6 अप्रैल 2011

अंतहीन कहानी: ये तो न्यू ही चालेगी’

हर कहानी का कोई अंत हो ये जरूरी नहीं,
कहानियां अंतहीन भी तो हो सकती हैं,
रेल लाईन की पटरी की तरह,
जो एक छोर पर खत्म होने से पहले
दुसरी अनुगामी के साथ मिल जाती है,
और उस पटरी को अपनी अधुरी ख्वाहिशे देकर
खुद उसी जगह रूक जाती है।
हां रेल की पटरियां अंतहीन ही तो होती हैं

हर कहानी का कोई अंत हो ये जरुरी नहीं,

पर कहानी में अचानक बदलाव होते है...
जो नाटकीय  कहे जाते हैं.

ये ठीक उसी प्रकार है -
जैसे राजसत्ता की अंतहीन भ्रष्टाचार गाथाएं
ये आज शोर्य गाथाओं का स्थान ले चुकी है,
राजसत्ता में सामंतों के छिन्न भिन्न अंग,
उनके शौर्य की कथा उनके जख्म खुद कहते थे और
आज के सामंतों का छिन्न-भिन्न जमीर
किसी स्पॉ और पार्लर में रगड़े गये चेहरे.....
उनके भ्रष्टाचार की कहानी खुद ब्यान करती हैं
ये देश, काल  के हिसाब से बदलते है
जैसे  विधायकों की निष्ठाएं बदलती हैं...
और अचानक ही राजसत्ता बदलती है....

कहानी में सूत्रधार भी होता है, और
कभी बंद कमरे में रहने वाले भी तो
बाद में सत्ताधीश बनकर
सत्ता के सूत्र  अपने हाथों से नचाते है....
कहानी चलती रहती है....
मनो  कठपुतलियां नाचती हैं....
बच्चे ताली बाजाते हैं..... और
प्रबुद्ध शिक्षक कुर्सी पर विराजे .... पान मुंह में संमेटे
कठपुतलीचालक की निपुणता की बात करते हैं....
ऐसे ही ठीक न्यूजरूम में कैमरे के सामने.....
समीक्षाएं/विवेचनाएं खूब होती है....
पात्र बदल जाते है ... और पाठक भी... लेखक भी
खानदानों की तरह.....
पर खत्म नहीं होते...
कहानी सदा ही अंतहीन होती है....
खत्म होते होते एक नई कथा का बीज बो जाती है...

यूं ही घोटाले चलते रहते हैं....
अंतहीन..
एक छोटा-सा घोटाला ही...
इक महाघोटाले को जन्म देता है....
यही महाघोटाले जब टक्कर देने लगते हैं सत्ता को
और सत्ता डगमगाती है.... पनाह मांगती है..
घोटालों के बल.... भ्रष्टाचार सशक्त होता है
अट्टहास करता है...... सत्ता गिड़गिड़ाती है...
न्याय की वेदी पर...
जांच अधिकारी की पैनी कलम को
घोटाले के पैसे से वकील भौथरी करता है।
डेट बदलती रहती है..... राजकाज चलता रहता है
कहानी है....... चलती रहती है...

ब्लू लाईन के पीछे लिखा
‘ये तो न्यू ही चालेगी’
शाश्वत लगता है।

5 अप्रैल 2011

बहुत हो गया, किरकेट का स्यापा ....अब अन्ना को दिखाओ.....

बहुत हो गया, किरकेट का स्यापा ......

बहुत मिल गया पैसा..... शोहरत ..... और इतिहास में अमरता...... 
बस करो.


वो आज बैठ गए हैं - अन्नशन पर ....... न दही आलू खायेंगे.... या भीगे बादाम वाल दूध और न ही कुट्टू के आटे के पकोडे.....

अन्ना दुर्गा मैया की किरपा नहीं चाहते.... भारत माता के पुजारी हैं, उनके पुत्रों व आने वाली नस्लों के लिए भ्रष्टाचारमुक्त भारत चाहते हैं........ इसलिए पूर्ण भूखहड़ताल पर हैं....

  श्वर उनके इरादों को और बुलंद करे ...... और शक्ति दे......

मीडिया से जुड़े मित्रों, ....... बहुत हो गया भांड...... रात को रोड पर नाचती राजमाता का, नीली वर्दी वालों का, राडिया का, टाटा का और रीलाईन्स  का और राजा का...... 

