20.5.13

कविता, औरत और क्रांति

क्या ये जरूरी है कि कवि बना जाए
क्यों न एक इंसान बना जाए
या फिर सवेदनशील पाठक
जो अच्छे कवियों की रचनाओं को पढ़े
खाली समय में उन्हें गाये गुनगुनाये
मनन करे, पर इससे अच्छा 
एक नागरिक भी तो बना जा सकता है
जो जब कहीं अपनी ही जुस्तजू में
धक्के खाता रहे
फिर भी दुष्यंत को गुनगुनाता रहे
सोचो कवियों, सोचो
गर अच्छे नागरिक नहीं होंगे,
तो कहाँ से आयेंगे क्रांतिवीर
कौन तुम्हे पढेंगें, मनन करेंगे
तुम्हारी अग्नि से उर्जा पायेंगे  


नेतागण एक बार तुम भी सोचो
कौन क्रांति का झंडा ले कर चलेगा
कौन मौके पर जा कर
पुलिस के डंडे झेलेगा
क्योंकि झंडे और डंडे का एक अनाम रिश्ता है
जहां झंडे होंगे वहीं डंडे भी होंगे
तुम तो आराम से रहोंगे न
क्यों झंडे इन्हीं ने तो थामे हैं
चाहे लाल हो न नीला
पर डंडा रंग नहीं देखता
वो बरसता है .... झंडे उठाने वालों पर
कार्यकर्ता मरता है
कुछ किसी मशान में जलते हैं
तो कुछ दफनाए भी जाते है
ये बस इरादे हैं
पर नेता के तो बुलंद होते जाते हैं
संसंद में भी शपथ लेते हैं
कविता - कविता बस किताबों में आह भरती है
कवित्रियाँ प्रकाशकों/आलोचकों के यहाँ
कविता पढ़ कर जागृत हुए क्रांतिवीर की माँ  
बहु को संशय की नज़र से देखती है
कहीं न कहीं कविता ही उस औरत की निगाह में दिखती है..
क्या था उसका प्यार कविता या फिर औरत

क्यों न खत्म कर दिया जाए सत्ता की हर निशानी को 
जय राम जी की