14.12.12

१२-१२-१२ का जादू : ट्रेन में शादी.


कहते हैं जादू वो जो सर चढ कर बोले, जैसे बंगाल के काले जादू के बारे में कहा जाता था. पर १२-१२-१२ के जादू ने तो बंगाल क्या अफ्रीका तक के जादू को फेल कर दिया.
      अभी तक ये सुनने में आया था कि कुछ भावी अभिवावकों ने अपने बच्चे के जन्म के लिए ये समय निधारित किया है. कि १२-१२-१२ को आपरेशन द्वारा प्रसव किया जाएगा. कुछ प्रेमी युगल ने शादी हेतु पंडित से चिचोरी कर के इस दिन के लिए लग्न तय करवाया है.  हालांकि ज्योतिष के अनुसार १२-१२-१२ का दिन का कोई विशेष नहीं मात्र संजोग है.

पर एक खबर : 
दिल्ली से चली ट्रेन, हुआ प्यार, अलीगढ़ में शादी
खास तारीख 12-12-12 से एक दिन पहले मंगलवार को पूर्वा एक्सप्रेस में यात्रा कर रहे 2 मुसाफिरों के लिए यह यादगार सफर बन गया। दिल्ली से चली ट्रेन में सफर के दौरान इन 2 मुसाफिरों को प्यार हुआ और ट्रेन के अलीगढ़ पहुंचते-पहुंचते दोनों ने शादी कर ली। ट्रेन में सफर कर रही किसी महिला से सिंदूर मांगकर युवक ने युवती की मांग भरी। ट्रेन में ही चल रहे एक यात्री ने इस शादी में पंडित की भूमिका निभाई। सहयात्रियों ने नव विवाहित जोड़े को आशीर्वाद दिया।

12.12.12

दादी माँ की दो कहानियाँ

एक लघु कथा है, जो गुज़रे जमाने में हर दादी माँ किशोर पोते को सुनाती थी.. मकसद एक होता था, कि बच्चा संस्कारित बने. शादी के बाद भी माँ बाप को भूले नहीं जिन्होंने बड़े जतन से उसे पाल पोस कर बड़ा किया.

वो ज़माना ही ऐसा था जब दस्तूर को मानना पड़ता था, हर समर्थवान की एक रखैल होती थी. और जो लोग रखैल नहीं रख सकते थे वो वैश्या का सहारा लेते. बाबु साहेब भी ऐसे थे... इज्ज़तदार मगर पैसे से कमज़ोर, एक वैश्या से दिल लगा बैठे.... अब तक कोई दिक्कत नहीं थी. जैसा की पेशा ही था, कि वैश्या से कई लोग दिल लगाते थे, पर इस मामले में एक पेच था... वो वैश्या इस बाबु साहेब से दिल लगा बैठी थी.
बाबु साहेब तो वैश्या के संपर्क में बस अपना दिल बहलाने को जाते, पर वैश्या के मन में कई अरमान - कई सपने जी उठे थे - अपना बच्चे, अपना मकान, गिरहस्थी... आयदा-इलाय्दा.

8.10.12

2 अक्टूबर - गाँधी जयंती और विज्ञापन - पार्ट १


    २ अक्टूबर - गांधी जी का जन्मदिन मेरे को विशेष रूप से स्मरणीय रहता है... दुनिया कहती है बापू राष्ट्रपिता हैं, होंगे – पर मेरे को एक दिक्कत है इस दिन दारु के ठेके बंद रहते हैं. और १ अक्टूबर को ठेकों पर भारी भीड़ रहती है. दूसरे अगर बापू राष्ट्रपिता हैं तो अपन भी धरतीपुत्र. कहीं न कहीं राष्ट्र और धरती – पिता और पुत्र के रिश्तों की पड़ताल के लिए पूरा दिन मिलता है. क्योंकि उस दिन सरकारी ‘घोषित’ छुट्टी होती है. जब झंग का नवाब छुट्टी पर हो तो घोषित छुट्टी की पूर्व संध्या बहुत ही कष्टदायक हो जाती है ... हालाँकि मैंने उसे तक्सीद कर रखा है कि किसी भी घोषित छुट्टी से एक दिन पहले गैरहाजरी नहीं होनी चाहिए. पर क्या किया जाए नवाबी चली भी गयी तो क्या - हैं तो नवाब. और झंग के नवाब १ अक्टूबर को छुट्टी पर थे.

6.10.12

फिर से वही झील और वही छठ पूजन

एक बार फिर से घोषित करना चाहता हूँ कि मैं तिहाड़ गाँव झील वाले पार्क में रोज सुबह जाता हूँ, और सूर्य देव के विपरीत मेरी सुबह का कोई समय नहीं है. जब जागो तभी सवेरा... आज ८.४० पर गया... और पार्क के गेट पर ही ठिटक गया ...
तिहाड़ झील के घाट पर भई नेतन की भीड़.
अधिकारी सब मनन करें कि दे नेता बहुते पीड़
   लाल बत्ती वाली गाडी और माननीय नेता, युवा नेता, छोटे नेता, बड़े नेता, अफसर नेता, मजदूर नेता, पूंजीवादी नेता और समाजवादी नेता जैसे लोगों की भीड़ थी. छठ पूजा की तैयारी को लेकर पशिचमी दिल्ली से सांसद श्री महाबल मिश्र जी का दौरा था.

गत वर्ष - छठ पूजा के लिए अपनी मेहनत से बना घाट.



गत वर्ष : छठ पूजन के लिए तैयारी करता श्रद्धालु
   49 एकड़ में फैले हुआ यह पार्क, जिसमे पुराना जोहड भी है, डीडीए के अंतर्गत है. पिछले कई दिनों से इस जोहड (जिसे झील का नाम दे दिया गया है J) में उगी घास को हटाया जा रहा था. वैसे ही मैं समझ गया था कि छठ पूजा नज़दीक है अत: उसी के तैयारी हेतु इस घास को हटाया जा रहा है. वैसे हमारे देश की की अफसरशाही संसार में सबसे विचित्र है. ये जोहड सुखा पड़ा था तो इसमें कोई घास फूस नहीं थी, जैसे जैसे बारिश आयी इसमें पानी भरने लगा और कुछ पानी आसपास लगे ट्यूववेल से भरा जाने लगा तो ये घास भी उगनी शुरू हो गई.... उसी समय इसका सफाया क्यों नहीं हुआ ? जब बारिश रीत चुकी है और ये घास बड़ी होकर गलने लग गयी तो जो थोडा बहुत पानी जोहड में है वो सड़कर काले रंग का हो, बदबू मारने लगा है - कैसे पूजा होगी? अब इसमें से से घास निकालनी शुरू कर दी गयी है..... पुरे तालाब में से तो घास निकालना बहुत दुरह कार्य है... छठ पूजा निम्मित मात्र किनारों से निकाली जायेगी.