आप भी चलो नयी दिल्ली...... 

अन्ना को दिखाओ.........
अन्ना को दिखाओ...... 

आज से अन्ना को दिखाओ..... अपने न्यूज़ चेनलों  बेशक उनकी बुराई करो....... पर उनको इग्नोर मत करना...... नहीं तो आने वाली नस्लें आपको कभी माफ नहीं करेंगी.......

जय राम जी की.

4 अप्रैल 2011

नव संवत २०६८ - शुभ, मंगल और शांतिदायक हो.


     नव वर्ष है..... हाँ, बस घर में रसोई से उठते कुछ पकवानों की महक... और माताजी की प्रात: जल्दी जागने की तक्सीद, या फिर बीते कल (पिछले संवत की आखिरी सुबह) कुछ लोग, (ह्रदय से नौजवान – और शरीर से अधेड), द्वारा एकत्रीकरण में देश समाज के बारे में सामूहीक विचार विमर्श, बस. ......
........... नव संवत है, बस यहीं से पता चलता है, न टीवी पर कोई झिक झिक, न मध्य रात्री में मोबाईल फोन पर सरकते मैसेज........ भारतीयता के सादे ढंग की तरह सादा हमारा नववर्ष – वर्ष प्रतिपदा .....
   क्या क्या सोचते है और कर्म की गति कहाँ ले जाकर पटकती है, कोई नहीं जानता.
मैं तो बनसा राम दा पुजारी ...
पर चा बैठा हाँ ऐ गठरी भारी..
    ये भारी गठरी खुद ही तो उठाई है, दीन-दुनिया की, माया की... सभी कुछ.  धीरे धीरे सामान इकठ्ठा किया, फिर जोड़ जोड़ कर गठरी में भरता गया..... कुछ और सामान.... और उसके बाद और, माया ..... और ... ताकि गठरी को आसानी से उठा लूं, भाड़े के बंदे बुला लूँगा ... स्वयं तो बस राम का पुजारी ही रहूँगा न.

और वो भाड़े के बंदे भी तो मेरी गठरी भारी करने पर लगे है....

अपनी ख्वाईशों को पूर्ण करने के लिए ... और सामान, अपने परिवार के लिए और सामान.... समाज में रुतबा बढ़ाने के लिए और, और सही में राम जी के लिए भी ....... पता नहीं क्या क्या..... घर मकान, फैक्टरी गोदाम, घोडा गाडी... बंगला जमीन....... कहीं भी अंत नहीं ..... गठरी तो वजनदार होगी ही न....

कैसे उठेगी, कैसे चलूँगा......... तपस्या बहुत है..... गृहस्थ का तप है ... किसी तपस्या से थोड़े कम है....  आदिवासी.... वनवासी सभी तो मिशिनरी या फिर नक्सली के रहमोकरम पर है..... बाकि तो सब ने अपनी गठरी उठा रखी है.

कहीं नीमघनी छाँव भी तो नहीं .......... कि गठरी नीचे रख ले और घडी-दो-घडी बैठ सुस्ता लें...

आज नव वर्ष पर बस यही सोच है...... भारी सामान है और दूर तक जाना है.....

नव संवत २०६८ आप और आपके परिवार के लिए शुभ, मंगल और शांतिदायक हो.

जय राम जी की.

2 अप्रैल 2011

पापा आउट ......क्रिकेट


पापा आउट ...........
बेटा मैं करेक्शन कर रहा हूँ...... मैं कैसे आउट हो सकता हूँ........
पापा सेहवाग आउट हो गया........
कोई बात नहीं बेटा... माना करेक्शन ज्यादा आ गयी.......... मुझे काम करने दे......
अरे पापा ....... आप जानते नहीं हों, करेक्शन तो फिर भी ठीक हो सकती है, पर सहवाग दुबारा थोड़े ही आ सकता है........
आ जाएगा बेटा, उसने अन्सुरेंस की कम्पनी से विज्ञापन बुक करवा रखा है...... उसीमें फिर से आ जाएगा.......... पर अगर करेक्शन रह गयी तो ... तो...... पब्लिशर (सेठ) पैसा काट लेगा....... मुझे करेक्शन लगाने दे....
पर वो तो विज्ञापन में आएगा न...... बेटा वो खेले या नहीं, उनको तो पैसा मिलेगा ही न...... चाहे बेटिंग से मिले या फिर विज्ञापन से..... बेटा उनको चूल्हे ही चिंता थोड़े ही है...
पापा, क्या बात कर दी, आपने, क्या इतना बड़ा खिलाडी चूल्हे की चिंता करेगा...... चूले ही चिंता तो आप जैसे कम्पोसिंग वाले करते हैं, जो बड़े बड़े तथाकथित विद्वानों के लेक्चर कम्पोसिंग कर के दिल जलाते हैं....
तो
पापा वो तो देश की चिंता करेगा न....
बेटा, देश की चिंता करते तो १ रन बना कर आउट थोड़े ही होते.....
लो, आप के बोलते बोलते सचिन भी आउट हो गए.......
बेटा, जो खेलने आता है, वो आउट होने के लिए ही आता है, ये बात अलग है कोई १ रन बना कर आउट हो जाता है और कोई १०० से ऊपर......... पर आउट होना ही है........... 


