14.9.11

बड़े भाई साहेब


कई कार्य गुपचुप तरीके से करने होते है कि कानोकान घर में किसी को खबर न लगे. विशेषकर बड़े सयुंक्त परिवारों में. जैसे मद्य सेवन करना. खासकर चचेरे ममेरे और फुफेरे भाइयों के साथ. उसके लिए बहुत व्यवस्था करनी पड़ती है. सलाद काटनी... रसोई से चुपके से नमक मसाला वगैरा उठा लाना... भौजाई से चिचोरी कर के पापड़ भुनवा लेना और चुपचाप छत पर पहुंचा देना.. :) हालाँकि जितनी भी होसियारी (श ही माना जाए) की जाए पर थोडी देर में घर आंगन में ये बात पता चल ही ज़ाती हैं कि साहेब, मयखाना आबाद हो चुका है... चाहे वो छत के स्टोर में हो या फिर नीचे बरामदे में ठीक बगल वाले कमरे में जहाँ अखबार रद्दी वगैरह रखी ज़ाती है.

और उस दिन बड़े भैया यानि ‘बड़े भाई साहेब’ की बेचैनी देखते ही बनती है... जी ठीक पहचाने, प्रेमचंद ने उनका वर्णन तो कर ही दिया था, आपको तो मात्र संकेत देना भर था.
उस दिन की ही तो बात है, हम सब भाई लोग इक्कठा थे और दिन तो ‘सीप’ में निकल गया - शाम के इन्तेज़ार में. शाम होते होते भाइयों में मद्यसेवन व्यवस्था हेतु सलाह मशवरा शुरू हो गया. काम बाटें जाने लगे – और आर्थिक पक्ष पर भी जमकर चर्चा हुई. (क्या किया जा सकता है – देश जितनी मर्ज़ी तरक्की कर ले, पर आज एक युवा अपने भाइयों पर खर्च नहीं कर सकता – चाहे इस पर शोधपत्र लिखवा लो).
छत पर बना कमरा कई मायनों में उचित स्थान के लिए उचित लगता, कि बच्चे वहाँ कम आयेंगे, बड़े भी जरूरत पर आवाज लगाएंगे, और गर कोई भाई ‘बहक’ भी जाए तो नीचे तक पता नहीं चलेगा. एक एक कर के सभी उपर बस मेरे को छोड़ कर – जिसने ‘व्यवस्था’ करनी थी, रह गया हाथ में २५० रुपे और बाकी ५० मुझे अपनी जेब से मिलाने थे :)
और आधे घंटे के बाद उपरी उस कमरे में महफ़िल गुलजार थी, देसी हंसी ठहाकों के साथ – हालांकि किवाड बंद कर रखे थे.  १ पेग अंदर गया ही था कि, आवाज़ आई  और मेरे साथ ३ और भाइयों के कान खड़े हो गए.
रे पप्पे, खाना खा लो यार, खाना तैयार है....
बहेंच..... अभी तक तो खाने का आता पता नहीं था, अब खाना कहाँ से तैयार हो गया..
पप्पे, सुन रहा है न...
अरे, एक पेग बना कर बाहर दे दो, मझले भैया की अनुभवी आवाज़ थी..
भैया, हाँ अभी आ रहे हैं, ये लो..
ठीक है, .... (संतुष्टि से पेग निगलते हुए) देखो भाई घर के संस्कार होते है, कुछ ऊंच नीच देखी ज़ाती है.... तुम तो बिलकुल उज्जड हो, दारू पीने बैठ जाते हो घर में, बच्चो पर क्या प्रभाव पड़ेगा - सोचा कभी... अपनी मेहनत का पैसा यूँ उड़ाते हो, कुछ शर्म भी नहीं आती, चलो छोडो मैं भी क्या बकने लगा.... तुम एन्जॉय करो यार, पर खाना समय पर खा लेना. ठीक है, .... (संतुष्टि से पेग निगलते हुए) 
थोडी देर बाद कालू आलू की चाट ले कर आ गया......
रे कालू ये आलू की चाट किसने भिजवाई..
चचा, ताऊ जी ने भिजवाई है,
चाट यहाँ रख कर भाग कालू यहाँ से... तेरे ताऊ जी को भी चैन नहीं.. , 
देखो अभी तक खाने का पूछ रहे थे, अब आलू की चाट भिजवा दी.
अरे छोड़ पप्पे, जानता तो है न भाई साहेब को, हरकतों से बाज़ भी नहीं आयेंगे और अपने उच्च संस्कारों का दिखावा करते रहेंगे, तुम जानते तो हो न..
थोडी देर बीती थी, कि फिर से आवाज़ आयी..
अरे पप्पे, भाई याद आ गया, वो बनिया को पैसे देने गया था तो कलम कटवा तो आया था न, कई बार पैसे देने के बाद भी लिखा रहता है. .... वैसे ज्यादा पीना ठीक नहीं रहता..
 एक पेग बना कर और दो भाई, तभी शांति मिलेगी..
किवाड थोडा सा खुला और गिलास बाहर दिया गया,
उसके बाद २० मिनट तक भाई साहेब की आवाज़ सुनाई नहीं दी........
आधे घंटे बाद फिर से आवाज़ आई,...
देखो भाई जीतनी देर मर्ज़ी बैठो, अपना घर है और सब अपने ही हो, पर नीचे रसोई में इन्तेज़ार हो रहा है, वो बेचारी कब तक तुम्हारा इन्तेज़ार देखेंगी, खाना खा लेते तो अच्छा था..... खाना .. सुना न....
किवाड खुला, और एक पेग बाहर निकला जैसे पहले सिनेमा घरों में टिकट निकलती थी, टिकट देने वाले का चेहरा नहीं देख पाते थे.. :)
ठीक है, भाई ... बैठो, मौज करो, तुम कौन सा रोज बैठते हो... यही उम्र है....... , ध्यान देना दारू गटक कर बाहर आवारागर्दी मत करना सीधे नीचे आ खाना खाकर सो जाना, समझे,  और हाँ लेडिस को भी सोचना चाहिए, एक दिन तो खाने के लिए इन्तेज़ार किया जा सकता है...
जी, भाई साहेब, छद्म आवरण में अपने हिस्सा ले जा चुके थे बिना किसी अहेसान के, पप्पे मण्डली का कोटा भी समाप्त प्राय था.... थोडी देर में रसोई घर में...
भाभी खाना लगा दो... भैया कहाँ है,
भैया, तुम्हारे भैया तो खाना खा कर, देखो चद्दर ओढ़े खराटे मार रहे है, वैसे क्या बात है, आज बहुत प्रस्सन थे, बोले पहले बता देते ... कुछ प्रोग्राम वोग्राम करना है, तो मैं इनके लिए चिकन-मटन मंगवा देता... पैसे फूटी कोड़ी नहीं होता जेब में और बात करते हैं... चिकन-मटन..
अरे भाभी जाने दो, आप तो जानती है न हमारे भाई साहेब का स्वभाव ही कुछ ऐसा है... आखिर संस्कारों में पले बड़े हैं..... और सबसे बड़ी बात वो बड़े हैं... आखिर मरजात भी कोई चीज़ होती है न....
जी ये एक मित्र के भी मित्र के बड़े भैया थे,........ क्यों नहीं आपको ‘बड़े भाई साहेब’ याद आयें.
जय राम जी की 

