17 मार्च 2011

आह होली - वाह होली और ये १०० वी पोस्ट

आह होली - वाह होली - फाग - फागुन - और उफ ये बेकरारी ......... नजर हमारी, जहॉं देखो - रांग नम्बर। क्या कहें। न उगलते बनता है न बोलते। पर आचारज (आचार्य) ने तो यूं फूहार छोड़ दी .... मानो कक्षा में कोई शरारती बच्चा मास्साब के खूब मना करने के बाद भी बाकी साथियों को रंग लगाना शुरु कर देता है और होली का महौल 2-3 दिन पहले ही शुरु हो जाता है।

याद आता है गांव में इस समय होली के लिए किसी के पास भी वक्त नहीं होता था - और न ही अब होता है। पर गांव के बामण, अहीर, मीणा, ठाकर सहित अन्य कमतर जातियां होली उत्सव में लग जाती थी पर पंजाबी खेत में लगे रहते थे- ‘अरे इन्हीं का त्यौहार है’ ....... सरसों की लावणी (कटाई) का मुश्किल भरा समय। बचपन था। रात को होलिका दहन के समय नगाड़ों के शोर में भयभीत होकर पर्व देखता। इतना शोर होता की कई बार कोई आवारा सांड मचल जाता और तबाही मचा देता था।

आज 200 से लेकर 1000 रुपये तक की पिचकारी आ रही है। पैसा बहुत है। दारु के खाली अध्दे में रंग भर उसके मूंह में झाडू के तीलों को छोटा छोटा कर के ढ़क्कन बनाया जाता था: और पिचकारी तैयार। 

घर के सामने खुला मैदान सा था, उसमें कई बार बुभले (गाड़ियार-लुहार) ठहरे रहते थे। उनकी होली देखने लायक होती.......... दोपहर बाद तक मिणों द्वारा निर्मित कच्ची दारु सर चढ़कर बोलती थी। और उन लोगों का लड़ाई-झगड़ा देखने लायक होता। दो-चार के सर फट्टे मिलते थे।

दिल्ली आये, पर दिल्ली का ये गांव अपने शहरीकृत स्वरुप को पाने के लिए प्रसवास्वथा से गुजर रहा था। ऐक आंटी थी - अपने से बड़ों के मूंह से सुनते थे - सही औरत नहीं है: पूरे गांव के आवारा किस्म के लड़के सुबह से उसके घर के आगे फेरा लगाना शुरु कर देते थे - आंटी का किसी पर मन होता तो रंग लगवा देती अन्यथा बेरंग मोड़ देती - सुधा चला जा-तेरे जैसे कई हांडे फिरे। और तथाकथित शरीफ लोग एक किनारे खड़े होकर मन मोस कर मजा लेते - उनका बस चलता तो वो कौन सा पीछे रहने वाले थे। 

होली है - मस्ती है: समस्त चालाकियां, शराफतें, दुश्वारियां,  इत्यादि को छोड़ कर, बस अपने अंदर के रंग को पहचान कर बाहर निकालता हूं। अल्सुबह से दोपहर 2 बजे तक: आप आमन्त्रित हैं होली मनाने के लिए तिहाड़ गांव में - बाबा को पहचान लेगें - ये गारंटी है।

दुसरी बात, आज सवा तीन साल बाद 100वीं पोस्ट लिखने को मौका आया है। शायद इस ब्लाग जगत में मो सम कौन आलसी मैं ही  दूसरा कोई नहीं।  पता नहीं कब आप लोगों को पढ़ते पढ़ते स्वयं का ब्लाग बना दिया पर लिखने के नाम पर सिफर - जो अब भी हूं। आप सब मित्र मिले: धन्यवाद करता हूं कि मुझे प्रेरणा दी - और ब्लागिंग का ये सफर धक्के खाते खाते चालू हुआ। ब्लॉगिग ने बहुत से मित्र दिये और मित्रों के अलावा एक दर्द भी दिया: र्सवाईकल का। पर मित्रों की मिठास के आगे ये दर्द कुछ भी नहीं।

ब्लॉग्गिंग के सफ़र में मेरे साथ रहे, मेरा उत्साह बनाए रखा, आप सभी मित्रों का धन्यवाद, हो सकता कही मेरे से कुछ नाम छूट रहे हो, तो कृपया अन्यथा न लें.ents:


