2.9.11

मैं और मेरी तन्हाई - क्या बातें करते हैं...

मैं और मेरी तन्हाई,
अक्सर ये बातें करते हैं तुम होती तो कैसा होता,
तुम ये कहती, तुम वो कहती
तुम इस बात पे हैरां होती,
तुम उस बात पे कितनी हँसती
तुम होती तो ऐसा होता, तुम होती तो वैसा होता
मैं और मेरी तन्हाई, अक्सर ये बातें करते हैं
तिहाड गाँव शमशान के पीछे, पार्क का हिस्सा, मैं और मेरी तन्हाई :)


हाँ, बीरान उस जगह....... दूर तक जहाँ फैले हैं घनी छायादार वृक्षों की कतारें... वहीं कहीं जहाँ चार बेंच लगे हैं, ... मैं और तुम. बैठ कर बतियाते... बातें करते ढेर सी. पर तुम नहीं हो. तुम नहीं हो, प्रिये, बस मैं हूँ एकांत में. मैं. अकसर ये बातें करता हूँ अपने आप से. तुम होती तो क्या होता और तुम न हो तो क्या है..
ये रात है, या तुम्हारी ज़ुल्फ़ें खुली हुई हैं
है चाँदनी तुम्हारी नज़रों से, मेरी राते धुली हुई हैं
ये चाँद है, या तुम्हारा कँगन
सितारे हैं या तुम्हारा आँचल