4.10.12

मैंने भी खैनी खाना शुरू किया.

कई दिन से कोई भी पोस्ट या टीप लिखते हुए आलस सा आता है... पता नहीं क्यों. अत: कुछ लिखने की कवायद के नाम से बक बक शुरू कर रहा हूँ, मित्रजन संभाल लेंगे :)

अस्वीकरण :  इस पोस्ट में तम्बाकू या उससे जुड़े हुए कोई भी प्रोडक्ट की मार्केटिंग का प्रपंच नहीं रचा जा रहा. तम्बाकू को लेकर जो जी में बार बार बातें  याद आती हैं उन्हीं को शब्द रूप देने हेतू इस पोस्ट को लिखने बैठा हूँ.

आर्टिस्ट (चित्रकार – ग्राफिक डिजाइनर) निरंजन
    पुरानी बात है, जब मैं प्रेस लाइन में डी टी पी ओपेरटर के रूप में कार्य करने लग गया था और ‘उस्ताद’ का खिताब भी प्राप्त कर लिया था. पर जहाँ नौकरी करता था मात्र कम्पोजिंग ही होती थी और किसी प्रेस को देखने के लिए मैं हमेशा उतावला रहता था. पर मौका नहीं मिलता. ऐसे उमंग भरे दिनों मैं राह चलते, दिवार पर चस्पे पोस्टरों को खासकर जैमिनी सर्कस के पोस्टरों को बड़े चाव से देखता था, कलात्मक तरीके से हाथ से ही लिखे और फ्लोरोसेंट इंक से छपे पोस्टरों को. उसी दौरान मेरा परिचय एक आर्टिस्ट (चित्रकार – ग्राफिक डिजाइनर) निरंजन से हुआ. बिहार या यु पी का तू पता नहीं पर था पूर्व का बाशिंदा... घोर काले रंग का. तिहाड़ गाँव में ही एक कमरा किराए पर ले कर रहता था. जिसमे कुछ उसकी ड्राईंग का सामान (रंग, कागज, ब्रुश) और कुछ स्क्रीन प्रिंटिंग का... बाकि बची जगह में एक छोटी सी फोल्डिंग चारपाई के साथ एक स्टोप और २-४ बर्तन. दूकान-मकान सभी एक १० बाई १० के कमरे में. गर मैं कभी जल्दी छुट्टी पा जाता तो घर में शक्ल दिखाने के बाद मेरा ठिकाना निरंजन का कमरा ही होता था. बेचारा बहुत गरीब आदमी था. कहीं से स्टिकर बनाने का काम मिल जाता था तो पहले डिजाइन बनाता फिर उसको खुद ही गम्मिंग शीट पर छाप कर सप्लाई करता था. जिसके पैसे भी उसे कभी मिलते कभी नहीं.. जैसे तैसे जुगाड कर जिंदगी चलाता था.

1.10.12

"क्या हिन्दुस्थान में हिंदू होना गुनाह है ?" का प्रोडक्शन.

राष्टीय गौरव संस्थान ने अशिवनी कुमार, संपादक पंजाब केसरी की पुस्तक "क्या हिन्दुस्थान में हिंदू होना गुनाह है ?"  महेश समीर जी के संपादन में प्रकाशित की. मैं पिछले सप्ताह उसी में व्यस्त रहा.

गत शुक्रवार को महेश जी का आगमन हुआ और अपने कार्यकर्म की रूप रखा बताने लगे, कि ३० सितम्बर को पंचकूला, हरियाणा में  उनका संस्थान एक कार्यक्रम कर रहा है - जिसकी डॉ सुब्रामनियन स्वामी अध्यक्षता करेंगे और श्री अशिवनी कुमार के कुछ चुनिन्दा सम्पादीय को एक पुस्तक की शक्ल में विमोचित किया जाएगा. ये मुद्रण व्यवसाय की विडंबना ही है कि कार्यकर्म के कार्ड तो पहले से ही बंट जाते है और किताब की सामग्री जिसका विमोचन होना है उसका अता-पता नहीं होता. :) 

मैं लगभग १९९० से लगभग २० वर्षों तक पंजाब केसरी का नियमित पाठक रहा हूँ, और उनकी कलम और राष्ट्रवादी विचारों से बहुत प्रभावित हुआ हूँ.  मेरे लिए ये बहुत खुशी का मौका था कि उनके लिखे लेख मेरी प्रेस में छपेंगे.

मैंने पंजाब केसरी पढ़ना क्यों छोड़ा ये भी काफी दिलचस्प है.
मैं सुबह अखबार खोल कर सबसे पहले ज्योतिष वाले पन्ने पर अपनी कर्क राशि देख कर दिन का अनुमान लगाता था ... कैरियर का उठान था, अधिकतर समय भयभीत ही रहता था. जिस दिन राशि नहीं छपी होती - उस दिन सुबह से ही परेशान रहता था. जिस दिन राशि बढिया आयी, उस दिन बोस को भी बोस नहीं समझना और जिस दिन राशि बेकार आई उस दिन चपरासी से भी डर कर रहना. :) ये बहुत ही भयानक आदत हो गयी थी. मैं अपनी आदत बदलना चाहता था, तो  लगा कि पहले पंजाब केसरी को पढ़ना छोडो. और एक बात और.... अखबार पढ़ने में दिक्कत आने लगी, एक दिन चाचा जी ने पंजाब केसरी देख कर कहा कि अंधा होना है तो ये अखबार पढ़ना. :)  ये बात मेरे घर कर गयी. पर बाद में पता चला कि मेरी नज़र कुछ कमज़ोर हो गयी थी. जो भी हो... २००९ से सभी अखबारें बदल बदल कर आने लगी... मैं अपना टेस्ट बनाने लगा. अन्त: मैं दैनिक हिन्दुस्तान रुक गयी.. पर अब अखबार पढ़ने का चाव भी कम हो गया है.

8.9.12

फ्रस्टियाओ नहीं मूरा...


फ्रस्टियाओ नहीं मूरा,
नर्भासाओ नहीं मूरा, 
एनीटाइम मूडवा को 
अप्सेटाओ नहीं मूरा,

जो भी रोंग्वा है उसे - सेट राईटवा करो जी,
नहीं लूजिये जी होप, थोडा फाईटवा करो जी, मूरा .....

