7.12.10

विद्रोही का ब्रह्मज्ञान और कविता

देखो विद्रोही, कितनी मस्ती है दिल्ली में, गुलाबी ठण्ड का मौसम है, लोगबाग दिव्य मार्केटों में घूम रहे हैं, चिकन-बिरयानी और मक-डोनाल के साथ मौसम का मज़ा ले रहे हैं. सरकार ने इतने बड़े-बड़े माल बनवा रखे हैं, ऐसे-ऐसे सिनेमा हाल बना रखे है की इन्द्र देवता भी फिल्म देखने को तरसे- क्या है कि अब वो भी तो अपनी अप्सराओं के नृत्य से परेशान हो गए हैं – क्योंकि वो अप्सराएं मुन्नी बदनामी और शीला की जवानी से डिप्रेशन की शिकार हो गयी हैं. उनमे अब वो लय और गति नहीं रह गयी. और एक तुम हो, कि मुंह लटका कर बेकार ही परेशान होते रहते हो. सरकार कि समस्त सुविधाओं का मज़े लो..... नए-नए मनभावन ठेके और बार खुले हैं – अच्छी वराइटी की दारू मिल रही है – जाओ खरीदो और पान करो. पर क्या करें? हम हैं तो कर्महीन ही – कर्महीन: अरे भाई, तुलसी दास जी फरमा गए है : सकल पदार्थ इ जग माहि – कर्महीन पावत नाहीं. तो भाई सभी पदार्थ मौजूद हैं – थोड़ी अंटी ढीली करो और मौज लो.

    ये ब्रह्मज्ञान आज ही राजौरी गार्डन की मार्केट में मिला है, रोज-रोज व्यवस्था को कोसना अच्छी बात नहीं. छोड़ दिया है कोसना ....... जैसा है–जहाँ है के आधार पर सब ठीक है.... पर पता नहीं कब तक? कब तक ये ज्ञान मेरे विद्रोही स्वर को दबा कर रखेगा... कुछ भी नहीं कह सकते ... दूसरा पैग लगाते ही की-बोर्ड की दरकार हो उठती है और बन्दा बेकरार हो उठता है.....  चलो कविता ही सही. नहीं आती लिखनी तो भी लिखो.


सामने अलाव सेंकते मजदूर
सीधे साधे अच्छे लगते है
कम से कम सीने में सुलगती भावनाओं को
इंधन दे - भडका तो सकते हैं.
अपने सुख-दुःख इक्कट्ठे बैठकर
झोंक देते हैं उस अग्नि में
और, सब कुछ धुआं बन उड़ जाता है.


उधर उस मरघट में
उठती लपटें भी सकूं देती है
चलो, अच्छा ही हुआ,
एक व्यक्ति अपनी मंजिल तक पहुंचा...
तमाम चिंताएं, दुश्वारियां
अग्नि के हवाले कर.
वो निश्चित होकर चल दिया...
और, सब कुछ धुंए में उड़ जाता है.

दूर घाट के पार अघोरी
जो चिता की आग से
अपनी धूनी जमाये बैठा है
खुनी खोपड़ी - कटा निम्बू,
कुछ सिन्दूर – शास्वत सा.
और मदिरा... आहुति के लिए
अपने कर्म-दुष्कर्म,
मदिरा बन होम कर दिए अग्नि में
और
सब कुछ धुंए में उड़ जाता है.

और मैं यहाँ ....
अपने घर में....
जहाँ सास-बहु के रिश्तों की सनक
नहीं देखने देती राष्ट्रीय नेताओं की हरकत....
कसमकसा रहा हूँ  ...
उस मजदूर का, मरघट का और अघोरी का
धुंवा अंदर भर रहा हूँ..
विद्रोह दबा रहा हूँ...
अग्नि अंदर ही अंदर सुलगा रहा हूँ.
-:-

मित्रों बक तो दी - जो दिल में थी........ देखना ये है कि आज की बक बक कहाँ तक आपके हृदय को छूती है, या फिर बेरंग ही वापिस आती है : जय राम जी की.
बाकलम खुद
दीपक बाबा 

25 टिप्‍पणियां:

  1. बाबा जी ये प्रवचन तो पिछले सारे प्रवचनो से धासंू निकला
    बाबा लिखते रहो और अपने मन की भडास निकालते रहो
    आज कविता ने सब धुंअे मे उडा दिया
    आपका विद्रोह बहुत जरूरी है जारी रखिये

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  2. और मैं यहाँ ....
    अपने घर में....
    जहाँ सास-बहु के रिश्तों की सनक
    नहीं देखने देती राष्ट्रीय नेताओं की हरकत....
    कसमकसा रहा हूँ ...
    उस मजदूर का, मरघट का और अघोरी का
    धुंवा अंदर भर रहा हूँ..
    विद्रोह दबा रहा हूँ...
    अग्नि अंदर ही अंदर सुलगा रहा हूँ.
    shanti main hi shakti hai.

    उत्तर देंहटाएं
  3. विद्रोह दबा रहा हूँ...
    अग्नि अंदर ही अंदर सुलगा रहा हूँ
    एक दिन तो ज्वालामुखी फटेगा तब क्या होगा ?
    आपके व्लाग पर पहली बार आया हूँ बहुत ही सवेदनशील लेख और रचना पढने को मिली धन्यवाद !

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  4. सच कह रहे हैं आप ! एक संवेदनशील पोस्ट.. कविता भी..

