7.1.11

तिरंगे का वजूद बढता रहे..

एक अरब से ऊपर लोग......
अरुणोदय से ले कर कन्याकुंवारी.........
तिरंगे का वजूद बढता रहे...

संसद में ‘निरीह’ सांसदों को बचाते....
बन्दूक ताने वो .....
बचाते रहे इनको ......
गोली दागते रहे उनपर - मरते दम तक
जब गाँव में मिटटी पहुंचे तो...
तिरंगे में लिपटा हो.....
गाँव धन्य हो जाय........
मुख्यमंत्री जी के आने से...
विधायक की सलामी से......
तिरंगे का वजूद बढता रहे...


केस स्पेशल है, .. कोर्ट स्पेशल है...
ऑर्डर स्पेशल है... सेल स्पेशल है.....
फ़ाइल दब गई है - खबर दब गई है,
महाघोटालों के बोझ तले
वो खाता है बिरयानी......
नायक का दर्ज़ा है उस देश में...
कुछ भी नहीं होगा, यहाँ, इस सोफ्ट स्टेट में....
गाजी बने या नहीं, पर यहाँ से अच्छे रहोगे....
ये बम ले जा कर फोड़ दो
उनको मुबारक हो- तिरंगे के हरे रंग से प्रेम,
तुम बम फोड़ते रहो....
और पूर्ववर्ती की तरह.
बिरयानी उड़ाते रहो..
लोग शहीद होते रहे, और
तिरंगे का वजूद बढता रहे...


ऊँची कुर्सी पर बैठ कर ....
वह न्याय का हथोड़ा बजाता है.....
अपने नातेदारों को ...
और अधिक धनाढ्य बनाता है......
उसके बाद मानवाधिकारवादी बन
रिश्तों को निभाता है..
उस पर भी तो
तिरंगे का वजूद बढता रहे...

एक दूर देश की नारी.....
अबला विधवा बेचारी...
आती है यहाँ जाहिलों के देश में.
काहिलों के बीच राज करने को,
१२५ साल पुराने पापों को ढोने को,
नए पाप चमकाने को,
ताकि, तिरंगे का वजूद बढता रहे...

उस पार से आते ५०० के नोट
मेहनताना है बस पत्थर फैंकने का ...
और वो जो बचे हुए... नहीं फैंकते पत्थर ...
मांगते फिरते हैं भीख..
राजधानी की सड़कों पर
वो गुलाबी गालों वाली कलियाँ अब....
नहीं चहकती...
लरजते हैं कलेजे...
कापतें है पहाड़.....
व्यथित हैं सुधिजन...
पर, तिरंगे का वजूद बढता रहे...