6 अक्टू॰ 2010

आओ आज रुदाली के लय में हम भी गायेंगे

आओ सभी सवेदनशील मित्रों
मिल कर रोयें हम
चाँद की उदासी तुम उधार मांग लाना
और गंगा का उदार पाट तुम लाना
कैलाश की ऊँचाई तुम लाना ए प्रिय
और मैं उधार लायूँगा मयूर के आंसू
तुम रुदालियों को भी न्योत कर आना
न्यौता उनको जरूर देना
कि महाशोक का उत्सव है
और उन्हें आंसुओं के दाम जरूर मिलेंगे
एक महा रुदन होगा...........
जिसके लाइव टेलेकास्ट का जिम्मा
बस – दूरदर्शन को ही मिलेगा.
वो लाइव टेलेकास्ट...
जिसपर कोई सट्टा नहीं लगायेगा
कोई  हारने पर आत्महत्या नहीं करेगा
और, किसी का परिवार तबाह नहीं होगा
ऐसा लाइव टेलेकास्ट ही दिखायेगा.......
हमारी गरीबी को.....
हमारी लाचारी को....
हमारे उन खयालातों को ..............
जिन्हें ज़माने ने नक्सलवाद का नाम दिया.
क्योंकि.............
जो गुबारा मेरी संस्कृति दिखा रहा था .....
वो ... ७० करोड का था.

प्रिये मत्रों ......
आओ आज रुदाली के लय में
हम भी गायेंगे.......

3 अक्टू॰ 2010

२ अक्टूबर - ठगिनी क्यों नैना झमकावै? ठगिनी!

२ अक्टूबर २०१० समय दोपहर २-३ बजे के बीच और मैं पार्क के ठीक गेट के पास दूकान पर बैठ कर बोर हो रहा हूँ और महसूस कर रहा हूँ कि अगर घर में अगर नेट का कनेक्शन होता तो कुछ बेशक कुछ पोस्ट नहीं लिख पता पर टिपण्णी तो दे ही देता – और शायद कोई ब्लोगर खुश हो कर ५-७ रुपे फी टिपण्णी हिस्साब से मेरे अकाउंट में जमा करवा देता.

पर पता नहीं क्यों जिस जगह बैठा हूँ, वहाँ भी किसी चिट्ठाजगत से कम नहीं लग रहा. सभी ब्लोगर महोदय के पात्र घूमते हुवे नज़र आते है – दारू में धुत – बापू को श्रद्धांजलि देते हुए. २ अक्टूबर है – राष्ट्रीय छुटी है अत: लगता है कल दारू ही थोक में खरीद ली होगी.

बगल पार्क से एक शराबी आता है – जो ठीक धर्मेन्द्र की तरह कमीज़ के ३ बटन उपर के खोल रखे है – उसके २ मित्र और मित्रों कि भाभी – यानी उस शराबी की पत्नी उसको घर ले जाने की असफल चेष्टा करते हुई – लाला को पांच का सिक्का देती है और लाला उसको स्वत: ही १ कुबेर और २ दिलबाग के पाउच पकड़ा देता है. बड़े प्यार से से वो पतिदेव के जेब में डालती है. धीरे-धीरे ये लोग नाट्य-मंच से दूर हो जाते है....... पर दिमाग में नेपथ्य से वो प्यार भरी आवाजें आती रहती है.

नाट्य-मंच पर अकस्मात ही एक नेपालन औरत आती है और लाला को हँसते हुए कहती है, परेशान होकर मैंने ‘उसे’ नेपाल भेज दिया है. सारा दिन मर खप के पेट भरने लायक तो कमा ही लुंगी – पर बेज्जती बरदास्त नहीं होती. मुझे मारे – तो  चोट मुझे ही लगती है – पर आसपास के लोगो से उसको पिटते देखती हूँ तो भी चोट मुझे ही लगती है......... वो बोल रही है .........

