21 सित॰ 2010

बोल मेरी मछली कित्ता पानी

एक गोल चक्कर बनाकर – एक दूसरे का हाथ पकड़ कर गोल गोले घूमते बच्चे बोलते.......

हरा समंदर – गोपीचन्द्र

बोल मेरी मछली कित्ता पानी

और बीच में जो बालक रहता – वो अपने घुटने तक हाथ लगता हुवा बोलता

इतना पानी

इसी प्रकार फिर से वो बोलना चालू करते – और बीच का बच्चा – कमर तक इशारा करता हुवा कहता इतना पानी

याद आपको भी आ गया होगा. बच्चपन का वो खेल. हाँ, आजकल मीडिया के सभी लोग यमुना के किनारे हाथ पकड़ कर गोल गोल घूम रहे हैं. और बोल रहे है – बोल मेरी मछली कित्ता पानी. सुबह से शाम तक बकते रहते हैं. यमुना खतरे कि निशान के इतना उपर – उतना उपर. दिल्ली में बाढ़??

दिल्ली में बाढ़ का खतरा! -

दिल्ली में बाढ़? सिर्फ 8 CM दूर खतरा ...

यमुना खतरे के निशान से ऊपर, दिल्ली ...

दिल्ली में बाढ़ का खतरा, कई ट्रेनें ...

यमुना का जलस्तर बढ़ा, दिल्ली में ...

दिल्ली में बढ़ रहा है बाढ़ का खतरा

यमुना में उफान जारी, शीला ने कहा ...

दिल्ली, बाढ़ ,Flood in Delhi - Desh Localnews - Desh ...

दिल्ली में बाढ़ का खतरा, खाली कराए गए ...

दिल्ली में बाढ़ का खतरा, हरियाणा ने ...


दिल्ली वालों, यमुना नदी – अपनी जगह मांग रही है – उसकी जगह खाली करो.


इतनी मीटिंग और आपातकालीन बैठक बुलाई जा रही है. इतने मास्टर प्लान बन रहे हैं. पर एक बात – नदी का पेटा जो दिल्ली के सेवर कि सिल्ट से भर गया है कभी उसको साफ़ करवाने की किसने सोची? सिल्ट से कम से कम १ मीटर गहराई तो कम हो गई है. नदी का विस्तार भी कम कर दिया है. किनारों से रेत खत्म हो गई है. मानसून के दौरान वजीराबाद बैराज से बहुत सा पानी बेकार चला जाता है. और अनुमानित यह पानी दिली जल बोर्ड द्वारा सप्लाई किया जाने वाले पानी के चार गुना होता है. नदियाँ जो पहाडो से रेत बहाकर लाती है .... वो अपने किनारों पर जमा करती है जिससे ज्यादा पानी आने से इसी रेत द्वारा सोंख लिया है.


यमुना कि इस रेत को रेत के ठेकेदारों ने नहीं बक्शा....... बाकि नदी में रह गई – सीवर कि सिल्ट. वो कहाँ से पानी सोखेगी. पहले यही नदियों कि रेत को अगर २-४ फूट खोदा जाता तो पानी मिल जाता था.



कहते हैं प्रकृति अपना समाधान खुद करती है – यमुना को हिल्लोरे मारने दो. बहने दो – ये तुम्हारी गंदगी ही तो साफ़ कर रही है.

मीडिया वालों बार बार टोक कर नज़र मत लगाओ.

जी हाँ पहले इसी नदी के कारण हमारी दिल्ली पानीदार थी – और दिल्ली वाले भी. अब दिल्ली वाले बेशर्म मालदार हैं और धरती बाँझ – कंक्रीट से भरी हुई.

सुबह बारिश आ रही थी - इसलिए घर बैठ कर टीवी देख रहा था - और परेशान होकर ये पोस्ट यमुना मैया पर लिखी - जय राम जी की.

फोटो : गूगल के साभार.

18 सित॰ 2010

लिवनी आंटी................

परिंदे तय कर लेंगे अपना सफ़र.
मौसम की दीवानगी से वाकिफ़ है.

सही तो है. पर एक बात जो अपन को कचोटी है – मेरे जैसे परिंदे को तो ये मालूम नहीं कि मंजिल कहाँ है – फासला कितना है – कैसे तय कर पायेंगे अपना सफर.

बस आवारागर्दी ही तो होगी.

