22.9.11

मन और झील कभी नहीं भरती...




पता नहीं क्यों मुझे
झील और मानव मन बराबर लगते हैं.
जैसे खाली बैठे-बैठे मन अशांत हो उठता हैं,
और
गर्मी बितते-बितते झील सूख ज़ाती है,
किन्तु गंदगी मन और झील में
सामान रूप से तैरती रहती है...
मन को किसी चंचल विचारों का,
और, झील को सावन का, इन्तेज़ार रहता है

मन में कुछ ख्याल उमड़ आते है,
जैसे घने काले बादल छाते है...
झमाझम पानी बरसते ही 
गली नालों से बह बह कर पानी
पुन: आता है इस झील में

न भरने की कसम खाने वाली
झील फिर से 
भरने को आतुर हो उठती है.
और न बहकने वाला मन
फिर बहक उठता है,

पहली फुहार से हरियाली लिए 
ये आबाद होने लगती है
क्योंकि सावन का वो उत्साह 
उसे सूखने नहीं देता....
जैसे मित्रगण, मन को शांत होने नहीं देते

और झील में दूर तक फैली हरियाली
मानो मन में भारी अवसाद...

हाँ,
झील सूख कर पुन: भर ज़ाती है
मन .... पुन: अशांत हो उठता है.
 

झील में फैली गंदगी... 
मानो मानव मन की गन्दगी









तिहाड गाँव की झील ... सावन में हरी भरी ...
मानो किसी के पोस्ट पर लहराती टिप्पणियां