20 अग॰ 2010

बाबू साहिब – अब तो नहीं लूटोगे (पगार बढ़ गई है)

“छट्ठे वेतन आयोग के बाद तो तनख्वाह बढ़ गई है साहिब – अब हम गरीब आदमियो से थोड़ी दया दिखाया कीजिये” एक ट्रक का कुलिनेर चुंगी पर पर बैठे बाबु से बोला. जाहिर सी बात बाबु का जवाब गलियों से आया होगा।

आज जब हमारे सांसदों का वेतन बड़ा है तो उपरोक्त टिपण्णी याद आ गयी. आज जनता सवाल भी कर रही है “बाबू साहिब – अब तो नहीं लूटोगे।”

“साहेब जितना पैसा मिलता है – उतना काम तो करोगे?” हल्ला गुल्ला कर के संसद थप तो नहीं करोगे।

“पहेले पूरी नहीं पड़ती थी ... महीने के आखिर में पैसा खत्म हो जाता था. आप घूस खा कर सवाल पूछते थे, बाबू साहिब हम भी आप की मजबूरी समझते थे. – बाबू साहिब, अब तो घूस नहीं खावोगे।”

“साहिब हमे तो मीट-चिकन खाए हुवे मुद्दत हो जाती है. आप को तो संसद में १०-१५ रुपे में चिकन मिल जाता है” क्या अब उस गरीब कैंटीन वाले के भी रेट बारहवा दोगे?”


साहिब २ दिन पहले फैक्ट्री में नाईट शिफ्ट में नींद आ गयी थी – मालिक ने पगार में दिहाड़ी काट ली – बोला साला फैक्ट्री को संसद समझ कर सो गया था.” सरकार आप की पगार बढ़ गई है – तो संसद में सोया तो नहीं करोगे। '


बाबू साहिब बताइए...

हमारे हमारे भी सवाल है – जवाब दीजिए ..... (कम पगार होते हुवे भी हम बिना घुस खाए सवाल पूछ रहे है.) आप की शक्ल डेड साल पहले देखि थी. अभी तो सादे तील साल रहते है... फिर आप हमारे पास आयेंगे. तब तक तो महंगाई डयान और बड़ी हो जायेगी और पगार फिर कम लगने लगेगी. साहिब इस डयान को मरवा क्यों नहीं देते.

जैसे की जो काम आप कानूनी रूप से नहीं करवा पाते – उसके लिए किसी गुंडे को सुपारी दे देते हो।
माए बाप इस महंगाई डयान को मरवाने की सुपारी कब देंगे।

आपसे ये नाचीज़ सवाल पूछ बैठा – गुस्ताखी करने की माफ़ी चाहता है.

