26.1.12

गणतंत्र दिवस की तहे दिल से मुबारकबाद.

राजपथ जाने को आतुर पर इंडिया गेट तक पहुंचे उन सभी: 

ग्राहक का इन्तेज़ार में खड़े कोटोन केंडी सेलर को; पिसी दाल से बनाए करारे लड्डू - कुतरी मूली और हरी मिर्च की चटनी के साथ परोसने को आतुर – लड्डूवाले को; दाल मौठ बना, ग्राहक से पैसे की जुस्तजू करते भैये को; उसी संग बच्चों को बहलाते हुए मम्मीपापा को;  दिन का फयादा उठा कुछ कमाने की होड में प्रिंट रेट से ५ रुपे ज्यादा बेच– मुंह छुपाता उ चिप्स (लेस)-पेप्सी वाले भैये को; सर्दी में भी गर्मी का अहसास करवाता वाडीलाल का नाम लगाए उ आइसक्रीम वाले को ; घर में हुई बर्तनों की खिटपिट से मायूस – बकिया हिसाब घर देखने की होड – बच्चे को संभालती – उ नांगलोई जे जे कालोनी में रहने वाली ननद-भौजाई को; सरकारी छुट्टी का सपरिवार आनंद लेते; १० रुपे में मिले ३ की जगह ४ पापड खरीद बँटवार करते उ हिम्मती पुरुष को; हजारों की तादाद में आये बाल बच्चों और परिवार जो मात्र एक नज़र परेड देखने के लिए आये – उ सब भाई लोगो को; ताईवान से ३ मित्रों संग आयी सुओ जू चैन (tsuo szu chein – पर्पल मफलर गले में डाले) आध-पुन घंटे के लिए बनी ध्रुव की फ्रेंड्स को; ब्रेड पकोडा भाई के साथ खाने की जिद्द करती उ छोटकी गुडिया को; दूर खंडहरों से - शताब्दियों पुराने पांडव कालीन किले से - (जिसे महाराजा हुमायूं और महाराजा शेर शाह सूरी ने तोड मारोड कर मुग़लअंदाज़ में बनवा दिया था) आवाज सुनाई दी : - 
सभी को गणतंत्र दिवस तहे दिल से मुबारकबाद हो.


25.1.12

दबंग गुणा विधायक गुणा व्यापारी गुणा नौकरशाह = गुणातंत्र


हमारे घर के पास ५९ हेकटर में फैला हुआ ये पार्क है जिसमे पुराना एक जोहड है जिसे अब झील की संज्ञा दी गई है, माने तिहाड़ झील. मैं ये दावा बिलकुल नहीं करता कि मैं सुबह इस पार्क में सैर करने जाता हूँ, जब मैं जाता हूँ, उसे विद्वजन सुबह का नाम नहीं दे सकते. पर मेरे जाने के वक्त भी कोहरा था.... माने जयपुर में छाया हुआ रुश्दी प्रसंग... जयपुर में बाकि क्या हुआ ... उ न मैं जानता हूँ न ही कोई मेरे जैसा 'गण' जानता होगा. इस वायदा है.

गणतंत्र है या फिर 'गनतंत्र' ... मैं कह नहीं सकता ... मैं चाहता हूँ आप खुद ही महसूस कीजिए.  मेरी तरफ से एक आइडिया है जरूर - आज न तो ये गणतंत्र न गनतंत्र  - ये  गुणातंत्र है... के  गुणा - जितना आप के पास है उतने ही  गुणा. गर पैसा तो पैसा से  गुणा कर सकते है और गर बहुबल या शोरत है तो उससे भी... चलेगा. जमीन और वोट का हिसाब किताब पंडित लोग बता सकते हैं, विधायकी का मोल भी उन्हें ही मालूम.

17.1.12

जिंदगी सिसकती चलती है - जिंदगी के शोरो शराबे के बीच.