ये आवारागर्दी कहाँ पहुंचायेगी........... ये न मैं जानता हूँ न आप.

बिना मंजिल – बिना किसी लक्ष्य के जीवन जीना......... कितना ही मुश्किल है – ये बात पड़ोस में रहने वाली उस लिवनी आंटी कि जीवनचर्या से मैंने सीखी थी.

लिवनी का मतलब – पागल होता है – वो ओरत थोड़ी सीधी थी – अत: बालपन में हम भाई बहनों ने उसका नाम लिवनी रख दिया था. उसका पति MCD में मुलाजिम था. घर में मात्र दो प्राणी थे – पति-पत्नी. मनो दो हँसो का जोड़ा.

याद आती है – गर्मियों कि वो दोपहर - एक दिन वो आंटी अकेले घर में रो रही थी. बाल-मण्डली को मालूम हुवा – बात घरों तक पहुंची – आस-पड़ोस कि कई औरतें इकट्ठा हो गई – पूछा गया .. ......... तू क्यों रो रही है – जवाब सुन कर हंसी आ गई – वो बोली आज वो दोपहर को खाने पर नहीं आये ..... काफी देर हो गई. एक बंद भेजा गया - आध-पोन्न किलोमीटर दूर ............ तब वो श्रीमान आये ......... और अंटी को डांटा – क्यों रो रही थी ?

इतना प्यार था ........... तब उम्र छोटी थी – नए नए गाँव से आये थे ..... पर हम लोगों के लिए हास्य का विषय बन गया था ........ हमने नाम दिया लिवनी अंटी.

शायद १९९६-९८ कि बात है. अंकल कि मुर्त्यु हो गयी. कंधा देने वाला कोई नहीं था. मोहल्ले के लोगों ने मिल कर सरे कर्म किये. आंटी अकेली रह गई. ८० गज का मकान दिल्ली जैसे शहर के बीच में.

ये परिवार वैसे तो शुरू से ही कंजूस था – पर अंकल के जाने के बात तो हद हो गए............. आंटी जेब से एक पैसा ढीला नहीं करती. सब्जी के रेडी पर जा कर रेट पूंछ कर ही रह जाती – पर कुछ नहीं खरीदती. दूध एक ग्लास में ५० ग्राम लाती – और चाय बना कर पीती. हमें दुःख होता. पर क्या कर सकते थे. दिन में एक-टाइम का भोजन तो पड़ोस के गुरूद्वारे से लंगर खा कर गुज़ारा करती. लोग खूब समझते – इतनी जमीन है – इतनी पेंशन आती है – खर्च कर – कौन खायेगा तेरे बाद.. पर बात उसके पल्ले नहीं पड़ती. हम भी होली – दिवाली जाकर – आंटी को कुछ मिठाई इत्यादि देकर मिल आते – और अपनी जिम्मेवारी से मुक्ति पाते.

उन्होंने एक मुसलमान किरायेदार रखा. माता-पुत्र सा व्यवाहर हो गया दोनों में – और हम लोग भी खुश – चलो जो भी आंटी को एक मंजिल तो मिली. बिहार के किसी जिल्ले में उस बंदे का घर था – उसकी शादी पकी हो गई. आंटी उसके साथ बिहार चली गई – मोहल्ले में बिना बताये. १५-२० दिन बाद वो अपनी पत्नी को ले आया.

अब आंटी फिर अकेली........ यानि पुत्र का स्नेह जाने लगा.......... बात बदने लगी..... वो मुसलमान कहेता – कि ये मेरी निजी जिंदगी में दखल देती है. लोगों ने खूब समझाया – किरायेदार है - किराए तक सोचो – और कुछ मत सोचो ..... पर आंटी को कौन समझाए.

मुसलमान किरायेदार को बुलाया गया ........ भाई तू माकन खाली कर दे .........

सामने तो कुछ नहीं बोलता – पर बात खुले लगी – कि मकान तो उसने अपने नाम करवा लिया है – अब वो ही मालिक है – इस मकान का.

मोहल्ले ये बात आग कि तरह फ़ैल गई सभी प्रधान टाइप लोग पहुँच गए. उसको धमकाया गया. आंटी से पूछा वो बोली हाँ कचहरी ले गया था. उसने माफ़ी मांगी और कागज देने के लिए चार दिन का टाइम माँगा.

