अग॰ 2013

हाल ऐ जिन्दगी

पार्क, गाँव, पहाड़ बारस्ता खेत , मकान दूकान से सरकते सरकते , गूगलिंग कर सर पटकते चश्मे के नम्बर बडवाते, कविता गुनगुनाते, लेख पढ़ते, गीत गाते, औरों से गिरते रूपये को थामते, कागज़ कागज़, प्रेस - प्लेट, स्याही, बिजली, लेबर, मंदी का रुदन करते, पर फिर से गर्दन झटक दो पैग लगा, बाईक उड़ा, बच्चों संग हंसी ठिठोली करते,  लेफ्ट राईट में टाईट होकर पैर पटक पटक जूता घिसाते फिरते,  देर शाम तक किसी भी नशेडी से हँसी ठठा करते ...  देश समाज चिंता से बेखबर, प्याज, आटा नून तेल, शेयर मार्किट, सोना, प्रोपर्टी को अस्सी पर बिठा, सदा मुस्कुराते बतियाते विजेता बन घूमते ......


मखा, आनंद बाबु कभी हमारी गली भी आया करो - रामा शामा कर जाया करो.


9 जुल॰ 2013

मंटो तुम्हे जीने नहीं देगा



सरकार तुम्हे मरने नहीं देगी, ... और मंटो तुम्हे जीने नहीं देगा.... बार बार आकर पूछेगा तुम्हारे जीने की वजह और दांतों में हाथों के नाख़ून काटते काटते सोचते रहोगे पर जवाब देने की स्थिति में नहीं रहोगे बाबु मोशाय...
बिलकुल नहीं,
मंटो तुम्हे घूर के देखेगा और तुम आँखे निचे किये रहोगे, सामने मेज़ पर पेग दिख रहा होगा पर हिम्मत नहीं होगी, उसे उठाने की ....
नहीं
दराज में और बोतल भी रखी है.
पर मंटो की आँखों में आँखे डाल कर उसे पेग ओफ्फ्रर नहीं कर पाओगे बाबु मोशाय...
बिलकुल नहीं,
याद रखना..

20 जून 2013

नहीं दिख रही लाशें


भूल गए थे, ये इंडिया है, जहाँ जिन्दा लोगों की गिनती, बस, वोटिंग के समय पार्टी के कार्यकर्ताओं को पड़ती है, या फिर रेलवे में टिकस बुकिंग के समय या किसी शिक्षण संस्थान में फ़ार्म जमा कराते समय अम्मुमन लोग बताते हैं की इतने लोग अभी मेरे से पहले हैं. उसके अलावा गिनती होती है तो लाशों की. कहीं भी कोई हादसा होता है तो लाशों की गिनती से ही उसकी भयावता का अंदाजा लगाया जाता है. और उतराखंड में जो हुआ, पहले १ दिन तक तो लाशों की गिनती से ही अंदाज़ा हो रहा था... हाँ ५० लोग मर गए, अगले दिन ये आकड़ा १०० पार गया, तीसरे दिन पता १२० थे. जब देश के प्रधानमंत्री और सप्रग अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी उतराखंड के हवाई दौरे पर निकले तो मात्र अफ़सोस जाहिर ही कर सकते क्योंकि तब तक भी १२० शव बरामद (सरकारी भाषा में) हो चुके थे. जब ये जलजला फूटा तब लाखों लोग वहाँ किसी न किसी के रूप (श्रद्धालु, लोकल, वहां दुकानदार इतियादी) में थे – उस के बाद आप कैसे लाशों को गिन रहे हैं. क्यों नहीं गिनते कि हजारों लोग नहीं मिल रहे .. और जो मिल नहीं रहे वो जिन्दा नहीं है, ये तय है, ... पर सरकार को जब तक डेड बॉडी नहीं मिले ... सबूत नहीं मिले, मौत को मौत नहीं मानती. और वही उतराखंड में हो रहा है.

23 मई 2013

छडो जी, सानु की... वडे लोकां दियां वडी गल्लां....


मैं कब से बकवास करता आ रहा हूँ, पर अब सरकार को भी पता चला है कि आई पी एल वाकई एक गन्दा खेल है. क्रिकेटर, उनकी पत्नियाँ, उनकी माशुकें, उनके मित्र, उनके लोग, उनके बुकी, उनके सौदे और उनके सट्टे और कहीं तों दामाद भी सभी – सभी इस हमाम में नंगे नज़र आ रहे हैं, और मज़े की बात ये कि उनको इस बात पर लज्जा भी नहीं आ रही, छडो जी, सानु की... वडे लोकां दियां वडी गल्लां....

20 मई 2013

कविता, औरत और क्रांति

क्या ये जरूरी है कि कवि बना जाए
क्यों न एक इंसान बना जाए
या फिर सवेदनशील पाठक
जो अच्छे कवियों की रचनाओं को पढ़े
खाली समय में उन्हें गाये गुनगुनाये
मनन करे, पर इससे अच्छा 
एक नागरिक भी तो बना जा सकता है
जो जब कहीं अपनी ही जुस्तजू में
धक्के खाता रहे
फिर भी दुष्यंत को गुनगुनाता रहे
सोचो कवियों, सोचो
गर अच्छे नागरिक नहीं होंगे,
तो कहाँ से आयेंगे क्रांतिवीर
कौन तुम्हे पढेंगें, मनन करेंगे
तुम्हारी अग्नि से उर्जा पायेंगे