यही शाश्वत सत्य है.....
जिंदगी हो या खेल का मैदान.

25 मार्च 2011

ब्लॉग्गिंग में मेरा सफ़र.........3

ब्लॉग्गिंग में यूँ तो कई तरह का लेखन हो रहा है, बहुत महीन से लेकर बहुत मोटा, संस्कृत निषठ शब्दों वाले शुद्ध व्याकरण के आजकल की बोलचाल वाली हिंदी (हिंगलिश) तक.

जाहिर है, जब मैंने इस ब्लॉग दुनिया और आसिलियत वाली दुनिया से मिलाने की कोशिश की या फिर ऐसा है भी. फिर जैसे की दुनिया में कुछ मोरल थानेदारी (कुछ देशों ने ठेका ले रखा है) हो रही है – तो फिर ब्लॉग जगत में भी होगी. यहाँ पर भी कुछ मठाधीशों ने ऐसा ही ठेका ले रखा है. पर शुक्र है यहाँ कोई ठेकेदारी (संयुक्त राष्ट्र) नहीं है........

कल ही सलिलजी ने टीप द्वारा मुझे चेताया था, की ब्लॉगलेखन कोई सामान्य लेखन नहीं है, उन्होंने मिश्र का उधारहण भी दिया था. और वाकाई मैं मानता हूँ की ये कोई साधारण लेखन नहीं है, मात्र एक पुश बटन द्वारा ही आपका मेसेज ग्लोबल हो जाता है. और आपके निजी विचार – निजी नहीं रहते ....... जैसा की व्यक्तिगत दायारी में लिखा होता है........ कोई भी नहीं पढ़ सकता, आप खुद ही पढते है और सिसक सिसक कर तकिये के नीचे रख देते हैं.

आज हमारी सोच कैसी है और कल कैसी होगी..... ये समझ पाना बहुत मुश्किल है. सुनने में आया है की भारत सरकार भी ब्लॉग्गिंग को सेंसर करने के मूड में हैं. करना ही चाहिए. पर वो तो जब भी करेंगे.... तब करेंगे.... पर उससे पहले ब्लॉग जगत के कुछ मठाधीशों ने मोरल मुद्दे को उठाते हुए एक आगाज़ किया है की लेखन की एक मर्यादा होनी चाहिए........ यानी आप परिवार के साथ बैठकर किसी के भी ब्लॉग को पढ़ सकें.

लेकिन एक बात है, जिस भी बच्चे के घर में अगर नेट कनेशन है, तो वो मात्र ब्लॉग जगत का मोहताज़ नहीं है. गूगल बाबा की कृपा से अपना मनोवांछित शब्द लिख देने से ही सेकडों साईट खुल कर आ जाती हैं...... आप बच्चे पर सेंसर नहीं कर सकते......... हाँ उसे कुछ अच्छी शिक्षा दे सकते है की हर वक्त ऐसे ही साईट खोल का न देखे.

मैं पिछले ३ वर्षों से ब्लॉग जगत को बारीकी से तो नहीं, पर मोटा मोटा जरूर देख रहा हूँ, और जो सबसे ज्यादा परेशान करती है वो है अपनी कारीगरी (लेखन) द्वारा किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना. खासकर ये आदत कुछ मुस्लिम ब्लोग्गर भाइयों की है. आज तक किसी भी मठाधीश ने उन पर कोई पोस्ट नहीं लिखी...... . क्यों नहीं लिखी इसका भी कारण है...... उन धर्मान्ध लोगो के आक्रमण से सभी घबराते हैं. – और बर्रे के छते में हाथ नहीं देना चाहते.