पर नेपथ्य........ एक ओरत कूट पिट भी रही है और अपने पतिदेव को गर्म हल्दी-तेल भी लगा रही और और उसका चेहरा अपने शरीर की चोटों से कम और पति के जख्मो से ज्यादा दर्द से तपा जा रहा है. आकाशवाणी पर गाँधी बाबा का भजन गया जा रहा है – वैष्णो जन तो उनको कहिये, जो पीर पराई जाने रे.........

फिर धर्मेन्द्र कि पत्नी भागती पार्क कि तरफ से जा रही है, बोलती जाती है – कल फेक्टरी से २००० एडवांस मिले थे – पता नहीं लड़ाई झगडे में कहाँ गेर आया या किसने खींच लिए.
नंगे-पैर वो पार्क में चली जाती है.

थोड़ी देर धर्मेन्द्र फिर से साले कुत्ते, कमीने, माँ, भेण करता हुवा लडखडाता – चल रहा है.
आकशवाणी में ‘जागते रहो’ का गाना बज रहा है  जिंदगी ख्वाब है, ख्वाब मे झूठ है क्या और भला सच है क्या...
भारी मन से उठकर में पार्क जाता हूँ और उस झील में अपनी तम्बाकू कि पुडिया फैंक देता हूँ................. आज २ अक्टूबर है. टहलते टहलते शमशान कि तरफ चला जाता हूँ वहाँ एक शव को लेकर कुछ लोग आये हैं – में मन ही मन प्रणाम करके शमशान कि चारदीवारी के बाहर आ जाता हूँ, वहाँ (शमशान के पीछे) फिर ४-५ शराबी उलझे मिलते हैं, साथ में दोलक और मजीरा भी है. शायद कोई भोजपुरी या फिर पूर्व का कोई खांटी गीत गा रहे हैं. गीत कि लय को पकड़ कर में वही बेंच पर बैठ जाता हूँ, पर गीत के बोल समझ में नहीं आ रहे.


क्या हो रहा हैं यहाँ – कड़क आवाज में मैं पूछता हूँ.
आज छुटी है बाबू, एन्जॉय कर रहे हैं.............
बुरा मत माना बाबू................. लो इ लियो, कह कर एक प्लास्टिक का मय से भरा गिलास मेरी तरफ बड़ा देते हैं.
पता नहीं किस मूड में में वो गिलास थाम लेता हूँ..........


ढोलकी और मजीरे तेज बजने लगते हैं –
ठगिनी! क्यों नैना झमकावै!
कद्दू काट मृदंग बनावे, नीबू काट मंजीरा,
पाँच तरोई मंगल गावें, नाचे बालम खीरा
रूपा पहिर के रूप दिखावे, सोना पहिर रिझावे,
गले डाल तुलसी की माला, तीन लोक भरमावे।।

ये लोग अपने दिल में मस्त गाते जाते है


     वहाँ शमशान में अग्नि तेज़ी से शव के साथ-साथ मेरे नव अंकुरित प्रण को भी प्रजवलित करती है......... पता नहीं मुझे क्या हो जाता है
    मैं नाचने लग जाता हूँ,  उछलता हूँ - कुदद्ता हूँ, फिर मटके-झटके भी लगता हूँ,
कुछ दलीप कुमार के भाव बनाता हूँ, कुछ राजकपूर का अभिनय करता हूँ और आखिर नशे से बदमस्त होकर वहीं गिर जाता हूँ जहाँ घीसू और माधो गिरे थे.
आज २ अक्टूबर है ............ बापू का जन्मदिन....................
राष्ट्रीय छुट्टी है........ और दारू के ठेके बंद है.


picture : with thanks from google

1 अक्टू॰ 2010

फिजा में तैर रहे थे कुछ हर्फ़ महफूज़ से


फिजा में तैर रहे थे कुछ हर्फ़ महफूज़ से
दिल्लगी से मैंने छुए और -
हाथ में आये तो दास्तां बन गए.
कहीं हीर रांझा लिख दिया
और कहीं
सोहनी ते महिवाल लिख दिया.

कहीं कब्रों से उठ बैठा बुल्लेशाह...
इक नई इबारत पढ़ने के लिए.
इक नई इबारत गड़ने के लिए.