सोमेश सक्सेना 
Kajal Kumar 
Sawai Singh Raj. 
सम्वेदना के स्वर 
Satish Chandra Satyarthi 
Deepak Saini 
वन्दना 
संजय @ मो सम कौन ? 
संजय कुमार चौरसिया 
Dr. shyam gupta 
Poorviya 
सतीश सक्सेना 
anshumala 
पद्म सिंह 
उपेन्द्र ' उपेन ' 
हरकीरत ' हीर' 
नीरज गोस्वामी 
सुरेन्द्र सिंह " झंझट " 
मनोज कुमार 
ajit gupta 
दिगम्बर नासवा 
रंजना 
सतीश सक्सेना 
Smart Indian - स्मार्ट इंडियन 
Dr (Miss) Sharad Singh 
Sunil Kumar 
अरुण चन्द्र रॉय 
सतीश पंचम 
चला बिहारी ब्लॉगर बनने 
शिवम् मिश्रा 
प्रेम सरोवर 
संगीता स्वरुप ( गीत ) 
ज्ञानचंद मर्मज्ञ 
abhi 
JHAROKHA 
Man 
ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ 
दिनेश वशिष्ठ 
M VERMA 
Indranil Bhattacharjee ........."सैल" 
नरेश सिह राठौड़ 
 
Suresh Chiplunkar 
गिरिजेश राव 
शरद कोकास 
संजय भास्कर 
Udan Tashtari 
Arvind Mishra 
नीरज बसलियाल 

जय राम जी की..........

रंगों से सराबोर मस्ती भरी होली की बधाई हो. 


P.S. 
अपने ब्लॉग को खंगालते खंगालते - इन दो टीप पर अभी नज़र गई :
नीरज गोस्वामी ने कहा…जय राम जी की...इतनी लम्बी छुट्टी ब्लॉग जगत में मंजूर नहीं की जाती...कुछ न कुछ लिखते रहन करें...

13 मार्च 2011

मय दे साकी, तेरे मयखाने में आये हैं..



मय दे साकी, तेरे मयखाने में आये हैं..
कई दिनों से गम अपना छुपाये हुए हैं.

छलकती है मय जो तेरी इन आँखों से.
कसम से कल से मयखाना भुलाए हुए हैं.

आ पी ओ मय पीने वाले....  यूँ लब तेरे बुलाते है.
तेरे दर पर ही आकर जीने की कसम खाए हुए हैं.

इस जमाने ने बेवफाई के सिवा भी बहुत कुछ दिया है...
बैठ मेरे पास साकी, कब से सीने में ये गुबार छुपाये हुए है.

तेरी अदा जो  क़त्ल-ओ-गैरत करती है ज़माने में...
हाय हम तो - बस दिल अपना बचाए हुए है. 

वादे, कसमे, रिश्ते नाते - झूठ सभी कसम से साकी..
बस ये मय और प्याला ही - इक डोर बनाए हुए हैं.



कुछ भी ,..... यूँ ही लिख दिया.... बस ... बहुत दिन हो गए थे ... सोचते है की तमाम विद्जनो में बैठना अच्छी बात नहीं, पर  इतनी दूरी भी तो ठीक नहीं..... आप सभी विद्वान लोगों में कोई न कोई बक बक करने वाला भी तो होना चाहिए :)  

तो लिख दिया - बस, यूँ ही लिख दिया.....

जय राम जी की. 