वैश्विक और हिंदी साहित्य में नए नए प्रयोग हो रहे है....... मन की वो गहन/महीन भावना जो मात्र मन मैं ही रहती थी, अब उसे कागज/रील या फिर कहें धरातल पर उतरा जा रहा है...... बहुत कुछ नए नए अनुभव हो रहे हैं – देखना ये है या फिर हम खुले दिल से उसका स्वागत करते हैं या फिर हमेशा की तरह आँख बंद करके शुचितावादी बनाने का ढोंग करते हुए उसके खिलाफ खड़े होते हैं.

आज जिसको हम अश्लील कह कर हीय दृष्टी से देखते है...... आने वाली पीढ़ी के लिए मजाक का विषय हो....... और अपने मित्रों के साथ विवेचना करे....... हमारे पूर्वज कितने भोले थे......... 


फिलहाल जय राम जी की.

22 मार्च 2011

ब्लॉग्गिंग में मेरा सफ़र.........2


cartoon from www.weblogcartoons.comकिसी ब्लॉग में हल्का फुल्का व्यंग लिखा जा रहा है, कहीं धीर-गंभीर विषयों को सरलता से पेश किया जा रहा है, वहीँ सरल विषयों की ऐसी जलेबी बनाए जा रही है की पाठक बिचारा परेशान हो जाता है. अधिकतर ब्लोग्गर कवी-ह्रदय है, लेख के साथ कविताई कर के दिल की भड़ास निकाल देते है, कहीं सामाजिक सरोकारों पर सार्थक बहस हो रही है - याहीं अधिकतर ब्लॉग लेखक अपने अपने लेखन में लगे है......

जहाँ अच्छी खासी डिग्री लिए हुई विद्वान इन्जिनीर, डाक्टर, विज्ञानिक, वकील, लेखाकार व् अन्य पेशों में परवीन लोग है , इत्यादि, वहीँ विद्यार्थी, शोधार्थी, और सेवानिरवत, गृहणी, कामकाजी, बैंक और रेलवे अधिकार, और हाँ निट्ठले भी. यानी दुनिया चलाने के लिए सब कुछ है..... और तो और चोर भी है सरे आम चोरी के लिए..... और गन्दी अंधधार्मिकता मानसिकता वाले लोग भी - जो माहौल खराब करने पे तुले रहते थे.........

हिंदी सिनेमा की तरह सब कुछ है - प्यार मोहब्बत लड़ाई झगडा, पुरानी दुश्मनी, , माँ, बहिन, दोस्त, दद्दा, बड़े भैया, छोटा भाई, उस्ताद सरजी, ........  सभी कुछ. सब रंगमंच की भांति चल रहा है......... देश दुनिया की सीमाओं से उठा ये ब्लॉग जगत. और हाँ एक तो बंटी  चोर भी थे, पर पता नहीं आजकल कहाँ गायब हो गए. एगो उस्ताद जी भी थे, हर पोस्ट पर न० देते थे, वो भी गोल हो गए.

मेरे ख्याल से ब्लॉग्गिंग के दो स्टेप हैं, एक तो पोस्ट लिखना ...... दुसरे टिपण्णी देना. पोस्ट तो सभी लिखना चाहते है, पर टीप के रस्ते से खुद को बचा कर ले जाते है...... फिर बाबा की तरह सर पकड़ कर रोते है, मेरे ब्लॉग पर कोई टीप नहीं देता. महान ब्लोग्गर श्री फुरसतिया जी कहते हैंबिना टिप्पणी के पोस्ट विधवा की सूनी मांग की तरह होती है।  पर इन सूनी मांगो का क्या किया जाए, मेरे जैसा, कोई भी तरस नहीं खाता. कोई ब्लोगर बिचारा की-बोर्ड पर की-बोर्ड तोड़ रहा पर  टिप्पणियों का महा आकाल है, तो कहीं ब्लोगर ऐसी भी कलाकारी जानता है की मात्र २ पहरा लिख कर टिप्पणियों की बाढ़ आयी हुई है.