जिंदगी सिसकती चलती है - जिंदगी के शोरो शराबे के बीच.कसम से,

बड़ी ही बेकार बोझिल सी है ये जिंदगी... कसम से; नोटों की गड्डी माफिक  जितना भी गिनो ९९ या फिर १०१ ही निकलते हैं, कभी १०० क्यों नहीं... उन्हें १०० बनाने के लिए कई बार गिनना पढता है. थूक लगा लगा कर.. थूक न हुई, माना ग्रेस में दिए गए नम्बर हों, जिनके बिना श्याद ही इंटर हो पाती.
एकटक लगा कर देखते रहना - एक ही फिल्म को कितनी ही बार, टीवी पर;  और एक खास सीन पर पूछना ... यार ये हेरोइन कौन है... कसम से - कुछ अलग सा है... बता सकती हो क्या...
और वो भी झुनझुन्ना कर जवाब  देती, जैसे तुम्हे कुछ मालूम नहीं, कुछ भी नहीं, ये मुआ चेनल पिछले ३ महीने में कम से कम ८ बार ये फिल्म दिखा चूका है, और इसी सीन पर तुम प्रश्न दाग देते हो - इस हीरोइन का नाम क्या है... गज़ब की एक्टिंग है.... तंग आ गयी मैं तो,

30.12.11

राजधानी में सर्दी का प्रकोप - नपुंसक जनता एक बार फिर गिलाफ में गुस गयी

कारवाँ गुजर गया – गुबार देखते रहे .. वो निकल गयी बस से और हम बस देखते रहे. रोड पर साये उस कुहासे को दिमाग में औड लिया, माने, औड ली चुनरिया तेरे नाम की. रोड पर छाई पीलिया लिए वो प्रकाश स्तंभ भी मात्र देखते रहे ... गवाह बने रहे जो वक्त आने पर गवाही नहीं देंगे (पता नहीं क्यों – उनका पुख्ता वायदा लग रहा है), कि वो तेरे लिए खड़ा था जालिम – तेरे लिए, मैं ये जानता हूँ – तेरे बस में जाने के बाद वो बोझिल क़दमों से चल दिया था. न दामन ही पकड़ा, न उसने पुकारा, मैं आहिस्ता आहिस्ता सा चलता ही आया – बस तेज रफ़्तार से निकल गयी – और मैं – और मैं उससे जुदा हो गया – मैं जुदा हो गया. बेवफा कुछ तो ध्यान दिया होता. नहीं. ये दिल्ली है. सुना है चच्चा ग़ालिब की भी दिल्ली थी और पर हसीनाएं तब भी बेवफा थी और आज भी हैं... बड़े बेआबरू होकर तेरी कुचे से हम निकले ग़ालिब. चच्चा ने जब ये शयर इन बेमुर्रव्त बगेरत के लिए लिखा होगा तब भी शर्म नहीं आयी थी और आज क्या आएगी – जब शोर्ट्स पहन कर देर रात महानगरीय सडकों पर चहलकदमी करती हैं.

दिल वालों की है दिल्ली.. जी साहेब, अब मान गए... तभी तो यहाँ आकर बना हीरो मुंबई में जाके जीरो हो जाता है और देश के बाकी हिस्सों के जीरो (जो चुनाव नहीं जीत पाते) यहाँ दिल्ली में (उच्च सदन) में हीरो हो जाते हैं - कि दुनिया तमाशा देखती है रात के बारह बजे तक ... मुआ राज्य सभा न हुआ फिरोजशाह कोटला का मैदान हो और पाक-हिंद का क्रिकेट का मैच हो.


28.12.11

सांप

शनिवारी रात भयंकर तरीके से गुजरी ... नहीं वैसे नहीं. सांपला ब्लोग्गर मीट से वापसी में आशुतोष की गाडी खराब हो गयी ... और मंथर गति से चलने लगी.. कई जगह ऊँचाई पर जाने के लिए धक्का भी लगाना पड़ा.. जैसे तैसे कीर्ति नगर मेट्रो स्टेशन तक उसे पार्क किया. उसके बाद दिल्ली के औटोरिक्शा वालों से सर खपाई अलग... घर पहुँचते पहुँचते रात के १२ बज़ गए.. जाहिर है अगले अगले दिन चेहरे पर १२ बजने ही थे... सो मूड ठीक करने की गरज से आवारागर्दी करने झील पार्क की तरफ निकल गया. सांपला से आते समय जो जो घटित हुआ उस पर पोस्ट पता नहीं कौन लिखेगा – संजय या आशुतोष, या फिर बाकी कई यादगारी घटनाओं की तरह ये भी बताने को रह जायेगी.