30 जन॰ 2011

बापू की बकरी के वंशज



आज गाँधीजी की पुण्य तिथि है..... राष्ट्रपिता को पूरा राष्ट्र नमन कर रहा है – याद कर रहा है. पर मेरे जैसे बुरबक को बापू की बकरी याद आ रही है. सुना है, बापू बकरी को बादाम खिलाते थे. बकरी की बहुत सेवा करते थे. और बकरी भी बापू से उतना ही प्यार करती थी. ये बात आश्रम में सभी को पता थी.... अत: जब भी कोई नेता या भक्त बापू से मिलने आता तो बकरी के सर पर हाथ जरूर फेर कर जाया करता था. पंडित नेहरु को भी बकरी में विशेष दिलचस्पी थी. वो बापू को खुश रखने के लिए अधिकतर बकरी को अपने हाथ से बादाम खिलाते.
देश आजाद हुवा, बकरी ने भी आजादी की साँस ली. पर कुछ ही महीनो में बापू के स्वर्गवास के बाद एक आपात बैठक में पंडितजी बोले कि इस बापू की बकरी कि सेवा मैं करूगा और ये अब आनंदभवन में आनंद से रहेगी. वैसे भी नेहरु जी के आगे बापू भी कुछ नहीं बोलते थे, अत: आश्रम में किसी व्यक्ति की हिम्मत ना हुई कि वो इस एतिहासिक धरोहर को आश्रम में रखने की बात करता.
जिस प्रकार तमाम गांधीवाद और गाँधी धरोहर को पंडितजी अगवा कर के ले गए या कहें कि आत्मसात कर लिया उसी परकार वो बकरी भी अब आनंद भवन की शोभा बन गयी........
समय बिताता चला गया. और बकरी के मृत्यु का दिन भी आ गया – ऐसे में फिर से सभा बैठती और उस बकरी के तमाम वशंजो में से एक को गाँधीजी की बकरी का दर्ज़ा दे दिया जाता.......
पंडित जी के स्वर्गवास के बाद भी ये परम्परा बदस्तूर जारी है.
बकरी बादाम खाती है...... और मज़े से रहती है..... पर उसे आज़ादी नहीं है कि कहीं खेत खलियान और गाँव देहात में घूम आये. कोई बात नहीं ........
लेकिन बादाम खा खा पर वो बोर हो गयी और उसने बादाम खाने बंद कर दिए... अब क्या हो? एक नयी समस्या खड़ी हो गयी...... बापू की बकरी के वंशज ने पंडित जी के वशंज के हाथो बादाम खाने से मन कर दिया.........
अगर मीडिया में आ गया तो दिक्कत पर दिक्कत...... वैसे ही समस्याए मुहं बाए खड़ी हैं और – एक नयी समयस्या और .......
बार पंडितजी के वशंजो के पास जो सलाहकार मण्डली थी, वो कोई मुफ्त में ही पैसा नहीं पाती थी, तुरंत युक्त भिडी और निष्कर्ष ये निकला की बकरी को २-३ प्याज खिलाए जाए...... जिससे बकरी का जयका बदल जाए.........
तुरंत सलाहकारों का एक समूह आजादपुर मंडी गया, और छाँट कर बेहतरीन २५० ग्राम प्याज लाया .... बकरी के आगे रखे गए... बकरी ने खुशी से खाना चालू किया ..... और सभी खुश हुवे और एक दूसरे को बधाई देने लगे.
पर एक बात जो और ध्यान में आयी कि बकरी ने अब मेमेमाना बंद कर दिया है..... बहुत पुचकारा गया....
और थोड़ी ही देर में बकरी के मुहं से निकला विदेशों से अब काला धन देश में ही आना चाहिए.
और सलाहकार खुशी से नाचने लगे..........
आगे दिन फिर अखबार की हेड लाइन बनी.......
'काला धन वापस लाने के लिए सभी प्रयास जरूरी'


मित्रों, माफ करना आपके डेरे (ब्लॉग) पर आते हैं - पढते है, पर बिना टीपे चले जाते है - श्याद महीना एक ऐसे ही चलेगा..... आप नाराज़ ना हों - और मुझे भूले नहीं.

....... जय राम जी की. 

26 जन॰ 2011

गण के तंत्र की बधाई कबूल फरमाइए ......


गण का तंत्र हूँ या फिर तंत्र का गण हूँ, पर सलाम कबूल फरमाइए और ये प्रशन भी, क्यों कि आज इस तंत्र की या फिर कहें गणतंत्र की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर भी इसका जवाब नहीं मिल पा रहा. या कहें कोई भी फैसला नहीं कर पा रहा कि वो इस तंत्र का गण है या फिर खुद ही तंत्र है.... इसका जवाब विकिपीडिया भी नहीं देता. सब मौन हैं – और ये मौन जो सन्नाटा उपजता है वो कई अर्थों में स्वयं गणतंत्र की अंतरध्वनि को झंझकोरता है. उत्देलित करता है.


एक जिम्मेवार सरकार का जिम्मेवार नुमाईंदा आज कह रहा है कि इस देश में कालाधन रखने वाले लोगों के नाम बताने के लिए सरकार जिम्मेवार नहीं है..... शायद उन लोगों के नाम छिपाने के लिए सरकार बाध्य है... कालाधन रखने वाले लोगों के नाम गुप्त के लिए कानून है और उजागर करने के लिए कानून बनाया जाएगा या फिर कालाधन के उन्मूलन के कानून बनाया जाएगा? -  ये भी प्रश्न उस प्रकार खड़े हो जाते हैं जैसे कि गण और तंत्र के रिश्तों के. 

