15 अप्रैल 2014

फुटकर बकवास.

वो जब सामने होती है 
मैं, निरीह सा,  छुप जाता हूँ.
धूप छाँव का अजीब खेला
ऐसे ही जीवन पर्यंत चलता रहा

*        *        * 

ईश्वर ने मेरे लिए कुछ जरुरी नायाब उपहार भेजे
मैं सदा उसकी गठड़ी पर निगाह गढ़ाकर
थोडा अक्षत पुष्प मीठा चढ़ाकर
और भी बहुत कुछ मांगता रहा.

*        *        * 

शट डाउन और री-स्टार्ट के बीच छोटे से
अंतराल को समझ पाना कितना दूभर है.
ज्ञानीजन जीवन और मृत्यु  के बीच के अंतराल को समझते हैं.

*        *        *  

स्वजन के मरने पर रोते-प्रलाप करते हैं
और अगले ही दिन काम पर चले देते हैं.
जीवन का खेल कितना विचित्र है 
और मृत्यु कितनी आसान सी
ऐसा सभी जानते  हैं.
पर कितने मानते हैं.

14 अप्रैल 2014

एक कहानी - जो कहानी नहीं है.



कहानियां कितनी नाटकीयता से भरी होती हैं, परतु कई बार जिन्दगी जैसी नंगी सच्चाई से परिपूर्ण. कई बार लफ्फाजी इतनी की चुनरी में गोटा और सितारे ज्यादा लगते हुए दिखाई देते हैं. पर कई बार एकाकी. कहानी कई बार एक कमरे में घटित दृश्य होती है और कई बार सुदूर पहाड़ों और दुनियावी सरहदों को फांदते हुए दृष्टिगोचर होती हैं.
जरुरी नहीं कि कहानी में नायक और नायिका हों – कई बार कहानी बिना हीरो हिरोइन के आगे बढती चली जाती है – पुरानी हिंदी कला फिल्मों मानिन्द. कई बार कहानी बेतरबी से बढती और कई बार सिलसिलेवार. कहानीकार पर निर्भर करता है – कई बार ढंग से कपड़े पहने, क्लीन शेव कहानीकार होते हुए भी कहानी को उलझाए चले जाते है और कई बार खिचड़ी दाड़ी, टूटे चप्पल और अस्त व्यस्त कपड़ों में सिलसिलेवार कहानी को आगे बढाये चले जाते हैं.
आधी रात में उनिंदी आँखे लिए या फिर कहीं भीड़ में खोये हुए कहानीकार की बैचेनी या कहें दिमागी अशांति उसे मजबूर कर देती है – कागज़ कलम उठाने के लिए. यहीं बैचेनी शब्दों में ढल कर कहानीकार को सकूँ देती है –कहानीकार उसे कई बार पढता है – फिर कुछ मिटाता है फिर से कुछ लिखता है. अंत में कोरे कागज़ पर एक हाशिया छोड़ कर पूरी कहानी ढंग से लिखता है. कहानी का प्रसव काल पूरा होता है. किसी अखबार या फिर पत्रिका में छप जाए तो कहानी अपने आप में सम्पूर्ण हो उठती है, अन्यथा बैचेनी में कई बार कहानीकार कागज़ फाड़ कर कहानी को फैंक देता है. और कहानी की भ्रूण हत्या हो जाती है.
कहानी कभी सन्देश कोई नहीं देती. कई बार प्रश्न छोड़ जाती है... कई बार कोशिश करती है कि किसी समस्या का समाधान देने की. कहानी अपने लिए प्रबुद्ध पाठक तलाशती है. जो उसे मथकर उसमे से कुछ ऐसा निकाले जो समाज उपयोगी हो सके. अध्यापकजन कहानी को पढ़ते पढ़ते पढ़ाने लग जाते है. विद्यार्थी को समझाते हैं कहानीकार के कहने का तात्पर्य अपने शब्दों में दोहराते हैं. पर वास्तव में कहानीकार क्या कहना चाहता है – ये कई बार तो न अध्यापक ही समझते हैं और न ही विद्यार्थी को समझा पाते हैं. परीक्षा में एक कहानी का मुल्यांकन ६ से १० नम्बर तक का होता है. इससे न ज्यादा न ही कम. कक्षा दस तक कहानी की इतनी ही महत्ता होती है.
कोई कहानी लम्बे समय तक पढते पढते से सुनते सुनते तक की प्रक्रिया में किसी भी सभ्यता/समाज में अच्छे से पैबस्त हो जाती है. उस कहानी के किरदार कहानी से बाहर निकल कर पाठक से ही बातें करने लग जाते हैं. बोलते हैं – पर सुनते नहीं हैं. और पाठक जानता है कि ये नालायक किस्म का किरदार है. सुनेगा नहीं  - फिर भी प्रबुद्ध पाठक / विद्यार्थी अपनी सलाह उस किरदार  को देने से नहीं चूकता – क्योंकि एक रिश्ता सा बन जाता है. यहाँ कहानीकार कामयाब रहता है. क्योंकि वो अपने किरदारों को वहीँ समाज में बिखेर देता है – जहाँ से उसने उठाये थे. यही आकर किरदार अमर हो जाते हैं. 
 जयरामजी की.

