13 जुल॰ 2010

आवश्यकता है : हेल्परों की

पिछले दो वर्षों से दिल्ली के ओद्योगिक क्षेत्रो में, लगभग हर फैक्ट्री के गेट पर टंगा एक बोर्ड आजकल चर्चा का विषय है। बोर्ड इस प्रकार है: "आवश्यकता है : हेल्परों की" . हेल्परों की कमी से समस्त कुशलवर्ग के साथ मालिक वर्ग भी परेशान है. फेक्टरी के अंदर जो कार्य हेल्पर करते थे वो सिर्फ हेल्पर ही कर सकते हैं, यानि की "जा बेटा चाय ले आ", "जा मशीन पर कपडा मार दे" "ये सामान मशीन से हटा कर सामने लगा दे" "ये पुर्जा फला दुकान से ले आ" - यानी की ये सभी कम रुके तो नहीं पर मुख्या कार्य में बाधा जरूर बन रहे हैं - यानि प्रोडक्शन में कमी. दूसरा भविष्य में येही हेल्पर उसी फैक्ट्री में कुशल कारीगर के रूप में योगदान देते हैं और फिर उस्तादों की श्रेणी में आ जाते हैं.
(पोस्ट को मात्र सुंदर बनाने के लिए इस फोटो का इस्तेमाल किया है.)

इसके लिए जिम्मेवार कारन मुख्यत: जो मुझे समझ आते हैं: दिल्ली की महंगाई, अन्य प्रान्तों में रोजगार के बड़ते अवसर, लड़कों का टेक्निकल कार्यों से रुझान हटना, कुछ भी सीखने की इच्छाशक्ति का ख़त्म होना और बिना कुछ सीखे सब कुछ पा लेने की चाहत। दिल्ली में आज कम से कम ६०००-७००० रुपये कमाने वाला व्यक्ति भी गुजरा नहीं कर पा रहा। ये हेल्पर वर्ग जिसे हम गरिया कर "बिहारी" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुवे हीन नज़र से देखते हैं - ये पूरी उद्योगिक इकार का मूल अंग होते hain. २५०० तनख्वाह ओवर टाइम मिला कर ४५०० या ५००० तक पहुँच जाती थी. जिसमे से ये लोग ४-५ के ग्रुप में कमरा शेयर करते थे १५०० मासिक भाड़े पर - पर व्यक्ति ५००-६०० रूपये पड़ते थे. खाना सस्ता था. दोपर हर क्षेत्र में ठेले पर १०-१२ रुपे का हो जाता था. और न न करते हुवे भी घर हर माह २००० रुपये के करीब भेज देते थे. पर आज ये सब नहीं हो पा रहा.

दूसरा मुख्या कारन: बिहार, उतराखंड में बढता उद्योगिक रकबा। नितीश के राज में प्रदेश के उद्योगपति मुखर हुए हैं और नयी नयी फैक्ट्री और प्रोजेक्ट ला रहे है - जहाँ पर बेशक दिल्ली से तनख्वाह कम मिलती है पर घर से नजदीकी और खर्चों की कमी के कारन वहां से लेबर का पलायन रुका है। दुसरे उतराखंड में हरिद्वार, रुद्रपुर अच्छे उद्योगिक क्षत्र के रूप में विकसित हुवे हैं और पहाड़ का आदमी - पहाड़ पर ही सिमट गया है।

दूसरी बात, आजकल के नौजवानों में तकनिकी कार्य करने की इच्छा खत्म हो गई है। अब हाथ में मोबाइल फोन आ गए हैं, कक्षा १० सभी पास कर गए है. हाथ काले करने में शर्म आती है- पैसा कमाने के लिए एक अच्छा विकल्प होता है कमीशन. कोई भी कार्य करना और कमीशन खाना. सभी "गुरु भाई" बनना चाहते हैं. चैन स्नाचिंग, चोरी चकारी इत्यादि।

एक बात तो है की हम भविष्य में सफ़ेद कोलर बेरोजगार नौजवानों की अच्छी खासी फौज तैयार कर रहे है.

