4.10.12

मैंने भी खैनी खाना शुरू किया.

कई दिन से कोई भी पोस्ट या टीप लिखते हुए आलस सा आता है... पता नहीं क्यों. अत: कुछ लिखने की कवायद के नाम से बक बक शुरू कर रहा हूँ, मित्रजन संभाल लेंगे :)

अस्वीकरण :  इस पोस्ट में तम्बाकू या उससे जुड़े हुए कोई भी प्रोडक्ट की मार्केटिंग का प्रपंच नहीं रचा जा रहा. तम्बाकू को लेकर जो जी में बार बार बातें  याद आती हैं उन्हीं को शब्द रूप देने हेतू इस पोस्ट को लिखने बैठा हूँ.

आर्टिस्ट (चित्रकार – ग्राफिक डिजाइनर) निरंजन
    पुरानी बात है, जब मैं प्रेस लाइन में डी टी पी ओपेरटर के रूप में कार्य करने लग गया था और ‘उस्ताद’ का खिताब भी प्राप्त कर लिया था. पर जहाँ नौकरी करता था मात्र कम्पोजिंग ही होती थी और किसी प्रेस को देखने के लिए मैं हमेशा उतावला रहता था. पर मौका नहीं मिलता. ऐसे उमंग भरे दिनों मैं राह चलते, दिवार पर चस्पे पोस्टरों को खासकर जैमिनी सर्कस के पोस्टरों को बड़े चाव से देखता था, कलात्मक तरीके से हाथ से ही लिखे और फ्लोरोसेंट इंक से छपे पोस्टरों को. उसी दौरान मेरा परिचय एक आर्टिस्ट (चित्रकार – ग्राफिक डिजाइनर) निरंजन से हुआ. बिहार या यु पी का तू पता नहीं पर था पूर्व का बाशिंदा... घोर काले रंग का. तिहाड़ गाँव में ही एक कमरा किराए पर ले कर रहता था. जिसमे कुछ उसकी ड्राईंग का सामान (रंग, कागज, ब्रुश) और कुछ स्क्रीन प्रिंटिंग का... बाकि बची जगह में एक छोटी सी फोल्डिंग चारपाई के साथ एक स्टोप और २-४ बर्तन. दूकान-मकान सभी एक १० बाई १० के कमरे में. गर मैं कभी जल्दी छुट्टी पा जाता तो घर में शक्ल दिखाने के बाद मेरा ठिकाना निरंजन का कमरा ही होता था. बेचारा बहुत गरीब आदमी था. कहीं से स्टिकर बनाने का काम मिल जाता था तो पहले डिजाइन बनाता फिर उसको खुद ही गम्मिंग शीट पर छाप कर सप्लाई करता था. जिसके पैसे भी उसे कभी मिलते कभी नहीं.. जैसे तैसे जुगाड कर जिंदगी चलाता था.
    उसे खैनी खाने का बहुत शौंक था... वो बड़े जतन से खैनी बनाता बहुत ही महीन   से... और मुंह में रखता... मुझे बहुत कोफ्त होती. (हालाँकि मेरे बाबा (दादा) और अम्मा (दादी) सभी तम्बाकू का प्रयोग करते थे) एक दिन उसने मुझे कहानी सुनाई :
एक बाबू साहेब सरकारी अफसर थे, के यहाँ बच्चे को सांप ने काट लिया. शहर में हहह्कार मच गया... किसी ने बताया कि पड़ोस ही गाँव में एक गुणी रहता है जो सांप का जहर अपने मुंह से चूस कर बाहर निकाल देता है. उस गुणी की खोज खबर शुरू हुई... पर गुणी ने आने से इनकार कर दिया. बोला कि एक तो तबियत खराब है दुसरे मैं बाबू लोगों के घर नहीं जाता. पर जब बच्चे का वास्ता दिया तो गुणी चल पड़ा. जब बाबु साहेब के घर पहुंचा तो बच्चा काफी हद तक नीला पड़ चुका था. गुणी ने तुरंत आध सेर गाय का घी मंगवाया और सांप काटे की जगह चूसने लगा. कुछ जहर चूस कर उडेलता और फिर घी से कुल्ला कर्ता... फिर कुछ मन्त्र बडबडाता ... फिर से जहर चूसता ... काफी देर ऐसा करने ने बच्चा होश में आ गया... परन्तु तब तक गुणी महाराज बेहोश हो गए थे. अब सभी लोग खुशी के साथ साथ परेशान भी हो गए.  फिर से बेचैनी बड़ने लगी... थोड़ी देर बाद गुणी उठ खड़े हुए... कुछ मन्त्र वगैरह बोले ... और चलने लगे.