12 मार्च 2014

राजक नहीं , अराजक हूँ मैं...


क्या नौटंकी है साहेब ... क्लियर कर दीजिए .. करना का चाहते है.. राजनीति या फिर ड्रामेबाजी. एकगो बार जोर से हुंकार भर पूरा मीडिया इक्कठा कर लीजिये और अनाउंस कीजिए ..
हम दिल्ली कर मुख्यमंत्री बन कर दिल्ली के गरीब गुरबे लोगों की सेवा करना चाहता हूँ.
छोडिये.. ये बहुत मोसकिल काम है. दिल्ली का लोगबाग़ चाहते हैं कि कोई आइसा सरकार दिल्ली में आये कि पांच साल पुरे – हांजी पांच साल पुरे – दिल्ली जल बोअर्ड पर लगा दिए जाए. और हर दिल्ली वाले को अपने हिस्सा का उचित मूल्य पर पानी मिले आउर यमुना मैया को वापिस साफ़ पानी मिले.
आप कर सकते हैं.... पर नहीं
मैं दिल्ली का आम नागरिक भूल गया की आप तो अराजक हैं.. कैसे राजकीय कार्य कर सटे हैं.
आपने नहीं किया और न ही करेंगे.. क्योंकि आप तो आप है –
इस घोर कलियुग में पाप के भी बाप है.
कहने को तो आप तो पीरधानमन्त्री बन कर देस का सेवा करना चाहते.
पर यहाँ लोचा है.

6 मार्च 2014

कर्मों से चली बक बक शादी के साइड इफेक्ट तक



कर्मक्षेत्र में बहुत मेहनत होती है. आप सब जानते हैं. रक्से से रेलगाड़ी चलाने वाले तक. दूध और अख़बार देने वाले से पंसारी या फिर कहें दैनिक उपयोग की वस्तु वाले व्यापारी तक और अख़बार के दफ्तर में सवांददाता वाया संपादक से होते हुए अखबार देनेवाले तक.
बहुत मेहनत होती है साहेब.

प्रेस लाइन में कहा जाता है की फर्मा पहले उठेगा – जनाजा बाद में. यानि की किसी कर्मचारी को अपने किसी परिजन या फिर परिचित की मृत्यु का भी समाचार मिल जाता है तो वो मशीन पर फर्मा तैयार कर के जाता है. वही हाल अधिकतर सेवा प्रदाताओं में है. शिक्षक की नौकरी कई मायनोंमें में सुविधाभोगी समझी जाती है पर उनका भी अपना एक दर्शन है. बालक के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है. किसी शिक्षक का अपना पुत्र या फिर पुत्री नालायक निकलते हैं तो गाँव में बहुदा यही कहा जाता है की अमुक मास्टर में बालक सही से नहीं पढाये... उनका भविष्य चोपट कर दिया. उपर वाले ने तो न्याय करना ही था न.
बहुत पेचीदगी होती है. कहा जाता है कि जिस भी कर्म में हम आये हैं या तो वो हमारी किस्मत में लिखा है अथवा पुराने कर्मों का लेखा जोखा पूरा करने के लिए परमात्मा ने हमे इस जगह बिठाया है ताकि हम पूर्व जन्म में अर्जित या फिर बकाया कर्मों की यहाँ पूर्ति कर सकें.
देखो जी, कई बार आपके कार्यालय में ऐसे लोग भी होते हैं जो आपसे ऊँची पोस्ट पर विराजमान होते हैं..पर काम आपके पासंग भी नहीं करते. आप उन सब को लेकर टेंसन मत कीजिए. उनके कर्म है. पिछले जन्म में कुछ ज्यादा अर्जन हो गया था – इस जन्म में मौज लेकर बराबर कर रहे हैं. उसी दफ्तर में कुछ और भी कर्मी दिखते होंगे – जो दिन रात खटते रहते हैं और उसके बाद भी अधिकारियों की डांट खाने को विवश रहते हैं. – माफ़ कीजिए, मामला जाती हो जाता है पर जरा इस दूसरी केटेगरी की पारिवारिक दशा देखने को मिले तो कृपया इनका उपहास न उड़ायें क्योंकि ऐसे लोग दिन भर दफ्तर में खटने के बाद घर में आराम नहीं पाते हैं. वहां भी इन्हें आराम नहीं.
कर्मों की अपनी गति साहेब.
मुद्दे पर आता हूँ.