वो अपनी पत्नी को गांव छोड़ आया – और गायब हो गया. गाँव के जितने दादा किस्म के लोग थे उनको मिलता और कागज कि फोटोकापी दिखाता. मामला हाथ से निकल गया. मोहल्ले वाले देखते रह गए. दादा लोगों के आगे सभी बे-बस थे.

अंटी फिर अकेले रहेने लग गई. आदत वही. कंजूसी वही. क्या कहा जाये. खूब समझाया – मासी अपने पर खर्च कर ले – तेरे बाद कौन.

पर मैं परेशान रहने लगा – अगर भगवान न करे – अंटी को कुछ हो गया तो सेवा कौन करेगा? यक्ष प्रेषण था.

एक दिन समाचार आया कि गुरुद्वारे से आते समय – अंटी का एक्सीडेंट हो गया.

मैं स्तब्ध रह गया?

पर क्या किया जा सकता था..........................

जिस ओरत नै – एक एक पैसा इतनी कंजूसी से खर्च किया – उसका पैसा क्या काम आया.

आज उसका मकान वीरान पड़ा है – बिहारी मुसलमान गायब है. उस अंटी के दूर के समधी चक्कर कटते रहेते हैं. मकान बिक नहीं सकता............ क्या बताएं.

आज पता नहीं क्यों उस आंटी कि याद बार बार आ रही है ........... और ये सब

नहीं लिखना चाहिए था न ???????

पर बक बक है – न लिखते तो प्रेस मैं बैठ कर कई लोगों को सुनाते.

बहरहाल – जय राम जी की.

17 सित॰ 2010

पर दिल है कि मानता ही नहीं.

बहुत सोचा था – अब ब्लॉग पर कुछ नहीं लिखेंगे....... काम पर ध्यान देंगे......

पर दिल है कि मानता ही नहीं.


आज पता नहीं क्यों

चाहता हूँ - तुम्हे थोडा डिस्टर्ब करू.........

जज्बातों का पत्थर फैंक कर ..

तुम्हारे ह्रदय के दरवाजे पर knock करूं

कुछ ऐसा करूं कि

दिमाग की शांति

छुटी पर चली जाए.........

और दिमाग के सारे

बर्तन, कपडे तुम खुद धोवो

परेशान होते हुवे तुम्हे मैं

दूर उस शितिज से निहारूं ........

तुम्हारे माथे पर उभरी

पसीने की बूंदे जो ..........

कमल के फूल पर ओंस मानिंद

मोती सी चमकती हैं

ऐसे में मैं निहारूं, .......

जो मेरे नयनों को

सकूं दें सकें


डिजाईन बनाते-बनाते जब ह्रदय के तारों को किसी की याद छेड़ जाती है – तो कविता हो जाती है.

क्या आप भी यही मानते हैं ....

जय राम जी की



8 सित॰ 2010

मैं कहाँ पहुँच गया हूँ...

कुछ बेवकूफी भरे अजीब विचार किसी महान विचारक के मोहताज़ नहीं होते.... किसी को भी आ सकते हैं. बाबा को भी.

आज जब सुबह नींद से जागा तो पता नहीं उठते ही कुछ गर्व हुवा अपने घर पर. बहुत ही सुंदर लगने लगा ............. परन्तु उसी समय दिल में बाबा भी जाग उठे ........ धिक्कारने लगे...... कितने लोग आते हैं तुम्हे मिलने........ इस घर में कितने लोगों का स्वागत करते हो...... कितने चाय या खाने पर आते हैं........ शायद कोई नहीं.


पुराना घर पिताजी का था........ उसकी तुलना में तो शायद नगण्य. सुबह कुछ निक्कर-धारी आते थे... चाय के साथ साथ समाज पर चर्चा होती थी. दोपहर माता जी के साथ – आस पड़ोस कि महिलायें जुट जाती थी .... दोपहर बाद बहनों की सखियों से घर आ
बाद रहता था......... दिन भर में कभी – डाकिया ... कभी कोई संत, कोई भिखारी दरवाज़े कि घंटी बजाये रहता था. देर रात को वो पगला ... बिट्टू .... जो दिन भर बावरे कि तरह घूमता था ....... रात्रि में १०-११ के बीच कभी भी किवाड खट-खता देता था....... रोटी के लिए. .... कभी माता जी पुरे मातृत्व भाव से उसको खाना देती और कभी ....... मन को कोस कर ...... पर खाना वो जरूर खाने आता था....... और हाँ, जब कभी उसको दाल-सब्जी अच्छी नहीं लगती थी........ तो वहीँ गली में बिखेर कर चला जाता था...... और मैं हँसता था....... देखो तुम्हारी बनाई हुई दाल तो बिट्टू भी नहीं खाता.....