19 अग॰ 2010

राष्ट्रमंडल खेल - चोर उचक्के चोधरी ते लुच्ची रन प्रधान

पंजाबी में एक कहावत है "चोर उचक्के चोधरी ते लुच्ची रन प्रधान" . पता नहीं पूर्व में कहावतों का विस्तार या फिर कहें निर्माण कैसे हुवा होगा. कुछ भी नहीं कहा जा सकता. समाज के हालात देख कर कुछ समझदार लोगों नें कुछ वाक्य कहें होगे – जो प्रचलित हो गए इत्यादी. पर आज में इस कहावत की बात इस लिए कर रहा हूँ – की आज की राजनितिक परिपेक्ष में ये कहावत बिलकुल सटीक बैठेती है.
पहले बात उतरप्रदेश की मुख्यमंत्री बहिन मायावती की. इनके २००७ में विजयी पर मुझे बहुत प्रसंता मिला थी. ये नहीं की में बी एस पी कर कार्यकर्ता हूँ – बल्कि इसलिए की देखो दलित पिछड़े वर्ग की एक महिला अपने दम ख़म पर इतने बड़े राज्य की मुख्यमंत्री बन्ने जा रही है. फक्र हुवा अपने देश और अपनी संस्कृति पर. पर आज जब नेता लोग आजादी की पूर्व संध्या पर सन्देश दे रहे थे – बहिनजी नें किसानों पर गोलियाँ बरसा कर जलियांवाला बाग की याद दिला दी. गेटर नोएडा से आगरा के बीच बन रहे यमुना एक्सप्रेस-वे के लिए जमीन के अधिग्रहण को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा. किसानो को एक्सप्रेस-वे से कोई परेशानी नहीं है, परन्तु एक्सप्रेस-वे के नाम पर जो उपजाओ भूमि जे पी ग्रुप को दी जा रही है वहाँ एक बिल्डर से क्या अपक्षा की जा सकता है – प्लाट कटेंगे – माल बनेगे – महंगी कालोनियां बनेगी. और येही धरती पुत्र इनको दूर से निहारेंगे. हो सकता है यहाँ की महिलाएं इन कालोनी में बाई का काम करें- यहाँ के पुत्र कल इन कालोनी में सब्जी बेचें. हाँ, यहाँ कोई उद्योगिक क्षेत्र विकसित किया जाता – जहाँ नौजवानों को रोजगार की उम्मीद होती तो बात अलग थी. इन ग्रामीणों के लिए कोई रोज़गार के अवसर पैदा किया जाता तो इनता कलेश नहीं था. किसानो से जमीन ले ली गई तो क्या करेंगे. न तो अब तक सरकार नें इनके हाथ में कोई तकनिकी हुनर दिया है – न ही ज्यादा पड़े लिखे हैं की कहीं ढंग की नौकरी कर लें.
बात इतनी है की जे पी ग्रुप और मायावती सीधे सीधे उपजाऊ भूमि बेच कर भागीदारी से पैसा बना रहे है. किसानो और मजदूरों की किसको चिंता है. कल ये लोग हतियार उठा लेंगे तो – माओवादी कहेलायेंगे.

दूसरी हमारी मनानाया सोनिया गाँधी जी हैं.
राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर चल रहे भ्रष्टाचार आरोप के मामलों सोनिया गांधी ने कहा कि राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े कार्यों में यदि कोई भ्रष्टाचार का दोषी पाया जाएगा, तो उसे खेलों के आयोजन के बाद सजा दी जाएगी. पहले क्यों नहीं. समझ नहीं आता की हमारे देश में सांप के निकल जाने के बाद ही क्यों लकीर पीती जाती है. सोनिया गांधी ने यह भी कहा कि राष्ट्रमंडल खेलों का संबंध किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति से नहीं है. यह एक राष्ट्रीय गौरव है और इन्हें सफ़ल बनाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए. मैडम आपको क्या पता राष्टीय गौरव किस चिड़िया का नाम है. अगर इतनी ही चिंता इस गौरव की होती तो आज अफजल गुरु फंसी पर लटक चूका होता. और आपके संत्री मंत्री किसी चिता हैं इस शब्द की.
कलमाडी साहिब छाती ठोक कर कह रहे हैं : उनकी नेता सोनिया गाँधी व मनमोहन सिंह कहेंगे तो वो इस्तीफा दे देंगे. अपना ज़मीर तो खत्म हो चूका है या कह लें की मर चूका है. अब नेता कहेंगे तो. नेता को क्या जरूरत है – तुम्हारे से इस्तीफा मांगने की.
उधर, राज्यसभा सदस्य अय्यर ने कहा, "अगर राष्ट्रमंडल खेल सफल हुए तो निजी तौर पर मुझे इसकी कोई खुशी नहीं होगी।" उन्होंने कहा, "मैं इन दिनों हो रही बारिश से बहुत खुश हूं। इसकी पहली वजह यह है कि बारिश खेती के लिए अच्छी है। दूसरी बात यह कि इससे राष्ट्रमंडल खेलों का विफल होना भी सुनिश्चित हो जाएगा।" ये विचार विपक्षी नेता के नहीं है – ये राज्यसभा में सारकार के नुमाइंदे हैं.
कितने उच्च विचार है. धन्यवाद अय्यर साहिब.
तस्वीर का एक अन्य पहलू हैं : हमारी दिल्ली की मुख्यमंत्री श्री मति शीला दीक्षित जी, नजाकत और नफासत की मिसाल. जिन्होंने दिल्ली में खेलों के लिए दिल्ली के विकास की परियोजनाओं के लिए पहले ही १६ हजार करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है। शीला ने सभी परियोजनाओं के पूरा होने की पिछले महीने की समयसीमा ३१ अगस्त बताई थी। देख लेंगे ३१ अगस्त को भी. करोडो अरबो रुपे खर्च हो चुके हैं पर अभी तक कोई भी नेता छाती ठोक का ये नहीं कह सकता की इन खेलों से हमारा “राष्ट्रीय गौरव” सही सलामत रह जायेगा.
खुदा खैर करे. हमारा क्या है ... खामखाह गरियाते रहते है।