26 फ़र॰ 2014

बदायूँ



ये उत्तर प्रदेश है. 
वाहन रेंग रहे है लगता है यहाँ सड़क है. उसी सड़क के दोनों और मुख्यमंत्री साहेब के बड़े बड़े होर्डिंग लगे हुए हैं. लगता है यहाँ सरकार भी है. पर वहीं खड़ी है या सरक रही है - कहा नहीं जा सकता. बदायूं जाने के लिए आनंद विहार बस अड्डे से एक के बाद एक बस चलती है. चलती है या रेंगती है – कुछ कहा नहीं जा सकता. २३७ किलोमीटर यहाँ ९.५ घंटे में पूरा होता है. फिर भी सवारी पर सवारी है – मानो चिल्लड़ और रेजगारी है. इन्हीं सवारियों के यहाँ सब व्यापारी हैं. छोटी छोटी सड़कों पर बड़ी बड़ी गाड़ियाँ भी है – हुटिंग है – सायरन है – ट्रेक्टरों ट्रोलो का शोर है. चारो ओर बने होर्डिंग पर हाथी है और साइकिल है. दिल्ली से लखनऊ तक की साइकल यात्रा है. इनके सवार वी आई पी हैं. ऐ सी दफ्तरों में बैठते हैं. हाथी के दांत माफिक इनकी सवारी है. 
उत्तर प्रदेश है – बहुत से प्रतीक है. यहाँ सरकारें भी प्रतीकों के सहारे हैं.
जैसे उत्तर प्रदेश एक राज्य है उसी प्रकार कहने को बदायूं एक जिला है. बस में मेरा सहयात्री ‘भाई जान’ की दो बीबियाँ है – एक से पटती नहीं थी तो दिल्ली में दूसरी कर ली – उसी से एक बेटी हुई है. एक प्यारी सी बच्ची का फोटू लावा में दिखाते हैं. भाईजान बदायूं से १०-१२ किलोमीटर और आगे जायेंगे. बदायूं में घुमने लायक क्या है तो जवाब देता है – लालकिला. !! आजम खान बदायूं में लालकिला बनवा रहे हैं. साथ बैठा दूसरा सहयात्री उसके सामान्य ज्ञान पर चुटकी लेता है.. अरे लालकिला दिल्ली में है. पर वो रुकता नहीं छाती ठोक कर कहता है वो तो मुगलों ने बनवाया था – बदायूं में आजम खान बनवा रहे हैं. दूसरा यात्री फिर से चुटकी लेता है – हाँ जरूर बनवा रहे होंगे ये आधुनिक मुग़ल हैं.

15 जन॰ 2014

नफे सिंग पिट गया



नफे सिंग बुरी तरह पिट गया. हालाँकि उसे पिटना नहीं चाहिए था और पिट भी नहीं सकता था. पर पिट गया. प्रधानी करके कई सालों से पब्लिक के पैसों से मौज ले रहा था. एक दबंग से बरदाश्त नहीं हुआ. उसने नफे सिंग को पीट दिया – बुरी तरीके से.
पर नफे सिंग अपने पूर्वर्ती पीड़ियों की तरह हुन्नरमंद (पब्लिक का पैसा खाने का हुनर) था. भाग कर घर आया. एक नए लौंडे को पांचेक सालों से कुछ खिला पिला कर तगड़ा कर रखा था. तुरंत उसे बुलवा लिया.
और मोहल्ले में छाती ठोककर उस दबंग के पास गया और सारेआम एक ऊँची आवाज़ में बोला – मेरे को तो पीट दिया – मेरे छोटे भाई को पीट कर दिखा तो तब मानु कि तू वाक़ई ही दबंग है.