कहते है, इश्वर के हर कर्म में कुछ न कुछ अच्छा होता है, चिट्ठाजगत बंद हो गया......... बहुत दुःख हुआ, पर हमसे ज्यादा तो दुःख तो नए नए ब्लोग्गर को होगा......... जो ५-७ पोस्ट में स्थापित हो जाते थे, अब बहुत महनत करनी पड़ेगी, पर कई मुस्लिम अंधधार्मिकता मानसिकता वाले ब्लोग्गरों से छुटकारा तो मिल गया...... आप सभी समझ सकते है की मेरा इशारा किस और है......... नाम लेकर मैं बर्र्रे के छते में हाथ नहीं देना चाहता.

ज्ञान और आनन्द का बहुत बढ़िया साधन है ये ब्लॉग्गिंग ......... बस देखना ये है कैसे इसका इस्तेमाल होता है....... पर एक बात है, इसके लिए समय बहुत चाहिए..... बहुत ज्यादा.. तभी आप एक सफल ब्लोग्गर रह सकते है.....  नहीं तो बाबा की तरह जहाँ धुनी जमा ली जमा लिए...... नहीं तो चल दिए दुसरे थोर ..........

शायद कुछ और भी है, पर फिलहाल इतना ही, जय राम जी की

19 मार्च 2011

आ बाबा के अंगना में खेले होली....


चित्र  http://blogs.sacbee.कॉम  के साभार

आ बाबा के अंगना में खेले होली....

रंग ले आज ये सफ़ेद चादर मैली ...

जहाँ हरे गुलाबी नीले पीले को न नाज़ हो 
बस अंदर के रंगों का आगाज़ हो..
बेरंग रह कर करें खुदी संग मस्ती...
दुनिया भी पुकारे - अजीब है ये हस्ती...

आ बाबा के अंगना में खेले होली

भूल जा झूठी दुनियादारी के रंग....
होली की रंगीन मस्ती, दारू-भांग के संग...
ऐसी बरसे की वो 'बाबा' भी रह जाए दंग..

आ बाबा के अंगना में खेले होली


चित्र  http://www.flickr.com/photos/sanzen  के साभार 


होली की शुभकामनाएं.

18 मार्च 2011

ब्लॉग्गिंग में मेरा सफ़र.........

कई बार अपने निर्णय पर दुःख नहीं होता, (वैसे तो कभी भी नहीं होता) लेकिन कई बार होता भी है - काश अमुक व्यक्ति की बात मान ली होती. पर एक निर्णय सोच विचार कर लिया था... और उस पर फक्र होता है - श्रीयुत  जी को आचार्य की पदवी देकर. आज मैं याद कर रहा हूँ अपने ब्लॉग जगत में पुराने दिनों को. 

दिसंबर २००७ में ब्लॉग बनाया था. कभी कभी दिल की भड़ास निकाल देता था. पर एक दिन इसी ब्लॉग जगत में डूबा हुवा था की अपने पूर्विया जी (कौशल मिश्र) प्रेस में आये ......... और मैं भी बहुत ही तन्मयता से उनको लप्पझनू  की पोस्ट पढ़ने लगा........ कौशल जी ठहरे पुराने लंठ........ लगे उसकाने ..... तुम क्यों नहीं लिखते....... 

अब मैं क्या जवाब देता, मैं तो इस विद्वासभा में खुद को उपेक्षित सा महसूस करता था, पर कौशल जी का हौसला था, लिखो यार कुछ तो लिखो ........ और क्रिस्पी पकौड़े ...... तुरंत लिखे गए. और लगे हाथ पूर्विया ब्लॉ भी बन गया .......... और ब्लोगवाणी भी बंद हो गई.... कहते है न ....... साडी वारी आयी ते प्रसाद ही ख़त्म हो गया....... :)

तब याद आये , उड़नतस्तरी ....... और नीरज जी, खूब कहते थे, कुछ लिखो कुछ लिखो.......... पर लंठ महाराज .... लिखे भी तो क्या........ टाइप करते .... और डिलीट कर देते........ पर पढ़ते रोज़ ही रहे.

जुलाई  २०१० से ढंग से ब्लॉग फिर से चालू हुवा.......... पता ही नहीं चला कब संजय (मो सम कौन........) से दोस्ती हो गई...... कई बार चेत्तिंग हुई........ संजय (माफ़ करना संजय 'जी' नहीं कह रहा, हमउम्र है न और हाँ हम ख़याल भी ) ने कई बार संभाला और ब्लॉग्गिंग के टिप्स भी दिए.......