: बाबा :

जोगर्स पार्क नहीं ब्लोगेर्स पार्क - पता नहीं क्या

क्या आप सुबह पार्क में भ्रमण के लिए जाते हैं। यदि जाते हैं तो अच्छी बात है, पर नहीं जाते तो कोई बात नहीं, हम बताते हैं क्या हो रहा होता है:

मोटी मोटी स्त्रियों को पार्क में यूँ भाग रही होती हैं की मनो आज ही सारा कोलेस्ट्रोल ख़त्म कर देंगी और नयी उम्र की लोंदियों की नज़र आएँगी. कुछेक के साथ उनके टौमी को और कुछ एक के साथ तो उनके 'उनके' को भी मजबूरी वश हाँफते हाँफते भागना पड़ता है। जो की सब से नज़र बचा कर और झुका कर चल रहे होते है.फिर थोड़ी ही दूर ... उम्र के अंतिम पड़ाव पर कुछ बुजुर्ग जोर जोर से ठहाके लगा रहे होते है : जोर जोर से ठहाके लगाने से या तो उनके नकली दांत गिर गए होते हैं या फिर पहेले से ही घर में रख कर आते है. वहां रुक कर देखने में बड़ा ही आनंद आता है. थोडा आगे जाने पर .... मोर्निग वाल्क का बहाना कर के निकली मेनका ... किसी इंद्र को लुभा रही होती है या फिर कोई देवदास पारो नयनो के तीर एक दुसरे पर चला रहे होते हैं। दूर एक बेंच पर एक सरदार जी, जिनकी नज़ारे तो उक्त प्रेमी युगल पर होती पर साँसे बाबा रामदेव का आलोम वियोम कर रही होती है।

बाकि कल बतायेंगे :

12 जुल॰ 2010

मेरे तिहाड़ गाँव का जोहड़

एक चाहत सी बनी रहेती है
इन कड़कती बिज़लियों को देखकर
बरसते मेघों में भीग कर
चलते चलते रुककर
कुछ सोच कर
फिर से चलने का उपक्रम
इन कड़कती बिज़लियों को देखकर
एक चाहत सी बनी रहेती है

चाहत अपने तालाब की
चाहत उन बिना मजदूर के बनाये नालों की
जो पानी को मेरे तालाब में पहुंचाते थे
पानी का लबालब तालाब -
तब बिना टेंडर के भी मछलियाँ उपजता था
जहाँ सर्दियों में सारस अपने वतन से दूर
मेरे गाँव आते थे.
उन सारस को देखने की चाहत
फिर बन जाती है
इन कड़कती बिज़लियों को देखकर

खिड़की से बारिश की आती बूंदों ने पता नहीं क्यों झंकोर दिया और यूं ही कुछ - पंक्तियाँ दिमाग में आने लगी .. जो शायद अश्पष्ट कविता का एक रूप है.
जब भी कहीं बारिश को देखता हूँ, महसूस करता हूँ तो पता नहीं क्यों गाँव का तालाब (सरकारी नाम : तिहाड़ गाँव झील- जो दीनदयाल अस्पताल के नज़दीक hai) याद आ जाता है जो आज सरकारी महकमे की मेहरबानी से अपने ओचित्य में ही रो रहा है.
और बचपन में मेरे को याद है की किस तरह तालाब पूरा भरता था और अगले मानसून तक भी भरा रहेता था. हरिनगर बस दीपो तक से पानी अपना रास्ता बनता हुवा इस तलब में आता था, घंटा घर, तिहाड़ गाँव, हरिनगर फ्लाटों, आशा पार्क और न जाने कितनी ही कालोनियों का पानी बिना किसी नाले से सीधा इसी तालाब में गिरता था.
जब से विकास चालू हुवा तो इस तालाब का मरण भी चालू हो गया. सरकारी खातों में तो पता नहीं क्या क्या योजनायें बनी - पर तिहाड़ झील तक कितनी पहुंची ये तो वो अफसर जानते हैं या फिर उनका ज़मीर. पहेले इस जोहड़ को झील की संज्ञा देने के साथ ही इससे खिलवाड़ चालू हो गया. इनके चरों तरफ बसी कालोनियों में बरसाती नाले बयाने गए की इनका पानी झील में न गिरे. फिर बड़े बड़े बोर्ड लगा कर यहाँ नोका विहार शुरू किया गया. जाहिर है पानी तो सुख ही गया था. इस को रिचार्ज करने के लिए सरकारी तौर पर ४-४ तुबवेल जो दिन रात चल कर भी इस बड़ी झील के लिए न-काफी सिद्ध हो रहे हैं.
पता नहीं - मुझे तो ड़र लगता है किसी दिन आसपास के RWA इस पाटकर पार्किंग न बना दें.