बाबू साहेब अंदर से जाकर पैसा निकाल लाये – और गुणी से मुंह मांगे पैसे के लिए कहने लगे. पर गुणी ने पैसा लेने से इनकार कर दिया. परन्तु जाते जाते एकाएक सुरती की डिमांड रख दी. उस पढ़े लिखे तबके में कोई ऐसा नहीं था जो सुरती खाता हो. गुणी महाराज परेशान हो गए... जैसे तैसे एक व्यक्ति कहीं से सुरती ले ही आया और गुणी ने मुंह में रखी और घर को चल दिया.
    निरंजन कहानी सुनाता रहा और मैं अपने मन में बस चुकी उस गुणी की छवि को प्रणाम करने लगा. उसकी महानता को एक बच्चे को जीवन दान दे दिया दूसरे बाबू साहेब से पैसा नहीं लिए तीसरे वो सुरती भी खाता था. और निरंजन जो अब तक सुरती बना चुका था मेरे तरफ हाथ बढाया और कसम से मैंने भी पहली बार जिंदगी में थोड़ी सी सुरती उस गुणी को प्रणाम करके अपने मुंह में रख ली. उफ़ थोड़ी देर बाद भयानक सर दर्द. समय रात के १० से उपर हो चुका था.. मैं भगा... और सर दर्द साथ में. चौक पर यार लोग महफ़िल (दारू वाली नहीं – मात्र बकैती)  लगा कर बैठे थे... मेरे को आवाज़ दी कहाँ जा रहा है... मेरा सर दर्द – भयानक... मैं रुका नहीं.. पर एक दोस्त सामने ही आ गया... बोला कहाँ से आ रहा है ..
मैंने जवाब दिया : निरंजन के यहाँ से...
बेहच..... उस चूतिये बिहारी के यहाँ बैठेगा तो सर दर्द होगा ही....
    ये उसकी इमेज थी. मैं निरंजन से मिलता रहता पर कभी दुबारा सुरती नहीं खाई. उसकी मुफ्लसी देख कर मैंने कई बार कहा कि नौकरी कर ले... पर पठ्ठा पका कलाकार था.. बोला मेरी कला की कोई कीमत नहीं...
    एक दिन उसके कमरे पर गया तो कमरा खाली था... मालिक मकान बोला कि वो कमरा खाली कर गया है... कहाँ गया कह नहीं सकते. २-३ साल तक नहीं मिला. एक दिन मिला ... तो था तो काला ही पर कुर्ते पजामे और फट्टी चप्पल की जगह पैंट बुशर्ट और जुते में था... बोला नौकरी कर ली है पांच हज़ार माहवार पर... किसी फेब्रिक प्रिंटिंग कम्पनी में आर्टिस्ट की. जी १९९०-९१ के समय ५००० बहुत थे, कमरे का किराया २५० रुपये महीना होता था ... जो निरंजन नहीं दे पाता था.