और इस फ्लैट के प्रथम तल पर कोई भूले से एड्रेस पूछने भी नहीं आता...........

बाबा वाकई सही लताड रहे है ..........

ये दुनियावी मन अपने रुतबे और कमाई पर कभी-कभी घमंड करने लगता है, आ ही जाता है.... पर फिर से दिल में बैठा ... बाबा धमकाने लगता है......... क्या मैं जितना कमाता हूँ – उतनी इमानदारी और निष्ठा से से अपने व्यवसाय में ध्यान देता हूँ?. क्या अपने क्लाइंटो की जरूरत और क्वालिटी जो उनका हक है – जिसके लिए मुझे पैसा देते हैं....... का ध्यान रखता हूँ? नहीं रखता.... अगर रखता होता तो प्रेस में बैठ कर ये चिट्ठे नहीं लिखता....... शायद मेरी योग्यता नहीं है – मैं अपनी कुर्सी और पद से पूरी निष्ठा और इमानदारी से वहन नहीं कर रहा हूँ. भारत के राज परिवार कि तरह मैं भी बिना योग्यता से इस प्रेस से चिपका हूँ....... और बैठ कर खा रहा हूँ......... पर दुनिया का दस्तूर समझ कर अनजान बन कर बैठे हैं ......... दिल में बैठे बाबा को क्या मालूम खामख्वाह बक-बक करता रहता हैं.

हर जगह – हर लोगों से मुझे शिकायत है......... क्यों ? क्या कभी अपने गिरबान में झाँक कर देखा हैं – क्यों शिकायत करते हैं – बाबा पूछता है – तुमने समाज को क्या दिया. कुछ भी तो नहीं ? फिर समाज से क्या शिकवा-क्या शिकायतें. उस दिन सामने ही रोड पर एक मोटर साइकल सवार कार कि टक्कर से गिर गया और मैं अपने दफ्तर कि खिडकी से देखता रहा ........ किंकर्तव्यविमूढ़ सा............ क्यों शरीर में हरकत नहीं हुई ...... अपनी जिम्मेवारी से बचता रहा ....... बाबा लताड रहे है. ....... शराब धीरे-धीरे खून को पानी बना देती है. जिस समाज कि तनिक भी चिंता नहीं – कोई मरे या जिए ......... तो उससे शिकायत क्या. तुम्हारे (दीपक) से अछे तो वो नौजवान है जो किसी कि चिंता नहीं करते – अपनी खुशियों में रहते है – समाज को कुछ नहीं देते पर समाज से कोई शिकवा-या शिकायत भी तो नहीं करते......

पिताजी से आगे निकलते निकलते – मैं कहाँ पहुँच गया हूँ....... खोज जारी है..........

इत्ता ही.

जय राम जी की.

5 सित॰ 2010

ब्रहमांड कि उत्पति - आप कौन से सूत्र को मानते हो विश्वास या भौतिक


दोस्तों, स्टीफन साहिब पर पंचम दा ने तो लिख दिया – अपने तरीके से. पर कुछ न कुछ बक बक भी होनी चाहिए.........

भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग साहेब का कहना है ईश्वर ने इस ब्रह्मांड की रचना नहीं की है, बल्कि वास्तव में यह भौतिक विज्ञान के अपरिहार्य नियमों का नतीजा है। विश्व के अग्रणी भौतिक विज्ञानी ने १९६८ कि अपनी किताब के बाद यह निष्कर्ष निकाला है। हॉकिंग ने अपनी नवीनतम किताब द ग्रैंड डिजाइन में कहा, चूंकि धरती पर गुरुत्वाकर्षण जैसे कानून मौजूद हैं, ब्रह्मांड कुछ नहीं से खुद को सृजित कर सकता है और करेगा।

भाई स्टीफन साहिब कह सकते हैं.... पर हम नहीं. क्योंकि वो विज्ञान जानते हैं और हम भगवान जानते हैं. पूरी जिंदगी भौतिक विज्ञान के सूत्र पढ़ते–पढ़ते इत्ता समझ आ गया....... पर हम तो भौतिक विज्ञान पढ़ नहीं पाए..