आज इस महान राष्ट्र में इन्हीं तानो बानो से उलझे एक राष्ट्रिय त्यौहार की पूर्व संध्या पर एक एडिशनल कलेक्‍टर को सरे आम जला दिया जाता है. उस एडीएम का कसूर सिर्फ इतना था कि वो पैट्रोल में कैरोसिन की मिलावट रोक रहा था. कितना बड़ा गुनाह कर रहा था. इस देश में ऐसे ईमानदार लोगों की रही सजा है. चाहे उसके बाद उसके परिवार को २५ लाख रुपे दे दो.

उधर वो पगले लाल चौक पर तिरंगा फिराने की युक्त भिड़ा रहे हैं..... उन्हें ये नहीं मालूम कि वो जगह मात्र अलगाववादियों के लिए सुरक्षित है आरक्षित है..... वहाँ पकिस्तान का झंडा फिराया जा सकता है..... बिना किसी अड़चन के.... वहाँ से एक गृहमंत्री की बिटिया अपहृत की जा सकती है..... तब कोई कुछ नहीं बोलता... आज तिरंगे के नाम पर पुरे देश में तूफ़ान मचा है..... जैसे कोई गुनाह हो रहा हो...... गृहमंत्री से लेकर प्रधान मंत्री सभी परेशान है..... बरसों पुरानी धर्मनिरपेक्षता की दुहाई दी जा रही है...... और कुछ इस तरह कहा जा रहा है मनो ..... अभी तो बच्चों (उग्रवादिओं) को समझा बुझा कर सुलाया (बहलाया) है फिर जाग गए तो आंतक बरपा देंगे....

गण परेशान हैं, वो देखो

वो देखिये, वो सरदार जी, जो इस तंत्र का एक हिस्सा हैं या फिर कहें गण हैं, (अभी तक  प्रश्न अनुतरित हैं) बदहाल .... कदम डगमगा रहे हैं, पगड़ी .... पीछे १५ फूट तक चली आ रही है, और दोनों हाथों से उसे संवारते है डगमगाते हैं........ बुदबुदाते हैं....... यार एस सरदार ने साडा ना मिटटी विच मिला दित्ता...... खैर छोडिये इनको.. पहले तो ये शराबी है, दूसरे कसूरवार है समाज के और क़ानून के (सार्वजनिक जगह पर मदपान करना गैरकानूनी है) इसकी बात पर क्या भरोसा करें...... हम भरोसा करते हैं डी टी सी की टाटा वाली ग्रीन बस के कंडक्टर का....... भाई साब आप खाम्खावाह महंगाई का रोना रो रहे हैं..... अगर प्याज ७० रुपे किलो मिल रहे हैं तो जरूरी है खाना ....... मेरी तरह मटर की चटट्नी बना के खा लो...... ये देखो (वो अपना टिफिन निकलता है उसमे एक छोटी सी डिबिया में हरे रंग की चटट्नी है) कुछ अभी दोपहर को रोटी के साथ खाऊंगा और बाकि रात को कहाँ है मंहगाई. ये भी तंत्र के गण हैं.

कल जब शान से हमारे सेना अर्धसैनिक बलों और के जवान सीना चौड़ा कर के राजपथ पर सलामी देंगे तो हो सकता है कुछ देर के लिए ये सभी गम भुला दिए जाएँ..... अत: रात को ही ये पोस्ट लिखी जा रही है.

आप किस तरह के गण है इस तंत्र के? या फिर गण के लिए कैसा तंत्र रचा जा रहा है? जब तक इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलेंगे तब तक ये गणतंत्र अधूरा है.


बहुत दिन बाद आज आना हुवा, सर्वाइकल हो गया है पर दर्द २-३ दिन से नहीं है. डाक्टर ने कम्प्युटर पर ज्यादा बैठने को मना किया ...... पर दिल है के मानता नहीं.
बहरहाल जय राम जी की.

7 जन॰ 2011

तिरंगे का वजूद बढता रहे..

एक अरब से ऊपर लोग......
अरुणोदय से ले कर कन्याकुंवारी.........
तिरंगे का वजूद बढता रहे...

संसद में ‘निरीह’ सांसदों को बचाते....
बन्दूक ताने वो .....
बचाते रहे इनको ......
गोली दागते रहे उनपर - मरते दम तक
जब गाँव में मिटटी पहुंचे तो...
तिरंगे में लिपटा हो.....
गाँव धन्य हो जाय........
मुख्यमंत्री जी के आने से...
विधायक की सलामी से......
तिरंगे का वजूद बढता रहे...