2 जुल॰ 2010

आज की जीवनचर्या और विवेका बाबाजी

आजकल मॉडल विवेका के मौत नें सभी नौजवान (खासकर महिलाएं जो अकेले रहेती हैं) को विचलित कर दिया है. एक मित्र की ईमेल इस प्रकार है :
मशहूर मॉडल विवेका बाबाजी की मौत के बाद कई बातें सामने निकल कर आ रही हैं। उनके दोस्तों का कहना है कि वह बहुत जिंदादिल लड़की थी और किसी के साथ भी बहुत ही जल्दी घुल मिल जाती थी मगर वह अपनी दुनिया में खोई रहना पसंद करती थी। विवेका काफी समय से अकेलापन महसूस कर रही थी इसलिए उनके दोस्तों का कहना है कि वह एक बच्चे को गोद लेने का मन बना रही थी।
अगर वह ऐसा करती तो शायद आज इस दुनिया में होती|विवेका को उनके टूटते रिश्तों ने काफी परेशान कर दिया था। हर ब्रेक अप के बाद विवेका का मर्दों पर से विश्वास उठता जा रहा था और वह अंदर से टूटती जा रही थी। ब्रेक अप के सदमे से उभरने के लिए उसे भावनात्मक सहारे की बहुत जरुरत महसूस होने लगी थी इसलिए उसने यह तय किया था कि वह किसी अनाथ बच्चे को गोद लेकर उसे सारी खुशियां देगी जो उनके परिवार ने उन्हें दी थी। मगर लगता है शायद किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था जो विवेका इतनी जल्दी इस दुनिया से चली गई.

परन्तु मेरा मन कुछ और कहेता है :
बात सिर्फ विवेका बाबाजी की नहीं, बात हमारी उस लाइफ स्टाइल की है जो हम जी रहे है. अकेलापण सताता है - भयावह होता है, अकेलापण दिन के सुहाने प्रकाश को अन्धकार में बदल देता है. हम लोग नेट पर पर दोस्त दूंदते रहते हैं पर आस पड़ोस के लोगों से मिलना जुलना पसंद नहीं करते. आप सुबह पार्क जाइए, कितने लोग होंगे जो रोज़ आपको उसी समय मिलेंगे, राम राम होगी- सुबह सुबह चेहरे पर मुस्कान आएगी. घर पर सुबह मैड आती है सफाई करने, हम सिर्फ बोस बन कर उससे पेश आते हैं - उसे हंस कर बात नहीं कर सकते क्योंकि उससे हमारी इज्ज़त कम होगी- सुबह दूध वाला आता है: मैं तो कई बार उसको चाय पूछता हूँ, अखबार वाले की इंतज़ार कर रहा होता हूँ- वो मुझे देख कर ही मुस्करा उठता है: अच्छी खासी दोस्ती हो गई है उससे. हर बार चाय पूछता हूँ पर उसने कभी नहीं पि. रास्ते में पनवाड़ी के पास रुकता हूँ - मुझे देख कर खुश हो जाता है. पेट्रोल पम्प - जहां से तेल भरवाता हूँ: वहां का स्टाफ मुस्करा कर मेरा स्वागत करता है: मैं उससे उसके घर का हाल चाल तक पूछता हूँ. प्रेस में जो रिक्शे वाले आते हैं - हरएक को पानी-चाय ऑफ़र करता हूँ - बहुत खुश होते हैं: किसी किसी को पवे के पैसे भी दे देता हूँ. वो लोग ख़ुशी से मुझे सुरती बना कर खिलाते हैं.
प्रेस में लडको को छोटा भाई सम समझता हूँ, सारा दिन मजाक मजाक में दिन निकल जाता है. जिस दिन प्रेस नहीं आता मेरा स्टाफ परेशां रहेता है. उनका मन नहीं लगता. जितने भी मेरे ग्राहक हैं: उनको ये प्रेस अपनी लगती है - यहाँ आते हैं - हम लोग घर परिवार की बात करते हैं और मस्त रहेते हैं.
देखो अकेलापन सिर्फ आपनी नाक से पैदा होता और पुरे वातावरण को दूषित करता है. हमारा दिमाग - सिर्फ नारात्मक हो जाता है और एक आज का नौजवान जब तरकी करके किसी मुकाम पर पहुँचते हैं तो अपने से निचले दर्जे को नीची नज़र से देखते हैं और यहीं उनका अकेलापन शुरू हो जाता है. अगर ऑफिस का पियन अगर मुस्करा कर बात कर दे - मन में संशय हो जाता है कहीं उधर न मांग ले.
मित्रों, में बस एक बात कहेना चाहता हूँ - की मस्त रहो और खुश रहो - सभी अपने लगेगे और अगर उदास और चिडचिडे रहेंगे तो अपने भी पराये लगेगें. जो मिले सब्र से इश्वर का प्रसाद मान कर सवीकार करें - और अगर ज्यादा की उम्मीद हो तो बस प्राथना करो. दूसरों को खुश रखना भी खुदा की इबादत है :
"घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो, यूँ कर लें किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये"