अब अगर ब्रह्मांड कि उत्त्पति को जानने का कीड़ा अगर हो तो पहले भौतिक विज्ञान में कम से कम ३०-४० साल खपाओ. या फिर सीधा-साधा – विश्वास है ये ब्रह्माण्ड भगवान ने बनाया है...... सब उपर वाले के हाथ का खेल है.

विष्णु कि माया है – कहीं धुप कही छाया ........... ३-४ महीने का अबोध बच्चा जब अपने आप हँसने लग जाता है – तो हमारी अम्मा कहती है – पूर्व जन्म कि खुशियाँ याद आ रही है – तभी खुश हो रहा है. और जब वो अपने आप रोने लग जाता तो कहते हैं पूर्व जन्म के दुखो को याद कर रहा है.

गाँव में जब सांप निकल आता था – अम्मा जी दूर से नतमस्तक हो कर कहती थी असा तेकू कुज नाय आधे – तू वी कुज ना आख ......... आप्डी दुनिया विच लगा वंझ यानी हम तेरे को मार पीट नहीं रहे – तू भी हमे नुक्सान न पहुंचा......... अपनी दुनिया में चला जा. और फिर पंडित जी के पास जाकर पुछा जाता था .... कौन से पूर्वज नाराज़ है – और उपाय किये जाते थे............. आँगन पक्का नहीं करवाते थे......... उपाय का मलतब पंडित जी को कई वस्तुयों का दान होता था.

आज भी मेरे बच्चों के मुँह पर दाने निकल आते है तो – वहाँ दवाई बंद हो जाती है – माता का प्रकोप होता है ८-१० दिन तक घर में प्याज लहसुन बंद और पूजा पाठ रहता है. यानी विज्ञान तो प्रोपर फ़ैल. और ताज्जुब होता है ८-१० दिन बाद बच्चा ठीक हो जाता है – बिना दवाई के.

अम्मा नें विज्ञान नहीं पढ़ा अत: विश्वास कि बुनियाद पर ये बात करती थी.

अपन के मंगल शनि और वीरवार को शेव बनवाने में पता नहीं अम्मा क्यों मना करती थी. विश्वास का कौन सा सूत्र है जो भौतिक के सूत्र पर भारी था – पता नहीं.

ये दीन दुनिया कैसे चल रही है.......... स्टीफन साहिब नें ब्रहमांड कि उत्त्पति के सूत्र तो बता दिया ........ हिन्दुस्तान में होते तो शनि महाराज के भी बताने पड़ते..........

शनि कि उत्त्पति, गुण दोष, क्यों परेशान करता है – क्यों ७.५ साल तक पीछा नहीं छोड़ता .......... ये भी बता देते तो अच्छा रहता...........

किसी भी कार्य कि सफलता-असफलता............. अंगूठी के नग पर निर्भर है. ओकात के हिसाब से हर व्यापारी, हर नौकरशाह (यहाँ तक वैज्ञानिक भी) के अपने अपने पंडित और धर्मगुरु है. जिनके हिसाब से लोग सलाह लेकर किसी नए काम कि शुरुवात करते हैं.

इत्ता ही, भविष्य में अपने जीवन को दिशा देने के लिए आपकी राय जानना चाहेंगे. अत: राय जरूर भेजे

जय राम जी कि..........


3 सित॰ 2010

फिल्म - छोटी सी बात

कल टी वी पर अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा कि फिल्म छोटी सी बात देखि .......... वैसे तो ये फिल्म पहले कई मर्तबा देख बैठे हैं......... पर कल पता नहीं एक ब्लोगर के मूड से देखी होगी....... पता नहीं.

फिल्म का ऊ हिस्सा बढिया लगा जब तक प्रभा (माला सिन्हा) को अरुण (अमोल पालेकर) नहीं पटा पा रहे था . .......... कैसे दब्बू सा बन्दा .......... पता नहीं क्या क्या सोचता है ...... पर जब प्रभा सामने आती है तो सांप सूंघ जाता है.......... शायद १९७० के ज़माने में ऐसा ही होता होगा ये तो हमें ६०-६५ साल के ब्लॉगर भाई बतायेंगे....... अगर कोई है तो .......

