17.12.10

दर्द का खरीदार हूं - कविता.....

दर्द का खरीदार हूं,
दर्द खरीदता हूँ......
जितने दर्द हो दे दीजिए.......


बहुत अजीब लगा.... ये फेरी वाला


मैडम ....... ढूंढ लीजिए..
दिलों दिमाग में,
कल फिर आ जायूँगा...
क्यों भई, क्या रेट खरीदोगे.. दर्द
मैडम, दर्द का कोई भाव नहीं......
ये तो बेमोल है....
जितना संभाल सकते हो ....
उतना ही संभालिए.....
न संभले तो हमें दीजिए.....
बराबर तौल कर खुशियाँ दे जाऊँगा...
आपका दर्द ले जाऊँगा.

नहीं भई, आजकल जमाना कैश का है...
खुशियाँ क्या करनी है.....
उन्हीं खुशियों के बदले ही तो दर्द लिया है...
तुम दर्द ले जायो ...और कैश दे जाना...
ठीक है, बीवी जी, जैसे आपकी मर्ज़ी.....
मैं नहीं देखता... नफा नुकसान..
मुझे नहीं मालूम सही पहचान....
बस ऐसा ही सौदागर हूं.

23 टिप्‍पणियां:

  1. सही है बाबा ,
    आपने भी दर्द ठेले बाले को बेच कर कैश ले लिया ....
    आजकल काम केवल कैश आता है !

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  2. इस दर्द के सौदागर को हमारा सलाम...

    नीरज

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  3. बधाई! यह कविता सोच में डालती है।
    बार्टर सिस्टम के भीतर रहते हुए दु:ख सुख बाँटने का प्रस्ताव कहीं पुरातन मानवीय साझेपन को दिखाता है - आओ साझा कर लें, तुम थोड़ा हँस लो और मैं भी थोड़ी आँखें नम कर लूँ।
    लेकिन अंतिम पैरा में 'कैश' प्रस्ताव, नफा नुकसान और सही पहचान की बात एक झटके से उस त्रासदी को उघाड़ देती है जिससे आज समाज त्रस्त है - सब कुछ बिकाऊ है, कैश चाहिए। पर सब कुछ के बाद भी दर्द वहीं रह जाता है। खुशियाँ लिए नासमझ सौदागर अपने धन्धे की तौहीनी पर मन मसोसने के अलावा कर ही क्या सकता है?
    ...अमाँ सही में स्वयं को आचार्य समझने लगे हो क्या? फूटो यहाँ से। :)

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  4. नहीं भई, आजकल जमाना कैश का है...
    खुशियाँ क्या करनी है.....
    उन्हीं खुशियों के बदले ही तो दर्द लिया है...
    तुम दर्द ले जायो ...और कैश दे जाना...
    ठीक है, बीवी जी, जैसे आपकी मर्ज़ी.....
    मैं नहीं देखता... नफा नुकसान..
    मुझे नहीं मालूम सही पहचान....
    बस ऐसा ही सौदागर हूं.
    kis kis ka dard kharado ge -------

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  5. आपकी पोस्ट की चर्चा कल (18-12-2010 ) शनिवार के चर्चा मंच पर भी है ...अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव दे कर मार्गदर्शन करें ...आभार .

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  6. बाबा जी प्रणाम
    हमारे दिल की दुकान मे बहुत सामान (दर्द) है
    सौदागर को हमारे गरीबखाने पर भी भेज देना

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  7. आचार्य ,
    @आचार्य........... गिरिजेश राव जी.
    आओ साझा कर लें, तुम थोड़ा हँस लो और मैं भी थोड़ी आँखें नम कर लूँ।
    कविता तो मैंने लिखी थे, पर भाव आपने उजागर कर दिए........ सही में. .... हमारी पुरातन सभ्यता रुपे और डालर से पहले येही बार्टर सिस्टम चलता था.........

    जल्दबाजी मेरी वैयक्तिक कमजोरी है मन में तो बहुत था......... पर डर हमेशा व्यक्तित्व पर हावी रहता है........ 'बीबीजी' शब्द आ गया था...... और कविता उस डगर पर चल पड़ी थी जहाँ नारीवादी कार्यकर्ता धरना के लिए तैयार रहते हैं........ अत: कविता को अचान्चक खत्म करना पड़ा........... अधूरी ही लग रही है.............

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  8. दीपक बाबा ,
    मुझे लगता है ब्लॉग जगत की दुर्दशा के बारे में अच्छे जानकार हो ...बहुत बढ़िया सुझाव लाये हो आपका स्वागत करता हूँ !
    पहल करने वाले भीड़ में से नहीं ढूंढे जाते वे अपने आप आगे आते हैं और रास्ता भी बनाते हैं ! मुझे जो कहना था डॉ अरविन्द मिश्र के ब्लॉग पर कह चूका हूँ मगर ध्यान रहे मीटिंग में आया एक भी गलत आदमी आपका सारा उद्देश्य खराब कर सकता है अतः अधिक लोगों के चक्कर में न पड़ काम शुरू करें !
    मुझे आप पर भरोसा है आप कुछ विश्वसनीय और ईमानदार लोगों की एक कमेटी बनाइये मुझे जो काम देंगे कर लूँगा !

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  9. कैश, नफ़ा, नुकसान... ये शब्द आपकी दिक्षनारे एन कहाँ से आ गए...!! दुखों को खरीदने के धंदे ने आपको भी सौदागर आना दिया!! सलाह देने के लिए मैं बौना हूँ... पर इस वेदना में जो दुःख नज़र आ रहा है उसे खरीदने को तैयार हूँ... मुंहमांगी कीमत दूंगा दीपक बाबू! बोली लगाओ!!

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  10. नफा नुक्सान से परे दर्द खरीदने वाली हस्ती को प्रणाम!

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  11. मैडमों से फ़ुर्सत पा लो तो बाबाजी हमारी तरफ़ भी चक्कर लगा लेना, पाव-डेढ़ पाव दर्द हमसे भी ले जाओ, छटांक भर खुशियां दे जाना:)

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  12. क्या सटीक लिखा है बाबा..

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  13. दीपक भाई, दुनिया में दर्द तो बहुतायात में है, पर उसके खरीददार आप पहले मिले हैं। आपकी इस सदभावना को सलाम करने को जी चाहता है।

    ---------
    छुई-मुई सी नाज़ुक...
    कुँवर बच्‍चों के बचपन को बचालो।

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  14. कोई सौदागर हो तो हमारी ओर भी प्रेषित करें

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  15. दीपक जी अपने व्यापार मे हमे भी शामिल कर लीजिये । सच किसी के दर्द लेकर जो खुशी मिलती है उतनी खुशी शायद किसी को खुशी देकर भी नही मिलती ।
    मै कैश नही मांगूगी ।

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  16. धंधे की बात है? लेकिन अच्छी बात है

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  17. बहुत खूब ... दर्द का खरीदार ... असल में तो कोई नहीं मिलेगा ... दर्द देने वाले जरूर मिल जाते हैं ... भरे पड़े हैं दुनिया में ...

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बक बक को समय देने के लिए आभार.
मार्गदर्शन और उत्साह बनाने के लिए टिप्पणी बॉक्स हाज़िर है.