12 दिस॰ 2010

गर गुमनामियाँ ही हमसफ़र हों तो क्या कीजिए.

कोई खिलौना ही दिल तोड़ दे तो क्या कीजिए....
कोई अपना ही बेगाना हो जाए तो क्या कीजिए....

दिया साथ तो हमने अंगारों पर चल कर..
अगर रास्ता ही लंबा हो जाए तो क्या कीजिए....

मेरे दोस्त, ये मय साकी ओ मयखाना....
सब एक रात में ही तवारीख हो जाए तो क्या कीजिए....

जो फूल बन बेबाक रस्ते में बिछ जाते थे....
शूल बन चुभते रहे बरास्ता, तो क्या कीजिए....

लाख बचाते रहे दामन हम अपना इन फूलों से ...
फिर भी शूल मिलते रहे किस्मत में तो क्या कीजिए....


बाबा तो चल निकले थे रस्ते ए शोहरत पर...
गर गुमनामियाँ ही हमसफ़र हों तो क्या कीजिए....



दोस्तों कुबूल फरमाएं इसे .... गज़ल नाम दे देंगे तो बाबा का सफर मस्त रहेगा... नहीं तो “ओलख निरंजन”

7 दिस॰ 2010

विद्रोही का ब्रह्मज्ञान और कविता

देखो विद्रोही, कितनी मस्ती है दिल्ली में, गुलाबी ठण्ड का मौसम है, लोगबाग दिव्य मार्केटों में घूम रहे हैं, चिकन-बिरयानी और मक-डोनाल के साथ मौसम का मज़ा ले रहे हैं. सरकार ने इतने बड़े-बड़े माल बनवा रखे हैं, ऐसे-ऐसे सिनेमा हाल बना रखे है की इन्द्र देवता भी फिल्म देखने को तरसे- क्या है कि अब वो भी तो अपनी अप्सराओं के नृत्य से परेशान हो गए हैं – क्योंकि वो अप्सराएं मुन्नी बदनामी और शीला की जवानी से डिप्रेशन की शिकार हो गयी हैं. उनमे अब वो लय और गति नहीं रह गयी. और एक तुम हो, कि मुंह लटका कर बेकार ही परेशान होते रहते हो. सरकार कि समस्त सुविधाओं का मज़े लो..... नए-नए मनभावन ठेके और बार खुले हैं – अच्छी वराइटी की दारू मिल रही है – जाओ खरीदो और पान करो. पर क्या करें? हम हैं तो कर्महीन ही – कर्महीन: अरे भाई, तुलसी दास जी फरमा गए है : सकल पदार्थ इ जग माहि – कर्महीन पावत नाहीं. तो भाई सभी पदार्थ मौजूद हैं – थोड़ी अंटी ढीली करो और मौज लो.

    ये ब्रह्मज्ञान आज ही राजौरी गार्डन की मार्केट में मिला है, रोज-रोज व्यवस्था को कोसना अच्छी बात नहीं. छोड़ दिया है कोसना ....... जैसा है–जहाँ है के आधार पर सब ठीक है.... पर पता नहीं कब तक? कब तक ये ज्ञान मेरे विद्रोही स्वर को दबा कर रखेगा... कुछ भी नहीं कह सकते ... दूसरा पैग लगाते ही की-बोर्ड की दरकार हो उठती है और बन्दा बेकरार हो उठता है.....  चलो कविता ही सही. नहीं आती लिखनी तो भी लिखो.


सामने अलाव सेंकते मजदूर
सीधे साधे अच्छे लगते है
कम से कम सीने में सुलगती भावनाओं को
इंधन दे - भडका तो सकते हैं.
अपने सुख-दुःख इक्कट्ठे बैठकर
झोंक देते हैं उस अग्नि में
और, सब कुछ धुआं बन उड़ जाता है.