इक़बाल की इन चंद पंक्तियों के साथ विराम
वतन की फ़िक्र कर नादां ! मुसीबत आने वाली है
तेरी बर्बादियों के मश्वरे हैं आसमानों में
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तां वालों
तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में

जय राम जी की

7 अग॰ 2010

कविता नहीं भी लिखनी आती - तो भी लिखो



















आओ तनहाई में मिले
फिर हम दोनों

मौन होकर
जहाँ चाँदनी भी न पहुंचे..
चाँद को भी चुगली की आदत है
फिर मिलें हम दोनों
तुम जज़्बात के उजाले को
अपने घर रख के आना
ज़माने की रावयेतें
जो एक अरसे से मेरे जिस्म पर चस्पा है

कहीं पढ न लो तुम, फिर
अँधेरे में ही आना....
आना अपरिचित बन
कुछ अपनत्व महसूस करेंगे

मैं ये और तुम ये
यहीं से शुरुवात हुई थी
हमारे अलगाव की
अपने अपने ख्याल की
और उस पुरे चाँद की रात में
तुम्हीं नें फाड़ दिए थे सारे पत्र
........
और उस रोज़,

दूर किसी ने कहा ,
और कईयों ने सुना.........
ज़माने पर एतबार करना

क्यों भाई, कितना सकूं मिलता है खामखा की कविता लिख कर भी. कश्मीर जल रहा, लेह बह गया है, बिहार बाद की चपेट में है. झारखण्ड में अलग खेल चल रहा है, २४ कांवरिये - भोले बाबा को प्यारे हो गए, शरद पवार से सबका ध्यान हट गया है, कलमाड़ी सोनिया गाँधी की तरफ देख रहा है - आप बोले तो इस्तीफा दूं, नहीं तो में यूँ ही माल बनाता रहूँगा - मिडिया चिल्लाये तो चिल्लाये.................. सब कुछ हो रहा है. गिल साहिब ने एक उद्घाटन में ही कह दिया, इन स्टेडियम (छत चूते हुवे) को देखने को ही तरस गया था, पर शीला मैया के चहरे पर परेशानिया नज़र आने लग गई है। खिलाड़ी उदास है..........
पर बाबा तुम परेशान मत हो.........
कविता नहीं भी लिखनी आती - तो भी लिखो
पर इन सब पर मत लिखो.....

5 अग॰ 2010

दिल की खिड़की को बंद रख दीपक,


कहते हैं मन बहुत ही आवारा किस्म का होता है - अभी तक विज्ञान की कोई मशीन मानव मन को समझ नहीं पाई है - इन कोमन घोटालो खबर के बावजूद भी ये कामन मन शाएरी करने बैठ गया। क्या बातें . अगर लिख ही दी है तो छाप देतें है - आपकी काम्मेंट्स - उत्साहित करेंगी.






बेतरतीब कागजों को सवारने का हुनर तो है दीपक
ये उलझी हुई ज़िन्दगी संवारूं तो चैन आये.

तेरी मासूमीअत - तेरा चेहरा बयाँ करता है -
जमाने के लोग कहेते हैं- आशिक बरबाद लगता है