वो रांझा आज भी मारा फिरता है .
अपनी हीर की तलाश में.
जो मशरूफ है अपनी जिंदगानी में
अपनी जवानी में..
तख़्त हजारे को याद कर के
वो आज भी रोता है

हीर अब  चेटिंग से
रोज इक नई दास्तां बनाती है.

30 सित॰ 2010

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।



भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।। 
लोचन अभिरामा तनु घनश्याम निज आयुध भुज चारी। 
भूषन बनमाला नयम बिसाला सोभासिंधु खरारी।। 

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता। 
माया गुन गयानतीत अमाना बेद पुरान भनंता।। 
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता। 
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता।। 

ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रों प्रति बेद कहै। 
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै।। 
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै। 
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै।। 

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा। 
कीजै सिसुलीला अति प्रियशीला यह सुख परम अनूपा।। 
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरि पद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।।


हृदय में सुंदर भाव भरकर मानव कल्याण की विशुद्ध हिंदू कामना लेकर
माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को सर माथे रख कर बोलिए
श्री रामचंद्र महराज की जय.
*****************
जब कोर्ट का फैसला आया तो मन हर्षो-उल्लास से भर गया और मन हुवे श्रीरामजन्म वाली चोपाई लिखी जाए.
बाकि दिन में २ बजे ये पोस्ट लिखी थी अजोध्या का फैसला - जय हो टर्कोलाजी

