आह होली - वाह होली - फाग - फागुन - और उफ ये बेकरारी ......... नजर हमारी, जहॉं देखो - रांग नम्बर। क्या कहें। न उगलते बनता है न बोलते। पर आचारज (आचार्य) ने तो यूं फूहार छोड़ दी .... मानो कक्षा में कोई शरारती बच्चा मास्साब के खूब मना करने के बाद भी बाकी साथियों को रंग लगाना शुरु कर देता है और होली का महौल 2-3 दिन पहले ही शुरु हो जाता है।
याद आता है गांव में इस समय होली के लिए किसी के पास भी वक्त नहीं होता था - और न ही अब होता है। पर गांव के बामण, अहीर, मीणा, ठाकर सहित अन्य कमतर जातियां होली उत्सव में लग जाती थी पर पंजाबी खेत में लगे रहते थे- ‘अरे इन्हीं का त्यौहार है’ ....... सरसों की लावणी (कटाई) का मुश्किल भरा समय। बचपन था। रात को होलिका दहन के समय नगाड़ों के शोर में भयभीत होकर पर्व देखता। इतना शोर होता की कई बार कोई आवारा सांड मचल जाता और तबाही मचा देता था।
आज 200 से लेकर 1000 रुपये तक की पिचकारी आ रही है। पैसा बहुत है। दारु के खाली अध्दे में रंग भर उसके मूंह में झाडू के तीलों को छोटा छोटा कर के ढ़क्कन बनाया जाता था: और पिचकारी तैयार।
घर के सामने खुला मैदान सा था, उसमें कई बार बुभले (गाड़ियार-लुहार) ठहरे रहते थे। उनकी होली देखने लायक होती.......... दोपहर बाद तक मिणों द्वारा निर्मित कच्ची दारु सर चढ़कर बोलती थी। और उन लोगों का लड़ाई-झगड़ा देखने लायक होता। दो-चार के सर फट्टे मिलते थे।
दिल्ली आये, पर दिल्ली का ये गांव अपने शहरीकृत स्वरुप को पाने के लिए प्रसवास्वथा से गुजर रहा था। ऐक आंटी थी - अपने से बड़ों के मूंह से सुनते थे - सही औरत नहीं है: पूरे गांव के आवारा किस्म के लड़के सुबह से उसके घर के आगे फेरा लगाना शुरु कर देते थे - आंटी का किसी पर मन होता तो रंग लगवा देती अन्यथा बेरंग मोड़ देती - सुधा चला जा-तेरे जैसे कई हांडे फिरे। और तथाकथित शरीफ लोग एक किनारे खड़े होकर मन मोस कर मजा लेते - उनका बस चलता तो वो कौन सा पीछे रहने वाले थे।
होली है - मस्ती है: समस्त चालाकियां, शराफतें, दुश्वारियां, इत्यादि को छोड़ कर, बस अपने अंदर के रंग को पहचान कर बाहर निकालता हूं। अल्सुबह से दोपहर 2 बजे तक: आप आमन्त्रित हैं होली मनाने के लिए तिहाड़ गांव में - बाबा को पहचान लेगें - ये गारंटी है।
दुसरी बात, आज सवा तीन साल बाद 100वीं पोस्ट लिखने को मौका आया है। शायद इस ब्लाग जगत में मो सम कौन आलसी मैं ही दूसरा कोई नहीं। पता नहीं कब आप लोगों को पढ़ते पढ़ते स्वयं का ब्लाग बना दिया पर लिखने के नाम पर सिफर - जो अब भी हूं। आप सब मित्र मिले: धन्यवाद करता हूं कि मुझे प्रेरणा दी - और ब्लागिंग का ये सफर धक्के खाते खाते चालू हुआ। ब्लॉगिग ने बहुत से मित्र दिये और मित्रों के अलावा एक दर्द भी दिया: र्सवाईकल का। पर मित्रों की मिठास के आगे ये दर्द कुछ भी नहीं।
ब्लॉग्गिंग के सफ़र में मेरे साथ रहे, मेरा उत्साह बनाए रखा, आप सभी मित्रों का धन्यवाद, हो सकता कही मेरे से कुछ नाम छूट रहे हो, तो कृपया अन्यथा न लें.ents:
P.S. अपने ब्लॉग को खंगालते खंगालते - इन दो टीप पर अभी नज़र गई :
- नीरज गोस्वामी ने कहा…जय राम जी की...इतनी लम्बी छुट्टी ब्लॉग जगत में मंजूर नहीं की जाती...कुछ न कुछ लिखते रहन करें...