एनीटाइम मूडवा को 
एनीटाइम मूडवा को 
अप्सेटाओ नहीं मुरा,

ज्यादा लिखने की आवश्यकता नहीं है; आप भावनाओं को समझिए और ये गेंगस आफ वासेपुर इसी गीत सुनिए....


जय राम जी की,

27.8.12

ध्रुव पूर्वा और हाथियों का घर


बच्चपन है साहेब,
बच्चपन.....
बस अपने धुन में मग्न रहने का समय...

ध्रुव और पूर्वा पिछले सप्ताह मेक डोनल गए थे? जी ये मेरे बच्चे हैं, और मेक डोनल गए थे, ये मैं भरी पंचायत में स्वीकृत कर रहा हूँ (थोड़ी शर्म के साथ, क्योंकि ऐसे वातावरण में, मैं अपने को एडजस्ट नहीं कर पाता). वहाँ से खाली डिब्बे/रेपर साथ ले आये, बोले पापा इसकी झोपडी बनायेंगे. (रिसाइकल और क्रेटीव के लिए आइडिया बुरा नहीं था.) निसंदेह इस झोपड़ी को बनाने में मेरा योगदान भी भरपूर है. साथ में ही इन्हें खिलोने भी मिले थे - हाथी. राम जी का शुक्र है कि एक से ही खिलोने मिले.

जब झोपड़ी बन के तैयार हो गयी तो आगे हाथी कर दिए और वे बोले पापा, ये हाथियों का घर है..

मैं मुस्कुराया....

हाँ, पडोसी राज्य में आजकल हाथी बेघर हो गए हैं. जो भी  हो, अपनों ने बेशक हाथी को दरकिनार कर दिया हो, पर बडकी मैडम का कोई भरोसा नहीं .. कब इनकी जरूरत पड़ जाए. अत: उन्हें समझाल कर रखने के लिए घर की जरूरत है. तुम लोगों ने ठीक किया जो हाथी के रहने के लिए जगह दे दी : )  
एक अफ़सोस है , हाथी नीले रंग में नहीं थे, ना ही वो झोपड़े. नहीं तो अगली बार नीली सरकार बनाने पर बहनजी से इस विषय में रोयल्टी की दरकार हो सकती थी. :)

जै राम जी की.

24.8.12

मुस्कुराइए

मुस्कुराइए कि सरकार मुस्कुरा रही है, क्योंकि 'आपजी', २ जी से बाहर आ गए हैं, बिना किसी नुक्सान के.  मैदाम ने राहत की सांस ले, सरदार जी को भी धीरज बंधाया, जब इतनी ही जीरो वाला 2 जी सरकार की मुस्कान नहीं छीन सका तु ये मुया कोयला क्य छीनेगा : वो भी तब जब मीडिया ने इसे 'कोलगेट' नाम दिया है,

उधर सोशल मीडिया वालों पर निगाहें तो कभी से टेढ़ी थी, अच्छा ही हुआ, 'पडोसी' की हरकतों से कुछ लोगों ने  दंगा फसाद कर दिया और हमेशा की तरह फिर निशाने पर संघ है. अत: संघ परिवार के मुखपत्र के ट्विटर अकाउंट को बंद कर दिया.

18.8.12

सोशल मिडिया : बंदर के हाथ में उस्तरा.


खबरें कहीं से भी आ सकती हैं और कुछ खबरें आपको बैचेन करती हैं – इसी बैचेनी में बन्दा बक बक करने लग जाता है यही दीपक बाबा की बक बक है.
और जब ‘बक बक’ कोई सुनने के लिए तैयार नहीं होता समय नहीं दे पाता तो ये बन्दा ब्लॉग्गिंग करने लगता है. ब्लॉग्गिंग का तात्पर्य मात्र पोस्ट लेखन से नहीं है, टिप्पणी लिखना भी ब्लॉग्गिंग का एक हिस्सा है ये मैंने माना है - पर आलस्य और कार्य दबाव अपने चरमोत्कर्ष पर है. अब देखिये जब से म्यांमार की घटनाओं पर अपने यहाँ प्रतिक्रिया हो रही है तब से मुझे अपने बिहारी लाला (श्री सलिल वर्मा) की एक टीप याद आ रही है, जिनमे वो मिस्र की घटनाओं में ब्लोग्गिंग को महत्व प्रदान करते हैं.
दीपक बाबा जी! उम्मीद है आपका सारा तकलीफ अब खतम हो गया होगा.. या फिर परहेज चल रहा होगा. तो सबसे पाहिले आपके स्वास्थ्य का कामना करने के बाद ब्लॉग्गिंग के ताकत का नमूना बताने के लिए मिस्र का उदाहरण देना चाहेंगे.. अउर टाइम्स ऑफ इंडिया के एक खबर का बिस्वास किया जाए तो एहाँ भी ब्लॉग्गिंग पर सिकंजा कसने का तैयारी चल रहा है.. टिपण्णी देना अउर उसका जो नियम कायदा है ऊ बीसी पर नहीं बोलते हुए हम तो एही कहेंगे कि टिपण्णी ब्लोगिंग में संबाद कायम करता है. जैसे जेतना लिखा जाने वाला अच्छा ही है नहीं कह सकते वैसे ही सब टिपण्णी सार्थक है, ई भी नहीं कहा जा सकता.. ब्लॉग्गिंग में मेरा सफ़र.........2 पर

8.8.12

इक रास्ता है ज़िन्दगी जो थम गए तो कुछ नहीं


इक रास्ता है ज़िन्दगी जो थम गए तो कुछ नहीं
ये क़दम किसी मुक़ाम पे जो थम गए तो कुछ नहीं
इक रास्ता है ज़िन्दगी ..