19 जून 2010

लफ़त्तू की संगत और क्रिस्पी पकोड़े

सभी ब्लोगर्स भाइयों को जय राम जी की
आज अपने मित्र कोशल जी, (जो प्रकाशक हैं व् Hardware Events & Garment Events नाम से दो मैगज़ीन हमसे छपवाते हैं), को "लफ़त्तू की संगत" मैं ले गए. बहुत ही आनंद आया. लगभग २-३ घंटे तक हम दोनों पांडेजी के लाफ्तू के साथ रामनगर में ऐश करते रहे.
बच्चपन की कई बातें हमें भी बार बार याद आती रही. और उन्हीं का जिक्र कर रहा हूँ.
एक मास्टर जी जो हमे प्राथमिक कक्षा में पड़ते थे. एक बार एक बच्चा कक्षा के बाहर झांक रहा था. मास्टरजी ने उसे बुला कर पहेले तो २ झापड़ रसीद किया फिर पूछा "बाहर तेरी माँ नाच रही थी" बेचारा बच्चा क्या जवाब देता. हाँ मगर लफ्तू टाइप कई लड़के उसको कई दिन तक छेड़ते रहे - बाहर तेरी माँ नाच रही है.
जब में नवी कक्षा में था, तो गणित और बिज्ञान में हमारा हाथ शुरू से ही तंग था (और आज भी है). जीवविज्ञानं के सरजी (अब मा'साब - सरजी बन गए थे) ने न जाने मुझ में क्या देखा - डेस्क से खड़ा कर दिया और केमिस्ट्री के कुछ HO2 जैसे फार्मूले पूछने लगे, (जहीर ही है, की जब उन्होंने सोच समझ कर मुझ से पूछा था तो उनको इतना तो मालूम ही था की मुझे नहीं आते) और मैंने भी सरजी की अपेक्षा पर खरे उतारते हुए अपनी गर्दन हिला दी. बस फिर क्या था रावल सरजी नै आव देखा न तव, पिल पड़े मुझ पर. पता नहीं कितने थप्पड़ मारे. वो भी तेज़ तेज़ मुहं लाल हो गया. आज भी बेटे की केमिस्ट्री की किताब देखता हूँ तो एक हाथ स्वत की मुंह पर चला जाता है. - बात थप्पड़ तक ही सिमित नहीं थी "हरामजादे पड़ते नहीं - कल हमारा मेट्रिक का रिजल्ट डाउन करवायेगे. आब कहेगा - कान का पर्दा फट गया, - कल बाप को बुला कर प्रिंसिपल के पास जा कर मेरी शिकायत लगायेगे." पिरोड़ ख़त्म होने के बाद में तो सर झुका कर बैठा रहा पर - बाकि क्लास नें मेरी और सरजी की एक्टिंग की क्या बताएं.
अब सोचते हैं की सरजी नें खामखा ही मारा, अगर आज केमिस्ट्री के फोर्मुल नहीं आते तो क्या रोटी नहीं खा रहे - जिंदगी में किसी मुकाम पर पीछे हैं क्या. हाँ गणित आता होता तो अच्छा था . आज प्रेस में हिसाब किताब में कई बार गड़बड़ हो जाती है.
ऐसी बात नहीं है की मास्टरों ने ही हमारी बजाई. जब हमें मोका लगता हम भी बाज़ नहीं आते थे. आठवी क्लास में एक मा'साब नें एक प्रसिद्ध दूकान से पकोड़े मंगवाए, हम पकोड़े तो ले लिए पर बाल सुलभ हरकतों की वजह से पकोड़े का लिफाफा हिलाते हुवे स्कूल ला रहे थे की लिफाफा हाथ से छूट कर रोड पर गिर गया और पकोड़े बिखर गए. अब बिखर गए तो कोई बात नहीं - पर बिखरे वहां थे जहाँ पर गोबर (सुखा) पड़ा था. हमने बड़े जतन से पकोड़े एकठे किये पर उनमें गोबर का बुरादा लग गया था. समझ नहीं आया क्या करें. फिर भी दिमाग(?) था .. पकोड़े दूकानदार को वापिस दे कर बोले की मा'साब नें बोला है दुबारा गर्म कर दो. दूकानदार नें दुबारा गर्म के दे दिए और हमने कांपते हाथों से मा'साब को दिए. शुक्र है पकोड़े ज्यादा क्रिस्पी बन गए थे...................