अजोध्या का फैसला - जय हो टर्कोलाजी

अरे भोलानाथ, बहुते दिन बाद नज़र आये.
का बताएं बाबा, ई टर्कोलाजी से फुर्सत मिले तो आपके पास आकर बैठे और बतलाये.
भोलानाथ, ‘टर्कोलाजी’ कहाँ से पकड़ लाये.
बाबा, हर घर-परिवार से लेकर पुरे देश में ही टर्कोलाजी चल रही है – कुछ चला रहे हैं – कुछ झेल रहे हैं.
भाई भोलानाथ – ई तो नई चीज़ बता दी तुमने, अभी तक तो हमो ई समझे बैठे थे की घर से लेकर पूरा देश – देसी जुगाड नामक यंत्र से चल रहा है. ई सुसरी ‘टर्कोलाजी’ कहाँ से आ गयी.
बाबा, देखो जमाना बदल गया है – लोग बदले साथ में नई नई टेक्नीक आये है. ई समझ लो टर्कोलाजी भी नई टेक्नोलोजी है.
उ का है न बाबा का दिमाग पुराने मॉडल का है – हो ई दम लगवा और तनिक विस्तार से बतावा.
देखो, घर में हमार मेहरारू नए साडी मागत रही – पिछले कातिक से, हमने समझाया – बैसाख में ले देंगे, फिर बताया – आशाद में फिर टालते-टालते बोले कि चलो इस दिवाली पर ले देंगे. बनिया बहुत तकाज़ा कर रहा था – पैसे के लिए. हम बोले इस धान कि कटाई पर दे देंगे फिर अरहर कि फसल का वयदा किया – टर्कोलाजी से सभे काम टकाटक चल रहे हैं.
पिच्छले तीन साल से अपनी अम्मा कि वृद्ध पेंशन के लिए चक्कर काट रहा हूँ – सरकार दफ्तर में और आशा बनी हुई है – इक्कठा पैसा आएगा. टर्कोलाजी यहाँ भी चल रही – उम्मीद कायम है.
पर saal बाड़ आयी थी,– मुख्यमंत्री राहत कोष से बाड़-पीड़ित में हमरा भी नाम था. उ पैसा के लिए बैंक में चक्कर काट रहा हूँ – सरकार का पैसा है जरूर मिलेगा पर वहाँ से मिली टर्कोलाजी कि बदोलत दिन कटते रहते हैं.
ई है तुम्हरी टर्कोलाजी ? अब बतावा देश कैसे चल रहा है टर्कोलाजी से.
अरे बाबा, देश चल नहीं रहा विकास कर रहा है. अब देखा ई खेल हो रहे है राजधानी में. उ ७ साल पहले हरी झंडी पा ली. पर ई टर्कोलाजी वहाँ भी चली. जब देखा समय पूरा हो गया. अब पैसा बनाने का पूरा चांस आ गया और टर्कोलाजी खत्म और काम चालू.
ई जो अजोध्या का फैसला है ई भी टर्कोलाजी पर चल रहा. हर सरकार टालना चाहती है और पिछले ६० साल में इत्ती सरकार आयी गयी – अपनी गाँधी जी का पार्टी, मजदूर वाले नेता का, खाकी निक्कर वाले का, तीसरी नस्ल वाली पार्टी का, .......... सभी ने टर्कोलाजी कि निति अपनाये रही.
हाँ, भोलानाथ पर ई मामला तो कोर्ट में है, अभी १-२ घंटे में फैसला आना है –
अरे बाबा, का फैसला आएगा, मामला कोर्ट में कैसे गया – का ई मामला कोर्ट का है? ई सभ टर्कोलाजी का ही एक हिस्सा है. अबे देख लेना कोर्ट भी यही टर्कोलाजी वाली निति अपनाएगी.
अच्छा, भोलानाथ – तुम तो बड़े ग्यानी हो कर दरशन बघार रहे हो.
हां, बाबा, आप देखते रहिये. एको बाबा बैठा था गद्दी पर –सुफेद दाडी वाला.
कौन, चंद्रशेखर –
हाँ, बाबा, उ सरकार इस मुद्दे पर बहुते कोसिस किये, पर हमरा गाँधी वाली पार्टी बिचारे की टांग खींच लिए – नहीं तो मामला निपटा देता. बस यहीं मार खा गए - सुफेद दाडी वाले. उनको ई टर्कोलाजी वाली निति नहीं आयी. मार खा गए.
बाबा तुमने तो कह दी मामला कोर्ट का है. चलो कोर्ट ने फैसला दे भी दिया तो का हो. काम तो दिल्ली वाले ही करेंगे. कोर्ट ने फैसला दिया था – अफजल गुरु को फांसी दो. टर्कोलाजी कि बदोलत आज तक फांसी नहीं हुई. कित्ते साल हो गए. उस सुसरा अगर जेल में न होता सायद मर गया होता – पर का है न कि उन्ह जेल में अच्छा खाना – अच्छा इलाज़ और का चाहिए एक उग्रवादी को? उके भाग जाग गए

ठीक बोले भोलानाथ जय हो टर्कोलाजी

26 सित॰ 2010

कामन भ्रष्ट खेल और मीडिया...... भाई आप खुदे समझ लें.

भाई आजकल ई मीडिया वाला काहे इत्ता चिल्ला रहे हैं

बाबा, ये जो ज्यादा चिल्ला रहे हैं न – इनको पैसा नहीं मिला

मेरे मित्र बोले.

इसके मायने

बाबा, मैं ये कहना चाहता हूँ कि हज़ारो करोड कि धांधली हुई है, इस कामनभरष्ट के खेल में, मीडिया वालों को अगर पैसा मिला होता तो – इतनी नेगटिव कोवेराज़ नहीं करते.

भाई, बात तो आपकी ठीक है, अगर हम कहें कि किसी और मुद्दे से ध्यान हटाने कि बात हो तो ?

और कौन सा मुद्दा है

क्या बात कर दी आपने, क्या नक्सलवाद के मुद्दे से ध्यान हटाना हो, और हमारे माननिये गृह मंत्री सक्रिय न हों ?

अगर महंगाई डायन से ध्यान हटाना है – तो हमारे माननिये खाद्य उपभोक्ता मंत्री सक्रिय न हों.

वो मान गए.

हाँ, बाबा, तुम्हारी बात में दम है, पर हम अब ही ध्रुव सत्य पर कायम हैं कि अगर मीडिया वालों को उनका हिस्सा मिला होता तो इतनी नेगटिव कवरेज नहीं करते.

