15.12.07

न किसी कि आँख का नूर हूँ

न किसी कि आँख का नूर हूँ
न किसी के दिल का करार हूँ
जो किसी के काम न आ सके
मैं वह एक मुष्ठ्र गुबार हूँ

न किसी कि आँख का नूर हूँ

न तो मैं किसी का हबीब हूँ
न तो मैं किसी का रकीब हूँ
जो बिगड़ चला गया वह नसीब हूँ
जो उजाड़ गया वह दयार हूँ

मेरा रंग रुप बिगड़ गया
मेरा यार Muhjse बिचाद गया
जो चमन खिजां में उजाड़ गया
मैं उसी कि फसल-ए-बाहर हूँ

न किसी कि आँख का नूर हूँ
न किसी के दिल का करार हूँ

पे- फातिहा कोई आए क्यों
कोई चार फूल चदाये क्यों
कोई आके शमा जलाये क्यों
कोई आके शमा जलाये क्यों
मैं वह बे-कासी का मजार हूँ

न किसी कि आँख का नूर हूँ
न किसी के दिल का करार हूँ

जो किसी के काम न आ सके
मैं वह एक मुस्थ-ए-गुबार हूँ
न किसी कि आँख का नूर हूँ

मैं कहाँ रहूँ मैं खाहन बसून
न यह मुझसे खुश न वह मुझसे खुश
मैं ज़मीन कि पीठ का बोझ हूँ
मैं फलक के दिल का गुबार हूँ
मुष्ठ्र किसी कि आँख का नूर हूँ

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