28 टिप्‍पणियां:

  1. भैया जी तो बड़े संस्कारी निकले ||
    जय हो ||
    बहुत बहुत बधाई ||
    खूबसूरत प्रस्तुति ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. ओह! सॉरी रोंग नंबर.

    पर आपको अपने ब्लॉग पर आने के लिए
    निमंत्रण देने का मैं अपना फर्ज समझता हूँ.

    उत्तर देंहटाएं
  3. वह बाबा जी, ये भैया जी तो कमाल के निकले.... सुंदर प्रस्तुति.
    पुरवईया : आपन देश के बयार

    उत्तर देंहटाएं
  4. लगा गरमी की एक शाम छत पर बैठ कर जमी उस मजलिस का हिस्सा हूं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. क्या बात है बड़े भईया !! मज़ा आ गया पढ़कर !! अईसन लाज़ में छुप-छिपाकर पीने का भी अपना मज़ा है || हम तो बड़े भईयन की शादी में लाज़-शरम खोल दिए थे भई, खोल क्या दिए थे खोलना पड़ गया जब रंगे हाथों पकडे गए, बहादुरी से सच्चाई भी कबूल ली अउर निधडक भविष्य में पीने का ऐलान कर अपने लिए रास्ता भी साफ़ कर लिए |
    आज ये कहानी पढ़कर उ छतवा का जमाना याद आई गवा |
    उ भी का ज़माना था ;-)

    उत्तर देंहटाएं
  6. बड़े रुचिकर ढंग से प्रस्तुत किया आपने यह संस्मरण।

    उत्तर देंहटाएं
  7. भाई साहब ऐसे ही बड़े थोड़ी न हो गये, बड़प्पन की लाइलाज़ बीमारी है।

    उत्तर देंहटाएं
  8. देखी रचना ताज़ी ताज़ी --
    भूल गया मैं कविताबाजी |
    चर्चा मंच बढाए हिम्मत-- -
    और जिता दे हारी बाजी |
    लेखक-कवि पाठक आलोचक
    आ जाओ अब राजी-राजी-
    क्षमा करें टिपियायें आकर
    छोड़-छाड़ अपनी नाराजी ||
    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत रोचक संस्मरण. बड़े भाई होने के नाते समझता हूँ कि कब जल्दी खा के सो जाना होता है... कब ऊपर नहीं जाना होता.. कब नीचे नहीं आना होता है... कब कमरे में कैद रहना होता है. संयुक्त परिवार का रस है यह. शायद संस्मरणों में रह जाये.... बहुत सुन्दर...