उधर उस मरघट में
उठती लपटें भी सकूं देती है
चलो, अच्छा ही हुआ,
एक व्यक्ति अपनी मंजिल तक पहुंचा...
तमाम चिंताएं, दुश्वारियां
अग्नि के हवाले कर.
वो निश्चित होकर चल दिया...
और, सब कुछ धुंए में उड़ जाता है.

दूर घाट के पार अघोरी
जो चिता की आग से
अपनी धूनी जमाये बैठा है
खुनी खोपड़ी - कटा निम्बू,
कुछ सिन्दूर – शास्वत सा.
और मदिरा... आहुति के लिए
अपने कर्म-दुष्कर्म,
मदिरा बन होम कर दिए अग्नि में
और
सब कुछ धुंए में उड़ जाता है.

और मैं यहाँ ....
अपने घर में....
जहाँ सास-बहु के रिश्तों की सनक
नहीं देखने देती राष्ट्रीय नेताओं की हरकत....
कसमकसा रहा हूँ  ...
उस मजदूर का, मरघट का और अघोरी का
धुंवा अंदर भर रहा हूँ..
विद्रोह दबा रहा हूँ...
अग्नि अंदर ही अंदर सुलगा रहा हूँ.
-:-

मित्रों बक तो दी - जो दिल में थी........ देखना ये है कि आज की बक बक कहाँ तक आपके हृदय को छूती है, या फिर बेरंग ही वापिस आती है : जय राम जी की.
बाकलम खुद
दीपक बाबा 

6 दिस॰ 2010

मैं ईमानदार प्रधान हूँ, मेरे प्रयत्नों में कोई कमी हो तो बताओ.

जंगल में सभी प्राणियों ने पंचायत की. इस बार प्रधानी में शेर को विजयी न होने दिया जाए..... क्या है कि ताकतवर है, जब चाहे किसी न किसी को तंग करता रहता है, किसी न किसी को उठा कर ले जाता है, अपनी मनमानी करता है. इस बार प्रधानी में किसी और प्राणी को चुना जाए....
.
सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास हुआ, और बन्दर जी को प्रधानजी के पद पर मनोनीत किया गया. बन्दर जी प्रसन्न हुआ और प्रधानी भाषण पढ़ा गया... बन्दर जी बोले
“कानून सभी के लिय बराबर होगा, और पूर्ण स्वतंत्र होकर आपना काम करेगा. हर प्राणी को जीने की पूर्ण आज़ादी होगी”
तालियाँ ......
फोटू सेस्सन के बाद सभा विसर्जित हुई.
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कुछ दिन बाद एक बकरी हांफते हाँफते आयी, प्रधानजी प्रधानजी, शेर मेरे बच्चे को उठा कर ले  गया है.....
शेर की इतनी हिम्मत, इस लोकतान्त्रिक जंगल में, जहां हर प्राणी को अपनी आज़ादी से जीना का पूर्ण अधिकार प्राप्त है – वो अपनी मनमानी और गुंडागर्दी नहीं कर सकता, बंदर जी ने जोश में कहा 
प्रधानजी, यहाँ बातें मत कीजिए, जल्दी चलिए...... समय बहुत कम है...
चलो देखते हैं.
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देखा तो शेर एक पेड के नीचे बकरी के बच्चे को दबोच कर सुस्ता रहा था.
बकरी ने इशारा किया...... प्रधानजी उछलकर पेड पर चढ़ गए ......
बकरी चिल्लाई...... देखो, वह मेरे बच्चे की गर्दन पर दांत गडा रहा है
बंदर ने पेड की एक डाल से दूसरी डाल पर उछलना शुरू कर दिया...
बकरी चिल्लाये..... देखो, वह मेरे बच्चे की गर्दन को नोच रहा है
बन्दर ने और जोर से पेड की शाखाओं को हिलाना चालू कर दिया ....
बकरी जोर से चिल्लाती रही...
शेर बच्चे को खाता रहा.....
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बन्दर कभी इस डाल कभी उस डाल..... जा जा कर जोर जोर से पेड की शाखाओं के हिलाता रहा.....
शेर ने बच्चे को पूरा खा लिया.....
बकरी रोने लग गई..... रोड पर स्यापा करने बैठ गई...
बन्दर थक कर पेड से नीचे आया, और बोला..
बकरी ने अर्शुपूर्ण दुखभरे नेत्रों से बन्दर को देखा.....
हांफता हुवा बन्दर सर झुका कर बोला, “मैं ईमानदार प्रधान हूँ - पूरी इमानदारी से महनत की, मेरे प्रयत्नों में कोई कमी हो तो बताओ....”

