3.7.12

Life is incomplete without Plastic. प्लास्टिक बिना जीवन सूना


१३-१४ साल पुरानी बात कर रहा हूँ, प्रगति मैदान में एक प्रदर्शनी लगी थी, प्लास्टिक उद्योग के उपर .... और उस का नारा था, Life is incomplete without Plastic.  तब ज्यादा समझ नहीं आया. पर आज राशन की दुकान पर शेम्पू के, रसोई मसोलों के, टाफी, चाकलेट, नमकीन, बिस्कट, कुरकुरे, पानी, देसी शीतल पेय आदि के पाउच देख कर लगता है कि वास्तव में सही बात है. : Life is incomplete without plastic.
पहले छोटू (१०-१२ साल का लड़का) चाय लेकर केतली में या फिर छीके’ (5-6 या ८ चाय के छोटे गिलास रखने का खांचा) में लाता था. बाद में वो खाली गिलास व केतली या छीके में रख कर वापिस ले जाता था. बाल मजदूरी पर रोक से ये 'छोटू' लोग चाय दूकान से गोल हो गए. अब पार्कों में बैठ कर नशा कर रहे हैं या छोटी मोटी चोरी चकारी. पढ़ने से तो रहे, सरकार जितना भी जतन करे. 
प्लास्टिक की पन्नी में चाय ओर प्लास्टिक के कप, किसी भी व्यावसायिक क्षेत्र में चाय वाला रोज की १२५ से २०० चाय के कप डिस्पोज करता है.
चाय वालों के पास इतना सामर्थ्य नहीं था कि किसी बालिग़ को अपनी दुकान पर नौकर रखे, एक तो उसकी तनख्वाह ज्यादा होती है दुसरे छोटू की तरह फुर्ती से काम भी नहीं कर पाते. अब चाय वालों ने ऑफिस/फेक्टरी में फ्री डिलिवेरी बंद कर दी, गर आपको चाय चाहिए तो आप दूकान से ले कर जाईये. यहाँ भी लोचा था अपनी जरूरत को तो ऑफिस बॉय चाय ले जाता पर केतली या वो खांचा उस दूकान पर वापिस करने नहीं आता.
इसका रास्ता ये निकला कि चाय अब प्लास्टिक की पन्नी में आने लगी और शीशे की ग्लास की जगह प्लास्टिक के कपों ने ले ली. आप किसी भी व्यावसायिक स्थल पर चले जाए, आपको ऐसे प्लास्टिक के कपों के ढेर मिल जायेंगे.
२-३ बरस पहले दिल्ली सरकार ने दिल्ली में प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया था, कि कोई ठेले वाला या फिर दुकानदार ग्राहक को पन्नी में सामान नहीं देगा, और तो और तम्बाकू खैनी और गुटखा तक इसकी जर्द में आ गए और उन पर दबाव रहा कि वो अपनी पैकिंग में बदलाव करें, जो भी कम्पनीयों ने बदलाव जारी रखे. लाला लोगों ने पांच का कुबेर छे में बेचा, ब्लेक मार्केटिंग हुई.
अंकल चिप्स, कुरकुरे या फिर हल्दी राम जैसे नमकीन पांच रूपये वाले नमकीन या उपर उल्लेखित प्रोडक्ट पर कोई बैन नहीं. आज भी किसी भी पार्क में अगर सबसे ज्यादा कचरा होता है तो प्लास्टिक के गिलास के बाद इन्ही सब की पैकिंग का होता है.  और तो और दिल्ली जैसे महानगर में पानी के छोटे छोटे पैक भी १ रुपये में मिल जाते हैं, पहले किसी चाय की दूकान पर चाय से पानी की इच्छा होती थी तो वहाँ रखे मटके से प्यास बुझा ली जाती थी, फ्री में. पर अब ऐसा नहीं है, पांच रुपये की चाय से पहले आपको १ रुपये के पानी का पाउच लेना पड़ेगा, यदि प्यास लगी है तो.
तिहाड गाँव झील के किनारे पर धार्मिक लोगों द्वारा छोड़ा गया कचरा,
जिसमे प्लास्टिक की थैलियाँ ही अधिक मात्रा में हैं.
वाकई, प्लास्टिक के बिना जीवन अधूरा है, पर इसी प्लास्टिक ने जीवन गरक कर रखा है. खासकर नाले/सीवर जाम में. सुबह पार्क में देखता हूँ, तो कई लोग ब्रेड, बिस्कट, और नमकीन पोलिथिन में भर कर लाते हैं, धर्मार्थ हेतु ये सब पक्षियों के खिलाने लाते हैं, पर इन सब के रेपर वहीँ छोड़ देते है जो हवा से तालाब में आ जाते हैं. और पानी को गंधियाते रहते हैं - वो ये नहीं सोचते कि पर्यावरण को गन्दा कर कितना अधार्मिक कार्य कर रहे हैं.
ऐसे हालात देख कर लगता है, हमें कम से कम प्लास्टिक के बिना तो जीना सीखना ही होगा. और Life is incomplete without plastic के नारे को नकारना होगा.

जय राम जी की.