बहुत सुंदर गीत है साहेब, जो थम गये तो कुछ नहीं, हमारा जीवन यात्रा ही तो है... ये कदम किसी मुकाम पर रूकने नहीं चहिये. चरेवेति चरेवेति... चलते रहे.... कहीं मंजिल तो होगी. नहीं नहीं, मंजिल कहीं नहीं होती, कई बार हम दिशा हीन होते है, पर मन ही मन में कहीं न कहीं एक पुकार/आवाज़ जरूर होती है .... अपने गंतव्य की तरफ, वहीँ जहाँ ढलान होती है, शायद मंजिल, किसी प्रेयसी माफिक वही कहीं हमारा इन्तेज़ार कर रही होती है .... और उसी प्रियतम/ प्रेयसी को मन में बसा चलना है... यही जिंदगी है,... नदी माफिक... जहाँ ढलान दिखी वहाँ राह बना लिया – ये मालूम होते हुए भी कि सागर या फिर वो बड़ी नदी जिसमे मिलना है बहुत दूर है. पता नहीं कितने दुःख रुपी नाले अभी और समायेंगे .... पर चलना है गर हार मान ली तो गंतव्य पर पहुंचे पहुँचते नदी नाले में भी बदल सकती है और हिम्मत हुई तो वही छोटी नदी गंगा में मिल कर गंगा जल में परिवर्तित होने का साहस भी रख सकती है. यानि जितना भी कचरा आ जाए, सभी कुछ बहा ले जाने का साहस... जिंदगी.
दुखो का तूफ़ान, प्रियों का बिछुडना, कुछ कुटिल लोगो का जिंदगी में आना, बहुत कुछ दुष्कर लग सकता है जीवन यापन के लिए. लगता है कि यहीं कहीं हम ठहर गए हैं कुछ नहीं है - इन लोगों में जीवन खराब कर दिया. पर ध्यान से सोचिये ये मंजिल नहीं, मंजिल बहुत आगे है, अत: इन लोगों को यहीं कहीं दफ़न कर दीजिए अपने विराट व्यक्तित्व में और आगे चलिए... किसी छोटी नदी माफिक - कहीं तो गंगा से संगम होगा ही.
गीत सुनते सुनते, दिमाग इसी ओर चला गया कर्म प्रधान जीवन है और ब्लॉग्गिंग ठंडी छाँव कुछ देर सुस्ता लिया और ये दो लाईने लिख दी. जय राम जी की.

22.7.12

मजदूर, चाँद और रोटियां

चाँद और रोटी की बात पता नहीं कब किस शायर/कवि ने सबसे पहले कही होगी... कहा नहीं जा सकता. रोटी को देख कर चाँद के प्रति जी ललचाया होगा या फिर चाँद को देख कर रोटी की याद आयी होगी. मेरे ख्याल से चाँद को देख कर रोटी को याद किया गया होगा... क्योंकि आज माध्यम वर्ग में न तो चाँद चाहिए और न ही रोटी. अब वो बचपन नहीं रहा जो चंदा को मामा कहता था और स्कूल से घर आते ही एक रोटी ढूँढता था... जी, उन दिनों भूख बहुत लगती थी. आज बचपन को चाँद तो नसीब ही नहीं, कितने ही कालोनियों में चाँद के दर्शन दुर्लभ हो गए है, और भूख लगने पर पिज्जा या फिर मेगी की फरमाइश करता है... कहाँ का चाँद और कहाँ की रोटी. 

घटनाएं जल्दी जल्दी घटती हैं, दादा को राष्ट्रपति भवन में जाने की जल्दी है, पवार साहेब को नम्बर २ की कुर्सी पर बैठने की जल्दी... दारा सिंह और काका को ज्यादा जल्दी थी, सो वो जल्दी निकल गए. युवराज को कोई जल्दी नहीं है, ..... वो और इन्तेज़ार करना चाहते है. सरकार है बार बार करवट बदल रही है. छोडिये, इन लोगों को न तो चाँद से मतलब है न रोटी से. व्यर्थ ही लिख दिया इनके बारे में. 

पिछले दिनों “सलाम बस्तर” पढ़ी थी, “क्यों जायूं बस्तर, मरने” के चक्कर में. रोटी हाथ से निकल रही है... माओवादी बढ़ रहे हैं, उनकी मंशा देखें तो ऐसा लगता है कि २०-२५ साल बाद लाल सलामी होगी – लाल किले पर. 

अभी गीत सुन रहा था, गेंगस औफ़ वासे पुर का .... चाँद और रोटियां, दिमाग घूम घूम कर वहीँ पहुँच रहा है. 

“अम्‍मा तेरी सिसकियों पे कोई रोने आएगा” हाँ, कहीं जवानों की शहादत में और कहीं माओवादी केडर की मौत में सिसकियाँ कम होती जायेंगी... कोई रोने नहीं आएगा... क्योंकि ये रोज का धंधा हो जाएगा. 

देश प्रेम, क्रिकेट, आसमान से बातें करती ऊँची इमारतें, ज्येष्ठ की दुपहरी में भी ठन्डे ठन्डे माल, मेट्रो, एअरपोर्ट – ये सब चाँद ही तो हैं, जिन्हें दिखा कर आम आदमी को बहकाया जा रहा है. जिसे रोटी की चाहत है. 


होनी और अनहोनी की परवाह किसे है मेरी जां

हद से ज्‍यादा ये ही होगा कि यहीं मर जाएंगे 


पिछले दिनों मानेसर में मारुती सुजुकी कंपनी में जो हुआ, उस पर मैं कोई टिपण्णी टिप्पणी नहीं करना चाहता. पर क्यों लग रहा है कि आने वाले दिनों में धार्मिक/भाषाई दंगे इतिहास की बातें हो जायेंगी. औद्योगिक फसाद शुरू होने को हैं... रोटी को तरसते मजदूरों को और उसमे भडकने वाले असंतोष को हवा/समर्थन दिया जा रहा है. 

रोटी और चाँद का खूब खेल चलेगा. देखिएगा.

7.7.12

भारत के सबसे तेज़ ब्लोगर डॉ अनवर जमाल DR. ANWER JAMAL

डॉ अनवर जमाल साहेब, दिसम्बर २००९ से ब्लॉग्गिंग कर रहे हैं, ये पूर्ण कालीन ब्लोगर हैं, नून आटा दाल चावल सोरी ये सब तो ये खाते नहीं, अंडे चिकन मटन सब इन्हें ब्लॉग्गिंग से ही प्राप्त होता है. रात रात भर जाग कर डॉ साहिब न केवल पोस्ट लिखते/कट पेस्ट करते हैं अपितु कमेंट्स भी करते हैं : इन्ही के शुभ हाथों द्वारा कि-बोर्ड पर पंच “भाई साहब हम भी आ गए हैं जोत जलाने और वह भी रात को 3 बजे । बिना सनकामीटर के ही भाँप लीजिए कि किस ग्रेड की सनक सवार है ?