दाग जो चेहरे पर हैं हट जायेंगे दीपक
उन जख्मों का क्या जो इस दिल ने खाएं है

तेरे साथ दो चार कदम क्या चला दीपक
जुल्फों को छूकर आई तल्ख़ हवा से दिल भर आया

दिल की खिड़की को बंद रख दीपक,
ये आवारा कागज़ के टुकड़े दिल का चैन लूट लेंगे

घर से न निकल इन बहारों में दीपक
बर्बाद आशिकों को ये फिजा नहीं सुहाती

27 जुल॰ 2010

भोलों की भीड़ में प्रदीप ने सिखाया जीने का जज्बा

२४ जुलाई की शाम मेरे लिए बेचैन करने वाली थी. कुछ भी समझ में नहीं आ रहा तो - मन हुवा चलो चले हैं - हरिद्वार - भोलों से मुलाकात करेंगे. भोले यानी शिवभक्त, अधिकतर दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान जैसे राज्यों से होते हैं, - जो की हर की पोड़ी से जल भरकर पैदल चलकर, अपने अपने गाँव के शिवालय पर जल चडाते हैं.
मैं जैसे तैसे शनिवार की रात को घर से छुटकारा पा कर दिल्ली के कश्मीरी गेट बस अड्डे पहुंचा. भाई, बसों में सीट की तो खैर सलाह, छत पर बैठने की जगह भी नहीं थी. जहाँ देखो वहीँ बम बम. कुछ भी समझ नहीं आ रहा था. एक बस आई उप्र परिवहन निगम की जो देहरादून की गंतव्य की थी, रूडकी के नाम पर बस में बठने को जगह मिली और जैसे तैसे हम हरिद्वार पहुंचे. सब से पहेले, होटल में कमरा पाने की जदोजहद पूरी की. फिर चले माँ गंगा की गोद में, भोलों के साथ ही स्नान संपन हुवा. समय बहुत था, काम कम. .. अत चल पड़ा गंगा तट पर तहेलते हुवे और हर की पोड़ी से २-३ किलोमीटर दूर गंगा तट पर प्रदीप से भेट हो गई. प्रदीप - समस्तीपुर बिहार निवासी - जात और पेशे से नाई . खाली बेठे बेठे मैंने उससे शेव करवाई और टाइम काटने के लिया उससे बात करने लगा। उसकी बातों ने झंझ्कोर दिया. बिलकुल फ़िल्मी हीरो की तरह.
प्रदीप ७ दिल पहले खाली हाथ घर से हरिद्वार आया. उसके शब्दों में खाली हाथ यानि की पैसे नहीं थे... बाकि उस्तरा, ब्रुश, कंघी इत्यादी साथ ही हमेश झोले में रहेते हैं. पर बिना कुर्सी और शीशे (आईने) के ये सब भी बेकार. कुछ दिन तो लंगर खा कर गुज़ारा किया. फिर एक नाइ की दूकान पर जाकर अपनी मजबूरी बताई तो उसने एक टूटी कुर्सी और आइय्ना किराए पर दे दिया. परदीप गंगा किनारे दूकान खोल कर बैठ गए. और कमाई का सिलसिला शुरू. हालाँकि "भोले" कम पैसे देते है, पर कई यात्री ज्यादा यानी १० रुपे भी देते हैं. भैया जब तक सावन का मेला है तो ठीक है, उसके बाद जो पैसे कमाएंगे, उससे दांत मंजन का बिज़नस शुरू करेंगे. यानि की, यानी की, मैं दन्त मंजन बनाना जानता हूँ, पारिया, दांतों का पीलापन, दांतों में कीड़ा लगाना जैसे रोग मेरे दंतमंजन से दूर हो जाते हैं. और वो मंजन बेचूंगा. यानी बिना पैसा लगाये एक शत्प्रिशत बिज़नस चालू करना. मैं हैरान रह गया. एक पिछड़े शेत्र का बन्दा, कम पैसों या बिना पैसों के भी बिज़नस चालू कर सकता है. लानत भेजता हूँ अपने शिक्षा पद्धति को, जहाँ १२-१५ साल पढने के बाद भी इतना ज़ज्बा नहीं होता की परिवार पाल लें. या कुछ कर गुज़र लें
mba करने के बाद भी लोग नौकरियों के लिए धक्के खाते हैं, पर प्रदीप जैसे लोग एक उद्धरण प्रस्तुत करते हैं और हम जैसे लोगों को जीने की कला सिखाते हैं - हिम्मत न हारना.
अगली पोस्ट में चाय वाले, राहुल की बात करूंगा.
हाँ, बाबा अपनी फक्कड़पण के चक्कर में कैमरा नहीं खरीद सका, (पैसे की कमी नहीं , पर फक्कड़ता कुछ भी गैर जरूरी खरीदने की इज़ाज़त नहीं देती), नहीं तो प्रदीप की फोटो भी चस्पा दी जाती.
बहरहाल जय राम जी की
अरे, माफ़ करना जय भोले की.