पता नहीं क्या क्या प्रिय, तुम्हारी जुल्फें, यूँ खुली हुई.... माने रात हो गयी. कितना अजीब लगता है न... काश तुमने जुल्फें न खोली होती... और ये रात भी न होती और वो भयंकर कारनामे जो रात में अंजाम दिए जाते हैं वो भी ना होते... प्रिय सोचो, कितनी बिचारी अबलायें दुष्कर्म से बच जाति. क्या तुम दोषी हो उन सब के लिए? नहीं.. मैं नहीं मान सकता... मानता हूँ कि तुम मतवाला बना देती हो.. पर उस स्तर तक कोई कैसे गिर सकता है प्रिय. नहीं तुम्हारी जुल्फों से रात नहीं होती... ये मात्र कवि का बकलोल है.. मात्र यही... और देखो चाँद और कंगन... सब जूठा है न प्रिय... चाँद आज भी विराजमान है और तुम्हारा कंगन... देखो कैसे शोहदों ने चौक पर रामपुरी दिखा कर लूट लिया था... अगर ये सत्य होता तो क्या ईद आती.. नहीं न. पर ईद आयी और सिवैयां हम दोनों ने खूब खाई... कितनी मोह्हबत से तुमने मुझे सैवियाँ खिलाई थी... यही तो ईद का भाईचारा है न. ईद का दिन है गले आज तो मिल ले ज़ालिम - रस्मे-दुनिया भी है, मौक़ा भी है, दस्तूर भी है..... पर नहीं, तुम्हे तो इस समाज कसे खौफ, कैसे मिल सकती थी गले, और न ही मिली... मैं बेफकूफ की तरह तुम्हारे भाईजान को ही ईद की मुबारकबाद देता हुआ घर आया. 
     कवि की कल्पना को रहने दो. और उस पर कहता है सितारे है या तुम्हारा आँचल... खामखा तुर्रमखा .... भैयाजी जाइए संभालिए महबूबा के आँचल को. बाईक पर सवार किसी आवारा ने लपक लिया तो .... छोडो अब क्या कहूँ. कई बातें कहने के लिए नहीं होती.. बस इशारे में समझ लिया जाता है.. भैयाजी अपनी इज्जत अपने हाथ. हवा का झोंका है, या तुम्हारे बदन की खुशबू 
ये पत्तियों की है सरसराहट के तुमने चुपके से कुछ कहा 
ये पत्तियों की सरसराहट ...... व्यर्थ ही न .. इस घनघोर जंगल में पत्तियों की सरसराहट... प्रिय तुमने ‘जंगल’ फिल्म देखी होगी न... मेरे तो रोंगटे खड़े हो जाते है और वो कह रहा है कि ‘तुमने कुछ कहा’... अमां यार तुमने कुछ कहना होगा तो फोन करोगी न....... या फिर बैलंस कम होने से तो मिसकाल, पर पत्तियों के इशारे से तो कुछ न कहोगी. मैं जानता हूँ प्रिय. पर इस वीराने में इस तरह पत्तियों की सरसराहट मात्र किसी जंगली जीव की उपस्तिथि का ही अंदाजा हो सकता है... देखो कवि मुझे ‘परम’ बनाने पर तुला है प्रिय... पर मैं इसके चक्रव्हूँ में नहीं फसुंगा..
कि जबकी मुझको भी ये खबर है
कि तुम नहीं हो, कहीं नहीं हो
मगर ये दिल है कि कह रहा है
तुम यहीं हो, यहीं कहीं हो
हाँ, अब सहमत हूँ उस से...... मुझे खबर है तुम नहीं हो, देखो मेरे लेप्पी में जी-मेल के अकाउंट में तुम्हारे नाम के आगे अभी तक हरी बत्ती नहीं जली है, और ये मुआ मोबाइल भी तुम्हारे नॉट रिचेबल की सूचना दे रहा है... पर ये कवि है प्रिय... कि बार बार मुझे आगाह कर रहा है ... कि तुम यहीं हो यहीं कहीं हो..., मैं जानता हूँ प्रिय तुम कहीं सुदूर दक्षिण दिल्ली में किसी महंगे शोरूम में अपने नए ‘दोस्त’ के लिए कुछ गिफ्ट खरीद रही हो... पर ये कवि कहीं न कहीं सत्य है उस बाबत भी कि तुम्हारे उस दोस्त की आवाज़ में आवाज़ मिला कर कह रहा है .... ‘तुम यहीं हो, यहीं कहीं हो’ पर मेरे से दूर हो प्रिय.
तू बदन है मैं हूँ साया, तू ना हो तो मैं कहाँ हूँ
मुझे प्यार करने वाले, तू जहाँ है मैं वहाँ हूँ
हमें मिलना ही था हमदम, इसी राह पे निकलते
हाँ प्रिय, ये तुम्हारी जैसी आवाज़ है.... बिलकुल ... ये भी कह सकता हूँ कि तुम ही बोल उठी हो, मैं बदन जरूर हूँ प्रिय, पर साया.......... साया कोसों दूर, बहुत दूर. दिल्ली के शेहरी कृत दिहातों की तंग गलियों में जहाँ ऊँची ऊँची बिल्डिंग भाई लोगों ने बना दी है, वहाँ मेरा साया ही मुझ तक नहीं पहुँच पाता, फिर तुम दूर बैठ कर नगमा गा रही हो... कैसे प्रिये कैसे.. कैसे तुम मेरे साथ हो सकती हो... वहाँ जहाँ उस शेहरीकृत गाँव के हर चोराहे पर मुझे थामने वाले मेरे बदनाम भाई मेरे साये को भी मेरे पास भटकने नहीं देते... तेरी आवाज़ तो वहीँ कहीं दब गयी न..
मजबूर ये हालात, इधर भी है उधर भी
तन्हाई के ये रात, इधर भी है उधर भी
कहने को बहुत कुछ है, मगर किससे कहें हम
कब तक यूँही खामोश रहें, और सहें हम
दिल कहता है दुनिया की हर इक रस्म उठा दें
दीवार जो हम दोनो में है, आज गिरा दें
क्यों दिल में सुलगते रहें, लोगों को बता दें
हां हमको मुहब्बत है, मोहब्बत है, मोहब्बत है
अब दिल में यही बात, इधर भी है, उधर भी
देखो प्रिय, दिल की बातें कई बार रेडियो में सुनाई दे ज़ाती हैं, क्या ऐसा नहीं लगता कि किसी ने हमारी बातें ही ‘एयर’ कर दी हों. हाँ मोहबत है...... अल्लाह मियां तुम्हारे वालिद को लंबी उम्र बक्शें, जिन्होंने इतनी मुश्किल से वो फिल्लिप्स का एफ एम सेट घर में ला कर रखा था, जिसमे रात को वो अपनी जवानी की याद में ‘पुरानी जींस’ को सुन गुनगुनाते मिलते और दिन में तुम, हाँ प्रिय, तुम मेरे फरमाइशी गीतों को सुनती... और दिलो के वो तार मिस काल द्वारा मिल जाया करते थे. 
        पर क्या कहा जाए प्रिय. देखो मैं किन भावुक क्षणों में तुम्हे मेवाड आइस क्रीम पार्लर की रेहडी पर ले गया था, और तुम्हारी फरमाइश पर मैंने दिल खोल कर १५ रुपे खर्च किये ... ये तो बेडा गरक हो उस पप्पू चाय वाले की दूकान का... न वो दूकान होती और न ही वहाँ मेरे बकलोल मित्र, जो बहुत देर से किसी ‘आसामी’ को ढूँढ रहे थे, और मुझे तुम संग देख कर सीधे हल्ला बोला मेवाड पार्लर पर........ वो झट से आइस क्रीम का कप ५ चमचों के साथ पेल गए... हम और तुम- प्रिय, दोनों देखते रह गए. और उसके बाद ये शिक्वे शिकायतों की सनातन परम्परा... प्रिय कसम से, कई दिन के वायदे को पूरा कर रहा था, अभी कल ही कंपनी से २०० रुपे मिले थे स्कूटर में पेट्रोल भरवाने को, वहीं से ३० रुपे का ‘जुगाड’ किया था, सोचा तुम्हे आइसक्रीम खिलाकर अपना वायदा ‘जेंटलमेंन प्रोमिस’ की तरह पूरा करूँगा... कितने मुश्किल से तुम्हे पटा कर लाया था, उफ़ कितनी मुश्किल से.....

Photo : Deepak Dudeja....