केस स्पेशल है, .. कोर्ट स्पेशल है...
ऑर्डर स्पेशल है... सेल स्पेशल है.....
फ़ाइल दब गई है - खबर दब गई है,
महाघोटालों के बोझ तले
वो खाता है बिरयानी......
नायक का दर्ज़ा है उस देश में...
कुछ भी नहीं होगा, यहाँ, इस सोफ्ट स्टेट में....
गाजी बने या नहीं, पर यहाँ से अच्छे रहोगे....
ये बम ले जा कर फोड़ दो
उनको मुबारक हो- तिरंगे के हरे रंग से प्रेम,
तुम बम फोड़ते रहो....
और पूर्ववर्ती की तरह.
बिरयानी उड़ाते रहो..
लोग शहीद होते रहे, और
तिरंगे का वजूद बढता रहे...


ऊँची कुर्सी पर बैठ कर ....
वह न्याय का हथोड़ा बजाता है.....
अपने नातेदारों को ...
और अधिक धनाढ्य बनाता है......
उसके बाद मानवाधिकारवादी बन
रिश्तों को निभाता है..
उस पर भी तो
तिरंगे का वजूद बढता रहे...

एक दूर देश की नारी.....
अबला विधवा बेचारी...
आती है यहाँ जाहिलों के देश में.
काहिलों के बीच राज करने को,
१२५ साल पुराने पापों को ढोने को,
नए पाप चमकाने को,
ताकि, तिरंगे का वजूद बढता रहे...

उस पार से आते ५०० के नोट
मेहनताना है बस पत्थर फैंकने का ...
और वो जो बचे हुए... नहीं फैंकते पत्थर ...
मांगते फिरते हैं भीख..
राजधानी की सड़कों पर
वो गुलाबी गालों वाली कलियाँ अब....
नहीं चहकती...
लरजते हैं कलेजे...
कापतें है पहाड़.....
व्यथित हैं सुधिजन...
पर, तिरंगे का वजूद बढता रहे...



