17.12.10

दर्द का खरीदार हूं - कविता.....

दर्द का खरीदार हूं,
दर्द खरीदता हूँ......
जितने दर्द हो दे दीजिए.......


बहुत अजीब लगा.... ये फेरी वाला


मैडम ....... ढूंढ लीजिए..
दिलों दिमाग में,
कल फिर आ जायूँगा...
क्यों भई, क्या रेट खरीदोगे.. दर्द
मैडम, दर्द का कोई भाव नहीं......
ये तो बेमोल है....
जितना संभाल सकते हो ....
उतना ही संभालिए.....
न संभले तो हमें दीजिए.....
बराबर तौल कर खुशियाँ दे जाऊँगा...
आपका दर्द ले जाऊँगा.

नहीं भई, आजकल जमाना कैश का है...
खुशियाँ क्या करनी है.....
उन्हीं खुशियों के बदले ही तो दर्द लिया है...
तुम दर्द ले जायो ...और कैश दे जाना...
ठीक है, बीवी जी, जैसे आपकी मर्ज़ी.....
मैं नहीं देखता... नफा नुकसान..
मुझे नहीं मालूम सही पहचान....
बस ऐसा ही सौदागर हूं.