3.7.12

Life is incomplete without Plastic. प्लास्टिक बिना जीवन सूना


१३-१४ साल पुरानी बात कर रहा हूँ, प्रगति मैदान में एक प्रदर्शनी लगी थी, प्लास्टिक उद्योग के उपर .... और उस का नारा था, Life is incomplete without Plastic.  तब ज्यादा समझ नहीं आया. पर आज राशन की दुकान पर शेम्पू के, रसोई मसोलों के, टाफी, चाकलेट, नमकीन, बिस्कट, कुरकुरे, पानी, देसी शीतल पेय आदि के पाउच देख कर लगता है कि वास्तव में सही बात है. : Life is incomplete without plastic.
पहले छोटू (१०-१२ साल का लड़का) चाय लेकर केतली में या फिर छीके’ (5-6 या ८ चाय के छोटे गिलास रखने का खांचा) में लाता था. बाद में वो खाली गिलास व केतली या छीके में रख कर वापिस ले जाता था. बाल मजदूरी पर रोक से ये 'छोटू' लोग चाय दूकान से गोल हो गए. अब पार्कों में बैठ कर नशा कर रहे हैं या छोटी मोटी चोरी चकारी. पढ़ने से तो रहे, सरकार जितना भी जतन करे. 
प्लास्टिक की पन्नी में चाय ओर प्लास्टिक के कप, किसी भी व्यावसायिक क्षेत्र में चाय वाला रोज की १२५ से २०० चाय के कप डिस्पोज करता है.
चाय वालों के पास इतना सामर्थ्य नहीं था कि किसी बालिग़ को अपनी दुकान पर नौकर रखे, एक तो उसकी तनख्वाह ज्यादा होती है दुसरे छोटू की तरह फुर्ती से काम भी नहीं कर पाते. अब चाय वालों ने ऑफिस/फेक्टरी में फ्री डिलिवेरी बंद कर दी, गर आपको चाय चाहिए तो आप दूकान से ले कर जाईये. यहाँ भी लोचा था अपनी जरूरत को तो ऑफिस बॉय चाय ले जाता पर केतली या वो खांचा उस दूकान पर वापिस करने नहीं आता.
इसका रास्ता ये निकला कि चाय अब प्लास्टिक की पन्नी में आने लगी और शीशे की ग्लास की जगह प्लास्टिक के कपों ने ले ली. आप किसी भी व्यावसायिक स्थल पर चले जाए, आपको ऐसे प्लास्टिक के कपों के ढेर मिल जायेंगे.

23.6.12

हाय, इस बार भी गर्मी बेदर्दी से निकली.

मुझे ये बताते हुए जरा सी शर्म महसूस हो रही है कि मैं इस अभागी दिल्ली का अभागा बाशिंदा हूँ. जरा सी मीन्स ‘जरा सी’ जितनी अपने वामपंथी मित्रों को अपने को हिंदू कहने में महसूस होती है. :) खैर मजाक यहीं तक, और नहीं.
   जब देश के किसी भी हिस्से में बाड़-सुखाड़ आता है तो यही दिल्ली तुरंत मदद भेजती है. इसपर कोई तरस नहीं खाता. केरल से मानसून आता हुआ यू पी, बिहार, बंगाल तक पहुँच गया, मगर ऐसा नहीं हुआ कि कुछ बादल वो यहाँ भी भेज देते. नहीं, अभी से सावन गीत गाने लगे है. ऐसा नहीं कि दिल्ली को कुछ नहीं मिलता. वैसे आपको मालूम ही होगा कि दिल्ली का अपना कुछ भी नहीं है, न बिजली, न पानी, और तो और मौसम भी नहीं. पडोसी राज्य जो वही देते है जो उनसे संभलता नहीं, जैसे गर्मी आई तो राजस्थान उदार हो गया, गर्म हवाएं यहाँ भेजने लगा, पर सर्दी में सारी गर्मी अपने पास ही रख लेता है. सर्दी में पहाड़ मेहरबान हो जाते जाते हैं, लो जी हमारे पास बर्फ जयादा आ गयी है – कुछ सर्द हवाएं आप ले लो. गर्मी में ये दरियादिल्ली क्यों नहीं दिखाते. संपन्न दिल्ली वालों को अपने यहाँ बुला लेंगे, आओ मित्रों – अपना पैसा ले कर आओ – और यहाँ की ठंडक महसूस करो. इधर शीला मैया हरियाणा सरकार को पानी के लिए गिडगिडा रही है और चौधरी साहेब आँखे दिखा रहे है – किद्द से दे दें पाणी, अपना ही पूरा न हो रहा. यही दो चार ढंग से बरसात पड़ी नहीं तो चौधरी साहेब, तुरंत हुक्म दे देंगे, भाई दिल्ली वालों को दे दो पाणी, कई दिन से पाणी–पाणी रो रहे थे, बोलो संभलो यमुना को.

14.6.12

६० साल के जवान या बूढ़े.

“मौत” शब्द सुनते ही कई बार शरीर में झुनझुनी सी लहर जाती है. और कहीं हंसी ठहाकों के बीच मौत शब्द का उच्चारण भी अगर कर लिया जाये तो महफ़िल एक दम संजीदा हो उठती है. पर अपने अस्सी का क्या किया जाए... काशी सिंह के नहीं. तिहाड गाँव में झीलवाले पार्क में लगने वाली सुबह की महफ़िल की बात कर रहा हूँ. जहाँ नजदीक ही शमशान घाट है. और मौत, फट्टा, चादर, घाट नो. ३६ जैसे शब्दों का प्रयोग ऐसे किया जाता मानो फन सिनेमा में लगी किसी फिल्म का.
सायं को जब पैसे मिला कर दारू के व्यवस्था तो हो गयी, पर जब शीतल जल खरीदने की बारी आई तो मितर बोला, खाम्खावाह पैसे खराब करने वाली बात है. शमशान में से ही चिल्ड वाटर भर लाते है. रात के ८ बजे . तो क्या- सब तो जल गए – उठ थोड़े जायेंगे. हम कौन सा सेब आम लीची उठाने जा रहे हैं (चौथे कर्म निमित रखे गए फल एवं मिठाई) J और उठ भी गए तो क्या, दो पेग वो भी ले लेगा.
और सुबह ..
मितर एक बात बताऊं, जब तुम मरोगे तो मैं सुंदर सी चादर कम से कम ग्यारह सौ वाली तुम्हारे पर चढाऊंगा. सच्ची, हाँ मितर... दुनिया भी याद करेगी, कि यारी सी यारां दी.
पर मितर क्या करे आदत से मजबूर, पूरा दिन जुआ खेलने में निकल गया और किस्मत तो शुरू से ही पाण्डुओं वाली, शाम तक खाली हाथ. पुरे दिन की मेहनत और हार के गम को सहन करने के लिए फिर से एक हरे गांधी की दरकार हो उठी, कहीं कोई रास्ता नहीं सूझा तो, देर रात मितर के दरवाजे पर ही आस ले पहुंचे,
देखो मितर, तेरा प्रेम बिलकुल पवितर उन्दे विच कोई दो राय नई. पर जो ग्यारह सौ रूपए मेरी चादर वास्ते संभाल रखे हन, उन्दे विच पंच सौ रुपये मेनू हुने दे दे. कल किसने देखा है यार – मैंने मरुँ या न मरुँ. J

12.6.12

.. तुम्हारी चेष्टा को नमन चेष्टा

दुनिया जब दफ्तर जा रही होती है – तो मेरे जैसा आलसी सैर करने निकलता है. उसी झील वाले पार्क में. पिछले सप्ताह में एक लड़की, जो कुत्तों के समूह को कुछ बिस्किट और दूध पिलाने की कोशिश में लगी थी, मैंने सोचा चलो कुत्तों का कुछ अधिक कल्याण हुआ. वैसे भी सुबह कई लोग पार्क में इन आवारा कुत्तों, कवों और कबूतरों को कुछ न कुछ खिलाते हैं.