बेवकूफी वाला जमाना.......... दब कर रहना........ हालांकि ये बॉम्बे कि स्टोरी है.............. जहाँ कि सामाजिक परिवेश दिल्ली जैसे शहर से १० एक साल आगे चलता है. जिस परिवेश में हम लोगों का जन्म हुवा है या जहां हम बड़े हुवे है वहाँ तो कसम से १९९० तक यही दब्बूपण वाला जमाना था....... ये भगवान भला करे नरसिम्हा राव का जिसने मनमोहन सिंह को घर की खिडकी दरवाज़े खोलने के लिया कहा और खिडकी दरवाज़े खुलने कि देर थी कि शाहरुख खान जैसे लौंडे दीपा साही जैसी माया मेमसाब से सरे आम इश्क लड़ाने लग गए थे........ मैं मानता हूँ कि इससे पहले और भी फिल्मे आयी होंगी – इसी टोपिक पर – पर अपन ने जो देखी उसकी बात कर रहे हैं.

आप कह रहे होंगे कि बात तो प्रभा और अरुण से चालू हुई थी...... पता नहीं बाबा कहाँ रुख करते हैं........ कहीं नहीं........

खुद अपनी याद आ गई..................

ये बात सत्य कि छोटी सी प्रेम-कहानी में अपन घोषित कर चुके हैं कि इश्क-और प्यार वाली गली से बाई-पास हो कर निकल गए .......... अपन का ऐसा-वैसा कोई चक्कर नहीं था..........

पर ये भी सत्य है कि कहीं न कहीं अपन के हृदय के तार स्पंदित होते थे. और अरुण कि तरह सोच कर सोच रह जाते थे......... दोस्तों के साथ हंसी मजाक में तो खूब तीर छोड़े जाते पर ........... जंग-ए-मैदान में सब बेकार हो जाते थे. दिल कि बात सिर्फ दिल में ही रह पाती थी. .........


इस चालबाज़ दुनिया में अरुण को तो कर्नल जुलिअस नागेन्द्रनाथ सिंह जैसा उस्ताद कहैं या फिर गुरु मिल जाता है जिससे न केवल उसे अपना प्यार प्रभा मिल जाता है अपितु भावी जीवन में इज्ज़त और दबंगपन से जीने के गुर भी सीख जाता है.


पर अपन को आज तक ऐसा गुरु नहीं मिला.


इस फिल्म ने असरानी ने जो नागेश कि भूमिका निभाई है........ उस प्रकार के व्यक्तित्व से मैं आज भी त्रस्त हूँ.............. अरे-अरे --------------- वो प्यार के मामले मैं नहीं ....... दीन दुनिया के मामले में. ..... जहाँ जाते हैं – लुट कर आ जाते हैं. चाहे ... फल-सब्जी वाला हो, किरयाने वाला या फिर कपडे वाले का शो रूम हो...... दिल्ली शहर में इत्ते बड़े-बड़े माल बन गए है......... पर यकीन मानिए मैं आजतक इन माल में नहीं गया ................ मात्र इसलिए .......... कि कहीं मुझे लपेटा न जाए ....


1 सित॰ 2010

इक छोटी सी प्रेम-कहानी....

पेड़ों और झाडियों के झुरमुट में बेंच के उपर वो बैठा था.......... क्या नाम दूं उस आशिक को......... चलो देवदास............... और जाहिर है जो साथ थी...... वो पारो ही होगी.....

पारो देवदास कि टांगो के ठीक बीच खड़ी अपने हाथों से उसके बालों से खेल रही थी.......... मैंने पटरी पर चलते हुवे दूर से दोनों को देखा ....... पारो से मेरी नज़र मिली ......... पर उसने मुझे इग्नोर सा कर दिया........... थोड़ी नज़दीक आने पर देवदास कि नज़र मुझ पर पड़ी ........ शरमा कर उसने पारो का हाथ छुडा कर एक किनारे उसे उसी बेंच पर बिठा दिया और उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी........... पता नहीं मैं भी मुस्कुरा दिया..................

पर थोडा आगे चल कर मुझे खीज होने लगी.... गुस्सा आने लगा .......... इस लैला मजनू कि जोड़ी पर ....... कारन .... पारो ... ... पारो ने स्कूल कि युनिफोर्म पहन रखी थी..... यानि स्कूल से भाग कर देवदास को मिलने आयी है......... मन ही मन मैं पता नहीं क्या क्या सोचता रहा ......... जाने किस घर कि होगी....... क्या सोच कर घर वाले पड़ने भेजते होंगे...... इत्यादि ...