झील - जो सूख चुकी है, उसी सूखी झील के किनारे धूप में बैठ कर बातें करना बहुत अच्छा लगता है. गुनगुनी सी धूप में बैठकर बतिया करना या गप्पे मारना या खुद को टटोलना - कभी कभार ही ये मौका मिलता है – जैसे चुराए पल. पर इन पलों में भी शांति भंग की उस चूहे मार सांप ने. शायद मेरी ही तरह धूप में विचरण करने निकला हो और ठीक मेरे पैरों के आगे से निकल गया. महाशय सफाई से मेरे सामने से निकल गये - बिना मेरा हालचाल पूछे. स्तब्ध रह गया मैं, कई दिन से सांप ला सांपला हो रहा था, और हम तो लाये नहीं, महाराज खुद मेरे सामने उपस्थित थे. :) ... ध्रुव बेटा सांप देखना है तो झील के पास आ जाओ - मैंने ध्रुव को फोन कर बताया और आते ही वह तुरंत फोटू खिचने लगा ... पहले क्लिक के साथ उसमे वाइल्ड डिस्कवरी फोटोग्राफर का दंभ नज़र आने लगा. आजकल की जेनरेशन के साथ चूहा, हल्दी की गाँठ और पंसारी वाली बात क्यों है. कुछ और बालक भी आ गए... पत्थर मारने का उपकर्म करने लगे अशांति सी हो गयी उस सूखी झील में. (पता नहीं क्यों वो बच्चे सब हमारे महान राजनीतिज्ञ और सांप अन्ना हजारे लगने लगा - जैसे अन्ना घर से बाहर निकलते हैं और उनमे अशांति सी हो जाती है) बेचारा सांप... हैरान परेशान दायें बायें भागने लगा... मैं थोडा परेशान हुआ, सांप की बाबत; बच्चो को पत्थर मारने से मना किया और उन्हें बताया की सभी सांप जहरीले नहीं होते... ये बेचारे तो चूहों को खा कर जीवन यापन करते हैं. उन्हीं चूहों को जो हमारे घर और रसोई में कोहराम मचाये रखते हैं.

25.12.11

राजू का जवाबी पत्र

राजू, 
कैम्प कार्यालय : खुंदकपुर
दिनाक : २५ दिसंबर २०११ 

अंधकपुर

दिखिए कैसी विडंबना है कि आपको अपने कुल का नाम अभी तक याद है... जबकि अभी तक कई लोग कुलनाम याद रखते हुए भी अपने कुल को भूले बैठे हैं... और इसके लिए वो उक्त जानकारी गूगल बाबा के साभार प्राप्त कर रहे हैं, और मज़े की बात तो यह है कि तमाम तरह की दिमागी हार्ड डिस्क, पेन ड्राइव के स्पेसे फुल होने के बाद भी उसी में भरने का विफल प्रयास कर रहे हैं जैसे रुकमनी की  ख़ुशी कि भांति. पर अमृत तो चलनी में न रुका है और न रुकेगा...
आपका पत्र प्राप्त हुए कई दिन बीत गए -  सोचते विचारते, कई विचार मन के सागर में, जो अपने लिए शब्द तलाशने उतरे थे, वापिस न पाए और इस खुंदकपुर में कैम्प लगने के कारन खुद पर और खुंदक बढ़ चली गयी.... जो कल सांपला में जाकर भी नहीं उतरी... 
आचार्य, खुद को टुकड़ों में बाँट कर देखना और फिर से टुकड़ों को एकत्र कर अपना एक नया रूप बनाने की कला में आप विशेष रूप से दक्ष हैं ... और ये हुनर मैं भी सीखता रहता हूँ, पर जब अपने ही हिस्से का एक टुकड़ा कोई लेकर उड़ जाए तो बहुत विडंबना होती है... कैसे अपने को पूर्णता एकीकृत करें,.... खासकर तब जब जमीर ही खंड-खंड विभक्त हो. 