फिर एक अच्छी रात ? रात को सतीश सक्सेना जी ने हमारी बक बक को खंगाला ...... और सर्टिफिकट दे दिया ......... बाबा आश्रम बहुत अच्छा चलेगा...... और हम निहाल हो गए..... और मैं ये सर्टिफिकट देना चाहता हूँ की जिस ब्लॉग को लाइमलाईट में लाना हो ..... सतीश जी से संपर्क करें ..... उनके हाथों में ऐसा जादू है जिस ब्लॉग पर फ्लोवेर्स बनते है .. उस ब्लॉग के भाग खुल जाते है. 

फंसते फंसते फंस गया ....... सफ़ेदघ, जी हाँ वही अपने सतीश पंचम जी, में, अनूठी बोली मैं बहुत कुछ अपनापण था, लिखा बढ़िया लगा..... औहथकड़ में शायाद सफ़ेद घर से कुछ क्लू मिला था......... ये दोनों ब्लॉग की जिस दिन दैनिक हिन्दुस्तान में रवीश ने चर्चा की तो शायाद किशोर चौधरी और सतीश पंचम से ज्यादा ख़ुशी मुझे हुई.........  और हाँ इन्ही सतीश पंचम जी से कुछ तकरार भी हुई क़स्बा पर...... 

पता नहीं कैसे आलसी  के चिट्ठे तक पहुंचा .... और मन्नू-उर्मी प्रसंग हाथ लग गया...... रात ११ बज गए  पढ़ते पढ़ते ....... घर से फोन आने लगे...... दिल वहीँ बंध गया. उसके बाद बाऊ प्रसंग...... 

सफ़ेदघर और आलसी के चिट्ठे के पढने के साथ पूर्विया का संग ...... मेरे पर भी बहुत कुछ पूर्व रंग चढ़ गया....
नहीं आये तो श्री अनूप शुक्ल जी, माने फुरसतिया...... कभी भी नहीं....

हाँ याद आया, आदरणीय ज्ञानदत्त पाण्डेय जी की हलचल..... गंगा किनारे तो मन पहले ही लगता था.... पर एक दिन कुछ इर्ष्य हुई ..... पंडित जी कुछ लिखते नहीं थे ..... और ३०-४० टीप उनके ब्लॉग पर हो जाती थी..... मैंने भी टीप दे दी ..... पाण्डेय जी ट्वीट करते है ........ और बाकि लोग ट्वीट पर ट्वीट करते है..... 
पता नहीं कैसे डॉ दिव्या जी (जील) ने उसी पोस्ट में 'अंतिम प्रणाम' कह दिया... और मैं भी निशाने पर था..... 
बहुत दुःख हुआ........ बहुत ही .... कई बार पंडित जी से माफ़ी मांगी...... और किस्मत को कौसा .... उसी पोस्ट पर ही जील ने अंतिम प्रणाम  कहना था.

डॉ अरविन्द मिश्र से प्रभावित था, तार्किक ब्लॉग्गिंग करते थे..... अजोध्या मुद्दे पर कुछ तकरार भी हुई........ ख़ुशी हुई की एक ही पथ के राही है........ 

या आया वो दिल्ली में ब्लोग्गर मीट, कौशल जी के कहने पर जाना हुआ, १०-१५ मिनट लेट पहुंचे ........ दाखिल हुए तो लगा की प्रधानआध्यापक के कमरे में दाखिल हुए है..... सामने थे समीर लाल जी और सतीश सक्सेना जी. कुछ भी नहीं कह पाए....... हमेशा की तरह एक इन्फेरिरेती काम्प्लेक्स था........ 

ब्लॉग्गिंग का इतना प्रभाव था , प्रेस में कई ग्राहक मित्र समय कम होने का बहाना कह का खिसक जाते और कविता नहीं सुनना चाहते थे, एक मित्र रवि रस्तोगी जी की बातों ने तो पोस्ट लिखने पर मजबूर कर दिया.

जून से शुरू हुई यात्रा जनवरी आते आते सर्विकल के रूप से सामने आयी....... डॉ से सकत हिदायत दी की कम्पूटर पर कम से कम बैठना....... और ... इसो ला नतीजा है की पढता तो बहुत कुछ रहा पर लिखने पर बचा का ले गया ..... सबूत हो जाएगा की अभी भी कम्पुटर पर बैठ रहे है. :)

कई ब्लॉग इतना अच्छा काम कर रहे है ---- की खुद का लिखा कुछ भी झूठा लगता है...... और आचार्य  का ये  कथन की इक्सेलेंस ही साध्य होना चाहिए........ सोच सोच कर ही रह जाता .. पर कुछ न लिख पता था......