जी दोस्तों,
शक्तिहीन की इमानदारी भी किसी काम की नहीं रहती..
शेर बच्चे को खा रहा है.....
.
भेडिये और सियार बची हड्डियों को पाने के लिए जंगल पंचायत को ठप्प करके बैठे है...
बकरी विलाप रही है.....
इस लोकतान्त्रिक जंगल में अपने-अपने हिस्से के लिए लड़ाई है, जनता के हिस्से की लड़ाई कौन लड़े. अत: बकरी का विलाप जारी है...

एक प्रधान कह रहा है 
"मेरी इमानदारी में कोई कमी हो तो बताओ.....
अब शेर के मुहं कौन लगे."

5 दिस॰ 2010

काला धन ...... नेता जी के माथे पर बल .

काहे माथे पर बल डाले ...... इन्ह से उन्ह चक्कर काट रहे हो.... पेट में अफारा हो गया का ? या सुसरी अब विदेशी दारू भी नहीं पचती.... पी कर घूमना पड़ता है.
नहीं इ बात नहीं
फिर क्वोनो टेप-वैप का चक्कर परेशान कर रहा है....
नहीं इ बात नहीं........
इ बात नहीं उ बात नहीं, तो फिर का अपने कुंवर साहिब क्वोनो परेशानी खड़े किये हैं.... कहीं कोई बलत्कार-व्ल्त्कार का का चक्कर तो नहीं हैं.
चुपे रहो.......... जब देखो गटर-पटर करते रहती हो..... जाओ खाना लगाओ
पहले बात बताओ, का परेशानी है.
सुनो, परेसानी सुसरी बिदेश में पड़े पैसा की है.
हाँ, उ तो कब से रखे है जब मंत्री थे... और खूब घोटाले किये रहे और पैसा स्विस बैंक में जमा करवा दिए.... वहाँ तो सेफ है.
हाँ, सेफ तो था, पर अब वहाँ की सरकार ने फैसला कर लिया है, की किसी भी देस की सरकार यहाँ आकर कुछ कागज कारे करके, सभी खाते देख सकती है.... और पैसा भी वापिस ले जा सकती है...
पर इ बात तो पुरानी हो गई, इसमें परेसान होने की का जरूरत है, सरकार क्वोनो गैर थोड़े ही है.... उसका का जरूरत पड़ी है – पुराने खाते खंगालने की.
नहीं, अब उ बात नहीं है, इ सरकार पर अपनी पकड़ नहीं है...... इन्ह अब क्वोनो सुनवाई नहीं होती...
फिर भी, आप अपने को रो रहे हो, इ लोग भी पिछले ६-७ बरस से सरकार चला रहे हैं, कुछ न कुछ इन्होने भी जमा कर लिया होगा..... उ फिल्म नहीं देखि थी.... वक्त.. उमे राजकुमार बोले थे, “शिनाय सेठ, जिसके अपने घर शीशे के हों, दूसरों पर पत्थर नहीं फैंका करते.” बस. कौन जाएगा...
अरे, सरकार से ज्यादा डर उ बाबा से है, सुसरा खुदे तो न कोई बाल-बच्चा, लौकी का जूस पीकर गुज़ारा करता है, हल्ला कर रहा है – पैसा देश में मंगवाओ – पैसा देश में मंगवाओ.
अरे हल्ला करने दो, कौन सुनता है, किसी बाबा की..... बाकि तो सभी आप जैसे ही हैं न – टोटली भ्रष्ट.....
अरे धीरे बोलो, तुमहो तो बस........ तभी कहते है, बीवी पढ़ी लिखी होनी चाहिए..... कहाँ गवार से गुजारा करना पड़ रहा है......
हाँ हाँ पढ़ी लिखी होनी चाहिए...... तुमहो कौन से पढ़े लिखे थे.... या कौन सा रोजगार था..... इ तो सुकर करो, हमरे बाप नें तुमरे खानदान देख कर सादी कर दी.  बिटिया को पढ़ा लिखा कर कौन सा तीर मार लिए..... देखो अपनी दोस्त को क्या-क्या कह रही थी.........