27.11.11

सब व्यर्थ है न प्राची..

मेरे लहू ने पुकारना बंद कर दिया था..
क्योंकि तुम्हारा जमीर भी तो सुन्न हो गया था..
और मेरा खून - पानी .
जैसे खून का दौरा बंद हो जाना... धमनियों में..
या फिर राजमार्गों पर एक के बाद एक
गाड़ियों का थम जाना..
और जाम की स्थिति का बन जाना..
इस जमीर पर विचारों के जाम होने
और मेरे खून के के पानी बनने में..
बहुत कुछ है प्राची...
क्या क्या बताऊँ तुम्हें.
क्या क्या समझाऊं तुम्हे..

25.11.11

बनिया, बेटी की शादी और एफ डी आई....Retail FDI... Social responsibility

क्या करें, कुछ खबरें आपको बैचेन करती हैं.
जी, याद आता है जुलाई का महीना और सन १९९३ ... बहन की शादी थी... उस समय के हालात से (हालांकि ऐसे मामलों में हालात लगभग यही रहते हैं..)  और पैसे की तंगी .. बोले तो हाथ टाईट.
सुरेन्द्र जी हैं, तिहाड गाँव में ... किराने की दूकान करते हैं... और दूकान प्रसिद्ध है ढालू की दूकान के नाम से. पुराने बनिया हैं - हलवाई के सामान की लिस्ट लेकर चिंतित होकर उनके पास माताजी और मामा जी (जिनकी खुद गाँव में किराने का थोक का व्यवसाय है) ले कर गए. उन्होंने तुरंत लिस्ट का वाजिब पैसा जोड़ कर बता दिया और सहर्ष तैयार हो गए पैसा किस्तों में लेने के लिए... बिना किसी ब्याज बट्टे के.
एक बनिया या कहिये व्यापारी का सामाजिक उतरदायित्व था... बिना किसी 'कंपनी ला' के .... और आज भी है.. क्योंकि वो खुद उसी समाज का हिस्सा है... उसी का अंग है.
मेरे ख्याल से ये गांधी जी अर्थशास्त्र है या फिर दीनदयाल उपाध्याय जी का एकात्म मानववाद  का ... उसके हर दुःख सुख में इंसान ही इंसान के साथ खड़ा रह सके .... 
साहेब कंपनी ला नहीं था... बिना किसी कंपनी ला के समर्थ व्यक्ति (समाजिक इकाई) आपनी आपनी सामाजिक जवाबदेही तय कर लेता था.  आज आप कानून बना रहे हैं. बनाइये. बजाये उस बनिए को कोई सहुलि़त देने के आप उसे उलझा दीजिए विदेशी साहूकारों के हाथ ..कि वो सामाजिकता भूल कर दिन रात बस दूकानदारी ही सोचता रहे. जनता पिसती रहेगी साहेब.

15.11.11

सावधान .. कुत्ते काले कपडे देख कर भड़क जाते हैं..

कलयुग है जी,
मैं तो कहता हूँ – घोर कलयुग...
"रंडियों ने रंडियों को और भिखारियों ने भिखारियों को लताड़ना शुरू कर दिया, नाइ कहाँ नाइ की हजामत मुफ्त में करेगा... पैसे दो मिंया....."
एक मोडर्न सैल्यून में ये बात सुनी थी, .... मैं तो कहता हूँ जी ... घोर कलयुग है...

फोटू आभार : hindustaantimes.com
ब्लॉग जगत में आने के बाद एक शब्द सुना था – कटहई कुतिया .... पर वास्ता नहीं पड़ा, पर टीवी पर देखा तो मालूम हुआ कुछ कंफुज़न हुई होगी ... कुतिया नहीं... कुत्ते होंगे - कटहए कुत्ते.. जो काले कपडे को देख कर भड़क जाते हैं,.... वैसे लाल कपड़ों को देख कर सांड भडकता है.... साक्षात तो नहीं देखा, पर कई फिल्मो में देखा है... और काले कपडे को देख कर कुत्तों का भडकना भी टीवी पर देखा...