    उत्तर देंहटाएं
  10. मुंशी प्रेम चंद की कहानी के साथ जोड़ा गया संस्मरण ... भाई तो मजे लेते हैं बस भाभियों और बीवी को करना पड़ता है इंतज़ार ...

    उत्तर देंहटाएं
  11. भगवान ने एक प्राणी बनाया, उसे समझदारी से चिढ़ ही थी तो उसने फिर शराब बना डाली। अब सब पागल होने पर आमदा। वाह क्‍या प्राणी है?

    उत्तर देंहटाएं
  12. मजे आ गए पढ़ के ... बड़े भईया तो कमाल निकले ..

    उत्तर देंहटाएं
  13. इत्ते बढ़िया तो बड़े भैया हैं।
    वैसे बड़े भैया अच्छे ही होते हैं,जैसे हम :)

    उत्तर देंहटाएं
  14. मेरे कोई बड़े भाई नहीं है , और पैग वाले भी नहीं ! चलिए यह बक - बक ही सही ! बधाई अनायास ही खलल ड़ाल दी !

    उत्तर देंहटाएं
  15. बड़े भैया तो एकदम ही बड़े निकले ......

    उत्तर देंहटाएं
  16. Hi I really liked your blog.

    I own a website. Which is a global platform for all the artists, whether they are poets, writers, or painters etc.
    We publish the best Content, under the writers name.
    I really liked the quality of your content. and we would love to publish your content as well. All of your content would be published under your name, so that you can get all the credit for the content. This is totally free of cost, and all the copy rights will remain with you. For better understanding,
    You can Check the Hindi Corner, literature and editorial section of our website and the content shared by different writers and poets. Kindly Reply if you are intersted in it.

    http://www.catchmypost.com

    and kindly reply on mypost@catchmypost.com

    उत्तर देंहटाएं
  17. बोतल बढ़िया रही पर दारू हमारे काम की नय निकली !हम तो खाली सलाद से ही काम चला लेंगे !

    उत्तर देंहटाएं
  18. चाहत है मेरे मन में भी ,हास लिखू श्रृंगार लिखू
    गीत लिखू मै सदा गुलाबी,कभी नहीं मै खार लिखू
    पर जब दुश्मन ललकारे तो कैसे ना ललकार लिखू?
    अपने देश के गद्दारों को कैसे ना गद्दार लिखू
    हमें बाटकर खोद रहे जो जाति धरम की खाई हैं
    खुलेआम मै कहता हूँ वो नेता नहीं कसाई हैं
    जो आपस में हमको बाटें उनका शीश उतारेंगे
    ऐसे नेताओं को हम चुन-चुन कर गोली मारेंगे
    मत भारती के दामन पर दाग नहीं लगने देंगे
    अपने घर में हम मज़हब की आग नहीं लगने देंगे
    हमने तो गुरूद्वारे में भी जाकर शीश झुकाया है
    बाईबल और कुरान को भी गीता का मान दिलाया है
    हम ख्वाजा जी की मजार पर चादर सदा चढाते हैं
    मुस्लिम पिट्ठू वैष्णो देवी के दर्शन करवाते हैं
    किन्तु यहाँ एक दृश्य देखकर मेरी छाती फटती है
    पाक जीतता है क्रिकेट में यहाँ मिठाई बटती है
    उन लोगों से यही निवेदन,वो ये हरकत छोड़ दें
    वरना आज और इसी वक़्त वो मेरा भारत छोड़

    उत्तर देंहटाएं
  19. बड़े भैया तो बड़े ही बोह निकले :)

    उत्तर देंहटाएं
  20. एक 'घरेलू समस्या' की बड़ी सधी रिपोर्ट ..ब्लॉग पर आनी ही थी किसी के द्वारा -आपने धन्य किया !

    उत्तर देंहटाएं

बक बक को समय देने के लिए आभार.
मार्गदर्शन और उत्साह बनाने के लिए टिप्पणी बॉक्स हाज़िर है.