16 सित॰ 2009

हरीश जोशी जी का कविता संग्रह ... उलझन

ब्लॉग बिरादरी जो जय राम जी की और समीर दादा को प्रणाम

बहुत दिन से तो कुछ लिख पाया और ही कुछ पड़ पायाप्रेस में हालात ठीक नहीं थेवैश्विक मंदी का असर धीर धीर और कम ही सही बाबा की प्रेस पर भी पड़ाआज जब एक बार फिर ब्लॉग देखा तो दादा की टिपण्णी थी की बहुत दिन से कुछ नहीं लिखा ... फिर असमंजस में पड़ गया की दादा को हमारी याद तो कम से कम इतनी बिरादरी में एक शख्स तो है जो राख में चिंगारी खोजने की मादा रखते हैं

इतने दिनों में घाघ की कुछ देसी कहावते की किताब नेट पर हाथ लगी थी कई बार उसको पढा बहुत अच्छी लगी। मंझली बहन, parinita, devdas , ये उपन्यास भी पढ़े देवदास और परिणीता तो पहेले से ही पढ़ा हुवा थाये सब यहाँ उप्लब्ध हैं www.kitabghar.tk।

कनपुरिया जी, कबाड़खाना, मोहल्ला और टूटे हुवे बिखरे हुवे पर गोता लगाता रहालगभग दो सप्ताह नेट भी ख़राब थाआज हालात ठीक हैंनेट भी ठीक है

abhi haal hi में मेरे मित्र श्री हरीश जोशी जी का कविता संग्रह छापा ... उलझनजोशी जी भारतीये कृषि अनुसन्धान परिषद् में राज भाषा निदेशक है और कवि हृदये हैआप की ये कविता संग्रह मॉस के लंबे अन्तराल में छप पाई - इसका एकमात्र कारन मेरी मनो दशा ठीक होना थाकुछ भी करने को मन नही कर रहा थाकुछ कविताये तो बहुत ही अच्छी है जैसे की :

बस

ये बस हिंदुस्तान है

क्या इतना ही काफी है

इसकी

सीट पर बैठा हर व्यक्ति

महान है

क्या इनता ही काफी है


जरा यहाँ गोर फरमाइए

जूता

घायलों के रिश्ते खून में भिगोकर

भाषा का जूता ... दनादन ... मरना चाहता हूँ

इन कम्भाक्तों के सर पर ...

पर इनका सर कहाँ

इनके तो पड़ते हैं ... पैर जहाँ ...

वहां तो खून ही खून ... आता है नज़र

इनके सर में भर दिया है बारूद ... और....

नफ़रत की गोलियां

बरसाने के लिए


दिन

क्या क्या नहीं घटता एक दिन में

सुख दुःख - हार जीत - कहा सुनी - मार पीट

रोग शोक - आधी व्याधि - हानि लाभ - जीवन मरण

सब एक दिन में ही तो घटते हैं

सचमुच .... जिंदगी काटना कितना आसन है

पर दिन काटना कितना मुश्किल

जो भी हो देर आयद दुरुस्त आयद ... किताब लेट छपी परन्तु अच्छी छपी और जोशी जी नें किताब का टाइटल उलझन भी मेरे कहने पर रखा ... शायद मेरा मान रखने के लिए

इतना ही ....