14 जुल॰ 2010

मीडिया : ध्यान से ये चित्र देखिये ............

ये हैं कृषि मंत्री शरद पवार ..........
जो महगाई नुमा द्रकुला के ग्रस्त हो चुके हैं अत: गरीबो का खून चूस रहे हैं।
क्या मीडिया के लोग सोए हैं? क्या मीडिया के लोग शरद पवार से डरते हैं? अगर जगे होते और न डर रहे होते तो शरद पवार को रात में न तो शांति से नींद आती और न खुद को ताकतवर समझ रहे होते। महंगाई का खलनायक अगर कोई इस देश में है तो वे हैं शरद पवार. इनके बयान, हावभाव, चालढाल, कामकाज से जगजाहिर हो रहा है कि महंगाई यूं ही नहीं बढ़ रही. इसे इन मंत्री जी और इनके अफसरों का प्रश्रय मिला हुआ है. जमाखोर, नेता, अफसर... सब मिले हुए लग रहे हैं. एक बयान आता है और जमाखोरी शुरू हो जाती है. दाम बढ़ने लगता है. आखिर कब तक मीडिया शरद पवार से डरता रहेगा? कब तक मीडिया वाले शरद पवार के आगे झुके रहेंगे??

मैं और मेरे पिताजी

  • जब मैं 5 साल का था, इससे पहले की बाते मुझ याद नहीं, तब सोचता था की मेरे पिताजी दुनिया से सबसे ताकतवर इंसान हैं।
  • 10 साल की उम्र में मैंने महसूस किया की मेरे पिताजी हर चीज का ज्ञान रखने वाले और बेहद समझदार भी हैं।
  • जब मैं 15 साल का हुआ तो महसूस करने लगा की मेरे दोस्तों के पापा तो मेरे पिताजी से भी ज्यादा समझदार हैं।
  • 20 साल की उम्र में मेरी यह सोच बनी की मेरे पिताजी किसी और दुनिया के हैं और ने ज़माने के साथ नहीं चल सकते।
  • 25 साल की उम्र में मैंने महसूस किया की अब पिताजी से काम के बारे में सलाह नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि उन्हें हर काम में नुक्स निकालने की आदत सी पड़ गई है।
  • 30 साल की उम्र में मैंने महसूस किया की अब पिताजी को मेरे तरीके से चलने की समझ आ गयी है, इसलिए छोटी-छोटी बातों पर उनसे सलाह ली जा सकती है।
  • जब मैं 35 साल का हुआ तो महसूस क्या की जरूरी मामलों में पिताजी की सलाह लेना बहुत जरूरी है।
  • ४५ साल की उम्र में मुझे लगा की पिताजी की सलाह के बिना कुछ भी नहीं करना चाहिए और १५ साल की उम्र के बाद की मेरी सभी धारणाएं गलत थी।
  • अब तक मेरे बच्चे बड़े हो चुके हैं। परन्तु अफ़सोस, इससे पहले की मैं अपने इस फैसले पर अमल का पता, मेरे पिताजी इस संसार को अलविदा कह गए और मैं उनकी हर सलाह व् तजुर्बे से वंचित रह गया.
बेटा समझता है, बाप बनने के बाद !
बेटी समझती है - माँ बनने के बाद !
बहु समझती है - सास बनने के बाद !

पहले ज़माने में ऐसा नहीं था, हमारे परिवार बहुत बड़े होते थे ... दादा, चाचा, ताऊ, बुआ, चाची, अम्मा- और बच्चे को बचपन में संस्कार मिल जाते थे - मेरे पिताजी दादा से कैसे व्यवहार करते है - माँ अम्मा से और बुआ - माँ से कैसे व्यवहार करती हैं। कहीं बाहर जाकर सिखने की जरूरत नहीं पड़ती थी. बेटा बाप की जी जान से सेवा करता था - क्यों, क्योंकि उसका बेटा भी बड़ा हो रहा है ताकि वो भी बुदापे में मेरी सेवा करे।