आपसी लड़ाई में जख्मी हुआ - कुत्ता
 कल देखा तो वो लड़की न केवल दूध पिला रही थी, अपितु एक घायल कुत्ते का उपचार भी कर रही थी, मुझे ताज्जुब हुआ. और पास के बेंच पर बैठ ब्लोगरी निगाह से देखने लगा.
घायल कुत्ता ख़ामोशी से बैठा रहा और लड़की एंटी-बाईटिक पाऊडर उसके सर पर लगे घाव पर छिडकती है. फिर वह अपने बैग में से एक साफ प्लास्टिक बाउल निकाल कर उसमे अमूल दूध के पैकट उड़ेल देती है, घायल कुत्ता सटासट दूध पीने लगता है, और बाकि तीन चार कुत्ते चारों तरफ ऐसे बैठे है जैसे मरीज़ का हाल पूछने आये हों, ताज्जुब होता है – उनमे इतनी ‘इंसानियत’ कहाँ से आ गयी कि घायल कुत्ते से छिना झपटी नहीं कर रहे.



लड़की ने अपना नाम ‘चेष्टा’ बताया.

9.6.12

शंघाई - राजनीति का स्टिंग ओप्रेशन करती फिल्म.

फिल्मे तो बहुत देखता हूँ, चोरी छुपे - : ) इस उम्र में भी  पर कभी किसी फिल्म की समीक्षा नहीं की. बक बक करने की आदत है तो शंघाई पर कर रहे हैं - 

दिबाकर बनर्जी के निर्देशन में बनी फिल्म शंघाई पुरानी कला फिल्म की तरह लगती है... याद कीजिए उन फिल्मो को जब तक दर्शक कुछ समझने की चेष्टा करते थे, परदे पर कलाकारों के नाम दिखने शुरू हो जाते थे, माने फिल्म खत्म हो जाती थी. कुछ वैसे ही.

जहां तक एक्टिंग की बात है, इमरान हाशमी, मुझे पहली बार एक अच्छे एक्टर के रूप में नज़र आया है, भट्ट खेमे की इमेज से उलट. दूसरा एक समय बाद सुप्रिया पाठक और फारूक शेख दिखे है. तीसरे अभय देओल – हाँ, आईएएस ऑफिसर टीए कृष्णन की भूमिका में अभय देओल जानदार अभिनय किया है.

सत्ताधारी पार्टी के IBP के पोस्टरों के साथ फिल्म शुरू हुई थी, और इस फिल्म में जिस डॉ अहमदी कार्यकर्ता (इन्ही के इर्द गिर्द कहानी की शुरुआत होती है) की मौत हो जाती है, उसकी पत्नी को ही अंत में उसी IBP पोस्टरों के साथ दिखाया गया है यानी राजनीति करती हुई अब वो सत्ता में आ गयी है. इस फिल्म में जो गुंडा डॉ अहमदी का मिनी ट्रक एक्सीडेंट से क़त्ल करता है वही अंत में भारत नगर को ढहाने के लिए जे सी बी चला रहा होता है – जो एक व्यक्ति के गिरगिट जैसे रंग बदलने की पराकाष्ठा है.


देखिये शंघाई,

24.5.12

पेट्रोल के दाम - बुद्ध फिर मुस्कुराये.

भगवान बुद्ध गाँव गाँव शहर शहर घुमते इन्द्रप्रस्थ आये, और गट्टर कि गंदगी से भरी यमुना किनारे एक विशाल वृक्ष के नीचे आकार बैठ गए, इन्द्रप्रस्थ की शानोशौकत देख कर भूल गए कि ये अब दिल्ली शहर है - जो कि भारतखंड नामक द्वीप की राजधानी बन चुकी है, जहां बैठ कर कुछ लोग सवा अरब मानव के भाग्य विधाता बने हुए हैं. जैसे इस नगर में आकर श्रवण अपनी पितृ-मात भक्ति भूल गया था उसी प्रकार पर भगवान बुद्ध भी बौद्ध गया से प्राप्त ज्ञान भूल गए, और शांति वन के नज़दीक एक बड के पेड़ के नीचे विचारवान मुद्रा में बैठ गए.
        सायं ६ बजते ही जैसे बाबु लोग आई.टी.ओ. से ऐसे छूटे मानो बच्चो का समूह स्कूल से छूटा हो - राष्ट्रपति के आकस्मिक निधन के कारन. ऐसे में एक विद्वजन सारा दिन राजकीय सेवा से त्रस्त, शान्ति की खोज में शान्ति वन टहलता हुआ आया, और एक सफाचट पुरुष को घने पेड़ के नीचे बैठा देख जान गया, हो न हो, भंते ने प्राणी मात्र के उद्धार के लिए फिर से जन्म लिया है.

18.5.12

जीव ज्ञानोदय (कहानी)

तुम अपनी तीव्रता और मेघा खोते जा रहे हो मिस्टर आनंद, रतलाम डेवेलोपेर्स प्रोजेक्ट में तुमने जो भूलें की वो बर्शास्त से बाहर है, इससे पहले भी कई बार में तुम्हे चेतावनी दे चूका हूँ, पर तुम्हारे कानो में जूँ तक नहीं रेंगती ..

सर झटक दिया आनंद ने , और पूर्व की भांति ही गंगा को देखते हुए, हर की पौड़ी से चल दिया. दिमाग में मिस्टर घई का क्रोध से तमतमाया हुआ चेहरा उसके जेहन में जीवन्त हो उठता है.