किस्सा मेरे सुरती खाने का.. 
    उसके बाद सुरती कभी नहीं खाई ... कभी भी नहीं. २००२ की गर्मियां थी. अपना कम्पोजिंग यूनिट खोल चुके थे नारायणा में... २ कृषि वैज्ञानिक आये अपनी किताब छपवाने... छपवाने तो किसी प्रेस में आये थे और उस प्रेस की कम्पोजिंग का कार्य मैं ही करता था. ३-४ दिन में ही उन डॉ साहेब से दोस्ती जैसे कुछ हो गया ... इसे दोस्ती नाम नहीं दिया जा सकता कि उन में और मेरे में जमीन आसमान का अंतर था... पर की-बोर्ड पर मेरी उंगलियां नचाने की कला के वो कायल हो गए. उनमे अजब का जनून था साहेब जबरदस्त जनून... सरकारी कर्मचारी होने के बावजूद भी रात रात भर बैठ कर करेक्शन करवाते. पूरी रात काम करने के बाद लगने दिन दोपहर को मेरे को जब नींद का एक झटका आया तो उन्होंने मुझे ‘दिलबाग’ गुटका दिया ... बोले नींद उड़नछु हो जायेगी.  वाकई ... ऐसा ही हुआ... पर मुझे गुटका खाने की लत गयी. डेढ़ एक साल मैं करीब १५ गुटके प्रतिदिन की एवरेज पर पहुँच गया. एक दिन घर से निकला और पिता जी साथ थे, स्कूटर पर बैठे हुए.... मैंने दिनचर्या के हिसाब से स्कूटर पनवाडी की दूकान पर रोका और पनवाडी ने तुरंत गुटखों की २ लड़ी (२०) मेरे को दे दी.
टेबल पर हमेशा मौजूद रहती है ये खैनी
    पक्के अयेबी लोगों की तरह मेरा भी अकाउंट पनवाडी की दूकान पर खुल चुका था. मैंने एक गुटखा मुंह में डाला और बाकि स्कूटर की डिक्की में. पिताजी पीछे बैठे हैं ये मैं भूल गया था. कुछ दूर जाने पर पिताजी ने स्कूटर रोकने को कहा. उन्हें अचम्भा हुआ और गुटखे के दोष गिनाने लगे.
    बहुत ग्लानि हुई ... बहुत ज्यादा. दफ्तर पहुँच कर वो गुटखे फैंक दिए. पर दिन कैसे निकले. गुटखा तो आदत में शुमार हुआ उसका तौड निकला कुबेर – रेडीमेड खैनी का २ रुपये का पाउच.. क्या बुराई थी... बाबा को खाते देखा था ... पर उस जमाने में रेडीमेड खैनी नहीं हुआ करती थी, तब अपने ही खेत में तम्बाकू उगता था... शीशम के पेड की छाल को जला कर उसकी राख और तम्बाकू को कूट कर तैयार कर लिया जाता था... रेडीमेड खैनी का ही रूप थी. वो प्राकृतिक होता था पर कुबेर नहीं. मैं जानता हूँ कि इसमें कुछ केमिकल वगैरह भी मिलाए जाते हैं. 

गुटखों पर प्रतिबंध और कुबेर की पुडिया.
    कुबेर का मूल्य काफी साल दो रुपये ही रहा उसके बाद तीन रुपये.  तीनेक साल पहले जब कोर्ट ने सख्ती दिखा कर सकूलों के आस पास तम्बाकू के उत्पाद बेचने में पाबंदी लगाईं तो कुबेर सीधे पांच रुपये. और पिछले साल से छ: रुपये. और अब जब पूर्ण रूपेण गुटखों पर रोक लग गयी है तो अवल कोई भी पनवाडी अनजान को तो कुबेर बेचता ही नहीं ... और जानकार को ७-८-९-१० रुपये बेच देता है. जबकि आज भी एम आर पी ५ रुपये ही है.
    और गुटखा दिल्ली में प्रतिबंधित हो गया है.. पर जर्दा (तम्बाकू) अलग से और साधारण सुपारी का पाउच अलग से. २ रुपये में मिलने वाले गुटखे की कीमत आज ४-५ रुपये तक हो गयी है. मजदूर तकबा आज भी दो पुडिया अलग अलग खरीदता है और फांकता है. जीवन से निजात पाने के लिए. जितना जियेगा उतना ही पैसा गुटखे पर खर्चा करना होगा.
    समझ नहीं आया को इस रूप में गुटखा बिकना ही था तो दिल्ली सरकार ने प्रतिबन्ध क्यों लगाया. क्या तम्बाकू कम्पनी और मुनाफा देने के लिए? मजदूर/कमजोर तक्बके की जेब थोड़ी और काटने के लिए.
    छोटे तबके के छोटे लोग हैं, अव्वल दिल तो किसी से लगाते नहीं ... और लगा ही लिया तो छोड़ते नहीं चाहे उसमे कितने ही कैंसर वाले कीड़े हों.
    मैं भी जब कुबेर छोड़ने की बात सोचता हूँ तो उस पुडिया का चेहरा मेरे सामने आ जाता है ... जो उदास स्वरों में कहती है..
जे नई सी तौन निब्हानी – मेरी कानू पकड़ीअई बांह.
जो अन्त तक साथ ले कर नहीं चल सकते थे तो मेरी बांह ही क्यों पकड़ी.

 जय राम जी की.