6 जन॰ 2011

बयाना ........मेरी स्मृति में.-दूसरा और अंतिम भाग



जब दिल्ली आये तो बस एक बात दिमाग में थी..... रुदावल वाले हनुमान जी. पिताजी बोले की सेवानिवृति के पश्चात सभी को वहाँ लेकर जायेगे....... और एक दिन पिताजी बिना सेवानिवृति के ही दुनिया से चले गए...... और वो जिम्मेवारी भी मेरे सर आ गयी.......
कई बार प्रयत्न किये पर जाना नहीं हो पाया........ बनते बनते - बीते वर्ष जून में रुदावल जाने की योजना बनी. मौसा जी को फोन किया गया...... कि वहाँ पंडितों को जिमाने का कार्यक्रम करना है..... आप वहाँ व्यवस्था कीजिए...... उनका जवाब होता था..... शादियों के भारे साये हैं...... कोई भी हलवाई खाली नहीं है.... अत: खुद ही हलवाई वगैरह की व्यवस्था ठीक करने मैं बयाना गया........ निजामुद्दीन (दक्षिण दिल्ली) से कोटा जनशताब्दी जो अपने तय समय से २ घंटे लेट थी......... बयाना मैं ७.०० शाम पहुंचा और सीधे भाग कर वहाँ बाजार में घूमने लगा........ हलवाईयों से बातचीत होती रही...  २ दिन के अंतराल में ५०-६० व्यक्तियों के छोटे कार्यक्रम के लिए कोई तैयार नहीं था.... उन्होंने से सुझाव दिया की आप रुदावल जाओ....... वहीं के हलवाई ठीक रहेंगे...... तुरंत जाओ........ रात होने को है.... मैं रिक्शे से नज़दीक फाटक तक गया जहाँ बस तैयार खड़ी थी........ बिलकुल फुल ....... फेविकोल के विज्ञापन की तरह...... और मैं भी छत पर बैठ गया...... लगभग ८ बजे के करीब रुदावल........
ढूढते-ढूढते बंटी हलवाई के दूकान के चोतरे पर ही डेरा जमाया........ वहीं क्यों ? इसका एक कारन यह था कि.. जैसे ही उसकी दूकान पर पहुंचा तो उसके हाथ में पानी का लोटा था...... या तो पानी पी बैठा था या फिर पीना चाहता था..... पर वो पानी भरा लौटा मुझे थमा दिया, बिना कुछ बोले ...... और मैंने आराम से पानी पिया और चप्पल उतार कर उसी के पास बैठ गया. उसने कुछ प्रश्नवाचक दृष्टी से मुझे देखा... और मैंने १ कप चाय बोल कर उसे शांति दी. चाय पीने के साथ साथ... उससे मंदिर में चढ़ने वाली सवामणी की बात करने लगा ....... दिल्ली से आये हो साब.. नहीं अलवर से....... ठीक है, कहीं से भी आये हो... किसी से भी पूछ लो.... हमारे बारे में. मैंने कहा, मुझे किसी से नहीं पूछना........ तुमने बिना मांगे मुझे पानी पिलाया है, अत: अब तेरा मुरीद हूं, जैसा कहेगा..... वैसे करेंगे...... बस नाक मत कटवा दियो..
अरे क्या बात कर दी साब आपने.... बस आप हुक्म कीजिए.....
मेरे पास कोई और विकल्प नहीं था..... मौसा जी के पास जाना नहीं चाहता था..... और दूसरी और बंटी था – जो पैसों (हुक्म) का इन्तेज़ार कर रहा था.
दाल, बाटी, चूरमा, पूरी, गट्टे की सब्जी, रायता .... सब देसी घी में..... २० लोग हम आयेंगे..... और २१ बामण जिमाने हैं...
ठीक है, ५० लोगों के लिए बना दूंगा.......
अगर जीमने वाले ज्यादा आ गए तो.......
नहीं, जितने न्योतोगे उतने ही आयेगें ..
अगर और आ गए तो, फिर भी वही नाक वाली बात....
ठीक है साब, आप २० लोग ही आओगे न...... तो बाकी मुझ पर छोड़ दो....
ठीक है, मैंने ५,००० रुपे साही (एडवांस) देकर पुख्ता किया....... और उससे बोला की मुझे बयाना छुडवा दे?
नहीं साब, इस समय नहीं...... आप रात को मेरे यहाँ सो जाओ, सुबह चले जाना..
क्या बात कर रहे हो, मुझे वापिस जाना है....... तू बस बयाना छुडवा दे.......
नहीं साहेब, ८-९ इस समय कोई वहाँ नहीं जाएगा.......
पैसे दे दूंगा, बाइक से भिजवा दो......
नहीं जी,
ठीक है, जय राम जी की...
मैं तो कहता हूं, कि रात यहीं रुक जाओ.......