3 दिस॰ 2010

लो जी, मारूति ८०० आ गयी........ सौम्यपूर्ण और अम्बेसडर आ गई.... पूर्ण गरिमा युक्त.

    सामने जाती रोड पर खड़े होकर ट्रेफिक को देखना भी एक कला है. आजमाइए . आप मात्र ट्रेफिक को ही देखिये ... पैदल चलने वाले मुसाफिरों को नहीं. क्योंकि जो मुसाफिर है – उसकी सवेदानाएं कहीं न कहीं उनके चेहरे पर अंकित होती है – और एक आम इंसान दूसरे इंसान क्या हर प्राणी की भावनाएं पढ़ सकता है, समझ सकता है. और कई बार तो दूसरे प्राणी के साथ नज़र मिलते ही एक दूरसंवेदी यंत्र की तरह सम्बन्ध भी स्थापित हो जाता है. और उसकी खुशी और उसके गम खुद महसूस किये जा सकते है. अत: मुसाफिर जो देखना छोड़ दीजिए... हो सके तो राम जी के बनाये अन्य प्राणी जैसे कुत्ता, बिल्ली या फिर कोई चिड़िया इत्यादि भी मत देखिये.......
    आप देखिये.... वाहनों को....... कलपुर्जों के अंतर्द्वंद को. सही में. पहचान लेंगे..... वो देखिये, टाटा ४०७ आ रही है... डरी हुई सी..... पता नहीं कब कहाँ ... ट्रेफिक पुलिस वाला हाथ देकर रोक ले. पता नहीं, गाड़ी ही डरी हुई है या फिर ड्राइवर का डर गाड़ी पर झलक रहा है. ड्राइवर सचेत सा ... गाड़ी भी सचेत सी. कभी कुछ यू लगता है कि ड्राइवर का व्यक्तित्व ही गाडी पर हावी रहता है. कोई दबंग सा ड्राइवर टूटी फूटी ४०७ चला रहा है – तो गाडी भी घटर-पटर करती हुई निकल जाती है....... खूब धुआं उडाती हुई.... मनो किसी कि परवाह नहीं, ‘ये तो नू ही चालेगी” के तर्ज़ पर
    उधर, एक सेवा निर्वुती को अग्रसर ब्लू लाइन आ रही है.... परेशान सी....... रुक रुक कर चल रही है. कोशिश है कि सामने वाली रेड लाईट पर जरूर रुके......... शायद कोई सवारी चढ जाए ... और पांच रुपे की टिकट कट जाए...... झम-झम ... खट-पट सी. किसी ज़माने में कितनी शान से चलती थी...... उतनी ही शान से ड्राइवर बैठा करता था..... मुंह में ‘दिलबाग’ डाले....... पर अब दोनों सुस्त. सुबह जब गाड़ी निकलती है तो मालिक भी बड़ी हसरत से देखता है... जैसे बिना दूध देने वाली गाय को दुधिया देखता है...... न तो बेच सकता है और न ही पाल सकता है.
    लो जी, मारूति ८०० आ गयी........ सौम्यपूर्ण. जब से रोड पर उतरी है – हमेशा सौम्य रही है. शायद ही किसी को परेशान किया हो.... न तो पैदल यात्री को न मालिक को और न ही ड्राइवर को. आज भी ऐसे ही.... कंपनी ने बनाना छोड़ दिया तो क्या, मायका बिछुड गया तो क्या? कितनी शान्ति से चल रही है. अब देखो, आराम से बिना शोर के चलते हुए, पुराने दिन याद करते हुई दिखती है. कितनी घबराहट में उतरी थी – ससुराल में यानि रोड पर, दायें-बाएं बड़े-बड़े ट्रक, बसें, और सौत (अम्बेसडर) ... उनके बीच बहुत ही प्यार से फिट हो गयी..... मधुर रिश्ते रहे हरेक से......... कई कोठियों में अब भी खड़ी है.... बिना उदासी के, ड्राइवर रोज सुबह कपडा मारता है – और लालाजी का जब मन हुआ – मंदिर तक चला जाता है. नहीं बेच रहा....... कैरीअर के उठान पर ली थी..... आज कई कारें खड़ी हैं.. पर मारुती मारुती ही है.
    ये सुफेद अम्बेसडर आ गई.... पूर्ण गरिमा युक्त...... दिव्य ..... माथे पर लगी ‘रेड लाईट’ मनो इसको और गरिमा प्रदान करते हों,  अंदर जितने भी काले दिल वाले क्यों न बैठे हों .... पर सुफेद अम्बेसडर की गरिमा पर कोई दाग नहीं.... बड़ी बहु जितनी आज्ञाकारी ...... और बड़ी सेठानी जैसे राज-काज वाली शांत धमक. अम्बेसडर ड्राइवर भी एक गरिमा लिए मिलेंगे.