अच्छा बताओ,

नहीं बाबा, पहले आप बोले रहो, फिर हम अपना तुरुप का पत्ता निकालेंगे.

राम मंदिर का फैसला आना था, ये तो आप भाई अच्छी तरीके से जानते हैं, वो अयोध्या का मुद्दा दब गया, फैसला नहीं आ पाया, अत: मीडिया को मजबूरी में फिर से कामन वेल्थ का मुद्दा उठाना पड़ा.

अरे बाबा, आप तो निरे बोडम हैं, अजोध्या का मुद्दा तो उ कोनों त्रिपाठी जी ने टायं टायं फिस कर दिया.

क्या बात कर रहे हो भाई, इ त्रिपाठी जी कहाँ से आ गए.

बाबा, जहाँ न पहुंचे कवि – वहाँ पहुंचे रवि.

यानि

यानी , त्रिपाठी जी हैं – पता नहीं कहाँ से राम लल्ला के भक्त बन कर पहुँच गए – उपर कि अदालत में और फैसला रुक गया,

बाबा, उ फिल्म तो देखे हो............

कौन सी

एक रुका हुवा फैसला

हाँ, भाई देखि है, एक व्यक्ति ने सभी मेम्बर को अपनी सोच के हिसाब से ढाल लिया था .... और फिल्म के अंत में उ फैसला उसी व्यक्ति के हिसाब से आया.

इही तो हम भी कहते हैं, बाबा, ई त्रिपाठी जी भी उ व्यक्ति हैं – पर ई खुद कुछ नहीं कर रहे – सुना है इनको भी उपर से आर्डर हैं.

भाई मान गए तुमको, पर उ जो है तुरुप का पत्ता तो बताओ.

बाबा बताएँगे, पाहिले कुछ और पूछ ल्यो.

नहीं भाई, तुम्हो अब बतायेदो, पाठक बहुते बोर हो रहे हैं, अब तुरुप का इक्का फैंक दो.

ठीक है बाबा, पहले ई न्यूज़ पढ़ लो

कॉमनवेल्थ मीडिया सेल के प्रमुख मनीष कुमार का इस्तीफा

· आईबीएन-7

Posted on Sep 25, 2010 at 23:26

नई दिल्ली। कॉमनवेल्थ गम्स को लेकर मचे हड़कंप के बीच शनिवार को CWG के मीडिया सेल के प्रमुख मनीष कुमार ने इस्तीफा दे दिया है। पिछले दो साल से CWG प्रेस ऑपरेशन प्रमुख के पद पर काम कर रहे मनीष कुमार का आज तबादला कर दिया गया था। अब मीडिया सेल का प्रमुख मंजू सिंह को बनाया गया है।

दरअसल इस तबादले के पर्दे के पीछे का खेल कुछ और है। जबसे सरकार ने आयोजन समिति की निगरानी शुरू की है तब से आयोजन समिति और सरकारी प्रतिनिधियों के बीच तनाव शुरू हो गया है।

सूत्रों के मुताबिक PIB के अधिकारी और मनीष कुमार के बीच लगातार दूरियां बढ़ती जा रही थी। पिछले कुछ दिनों से मनीष कुमार PIB के अधिकारियों के बीच लगातार बहसबाजी हो रही थी। जिसके चलते PIB ने मनीष के तबादले का फरमान सुना डाला। तबादले से नाराज़ मनीष ने पद से इस्तीफा दे दिया। मनीष का कहना है कि कॉमनवेल्थ को लेकर उन्होंने कोई गलती नहीं


पढ़ ली बाबा,

हाँ, भाई पढ़ ली, इसमें क्या, कई लोगों ने जाना है, कोई पहले – कोई बाद में, ई मनीष कुमार पहले सही.

नहीं बाबा, ई जो मनीष कुमार हैं न – मीडिया के इन-चार्ज हैं मीडिया को देखते हैं. बस बाकी आप समझदार हैं . खुदे ही सोचते रहिये.