आज होली और  १०० वी पोस्ट पर आचार्य की मेल प्राप्त हुई.............. जो कई मायने में १०वी के सन्नद माफिक है........ लम्बी है पर इस पोस्ट को लिखने का मोह उसी मेल से प्राप्त हुआ.....

आचार्य की मेल : 

सौवीं पोस्ट की बधाइयाँ।
प्रकृति को खालीपन पसन्द नहीं, भर देती है। यह अच्छे लोगों का कर्तव्य है
कि खालीपन को भरने के लिये स्वयं को प्रस्तुत रखें। इसलिये सर्वाइकल पेन
के बावजूद जब भी आराम मिले लिखते रहियेगा। लेकिन पहले स्वास्थ्य ही रहना
चाहिये।

अब आप की ब्लॉग यात्रा:

जफर की ग़जल के बाद दिनांक 16 दिसम्बर 2007 की पोस्ट, जिस कोमलता के साथ
आप प्रेम का चित्रण करते हैं, कसम से ईर्ष्य़ा हो गई:

समंदर पूछता है अब वो दोंनो क्यों नही आते
जो आते थे तो अपने साथ कितने ख्वाब लाते थे
कभी साहिल से ढेरों सीपियाँ चुनते
नंगे पाँव पानी में चले आते थे
भीगी रेत से नन्हें घरोंदे भी बनाते थे
और उनमे सीपियाँ,रंगीन से कुछ संगीत यू सजाते थे
के जैसे आज के जुगनूमय लम्हे
आने वाली कल कि मूठ्ठी में छुपाते थे। ...कुछ इसी तासीर की मेरी पहली
पोस्ट थी, जो प्रेम से इतर विषय पर थी। आश्चर्य नहीं कि आप के ब्लॉग पर
पहली बार आते ही 'सट' गया :) 

कसम से मुझे मालूम नहीं की ये ग़ज़ल ज़फर की थी. एक याहू ग्रुप से प्राप्त हुई थी..... अच्छी लगी अत: ठेल दी.

और यह तेवर तो एकदम ही अलग है (दिनांक 13/12/08)
:

ये दुनिया
इसी मायावी दुनिया में रह कर जी रहे हैं हम
हम तो शायद सूरज से भी ज्यादा प्रचंड है
 ढीठ भी सूरज से ज्यादा।
....
इस बार नहीं बनने दूँगा उसे इतना लाचार
की पान की पीक और खून का फर्क ही ख़त्म हो जाए
इस बार नहीं
इस बार घावों को देखना है
गौर से थोड़ा लंबे वक्त तक
कुछ फैसले
और उसके बाद हौसले... 

ये कविता बहुत पहले एक डायरी में लिखी थी..... एक दिन ठेल दी.

मजे की बात यह है कि टाइपिंग की कठिनाइयों का जिक्र प्रेस बाबा भी करते हैं :) आचार्य को ये मालूम हो की मैं रेमिंटन की टाइपिंग करता था ..... और इनस्क्रिप्ट मेरे लिए नया अनुभव था.... और आज भी है. 

प्रधानमंत्री से अपील करते जलते हुये सच को कहने से बाबा को परहेज नहीं:
.. देही शिवा वर मोहे एही
शुभ कर्मन से कबहूँ न टरों
न डरों अरि जब जाय लरों
निश्चय कर अपनी जीत करूँ
पड़ोसी की नियत शुरू से ही खोटी रही है. आज की बात नहीं है ... हरामजादे
शुरू से ही उर्दू की मुशायेरे और क्रिकेट की बातें करते करते पीठ में
छुरी घोंप जाते है (दिनांक 12/03/08).

केरल के सी एम की कारस्तानी पर तीखापन एक आम अबौद्धिक सीधे साधे आदमी का
है (दि. 12/02/08)
... भारत वंशी का होश नहीं गंगा की सोच नहीं मिटटी का लगाव नही वतन पर
नाज़ नही बस राज करना चाहते हैं - दोस्तों मेरा ये वादा है की जिस दिन ये
लोग आपने तरीके से इस देश पर राज करने लगे तो भारत के ३८० टुकड़े होंगे
और इनका मुख्यालय पेचिंग (चाइना) में होगा। ....