कीजिए साहेब........ नोटिस कीजिये.... इनको. 

2 दिस॰ 2010

छोडो यार .. एक कश लगाने दो.....

थामस, राजा, आदर्श, २ जी स्पेक्ट्रम,  राडिया, ........ छोडो यार .. एक कश लगाने दो... ढंग से. कल से आई टी सी कंपनी भी अपनी सिगरेट की फेक्टरी बंद कर रही है.... इसी पल को जी लें.... इस पनवाडी की दूकान पर ये कश पी लें..... और तुम हो कि थामस थामस लगा रखा है... CVC सरकार की और थामस भी सरकार का....... जो घोटाले हुए वो भी सरकारी.. राजा भी सरकार का हिस्सा या ये कह लो कि राजा की ही सरकार. क्या फर्क पड़ता है....... फर्क तो वहाँ पड़ रहा होगा जहाँ १५ दिन से कुछ संसद वेतन नहीं ले रहे..... पता नहीं घर का राशन कैसे भरेंगे.

    कितना ही आसान है सिगरेट के धुंए में गम को विलीन कर देना...... पर ये गम भुला नहीं जाता ... जब ये घोटाले दिमाग में घूम-घूम कर दही बिलो रहे हों, तो इसकी आउटपुट सिगरेट के धुंए में बाहर आती है. तुम कह रहे हो, थामस थामस क्या लगा रखी है. भाई, वो ध्यान देगा भ्रष्टाचार कैसे आदर्श हो.... आखिर सरकार ने उसको CVC पर बिठाया है.... तो उसका भी कर्तव्य हो जाता है की सरकार का ध्यान रखे. सिगरेट का धुआं कई बार आसमान में विलीन होते-होते अजीबोगरीब शक्ल अख्तियार कर लेता है. अभी धुआं निकला तो पता नहीं कुछ क्रास जैसा निशान बन गया...... वाकई कुछ नहीं सूझता. CVC का पद एक सवेधानिक पद है...... इसमें कोई धर्मवाद और जातिवाद थोड़े चलता है. ये अपने आप में ऐसे ही महत्वपूर्ण है जैसे की इस सिगरेट में तम्बाकू के बाद लगी फिल्टर का होना.