मान गए इस भाई बात को. और बक भी दिया अपने लोगों के बीच. आप सोचते रहिये. का ई बात ठीक है.


पर बाबा चलते हैं, जय राम जी की.


24 सित॰ 2010

जमाना बदल गया है – प्यारे, तू भी बदल

जमाना बदल गया है – प्यारे, तू भी बदल.

सही में, जमाना कितना बदल गया है. आज बुद्धू-बक्से (टी वी को हम यही नाम दिया करते थे न) से होकर बाजार हम पर कितना हावी हो गया है – ये बात आज अपने 11 वर्षीय बेटे (और मोहल्ले में उसके मित्रगण) को देख कर लगती है. पापा आप पुराने हो?

गाँव के नाम पर – नाक सिकोड़ कर कहता है – नहीं पापा वहाँ नहीं जाना. क्यों ? पापा – वहाँ पोटी कि स्मेल आती है (भैंस के गोबर की) ये बालक वहाँ का दूध नहीं पीना चाहता. गन्दी भैंस से निकला है. घर में अगर गाँव से आयातित मक्खन आ जाये – तो इनको पसंद नहीं – इनको चाहिए अमूल बटर.

अब आप क्या कहेंगे.

पापा आप गाडी कब लोगो ?

बेटा, क्या जरूरत है, (मैं दोपहिया वाहन का इस्तेमाल करता हूँ)

नहीं पापा, कुआलिस लो?

बेटा – मारुती ८०० क्यों नहीं

नहीं पापा, that’s old one

Ok, मैं चुप हो जाता हूँ.

बेटा, इन छुट्टियों में हम मनाली घूमने जायेंगे ?

नहीं पापा – न्यूजीलैंड?

अरे .............. क्यों

नहीं पापा – न्यूजीलैंड? क्यों का जवाब उसके पास नहीं है – पर मैं ये मानता हूँ कि, उसके क्लास फैलो विश्व भ्रमण का चस्का लग गया है तो ये कैसे पीछे रहे.

बेटा, आज रोटी क्यों नहीं खाई ......... क्या पापा रोज-रोज रोटी. क्या मतलब. मुझे रोज रोज रोटी नहीं खानी. फिर क्या ? पिज्जा, ब्रेड-ऑमलेट और सैंडविच. रोटी तो ये इंडियन खाते हैं.

तो, तू इंडियन नहीं है ..............

.......... हुम्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म

अच्छा.

फलां – साबुन लाना, फलां पावडर लाना (दूध में डालने हेतु), फलां टूथ पेस्ट लाना. यानी ये पीड़ी हर जगह से ब्रांडिड है. या ये माना जाये – कि ये आज़ाद देश और आज़ाद ख्याल के गुलाम व्यक्तित्व बन चुके हैं. जैसे पहनने के, ओढने के, पीने के, खाने के – हर चीज़ के ब्रांड हैं. और उस ब्रांड के बिना ये जी नहीं सकते.

और ये लोग आज खामख्वाह ही बड़े-बड़े माल में घूमना चाहते हैं – और वहीँ से खरीदारी करना चाहते हैं. बनिया कि दूकान अब इनको ओल्ड फैशन लगती है.


हम जब ४-५ कक्षा में थे – हमारे आदर्श – भगत सिंह, आज़ाद, नेताजी बोस जैसी शक्सियत होती थी. पर आज इनकी – शाहरुख खान, जान अब्राहिम और जान सीना (शायद wwf) वाले हैं.

इस समय चाणक्य जैसे नीतिकार अगर होते तो उन्हें दुबारा सोचना पड़ता....... आज ८ साल के बालक को आप प्रताड़ित नहीं कर सकते. ये मेरा मानना है.

आज ये पीडी इन्टरनेट में मुझ से ज्यादा जानती है. उनको कई वेबसाइट पता हैं – जो स्कूल में बच्चे आपस में शेयर करते हैं. विंडो सेवेन आपने अपने कम्पुटर में डाली हो या नहीं – उनको चाहिय. और सबसे मजेदार बात ये है कि उनको विन्डोज़ सेवेन के कई नए फंक्शन मालूम है – जो आपको मालूम नहीं. और उनके पास किसी वेबसाइट का एड्रेस भी है जहाँ से ये डाउनलोड हो सकती है.

