12.7.10

मेरे तिहाड़ गाँव का जोहड़

एक चाहत सी बनी रहेती है
इन कड़कती बिज़लियों को देखकर
बरसते मेघों में भीग कर
चलते चलते रुककर
कुछ सोच कर
फिर से चलने का उपक्रम
इन कड़कती बिज़लियों को देखकर
एक चाहत सी बनी रहेती है

चाहत अपने तालाब की
चाहत उन बिना मजदूर के बनाये नालों की
जो पानी को मेरे तालाब में पहुंचाते थे
पानी का लबालब तालाब -
तब बिना टेंडर के भी मछलियाँ उपजता था
जहाँ सर्दियों में सारस अपने वतन से दूर
मेरे गाँव आते थे.
उन सारस को देखने की चाहत
फिर बन जाती है
इन कड़कती बिज़लियों को देखकर

खिड़की से बारिश की आती बूंदों ने पता नहीं क्यों झंकोर दिया और यूं ही कुछ - पंक्तियाँ दिमाग में आने लगी .. जो शायद अश्पष्ट कविता का एक रूप है.
जब भी कहीं बारिश को देखता हूँ, महसूस करता हूँ तो पता नहीं क्यों गाँव का तालाब (सरकारी नाम : तिहाड़ गाँव झील- जो दीनदयाल अस्पताल के नज़दीक hai) याद आ जाता है जो आज सरकारी महकमे की मेहरबानी से अपने ओचित्य में ही रो रहा है.
और बचपन में मेरे को याद है की किस तरह तालाब पूरा भरता था और अगले मानसून तक भी भरा रहेता था. हरिनगर बस दीपो तक से पानी अपना रास्ता बनता हुवा इस तलब में आता था, घंटा घर, तिहाड़ गाँव, हरिनगर फ्लाटों, आशा पार्क और न जाने कितनी ही कालोनियों का पानी बिना किसी नाले से सीधा इसी तालाब में गिरता था.
जब से विकास चालू हुवा तो इस तालाब का मरण भी चालू हो गया. सरकारी खातों में तो पता नहीं क्या क्या योजनायें बनी - पर तिहाड़ झील तक कितनी पहुंची ये तो वो अफसर जानते हैं या फिर उनका ज़मीर. पहेले इस जोहड़ को झील की संज्ञा देने के साथ ही इससे खिलवाड़ चालू हो गया. इनके चरों तरफ बसी कालोनियों में बरसाती नाले बयाने गए की इनका पानी झील में न गिरे. फिर बड़े बड़े बोर्ड लगा कर यहाँ नोका विहार शुरू किया गया. जाहिर है पानी तो सुख ही गया था. इस को रिचार्ज करने के लिए सरकारी तौर पर ४-४ तुबवेल जो दिन रात चल कर भी इस बड़ी झील के लिए न-काफी सिद्ध हो रहे हैं.
पता नहीं - मुझे तो ड़र लगता है किसी दिन आसपास के RWA इस पाटकर पार्किंग न बना दें.