खबरे जो बेचैन करती हैं – उनमे से एक खबर की हेडिंग ये थी ...
लोकसभा चुनाव आप बनाम BJP, कांग्रेस गायब

बाकि आप समझदार है... नफे सिंग कौन और उसका छोटा भाई कौन हैं – अंदाज़ा लगा लीजिये.
~ जय रामजी की.

9 जन॰ 2014

केजरीवाल को फ़िल्मी शहीद बनाता हिन्दू रक्षा दल.

हिन्दू रक्षा दल नाम का बेनर लेकर कुछ लोगों ने कल कोशाम्बी में आम आदमी पार्टी के कार्यालय में जो उत्पात मचाया उसकी चारों ओर से निंदा और भर्त्सना हो रही है. होनी भी चाहिए. हिन्दू सदा ही सहिष्णु रहे हैं और उसमे उग्रवाद या असहिष्णुता की कोई जगह नहीं रही है. इसी समाज ने सबसे ज्यादा सम्प्रदाय और पंथ दिए है. आज हिन्दू के नाम पर विष्णु गुप्ता और पिंकी चौधरी जैसे लोग तौड़फोड़ करके उसे हिन्दू राष्ट्रवाद का नाम दे रहे हैं तो ये दुर्भाग्यपूर्ण है.
आम आदमी पार्टी के नेता प्रशांत भूषण (जो पेशे से वकील हैं) ने कश्मीर पर जो ब्यान दिया – वो भारत की सवैधानिक व्यवस्था को ही चोट पहुंचा रहा था. निंदनीय था. अन्य राज्यों की तरह जम्मू-कश्मीर भारतसंघ का एक अंग है. और अंग तो मैं कह रहा हूँ अपितु सरकारी कागजों में तो अभिन्न अंग है. ऐसे महसूस हो रहा कि आम आदमी पार्टी सुप्रीमो ने जनमत संग्रह करवा कर सरकार बनाने और चलाने की बात करते हैं तो पार्टी के बाकि नेता उसी सियासत पर चलते हुए कश्मीर जैसे मुद्दे पर ऐसे ही जनमत संग्रह को प्रमुखता देने लगे है.

31 दिस॰ 2013

कितनी बेबसी से जा रहा है बीस सौ तेहरा


बीस सौ तेहरा ... यहीं नाम तो तुमने दिया था – मुझमें समाने वाले उस काल के छोटे से टुकड़े को. मानों सागर में ओस की एक बूँद और गिर गयी. इस सागर सरीखे इतिहास में इस बूंद का अर्थ क्या? क्या क्या याद करोगे. बैठोगे और क्या क्या गिनोगे कि छाती चौड़ी हो जाए. क्या क्या भुलाना चाहोगे – कि याद आते ही एक सिहरन सी उठती है.
उतराखंड त्रासदी - तुम्हारी रूह कांप उठी न -  मैं तो बेबस हूँ ... बस मूक – तुम्हारी तरह ही मैंने भी यही त्रासदी देखी. पर उससे पहले मैंने वो अंधाधुंध विकास भी देखा था... जब भीमकाय मशीनें हिमालय की छाती को रौंद रही थी और उस तपोभूमि में तुम अपने रहने के लिए आलिशान होटल बना रहे थे. तब भी मूक था. कुछ काल पीछे चलें तो कर्म सिद्धांत का ज्ञान योगेश्वर कृष्ण दे गए थे.
रुपया रुपया जोड़ कर तुम प्लानिंग कर के घर के बजट को संवारते रहे – पर देश के हुकमरानों के हाथों रुपया फिसलता रहा - डालर उड़ता रहा. प्याज – बादाम हो गए और टमाटर – अखरोट. बच्चे तो जरूर १० रूपये के चिप्स में खुश रहे पर रसोई में चूल्हा रोता रहा. और मैं मौन. यहाँ भी कर्मों को तुम्हे ही भोगना पड़ा क्योंकि इन हुक्मरानों को तुमने ही तो चुनकर भेजा था.