आज परिवार टूटे हैं - रिश्ते तार तार हो चुके है. ऐसे में इंसान स्वयं से ही सीख रहा है और ठोकर लगने पर ही संभालता है।

: बाबा :

13 जुल॰ 2010

आवश्यकता है : हेल्परों की

पिछले दो वर्षों से दिल्ली के ओद्योगिक क्षेत्रो में, लगभग हर फैक्ट्री के गेट पर टंगा एक बोर्ड आजकल चर्चा का विषय है। बोर्ड इस प्रकार है: "आवश्यकता है : हेल्परों की" . हेल्परों की कमी से समस्त कुशलवर्ग के साथ मालिक वर्ग भी परेशान है. फेक्टरी के अंदर जो कार्य हेल्पर करते थे वो सिर्फ हेल्पर ही कर सकते हैं, यानि की "जा बेटा चाय ले आ", "जा मशीन पर कपडा मार दे" "ये सामान मशीन से हटा कर सामने लगा दे" "ये पुर्जा फला दुकान से ले आ" - यानी की ये सभी कम रुके तो नहीं पर मुख्या कार्य में बाधा जरूर बन रहे हैं - यानि प्रोडक्शन में कमी. दूसरा भविष्य में येही हेल्पर उसी फैक्ट्री में कुशल कारीगर के रूप में योगदान देते हैं और फिर उस्तादों की श्रेणी में आ जाते हैं.
(पोस्ट को मात्र सुंदर बनाने के लिए इस फोटो का इस्तेमाल किया है.)

इसके लिए जिम्मेवार कारन मुख्यत: जो मुझे समझ आते हैं: दिल्ली की महंगाई, अन्य प्रान्तों में रोजगार के बड़ते अवसर, लड़कों का टेक्निकल कार्यों से रुझान हटना, कुछ भी सीखने की इच्छाशक्ति का ख़त्म होना और बिना कुछ सीखे सब कुछ पा लेने की चाहत। दिल्ली में आज कम से कम ६०००-७००० रुपये कमाने वाला व्यक्ति भी गुजरा नहीं कर पा रहा। ये हेल्पर वर्ग जिसे हम गरिया कर "बिहारी" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुवे हीन नज़र से देखते हैं - ये पूरी उद्योगिक इकार का मूल अंग होते hain. २५०० तनख्वाह ओवर टाइम मिला कर ४५०० या ५००० तक पहुँच जाती थी. जिसमे से ये लोग ४-५ के ग्रुप में कमरा शेयर करते थे १५०० मासिक भाड़े पर - पर व्यक्ति ५००-६०० रूपये पड़ते थे. खाना सस्ता था. दोपर हर क्षेत्र में ठेले पर १०-१२ रुपे का हो जाता था. और न न करते हुवे भी घर हर माह २००० रुपये के करीब भेज देते थे. पर आज ये सब नहीं हो पा रहा.

दूसरा मुख्या कारन: बिहार, उतराखंड में बढता उद्योगिक रकबा। नितीश के राज में प्रदेश के उद्योगपति मुखर हुए हैं और नयी नयी फैक्ट्री और प्रोजेक्ट ला रहे है - जहाँ पर बेशक दिल्ली से तनख्वाह कम मिलती है पर घर से नजदीकी और खर्चों की कमी के कारन वहां से लेबर का पलायन रुका है। दुसरे उतराखंड में हरिद्वार, रुद्रपुर अच्छे उद्योगिक क्षत्र के रूप में विकसित हुवे हैं और पहाड़ का आदमी - पहाड़ पर ही सिमट गया है।

दूसरी बात, आजकल के नौजवानों में तकनिकी कार्य करने की इच्छा खत्म हो गई है। अब हाथ में मोबाइल फोन आ गए हैं, कक्षा १० सभी पास कर गए है. हाथ काले करने में शर्म आती है- पैसा कमाने के लिए एक अच्छा विकल्प होता है कमीशन. कोई भी कार्य करना और कमीशन खाना. सभी "गुरु भाई" बनना चाहते हैं. चैन स्नाचिंग, चोरी चकारी इत्यादि।

एक बात तो है की हम भविष्य में सफ़ेद कोलर बेरोजगार नौजवानों की अच्छी खासी फौज तैयार कर रहे है.

: बाबा :