     युवराज को परिपक्व होने में अभी और समय है और ‘उस’ भलेमानुस से कम से कम ४ साल सरदारी और करवानी है...... कई काम अधूरे है..... तो ऐसे महत्वपूर्ण पदों पर थामस जैसे का होना लाजिमी है. इसी उधेड़बुन में एक जोर का कश और लेता हूँ और आउटपुट में जो धुआं निकलता है उसका रंग काला बदरंग सा नज़र आता है ...... और मैं जब उसे आसमान में उडेलता हूँ तो पहले का क्रास जो सफेदी लिए था... इस काले रंग में और खिल उठता है.


   सिगरेट जलती जा रही है..... मेरे सवालों के साथ-साथ...... सवाल खत्म होने का नाम नहीं ले रहे .....  
   दिमाग में दही पूर्णता बन कर तैयार हो जाती है दूकान पर रखे टीवी में थोमस साहेब कहते हैं, "सरकार ने मुझे मुख्य सर्तकता आयुक्त (सीवीसी) नियुक्त किया है। मैं सीवीसी के रूप में काम कर रहा हूं।"

   सिगरेट का आखिरी कश लगाकर मैं उसे सड़क पर फेंकता हूँ और पैरों तले रौंद कर ...... बकबका कर चल पड़ता हूँ......


जय रामजी की
  
Photo : coursey by google.co.in 

30 नव॰ 2010

एक बोध कथा....

     एक मजदूर को लत लग गयी..... लत (नशा) हर चीज़ की बुरी होती है. सुबह-सवेरे मजदूरी का नागा कर के पार्क में बुद्धिजीवी लोगों के बीच बैठ जाता... जहाँ देश समाज पर चर्चा होती रहती थी... कुछ जवलंत मुद्दे उठाये जाते ........ कुछ राय जाहिर की जाती ... प्रधान मंत्री को ऐसा करना चाहिए...... नेता विपक्ष यहाँ गलत था......  आदि इत्यादि.... पतनशील समाज और गर्त में जा रहा है. सिनेमा का यह रूप हमारी युवा पीडी और हमारे मूल्यों को समाप्त करने पर तुला है..
      वो मजदूर सुबह से लेकर देर दोपहर उन लोगों की बीच बैठा रहता.... खैनी खाता और उनकी न समझ आने वाली बातें सुनता रहता...
    दोपहर बाद उसे दायें–बाएं घूमना पड़ता.... तब उसे कोई भी मजदूरी पर न रखता.... और रात ढ़ले घर आता.... घर वाले थका मांदा समझ कर समय से खाना वगैरह दे कर कुछ न कहते..
    सुबह फिर से वही दिनचर्या....... पर शांत माता सब देख रही थी और समझ भी रही थी...... एक रात कहीं बुद्धिजीवी बैठक में जाने के लिए उसने माँ से कुछ पैसे मांगे तो.... माता फट पड़ी..... ये मजदूरी छोड़ कर बतोले करता रहता है... कब तक मेरे से पैसे मांग कर गुजारा करेगा ?

सही तो कहा है अमरकवि दुष्यंत ने
हर उभरी नस मलने का अभ्यास
रुक रुककर चलने का अभ्यास
छाया में थमने की आदत
यह क्यों?

जब देखो दिल में एक जलन
उल्टे उल्टे से चाल-चलन
सिर से पाँवों तक क्षत-विक्षत
यह क्यों?

जीवन के दर्शन पर दिन-रात
पण्डित विद्वानों जैसी बात
लेकिन मूर्खों जैसी हरकत
यह क्यों?

जय राम जी की

27 नव॰ 2010

ये दिल्ली है साहेब.......