पता नहीं क्यों, ऐसा कैसे हो गया, आनंद जैसे कॉपी राइटर कम विजुलाजर कम ग्राफिक डिजाइनर का दिमाग भनभनाता रहा, मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है, कहाँ जीरो आइडिया से में काम शुरू करता हूँ, और पूर्ण होते होते क्लाईंट और एम् डी  की कितनी शाबाशी मुझे मिलती है ... पर जब फाइनल विज्ञापन अखबार में छप कर आता है तो कोई न कोई ऐसी गलती छप जाती है कि जितनी शाबाशी मिली थी उससे कहीं ज्यादा गालियाँ सुननी पड़ती हैं.

फक आल दीज़ थिंग्स एंड एन्जॉय योरसेल्फ.... सोच  कर उसने सर पटका  डेव की पेत प्लास्टिक बोतल को मुंह से लगा कर एक चुस्की ली. सुबह ही एक अद्धा जिन का उस ने डेव में मिक्स कर दिया था, ताकि धार्मिक स्थल पर कुछ ऐसा न हो जाए जिसके लिए समाज उसका तिस्कार कर दे. वैसे अब तक घर क्या, कम्पनी से लेकर समाज तक हर जगह उसका तिस्कार हो चूका था.

13.5.12

नमन माँ


तेरे संघर्षों को, 
तेरी घुटन को,
तेरी तड़प को,
तेरे धैर्य को,
तेरे विनम्रता को,
तेरे विश्वास को,
तेरी आस को,
तेरे उस दर्शन को,
जिसने किया सदा मार्गदर्शन मेरा ,
कि जिस मुकाम पर तू मुझे पहुँचाना चाहती थी,
आज मैं वहीँ हूँ, माँ 
और चाहता हूँ कि तेरे प्यार और असीस की 
ये घनी छाया यूँ ही बनी रहे

नमन माँ.

11.5.12

मेरे दोस्त, मैं एक बार तो मरना चाहता हूँ

नहीं नहीं, तुम गलत समझे मेरे दोस्त,  
मैं मरना तो चाहता हूँ, पर मर कर दुबारा जिन्दा भी होना चाहता हूँ,
मैं देखना चाहता हूँ, कैसे और क्यों मुझे कोई कंधे पर उठता है, बवजूद इसके कि मैं जानता हूँ, कि अब कंधे किसी भी अर्थी कर वज़न नहीं उठा पायेंगे, क्योंकि वो त्रस्त है,
पहले ही झुके हैं वो कंधे, परिवार के अरमानो को झूलते झुलाते,
दूध सब्जी और राशन के थोडा सा बौझ पर इतने पैसे लुटाते, सिगरेट का कश भी गिन गिन पीते, 
झुके झुके से चल कुछ गुनगुनाते बडबडाते, बुदबुदाते,मन ही मन, मन को समझाते, गिरे नयनो से घर को आते, उनके कंधो का वज़न और तोलना चाहता हूँ,

1.5.12

मेरा गाँव - मेरा देश.

इस बैसाखी पर अपने गाँव गया था, मानका - (राजस्थान - हरियाणा सीमा पर). गाँव पहुँचते ही एक गहरी अनुभूति होती है, फैफडों में एक साथ ताज़ी हवा का झोंका आता है और शरीर का वजन ५ किलो कम हो जाता है - खून का दौरा बढ़ जाता है, पंख नहीं होते पर यकीन मानिए - पैर जमीन से २ ब्लांत उपर चलते हैं...

कटाई के बाद खेत में पड़ी गेंहू 
गेंहू - २४ केरत खरा सोना
गेंहूँ की लावणी (कटाई) का समय है... हमारे गाँव में कटाई के लिए थ्रेशर (गेंहू काटने की मशीन) नहीं मंगवाई जाती - क्योंकि उसमे किसान को तुड़ी नहीं मिलती जो की पशुयों का प्रमुख आहार है. अत: खुद ही कटाई की जाती है. खड़ी गेंहू २४ केरत का सोना लग रही है... पर दुःख होता है जब यही गेंहू सरकारी गोदामों में सड़ता है.

25.4.12

दिल जार जार है

      भाई लोगों से दूर हूँ, पर इतना भी नहीं किसी के ह्रदय छुपे दर्द को महसूस न कर पायूं, दिमाग है, बातें घुमड़ घुमड़ आती हैं, और आ रही हैं, खबरे हैं, बैचेन करती हैं, और कर रही हैं.
      पानी के हौज़ में बंदरी को उसके बच्चे सहित छोड़ दिया, हौज़ में पानी भरने लगा तो बंदरी ने बच्चे को गोदी में उठा लिए ..... पानी बढ़ते बढ़ते जब उसकी कमर तक आया तो उसने अपने बच्चे को छाती से चिपका लिए, पर हौज़ में पानी बढ़ ही रहा था, और पानी उसकी छाती छोड़ गर्दन तक आ पहुंचा तो बंदरी अपने बच्चे को सर पर उठा कर खड़ी हो गयी जब पानी उसके नाक तक पहुँचने लगा तो एक अजीब बर्ताव नजर आया उस बंदरी के व्यवहार में, उसने अपने बच्चे को हौज़ में पटका और उस पर खड़ी हो गयी, अपनी जान बचने को.

5.4.12

देखन आये जगत तमाशा.

      दायें बाएं देखता हूँ, कुछ कोशिश जारी रखता हूँ, अपने वजूद को पहचाने की - उस बच्चे मानिंद जो देखता है छूता  है - और वस्तु को उसकी प्रकुति के हिसाब से पहचानता है... पर क्या किया जाय कि बच्चे जितनी जिज्ञासा भी खत्म हो चुकी है. फिर किसी उदासीन बाबा की तरह दुनिया को देखता भालता हूँ, कोशिश करता हूँ - समझना चाहता हूँ

मेरे पात्र बैताल की तरह चढ़ जाते हैं सिर और कंधे परपूछते हैं हजार सवाल।

मुझमें इतना कहाँ विक्रम जो दे सकूं जवाब ...रोज़ मेरा सिर हजार टुकड़े होता है।

      क्या बताऊँ, ये पात्र है, कई बार कहना मान भी जाते हैं  - पर इस दीन दुनिया का क्या किया जाए, ये तो रोज ही मेरे वजूद के हज़ार टुकड़े करती है, और मैं रोज मर मर जाता हूँ, और फिर जीवित हो उठ भागता हूँ, गिरता हूँ, संभलता हूँ, फिर भागता हूँ, भागते भागते रुक कर हाँफते हाँफते सोचता हूँ, कि जीवन एक जिद्द है - पूर्ण करना है, आनंद है - परमआनंद होना है, कि रास है - महारास तक पहुंचना है, - जीवित रहना है अत: बहुत कुछ सहना है...  और दिन को फिर से एक धक्का लगाना है... कि आज तो जा - कल फिर देखेंगे.... जय राम जी की . 