और हास्य का यह रंग (दि. 13/07/10)
मोटी मोटी स्त्रियों को पार्क में यूँ भाग रही होती हैं की मनो आज ही
सारा कोलेस्ट्रोल ख़त्म कर देंगी और नयी उम्र की लोंदियों की नज़र आएँगी.
कुछेक के साथ उनके टौमी को और कुछ एक के साथ तो उनके 'उनके' को भी मजबूरी
वश हाँफते हाँफते भागना पड़ता है। जो की सब से नज़र बचा कर और झुका कर चल
रहे होते है.फिर थोड़ी ही दूर ... उम्र के अंतिम पड़ाव पर कुछ बुजुर्ग
जोर जोर से ठहाके लगा रहे होते है : जोर जोर से ठहाके लगाने से या तो
उनके नकली दांत गिर गए होते हैं या फिर पहेले से ही घर में रख कर आते है.
वहां रुक कर देखने में बड़ा ही आनंद आता है. थोडा आगे जाने पर ....
मोर्निग वाल्क का बहाना कर के निकली मेनका ... किसी इंद्र को लुभा रही
होती है या फिर कोई देवदास पारो नयनो के तीर एक दुसरे पर चला रहे होते
हैं। दूर एक बेंच पर एक सरदार जी, जिनकी नज़ारे तो उक्त प्रेमी युगल पर
होती पर साँसे बाबा रामदेव का आलोम वियोम कर रही होती है। :) अनुलोम
विलोम लिखना था बाबा!

तिहाड़ गाँव के जोहड़ की यह कविता( 12/07/10) सोचने पर मजबूर करती है:
पानी का लबालब तालाब -
तब बिना टेंडर के भी मछलियाँ उपजता था
जहाँ सर्दियों में सारस अपने वतन से दूर
मेरे गाँव आते थे.
उन सारस को देखने की चाहत
फिर बन जाती है
इन कड़कती बिज़लियों को देखकर
एक दिन बारिश जोर से हो रही थी, और प्रेस में मैं खिड़की से देख रहा था..... और तालाब की याद आई..... 

लंठई (दि. 19/06/10)
... पकोड़े का लिफाफा हिलाते हुवे स्कूल ला रहे थे की लिफाफा हाथ से छूट
कर रोड पर गिर गया और पकोड़े बिखर गए. अब बिखर गए तो कोई बात नहीं - पर
बिखरे वहां थे जहाँ पर गोबर (सुखा) पड़ा था. हमने बड़े जतन से पकोड़े
एकठे किये पर उनमें गोबर का बुरादा लग गया था. समझ नहीं आया क्या करें.
फिर भी दिमाग(?) था .. पकोड़े दूकानदार को वापिस दे कर बोले की मा'साब
नें बोला है दुबारा गर्म कर दो. दूकानदार नें दुबारा गर्म के दे दिए और
हमने कांपते हाथों से मा'साब को दिए. शुक्र है पकोड़े ज्यादा क्रिस्पी बन
गए थे...यह किस्सा तो एफ एम के 'सुड' को भेजना चाहिये ;)

अब बीच में गोल कर मेरी प्रिय
पोस्ट - बापू की बकरी से कुछ अंश:
पंडित नेहरु को भी बकरी में विशेष दिलचस्पी थी. वो बापू को खुश रखने के
लिए अधिकतर बकरी को अपने हाथ से बादाम खिलाते...
..

इस कथा ने जाने कितने आयामों से परिचय करा कर आप की प्रतिभा से परिचय करा
दिया। ... अनवरत लेखन और उत्तम स्वास्थ्य के लिये शुभकामनायें। 

बहुत बहुत आभार आचार्य...... बस आपसे एक निवेदन है..... टीप बॉक्स को खुला रखिये. और दुसरे ब्लॉग पर भी टीप दीजिए......... 

ब्लॉग्गिंग का एक असर मेरे पर ये भी हुवा की जब सुबह अखबार पढता था तो हर खबर पर टीप देने का मन करता था.

मन में बहुत अरमान थे...... पर कम लिख पाया......... कई मित्रो से और भी बढ़िया अनुभव थे....... जो श्याद इस पोस्ट में समेत नहीं पाया.... कोशिश करूंगा कल... काश कोशिश सफल हो... नहीं तो ये पोस्ट अधूरी ही रहेगी. 

जय राम जी की.