27 मार्च 2009

नव वर्ष की शुभ कामनाएं

आज शुभ विक्रमी संवत २०६६ है। में भारत भूमि पर जन्म लेने के कारन सर्व मानव कल्याण की पुरातन हिंदू भावना से ग्रस्त हूँ, अतः इस वेद मंत्र के साथ कामना करता हूँ :

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया: ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:ख भाग्भवेत् ।

अर्थात सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी को शुभ दर्शन हों और कोई दु:ख से ग्रसित न हो ।

कितना सुंदर और सारगर्भित ये मंत्र है जिसमे विशव के सभी मानव जाति के कल्याण की बात की गए है। होली के बाद ही मौसम में परिवर्तन आना शुरू हो जाता है । जब प्रकृति अपनी सम्पूर्ण छटा बिखेर कर अपने योअवन पर आ कर मुस्कराती है तो भारत देश में मानव तो क्या प्रतेयेक प्राणी के मन में नयी उमंग आ जाती hai।


नयी फसल खेतों से निकलकर - किसान जब नगदी घर लाता है - और घर में एक त्यौहार का एहसास होता है बच्चों के लिए नए कपडे, घर के लिए कुछ नया, और पैसा बचा तो घर की मालकिन के लिए नया कपड़े जेवर इत्यादि । कुल मिला कर किसान जो भारत वर्ष की ७० प्रतिशत जनता का प्रतिनिध्तावा करता है खुश होता है और मन उमंगों से भरा रहेता है। प्रकृति के ताल से अपना ताल मिलते हुवे अपनी खुशी में और इजाफा करता है।

वसंत ऋतू में प्रकृति अपने सम्पूर्ण यौवन पर मानव के चित्त को मस्त करती है। आम के वृक्षों में फूल सुगंध बिखेरते हैं। जगह जगह लगे पेड़ भी नव पत्तों के साथ नए कपड़े पहेने सरीखे लगते हैं।

विक्रमी संवत का इतिहास :
ब्रम्हा जी ने आज ही के दिन सृष्टि का निर्माण शुरू किया था.
भगवान् श्री रामचंद्र जी का राज्यअभिषेक इसी दिन हुआ था.
आज ही के दिन स्वामी दयानंद जी नें आर्यसमाज की नींव रखी थी.
माना जाता है कि विक्रम संवत गुप्त सम्राट विक्रमादित्य ने उज्ज्यनी में शकों को पराजित करने की याद में शुरू किया था।
एक बात और, दीपक बाबा ने भी इसी दिन संवत २०६२ में नरेना मैं एक 6 गुना 6 फ़ुट कोठरी में मिस्टिकल ग्राफिक्स नामित कंपनी की शुरुवात की थी. अत इस दिन का महत्व और भी बाद जाता है. अच्छी तरह याद है की पंडित राम कुमार पाण्डेय जी (छोटू पंडित) नें कोठरी के बाहर हवन किया था और जी भर कर आशीर्वाद दिया था.

दोस्तों हमारा हिंदू धर्म कह लो या जीवन पद्धति - हमें प्रकृति के साथ जीने की विद्धा सिखाती है। और हमारे पूर्वज प्रकृति के लए के साथ ताल मिलते हुवे जीते थे और खुश रहते थे। आज अपने बारे में सोचे? अंग्लो नव वर्ष Happy New Year पर क्या करते है? क्या प्रक्रति हमारा साथ देती है. हम बस और लोगों की देखा देखि ये अंग्लो नव वर्ष मानते है.

25 मार्च 2009

मनमोहन सिंह जी - जय हो....

मानिये प्रधानमंत्री जी। मुबारक हो ॥ बधाई हो .. आपने प्रधानमंत्री के रूप में अपने पांच वर्ष पुरे कर लिए हैं और आपकी तस्वीर पूर्व महान प्रधानमन्त्रियों के साथ सरकारी दफ्तरों में चस्पा की जायेगी. वो बात दीगर है की उस तस्वीर में श्रीमती सोनिया गाँधी जी भी नज़र आएँगी. चाहए वह वाटर मार्क के रूप में ही नज़र आये. पर आयेंगे जरूर.