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  5. दीपक जी,

    मन की बतियां कहीं न कहीं इसी तरह बाहर आ जांय तो अच्छा रहता है, भड़ास निकल जाने का सुकून मिलता है :)

    वैसे कविता सुन्दर है। मस्त लिखा।

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  6. @दीपक सैनी जी, पूर्विया जी, आप मेरे पखों को और ऊँचाई का हौंसले देते हैं, आभार.
    @सुनील कुमार जी, स्वागत है
    @अरुण जी, आप कवि हरदय है, अत: कविता आपको अच्छी लगी.

    @सतीश पंचम जी, बहुत बहुत स्वागत है, कुछ यूँ लगा जैसे पूर्णता की और दो कदम और मैं चला.

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  7. दीपक बाबू!आपके ब्लॉग का टिप्पणी बक्सा कम पड़ जाएगा और सारा मेमोरी स्पेस खतम हो जाएगायह बताने के लिए कि आपका कबिता (आप इसको चाहे जो कहिए)कहाँ और केतना असर करता है!!
    कह दिया तो कहाँ से समझिएगा...कहने को तो हम भी अद्भुत, मार्मिक, घिनौना सच, लाजवाब और बहुत कुछ कह सकते हैं, काहे से कि बकबक हमको भी आता है..मगर अपना तो हाल चचा वाला हैः
    हाले दिल यार को लिखूँ कैसे, हाथ दिल ए जुदा नहीं होता!
    रिपीट हो गया हो तो भी सच्चा मानिएगा!!

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  8. बहुत सच्ची बात बक दिए बाबा सुरूर में..................

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  9. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

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  10. बढ़िया और ईमानदार बयान ....घर तक मत पंहुचा करो बाकी बहुत बढ़िया है !
    शुभकामनायें !

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  11. भाई दीपक जी, आप तो दो पैग लगाकर कविता कर गए लेकिन हम तो बिना पैग के ही इस दुनिया को देख रहे हैं और सहन कर रहे है। लेकिन आग सुलगती रहनी चाहिए।

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  12. Baba-khud jalte raho aur hamein bhi jalate raho-Shayad jalane ke bad kuchh kam ki vastu mil jaye. Bam shankar dushman ko tang kar. Baba mere blog par aiye aur ek chilam mar kar Ashirvad to de jaiye. Very nice

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  13. हो कहीं भी आग लेकिन, आग जलनी चाहिये.....
    हर बात दिल को छू रही है बाबाजी।

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  14. उस मजदूर का, मरघट का और अघोरी का
    धुंवा अंदर भर रहा हूँ..
    विद्रोह दबा रहा हूँ...
    अग्नि अंदर ही अंदर सुलगा रहा हूँ.

    यह आग सुलगी रहनी चाहिए ...कभी तो बाहर निकलेगी और भड़केगी ....बहुत विचारणीय रचना ..

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  15. @सतीश जी, काहे आप घर तक पहुँच जाते है...... टीवी पर आने वाले सास बहु शो की बात कर रहा हूँ......

    भावनाओं को समझो महाशय.


    @प्रेम सरोवर......... चिलम में माल तो डालते जाओ...... खाली पीली आसिरवाद मांगते हो.

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  16. जैसा समझाया ...मैं समझ गया महाशय !
    यह महाशय क्या चीज़ है ??
    बाबा ज्ञान दो !

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  17. पहली बार आपके ब्लॉग पर आया ! हृदयस्पर्शी कविता पढ़कर आना सार्थक हुआ!
    साधुवाद !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  18. आपका नाम युहीं दीपक बाबा नहीं और आपके ब्लॉग का नाम युही दीपक बाबा की बकबक नहीं...
    :)
    ये बकबक बहुत पसंद आई :)

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  19. बाबा,
    कभी कभी एक टिपण्णी दान गरीबों को भी दे दिया करो ...भगवान् आपका भला करेगा !
    आशीर्वाद की इच्छा में

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  20. aapne aapni bak -bak ke bahaane apne andar ke jajbaat ko yatharth roop diya hai .viase agar man ki baat kisi se baant le to thoda shakun to ho hi jaata hai.chaliye isi bahaane aapne apne man ki bhadas nikal di .achha kiya,varna andar hi andar khchdi pak kar jaane kya gul khilati.
    badhiya prastiti.
    poonam

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  21. दूसरा पैग लगाते ही की-बोर्ड की दरकार हो उठती है और बन्दा बेकरार हो उठता है..... चलो कविता ही सही. नहीं आती लिखनी तो भी लिखो..........
    क्या बात हे दीपक जी विद्रोह यदी कविता के रूप में ढल जाये तो जन वाणी बन जाती हे ,बहुत बढ़िया..दीपक बाबा की बक बक |
    http://jaishariram-man.blogspot.com/2010/12/blog-post_05.html

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  22. आपके ब्लॉग पर पहली दफा आया हूँ | पता चला कि जीवन की वास्तविकता क्या होती है | आपका लेखन वाकई काबिलेतारीफ है | सही दिशा में सकारात्मक प्रयास है | जारी रखिए ...

    उत्तर देंहटाएं
  23. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना कल मंगलवार 14 -12 -2010
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..


    http://charchamanch.uchcharan.com/

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बक बक को समय देने के लिए आभार.
मार्गदर्शन और उत्साह बनाने के लिए टिप्पणी बॉक्स हाज़िर है.