4.4.12

कुछ तो लिखो मेरे यार.....


कहते हो कि लिखो, कुछ तो लिखो, लो ये कलम और लिख दो दिल के जज्बात, लिखो कि दिल पुकार रहा है, लिखो कि शाम का मौसम खुशनुमा है और तुम नहीं समझ पा रहे हो कि टाइम्स रोमन टाइप लगाया जाए या फिर सेरिफ़... बोल्ड कर के ३६ पॉइंट लगा दिया जाए या फिर नोर्मल ही रुआंसा छोड़ दें, बेदर्द दुनिया से ठुकराए आशिक की तरह.. लिखो इसी को लिखो.
कलम नहीं चल रही, स्याही खत्म है तो क्या... की बोर्ड सामने है, इस मुए कारेल डरा को एफ फॉर दबा कर विराम दो और .... दो पेग लगा कर अपनी मस्ती में फिर से बहो, लिखो ... लिखो कि आशिकों के आंसू खत्म हो गए हैं, लिखो कि दुनिया अब भी बेदर्द है... लिखो कि कैकई कैसे मंथरा की बातों में आ गयी और राम सिंहासन विहीन हो कर बनवासी हुए ... घबरा मत मंथरा अब भी जिन्दा और अपनी जिद्द पर कायम है,...
कुछ तो लिखो मेरे यार..... 

26.1.12

गणतंत्र दिवस की तहे दिल से मुबारकबाद.

राजपथ जाने को आतुर पर इंडिया गेट तक पहुंचे उन सभी: 

ग्राहक का इन्तेज़ार में खड़े कोटोन केंडी सेलर को; पिसी दाल से बनाए करारे लड्डू - कुतरी मूली और हरी मिर्च की चटनी के साथ परोसने को आतुर – लड्डूवाले को; दाल मौठ बना, ग्राहक से पैसे की जुस्तजू करते भैये को; उसी संग बच्चों को बहलाते हुए मम्मीपापा को;  दिन का फयादा उठा कुछ कमाने की होड में प्रिंट रेट से ५ रुपे ज्यादा बेच– मुंह छुपाता उ चिप्स (लेस)-पेप्सी वाले भैये को; सर्दी में भी गर्मी का अहसास करवाता वाडीलाल का नाम लगाए उ आइसक्रीम वाले को ; घर में हुई बर्तनों की खिटपिट से मायूस – बकिया हिसाब घर देखने की होड – बच्चे को संभालती – उ नांगलोई जे जे कालोनी में रहने वाली ननद-भौजाई को; सरकारी छुट्टी का सपरिवार आनंद लेते; १० रुपे में मिले ३ की जगह ४ पापड खरीद बँटवार करते उ हिम्मती पुरुष को; हजारों की तादाद में आये बाल बच्चों और परिवार जो मात्र एक नज़र परेड देखने के लिए आये – उ सब भाई लोगो को; ताईवान से ३ मित्रों संग आयी सुओ जू चैन (tsuo szu chein – पर्पल मफलर गले में डाले) आध-पुन घंटे के लिए बनी ध्रुव की फ्रेंड्स को; ब्रेड पकोडा भाई के साथ खाने की जिद्द करती उ छोटकी गुडिया को; दूर खंडहरों से - शताब्दियों पुराने पांडव कालीन किले से - (जिसे महाराजा हुमायूं और महाराजा शेर शाह सूरी ने तोड मारोड कर मुग़लअंदाज़ में बनवा दिया था) आवाज सुनाई दी : - 
सभी को गणतंत्र दिवस तहे दिल से मुबारकबाद हो.


25.1.12

दबंग गुणा विधायक गुणा व्यापारी गुणा नौकरशाह = गुणातंत्र


हमारे घर के पास ५९ हेकटर में फैला हुआ ये पार्क है जिसमे पुराना एक जोहड है जिसे अब झील की संज्ञा दी गई है, माने तिहाड़ झील. मैं ये दावा बिलकुल नहीं करता कि मैं सुबह इस पार्क में सैर करने जाता हूँ, जब मैं जाता हूँ, उसे विद्वजन सुबह का नाम नहीं दे सकते. पर मेरे जाने के वक्त भी कोहरा था.... माने जयपुर में छाया हुआ रुश्दी प्रसंग... जयपुर में बाकि क्या हुआ ... उ न मैं जानता हूँ न ही कोई मेरे जैसा 'गण' जानता होगा. इस वायदा है.

गणतंत्र है या फिर 'गनतंत्र' ... मैं कह नहीं सकता ... मैं चाहता हूँ आप खुद ही महसूस कीजिए.  मेरी तरफ से एक आइडिया है जरूर - आज न तो ये गणतंत्र न गनतंत्र  - ये  गुणातंत्र है... के  गुणा - जितना आप के पास है उतने ही  गुणा. गर पैसा तो पैसा से  गुणा कर सकते है और गर बहुबल या शोरत है तो उससे भी... चलेगा. जमीन और वोट का हिसाब किताब पंडित लोग बता सकते हैं, विधायकी का मोल भी उन्हें ही मालूम.

17.1.12

जिंदगी सिसकती चलती है - जिंदगी के शोरो शराबे के बीच.

जिंदगी सिसकती चलती है - जिंदगी के शोरो शराबे के बीच.कसम से,

बड़ी ही बेकार बोझिल सी है ये जिंदगी... कसम से; नोटों की गड्डी माफिक  जितना भी गिनो ९९ या फिर १०१ ही निकलते हैं, कभी १०० क्यों नहीं... उन्हें १०० बनाने के लिए कई बार गिनना पढता है. थूक लगा लगा कर.. थूक न हुई, माना ग्रेस में दिए गए नम्बर हों, जिनके बिना श्याद ही इंटर हो पाती.
एकटक लगा कर देखते रहना - एक ही फिल्म को कितनी ही बार, टीवी पर;  और एक खास सीन पर पूछना ... यार ये हेरोइन कौन है... कसम से - कुछ अलग सा है... बता सकती हो क्या...
और वो भी झुनझुन्ना कर जवाब  देती, जैसे तुम्हे कुछ मालूम नहीं, कुछ भी नहीं, ये मुआ चेनल पिछले ३ महीने में कम से कम ८ बार ये फिल्म दिखा चूका है, और इसी सीन पर तुम प्रश्न दाग देते हो - इस हीरोइन का नाम क्या है... गज़ब की एक्टिंग है.... तंग आ गयी मैं तो,