मुझे याद hai आपका शपथ ग्रह समारोह। याद है वामपंथियों के नाम पर शेयर मार्केट का धराशाही होना। मैडम का दो बार तत्कालीन राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम के पास जाना और वापिस आना। १० जनपथ के बाहर फर्जी कांग्रेसियों की भीड़। सभी कुछ तो याद है. एक कांग्रेसी वो भी याद है जो पिस्टल ले कर पेड़ पर चढ़ गया था. टीवी पर देखते देखते शेयर मार्केट ४००० से नीचे आ गयी थी. अचानक सब बदल गया मैडम ने आपको आगे कर, एक तुरुप का पत्ता चल दिया, मैडम को मालूम था की आप दक्षिण दिल्ली में विजय कुमार मल्होत्रा से लोकसभा चुनाव हार गए थे. प्रणव मुख़र्जी जैसे मंजे हुवे खिलाडी को एक किनारे करते हुवे आपका नाम प्रधानमंत्री पद के लिए आगे किया. आप क्या सोच रहे है की आपके अंदर प्रधानमंत्री बनाने की प्रतिभा थी, नहीं, मैडम को बस एक डमी प्रधानमंत्री की जरूरत थी, वो सब योगतायें आप में दिख रही थी.
मनमोहन सिंह जी, दिल पर हाथ?? (क्या बताएं, हाथ भी कोंग्रेस का कैसे सच बोलेंगे ) रख कर बताएं , की कोंग्रेस में श्री प्रणव मुख़र्जी जैसे मुखर नेता के होते हुवे आप को (मैडम नें ) प्रधानमंत्री कि रूप में नामित क्यों किया. और आब्की २००९ कि लोकसभा चुनावों में भी आपको आगे रख कर लड़ रहीं है. आप अपनी कारीगरी पर नज़र डालें :

- आपके राज में शेयर मार्किट, २०,००० को पार कर गई, आपको मालूम था की किन लोगों का पैसा इस खेल में लग रहा है, और वो लोग जब अपना पैसा वापिस निकालेंगे को कों पिसेगा, ... यानि की उच्च माध्यम वर्ग, जो आपना एक एक पैसा बचा कर शेयर मार्केट में मुनाफे कि लिए लगा रहे थे। उनको क्या मालूम था की कुर्सी पर एक अर्थशास्त्री बता हुवा है जो आपकी न सुन कर मुल्क से बाहर बेठे आकोयों की सुनता है


- उत्तेर प्रदेश में निठारी बच्चे लील कर थी। हरियाणा में पुलिस फक्टोरी कि बाहर कामगारों की पिटाई कर रही थी पर आपको कहाँ फुर्सत थी। पिस तो धरती कि लाल रहे थे। - कारपोरेट जगत का पैसा, काली कमाई कि रूप में भूमि सम्पदा में निवेश हो रहा था ... आपने अपना चस्मा उधेर नहीं घुमाया।
- एक सत्यम का राजू तो पकडा गया ... बाकि राजू का क्या होगा।
- सेज कि रूप में दिल्ली कि १५० किलोमीटर बाहर जमीन कोडियों कि भावः उद्योगपतियों को दी गई, किसानो का क्या होगा सोचा.
- एक माल में करोडों रुपे का निवेश होता है. .... पर ग्राहक नहीं होते, ये पैसा कहाँ से आता है. और क्यों डैड इनवेस्टमेंट कि रूप में इस्तेमाल होता है.
- आज चुनाव नज़दीक आने पर, आपने मंहगाई दर शुन्य के करीब कर दी है. पर इसका फयदा किसे है॥
- दिल्ली की बात करता हूँ, दिल्ली में फक्टोरियों में, एक हेल्पर जो १८०० से २२०० में मिल जाता था और खुश हो कर काम करता था, आज ३००० में नहीं मिलता, मालूम क्यों, २००५ में वह प्राणी, १८०० के वेतन से ३००० (ओवर टाइम मिला कर) रुपे पाक संतुष होता था और उसमें घर भी १००० रुपये भेज देता था. आज वह ३००० वेतान पाकर भी संतुष नहीं होता क्यों की आपकी दया से फक्ट्रोरिओं में काम ख़तम हो गया है और ओवर टाइम नहीं लगता.
- आप कहेते है की महंगाई दर कम हो गई है. झुगी झोपडी में रहेने वाले सभी करोड़ पति नहीं बनते. वेह मात्र फिल्मो में ही होता है और आपसे कहेल्वाया जा रहा - जय हो

बहरहाल जय हो ... प्रधानमंत्री जी ... तेरी जय हो....