और थोड़ी ही देर में मैं रुदावल की उस छोटी सी मार्केट में घूमता रहा, दुकाने अधिकतर बंद हो रही थी........ और वाकई कोई साधन नहीं मिला.... मैं परेशान..... न तो बंटी हलवाई के पास जाना चाहता था और न मौसा जी के यहाँ..... अपनी जिद्दी धुन और आवारगी पर पूरा भरोसा था... और सामने अंग्रेजी शराब की देसी दूकान........ जिसको बढ़ाने की तैयार भी चल रही थी......
वाह.... मेरी बुद्धि..... ऐसी अनजान जगह पर भी....
पहले जाम दे साकी फिर जिंदगी की बात होगी,
रात के १० बजे का समय .... घुमते घुमते एक जगह देखा तो जो मिनी बस मेरे को ले कर आई थी.... उसी के पास ... २-४ लोग खड़े हैं.... क्यों साब, ये बस वापिस बयाना जायेगी....
जाती तो उसी समय...... पर लेट हो गए... बस में खराबी आ गई है.... जायेंगे तो जरूर बस बयाना की है.
..... हौसला हुआ और यकीन भी,  मुल्ला का हो या नहीं, पर खुदा शराबी का जरूर होता है.
ठीक ११ बजे बस चल पड़ी ......... सुनसान .......... ले दे कर सवारी के नाम पर मैं अकेला..... कंडक्टर से बोला टिकट, कोई बात नहीं साब.... और उसने बस को ही मयखाने में बदल दिया. बयाना के सारे बाजार बंद..... कहाँ जाओगे, - रेलवे स्टेशन .... कोई बात नहीं, दिल्ली की गाडी रात २ बजे की है, अभी बहुत टाइम है.. और वहीँ बस में पता नहीं, कहाँ से खाना भी आ गया.........
१ बजे मैं स्टेशन पर था........ गाडी आई ३ बजे. और जो गर्मी जो तपिश उस समय तक थी, बयां नहीं कर सकता. ब्रिटिशकालीन वो लाल पत्थर का रेलवे स्टेशन अभी तक सुलग रहा था.
जैसे तैसे दिल्ली पहुंचे........... और एक दिन छोड़ कर बयाना के लिए चल दिए...... बढिया सफर, सुबह ४ बजे चले थे और १० बजे तक पहुँच गए..... बंटी भाई इन्तेज़ार कर रहे थे. धर्मशाला में उम्मीद से अच्छी व्यवस्था कर रखी थी,  जाते ही नीम्बू की ठंडी शिकंजी से स्वागत किया... और फिर चाय. ये सब उसके साथ करार में शामिल नहीं था..... यानि अलग से व्यस्था कर रखी थी. पूजा के लिए सामान लिया और..... मंदिर में हनुमान जी की पूजा अर्चना की.
उसके बाद समय आया ब्राहमणों जो जिमाने का.. पर अभी तक तो कोई नहीं आया था...... बंटी भाई बोला, चिंता मत कीजिए, नोवे (नाइ) को भेजा था न्योतने, अभी आ जायेंगे....... थोड़ी देर में कोई दूकान बंद करके और कोई खेतों से पंडित जी आ गए........ मतलब ये था कि जरूरी नहीं कि वो कर्म से पंडित हो, जात से होना चाहिए....... कुछ साधू भी आ कर बैठ गए, थोड़ी देर बाद साधुओं की संख्या बदती चली गए....... मैंने उनको भी पंगत में बिठा दिया, बस इतना करने की देर थी,
 २-३ ब्राह्मण देवता उठ खड़े हुए, बोले इन जोगियों को हमारे साथ नहीं बिठाओगे,
यानि,
यानि, पता नहीं कौन सी जात, और ये हमारे साथ बैठ कर भोजन करेंगे.......
उनकी जबरदस्त नाराजगी को देखते तय हुआ कि साधू लोग बाद में पंगत में बैठेंगे........ देखते देखते काफी लोग हो गए, माता जी कहने लगी तुमने तो ५० बन्दों का ही भोजन बोला था, इस पर में बंटी भाई की तरफ देखा तो वो बोला, साब चिंता मत करो...... जो भी आता है आने दो.
इस घटना से बयाना मेरे दिमाग ऐसे घर कर गया कि यहाँ जातिवाद कितना चरम पर है – जो साधू अपनी जाति छोड़ कर भगवा कपड़े धारण कर लेते है वो भी ताउम्र इसी जातिवाद के शिकार रहते हैं.
और चौधरी साहेब ... रेल की पटरी पर बैठे हैं....... बिहार जिस दलदल से धीरे-धीरे निकल रहा है – म्हारो रंगीलो राजिस्थान उस दलदल में धंस रहा है. फंस रहा है. ताज्जुब ये है लोग गुंडा गर्दी की बात करते हैं....... जातिवाद की क्यों नहीं करते.