बाबा कि जवानी तो निरर्थक निकली है ........ यानि प्यार और इश्क वाली गली से तो बाई-पास होगये. अत जब किसी को प्रेम-लीला में लीन देखता हूँ ..... तो ह्रदय कि कोई तार बाबा ke भी झनझना जाती है...... पर यहाँ मामला अलग था....... पारो स्कूल युनिफोर्म में थी.........

जो भी हो...... मैंने अपनी सैर जारी रखी....................

वापसी आते आते ..... फिर वो प्रेमी युगल सामने से अठखेलियां करते सामने से दिखे......... एक जगह ही थी जहाँ मुझे उनको क्रोस करना था........... उस जगह फिर देवदास मुझे देख कर मुस्कुरा उठा........... क्लास खत्म हो गई मैंने पुछा........ हाँ भैया देवदास का जवाब था......

अगले दिन ............ फिर प्रेमी युगल से वहीँ पर मुलाकात हुई.......... आज पता नहीं क्यों पारो कुछ सहमी सी नज़र आयी............ देवदास फिर मुस्कुराया........ मैंने अपनी सैर जारी रखी....... पर वापसी में निश्चित जगह मिलने पर दोनों ठिठक गए.............

भाई कौन सी क्लास में पढ़ते हो मैंने देवदास से पुछा..........

भैया ........ सेकंड इयर

और ये .

ट्वेल्थ ..........

आजकल स्कूल से बंक चल रहा है..

बस भैया ऐसे ही..............

पारो शर्माती रही ........ और देवदास के पीछे छिपती रही..........

उसके १ महीने तक दोनों का अता-पता नहीं चला...... पता नहीं क्यों मन उनसे मिलने के लिए कुछ बेचैन सा रहा......... एक खामख्वाह कि व्याकुलता दिल में घर कर रही थी.मैं मानता हूँ कि सामाजिक दृष्टी से ये मेरी चुतियापंती ही कही जायेगी........ क्यों देखना चाहते हो भाई...........

पर पता नहीं .......... ??

मैं भूल गया....................

रह रह कर एक कविता कई बार जेहन में आती है ............


समुन्दर पूछता है अब वो दोनों क्यां नहीं आते

जो आते थे – तो अपने साथ कितने ख्वाब लाते थे...

कभी साहिल से ढेरों सीपियाँ चुनते थे.

नंगे पाँव पानी में चले आते थे.

भीगी रेत से नन्हे नन्हे घरोंदे बनाते थे.

और, उनमे सीपियाँ, रंगीन से कुछ संग्रीज़ यू सजाते थे

के जैसे अज के जुग्नुसय लम्हे

आने वाले कल कि मुट्ठी में छुपाते थे.

समुन्दर पूछता है अब वो दोनों क्यां नहीं आते

समंदर ने खिंजा कि सिसकियाँ लेती हुवे

एक शाम उन नौजवानों को नहीं देखा

जो देर तक तनहा सारे साहिल रह बैठा ...

फिर उसने ढेर सारे खत

बहुत से फूल सूखे और तस्वीरें

और अपने आंसू

समुन्द्र के हवाले कर दिए..

देखो बाबा का सरल कवि ह्रदय ......... कैसे भावपूर्ण कविता में गोते लगता रहा............

कुछ दिन में भूल गया ....... पर आज फिर पार्क के एक कौने से मुझे वही अठखेलियाँ करते आते हुवे दिखने लगे.... पता नहीं आज मुझे देख कर पारो छुपने का उपकर्म करने लगी. समझ नहीं आया .... कि ऐसा क्या रिश्ता जुड गया.. बहिन-बेटी-भतीजी फिर भांजी... जिससे उसको शर्म आने लगी. ......... फिर उसी नियत जगह ..... जहाँ मिलना था.......... ठीक उसी जगह ..... पारो देवदास के पीछे छिप सी गयी और शर्म सी करती हुई आँखे मिलाने से बचती है.......

देवदास मुस्कुराते हुवे – और भैया...........

कहाँ थे भाई इत्ते दिन........

बस यू ही भैया.........

आज लफंगे परिंदे देखने जाना है - वो हँसता है.......

...... पारो शरमाती है..................



पारो - देवदास पुराण पर आज इत्ता ही.....

जय राम जी की