    ये दिल्ली है साहेब........... यहाँ चकाचौंध है.... बड़े बड़े खेलों की, मीडिया के कैमरों की, आसमान छूती बिल्डिंग में बड़ी कंपनियों के साइन बोर्ड की....... एकदम चमाचम....
    कहा जाता होगा किसी जमाने में, दिल्ली है दिलवालों की... पर आज नहीं .. आज दिल्ली है संगदिल लोगों की....... संगदिल ...... चाहे पैसे और रुतबे से कित्ते भी बड़े क्यों न हो.... चाहे उन्होंने अदब और साहितियक  दुनिया में कित्ते ही बड़े झंडे बुलंद न कर रखे हों......... चाहे कित्ते ही बड़े समाजसेवी और मानवाधिकार और पर्यावरण, जाने क्या-क्या, के कार्यकर्ता और अधिकारी हों...... पर सब संगदिल......... बाहर का दिखावा एक दम मस्त.... पोलिश .... पर एक छोटा-सा दायरा ... उसके अंदर किसी को भी आने की आज़ादी नहीं.... और न ही साहेब लोग उस दायरे से बाहर जाते है ... एक बनावटी मुस्कान ... कागज के फूलों-सी हरएक सूटेड-बूटेड टाई पहने इंसान के मुंह पर है..........

       महंगे ब्रांडेड महकते कपडे में लोगों के काले-काले दुर्गन्ध मारते दिल ... चमचमाते चेहरे..... लंगर.... दान........ गुरुपुरव, साईं संध्या, विशाल भगवती जागरण है यहाँ. ......... हरेक की प्रधानी चमक रही है..... कालकाजी मंदिर, बंगला साहिब, शीश गंज साहिब, हनुमान मंदिर, शनिमंदिर में लगती लंबी कतारें...... सूटेड-बूटेड प्राणाम - ये नतमस्तक हैं. .... पापों से छुटकारा चाहने के बाद........ दारू और मुर्गे के साथ आबाद होती किसी भी फार्म-हाउस और बियर-बार में रंगीन शामे........ रात १२ बजे तक दिन है साहिब.. अब कौन क्या कर रहा है किसी को क्या मतलब? अपना सौदा देख.
     सुबह की टेंशन ......... ऑफिस, उधारी कारों (इंस्टालमेंट) की लंबी कतारें, ट्रेफिक जाम – एवेरज १० कि.म. प्रति घंटा.... एम्बुलेंस और फायर ब्रिगेड का शोर - कोई मरे तो मरे ......... लबालब मेट्रो........ भागते इंसान... दम तोडती सिटी बस. परेशान करते ऑटो रिक्शा वाले.. दिल्ली है साहेब.......... गुजारा करोगे - तो खरीदो कार और लगो क्यु में .... १५ किलोमीटर के ऑफिस में पहुँचो शान से १ घंटे में.... टाई पहन कर – सूटेड बूटेड.... आप अपनी सहुलि़त के लिए नहीं जी रहे ......... आप सहुलि़त पाने के लिए जीते हो यहाँ पर........ साध्य ही रास्ता है साधन तक पहुँचने का..... उलटी गंगा है - ये दिखावटी अमीरी है साहिब...
  यहाँ पर बहिन-बेटी, बुडे माँ-बाप – सब बराबर ... धक्का मुक्की........ चैन स्नेचिंग, बैंक-रोबरी , लूटमार, बलात्कार.......... जो हो जाए वो कम है. अब बारी है दुसरे तबके की ....... उनके पास अगर किस्तों पर कार है तो हमारे पास चोरी की............ वो फार्म-हाउस में रंगीन शामे गुज़ार रहे हैं तो अपन भी दारू पी कर बलात्कार से ही गुज़ारा कर रहे है..... आदमी पिस रहा है अपने सपनो में ... अपनी आकांक्षाओं में...... जो कि गाँव में उधार लिए थे....... और दिल्ली में लुटा रहे है........
नेता मस्त है - पुलिस पस्त है ... दबंग जी रहा है...... कर्मो से पूज रहा है.

आओगे साहेब...... मेरी दिल्ली में .......

अपने सपने गाँव में पूरे करना जी.... मत आना इन सपनो के शहर .. यहाँ तो सुना है श्रवण कुमार ने भी माता पिता से किराया मांग लिया था..... यमुना भी यहाँ आकर थक जाती है....... 

ये दिल्ली है 
शान है
सत्ताधीशों की.......
दलालो की...... 
घोटालेबाजों की....
और दूषित मानसिकता लिए जाबाजों की......


आओगे यहाँ .... स्वागत है.....  


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