जैसे कर्ण को कुंडल और कवच जन्म से मिले थे – उसी प्रकार मोबाइल फोन इनको मिला है. कौन सा नया मॉडल, किस कंपनी का, कौन-कौन से नए आप्शन इसमें है. ये आपको किसी प्रशिक्षित सेल्समैन कि तरह समझा देंगे................... और बता भी देंगे – पापा अमुक ही लेना.

याद आता है जब स्कूल में फीस के नाम पर 40 पैसे चंदा दिया जाता था (हाँ तब हम फीस को चंदा ही कहते थे) और १० तारिख निकल जाने के बाद भी जब नहीं दे पाते थे – तो मा’साब वापिस घर भेज देते थे – जाओ चंदा लेकर आओ. इसी वज़ह से जब क्लास में खड़ा करते थे – ऐसा लगता था – मानो जमीन फट जाए – और हम बीच में समां जाए. बहुत ही शर्म आती थी. आज बच्चे से पूछो – बेटा इस बार आपका स्कूल फीस का चेक जमा नहीं करवा पाए – मेम ने कुछ कहा तो नहीं ? तो वो हँसता है ?

बताओ भाई ?

कुछ नहीं ?

कुछ तो बोला होगा

कुछ नहीं ? मुहं कि एक विशेष सी आकृति बना कर वो कहता हैं.

वो मैम बला बला बला बला बला बला बला बला बला कर रही थी.........

अब बताइये ............... कैसे निभाएंगे आप इस पीड़ी के साथ?

हैं न यक्ष प्रशन .


बहरहाल, जय राम जी की.

और मेरा मानना ये है कि ये सब बाजारवाद का ही परिणाम है.

22 सित॰ 2010

आज के दो बैल - सन्दर्भ मुंशी प्रेमचंद.

जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुद्धिमान समझा जाता है। हम जब किसी आदमी को पहले दर्जे का बेवकूफ कहना चाहते हैं, तो उसे गधा कहते हैं। गधा सचमुच बेवकूफ है या उसके सीधेपन, उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। गायें सींग मारती हैं, ब्याही हुई गाय तो अनायास ही सिंहनी का रूप धारण कर लेती है। कुत्ता भी बहुत गरीब जानवर है, लेकिन कभी-कभी उसे भी क्रोध आ ही जाता है, किन्तु गधे को कभी क्रोध करते नहीं सुना, न देखा। जितना चाहो गरीब को मारो, चाहे जैसी खराब, सड़ी हुई घास सामने डाल दो, उसके चेहरे पर कभी असंतोष की छाया भी नहीं दिखाई देगी। वैशाख में चाहे एकाध बार कुलेल कर लेता है, पर हमने तो उसे कभी खुश होते नहीं देखा। उसके चेहरे पर स्थाई विषाद स्थायी रूप से छाया रहता है। सुख-दुःख, हानि-लाभ किसी भी दशा में उसे बदलते नहीं देखा। ऋषियों-मुनियों के जितने गुण हैं, वे सभी उसमें पराकाष्ठा को पहुँच गए हैं, पर आदमी उसे बेवकूफ कहता है। सद्गुणों का इतना अनादर!


कदाचित सीधापन संसार के लिए उपयुक्त नहीं है। देखिए , भारतवासियों की अफ्रीका में क्या दुर्दशा हो रही है ? क्यों अमरीका में उन्हें घुसने नहीं दिया जाता? बेचारे शराब नहीं पीते, चार पैसे कुसमय के लिए बचाकर रखते हैं, जी तोड़कर काम करते हैं, किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करते, चार बातें सुनकर गम खा जाते हैं फिर भी बदनाम हैं। कहा जाता है, वे जीवन के आदर्श को नीचा करते हैं। अगर वे ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते तो शायद सभ्य कहलाने लगते। जापान की मिसाल सामने है। एक ही विजय ने उसे संसार की सभ्य जातियों में गण्य बना दिया। लेकिन गधे का एक छोटा भाई और भी है, जो उससे कम ही गधा है। और वह है बैल

प्रस्तावना पढ़ ली आपने – प्रेमचंद द्वारा लिखित कहानी – दो बैलकी.