5 जन॰ 2011

बयाना ........मेरी स्मृति में.

राजस्थान का ये छोर जहाँ उतर-प्रदेश के साथ मिलता है वही स्थित है बयाना – कस्बाई स्वरुप है. जिला भरतपुर  और भाषा के लिहाज़ से अत्यंत मीठी – बृज भाषा. भाषा और रीतिरिवाज से ये हिस्सा कहीं से भी राजस्थान का अंग नहीं लगता..... बयाना पर मैं कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दे रहा. न ही इसके लिए मुझे राजस्थान सरकार अथवा गुजर सम्युदाय ने अधिकृत किया है. न ही इस पोस्ट को इन दोनों के बीच की कड़ी समझा जाए.... और रिश्तेदारियों से अनुरोध है कि न ही वे इस पोस्ट की बाबत मुझे नाराजगी भरे फोन करें.

बात कोई ८-१० साल पुरानी है जब में प्रथम बार बयाना गया था. ब्रह्म्बाद गाँव है बयाना रेलवे स्टेशन के लगभग १५ मील दूर. वहाँ एक मासी जी रहती है. मौसा जी उस समय इंटर कोलेज में प्रवक्ता थे. कालेज से आने के बाद .... बाहर बरामदे में कुर्सी लगा कर बैठते थे... गुटखे के भरा मुंह – लाल ... और नीचे पत्थर का फर्श भी लाल........ और जो छोटी सी नाली उधर से गुजरती थी, शायद वो गुटखे के लाल पानी को बहाने के लिए बनाई गई थी, अथवा खुद बन गयी थी इस समय ये कहना कठिन है. मौसा जी, गज़ब की बातें करते हैं ... बृज भाषा की चाशनी डाले... आस-पास के कुछ ग्रामीण उनके पास आकर बतिताते थे. यहाँ लाल पत्थर बहुत है,  अत: घरों के निर्माण में इसका इस्तेमाल भी ज्यादा होता है... मकान की छतों पर उसी लाल पत्थर के पटाव... ८-८ फूट लंबे. दरवाजे के चौखटे.... नीचे फर्श सभी लाल पत्थर के. उस समय मोसेरी बहन की शादी का आयोजन था. और मैं मय परिवार वहाँ गया था.... बहुत गर्म दिन थे..... ज्येष्ठ का महीना... ... आम के पेड भी ज्यादा थे..... और कच्ची अम्बी उतरने लगी थी...... मेरे गाँव में आम के पेड नहीं होते .... बस किस्सों और कहानियों में ही पढ़े थे. घर के बगल आम का बगीचा था ... वहाँ चारपाई पड़ी रहती और ..... बाकि रिश्तेदारों के साथ मिल बैठ कर मैं भी उन लोगों की निंदा में व्यक्त गुजरता जो इस आयोजन में नहीं आ पाए थे और खाली समय में सीप (ताश) का खेल. एक बुजुर्ग से दोस्ती भी हो गई जो उसी बगीचे की देख भाल करता था. उसी ने वापसी समय पर ६-७ धड़ी अम्बी दी थी (मोल) गिफ्ट में नहीं....... घर ले आया था..... और सच, उस साल वो अचार बहुत उम्द्दा बना था.

दुबारा फिर जाना हुआ .... फिर एक बहन की शादी का आयोजन था. दूसरी बार जा रहा था अत: इस बार कुछ ज्यादा ही ‘लोकल’ बन गया - गले में गमछा डालकर . मौसा जी ने रुदावल वाले हनुमान मंदिर का भी जिक्र किया, जिस पर मेरे पिताजी की बहुत श्रद्धा थी, और संजोग से रिश्ते के भाइयों के साथ वहाँ चल पड़ा. रुदावल..... बहुत ही शांत जगह नज़र आई....... हनुमान जी का भव्य मंदिर, और आस पास धर्मशालाएं.

एक बात जो बार बार यहाँ दोहराई जाती कि यहाँ गुंडा-गर्दी और बदमाशी बहुत है......... देर शाम के बाद कोई घर से बहार नहीं निकलता....... पर मुझे ऐसा कुछ नज़र नहीं आया..... अगले रात शादी की थी..... और यहाँ मुझे जो जिम्मेवारी सोंपी गई वो... मुनीमजी की थी. दिल्ली में तो लोग लिफाफा जेब में डाल कर लाते है....... और घर के मुखिया को सीधे ही दे देते हैं....... पर गाँव और कस्बों में एक ‘जिम्मेवार’ व्यक्ति को बिठाया जाता है .... कापी कलम और एक बैग या झोला ले कर.  पता नहीं मौसा जी को मुझ में कौन सा जिम्मेवारी वहन करने वाला जज्ज्बा नज़र आया कि मुझे वहीँ बिठा दिया...

एक के बाद एक लोग आते गए...... मुझे ५-११ या २१ रुपे देते....... और जब तक मैं कापी पर उनका पूरा नाम न लिखता तब तक वहीं खड़े रहते या फिर पास कुर्सी में बैठ जाते. ठीक गाँव में आये सरकारी कर्मचारी की तरह. कई व्यक्तियों को देख कर तो मैं चौक उठता...... बड़ी से पगड़ी....... बड़ी-बड़ी मूंछे .... कन्धों पर लटकती दुनाली...... ठीक चम्बल से आये लगते थे. शुरू शुरू एक दो को देख कर चौक गया था...... पर बाद में देखा की हर ४-५ व्यक्ति उसी प्रकार से तीनों में से एक न एक विशेषता तो लिए हुवे था. कई तो नवयुवक १८-१९ साल के भी ऐसे ही दुनाली लटका कर आते थे. हाँ, इन तीन विशेषताओं के अलावा एक बात जो सामान्य थी वो थी – गमछा........ जो मैं भी गले में डाल कर बैठा था ..... मेरे ख्याल से ९५% लोगो के गले में था.