पता नहीं क्यों जब में अपनी तुलना करने लगता हूँ तो मुझे ले दे के बैल ही नज़र आते हैं. और हाँ – एक दोस्त के शब्दों में रहंट के बैल. जिनको पानी निकालने के लिए जोता जाता था. उनकी आँखों में पट्टी नुमा कोई चीज़ बंधी जाती थी ताकि – वो दायें बाएं न देख सकें. ये भी न देख सकें कि मालिक है या नहीं – बस चलते जाएँ. गोल गोल –

फैक्ट्री से घर – घर से फैक्ट्री.

बिलकुल बैल कि तरह. दुनिया भर का बोझ उठाये. वजन ज्यादा या कम – ये हमारी किस्मत पर निर्भर करता है – कब गाडीवान को रुई लादने का भाड़ा मिला है या लोहा. अपना कुछ नहीं. अगर अपने कहने को है तो – मात्र किस्मत. जो अपनी होती तो बैल कि योनी में जन्म न लिया होता – अगर बैल कि योनी में जन्म लिया ही था – तो कोई धर्मात्मा छुडवा देता सांड कि शक्ल में – धर्म के नाम पर. पर नहीं खालिस बैल- बोझा उठाने को.

हाँ बैल चार पहिया वाले होते इन – और हम है दुपहिया.

अब वर्तमान पर आते हैं. दिल्ली में नारायणा रेड लाइट का एक दृश्य:

भारी लोहे के गार्डरों से बैल गाड़ी लदी हुई है. गाडीवान तीसरी कसम का राजकपूर नहीं है और ना ही प्रेमचंद का होरी या झूरी है. वो खालिस गाडीवान है जो उत्तर प्रदेश के किसी जिले का है और अभी २० वर्ष से दिल्ली वाला हो गया है, वो दारू के नशे में धुत है. लोहे के गार्डर जहाँ खत्म होते हैं वहाँ एक लालटेन – लाल चमकीले पनी में लपेट कर लटका रखी है. बेक लाइट का काम करने के लिए.

आजकल बैल भी समझदार हो गए हैं. रेड लाइट पर रुक गया है. बैलगाडी के पीछे कोई अमीरजादा अपनी लंबी होंडा सिटी गाड़ी में विलायती महेंगी शराब के नशे में मद हो कर होर्न पर होर्न दिया जा रहा है. और बैलगाडी के बगल में मैं अपने लड्डा (सेलेक्ट स्कूटर) पर बैठा सब देख रहा हूँ. बैल जानवर जरूर है पर है समझदार – पता है रेड लाइट है आगे नहीं बढ़ रहा. अमीरजादा बेखोफ सा गाडीवान को गाली देता है और गाडीवान की देसी शराब उतर जाती है – वो बैल पर दो चार डंडे से बरसाता है.

पर बैल को पता नहीं क्या डर है? आगे नहीं बढ़ रहा. गाडीवान के बैल की पुरुष ग्रंथि पर वो डंडा तेज तेज घुमाने पर बैल सरपट चल पड़ता है. पीछे से अमीरजादा भी निकल जाता है – ओवर टेक करके. मैं अपनी जगह मनमोस कर रह जाता हूँ. क्योंकि कुछ दर्द है – जो बैल की पुरुष ग्रंथि से होकर मेरे हृदय को कचोट रहा है.

दिन याद आया २००६ का दशहरा. झांकी सजाने के लिए १० बैलगाडी बुलाई थी. एक का गाडीवान दारू पी कर पता नहीं कहाँ चला गया था. और पूरी शोभा यात्रा में वो बैल गाडी मुझे हांकनी पड़ी थी.

जय राम जी की


चित्र : गूगल के साभार.