26.1.11

गण के तंत्र की बधाई कबूल फरमाइए ......


गण का तंत्र हूँ या फिर तंत्र का गण हूँ, पर सलाम कबूल फरमाइए और ये प्रशन भी, क्यों कि आज इस तंत्र की या फिर कहें गणतंत्र की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर भी इसका जवाब नहीं मिल पा रहा. या कहें कोई भी फैसला नहीं कर पा रहा कि वो इस तंत्र का गण है या फिर खुद ही तंत्र है.... इसका जवाब विकिपीडिया भी नहीं देता. सब मौन हैं – और ये मौन जो सन्नाटा उपजता है वो कई अर्थों में स्वयं गणतंत्र की अंतरध्वनि को झंझकोरता है. उत्देलित करता है.


एक जिम्मेवार सरकार का जिम्मेवार नुमाईंदा आज कह रहा है कि इस देश में कालाधन रखने वाले लोगों के नाम बताने के लिए सरकार जिम्मेवार नहीं है..... शायद उन लोगों के नाम छिपाने के लिए सरकार बाध्य है... कालाधन रखने वाले लोगों के नाम गुप्त के लिए कानून है और उजागर करने के लिए कानून बनाया जाएगा या फिर कालाधन के उन्मूलन के कानून बनाया जाएगा? -  ये भी प्रश्न उस प्रकार खड़े हो जाते हैं जैसे कि गण और तंत्र के रिश्तों के. 

आज इस महान राष्ट्र में इन्हीं तानो बानो से उलझे एक राष्ट्रिय त्यौहार की पूर्व संध्या पर एक एडिशनल कलेक्‍टर को सरे आम जला दिया जाता है. उस एडीएम का कसूर सिर्फ इतना था कि वो पैट्रोल में कैरोसिन की मिलावट रोक रहा था. कितना बड़ा गुनाह कर रहा था. इस देश में ऐसे ईमानदार लोगों की रही सजा है. चाहे उसके बाद उसके परिवार को २५ लाख रुपे दे दो.

उधर वो पगले लाल चौक पर तिरंगा फिराने की युक्त भिड़ा रहे हैं..... उन्हें ये नहीं मालूम कि वो जगह मात्र अलगाववादियों के लिए सुरक्षित है आरक्षित है..... वहाँ पकिस्तान का झंडा फिराया जा सकता है..... बिना किसी अड़चन के.... वहाँ से एक गृहमंत्री की बिटिया अपहृत की जा सकती है..... तब कोई कुछ नहीं बोलता... आज तिरंगे के नाम पर पुरे देश में तूफ़ान मचा है..... जैसे कोई गुनाह हो रहा हो...... गृहमंत्री से लेकर प्रधान मंत्री सभी परेशान है..... बरसों पुरानी धर्मनिरपेक्षता की दुहाई दी जा रही है...... और कुछ इस तरह कहा जा रहा है मनो ..... अभी तो बच्चों (उग्रवादिओं) को समझा बुझा कर सुलाया (बहलाया) है फिर जाग गए तो आंतक बरपा देंगे....

गण परेशान हैं, वो देखो

वो देखिये, वो सरदार जी, जो इस तंत्र का एक हिस्सा हैं या फिर कहें गण हैं, (अभी तक  प्रश्न अनुतरित हैं) बदहाल .... कदम डगमगा रहे हैं, पगड़ी .... पीछे १५ फूट तक चली आ रही है, और दोनों हाथों से उसे संवारते है डगमगाते हैं........ बुदबुदाते हैं....... यार एस सरदार ने साडा ना मिटटी विच मिला दित्ता...... खैर छोडिये इनको.. पहले तो ये शराबी है, दूसरे कसूरवार है समाज के और क़ानून के (सार्वजनिक जगह पर मदपान करना गैरकानूनी है) इसकी बात पर क्या भरोसा करें...... हम भरोसा करते हैं डी टी सी की टाटा वाली ग्रीन बस के कंडक्टर का....... भाई साब आप खाम्खावाह महंगाई का रोना रो रहे हैं..... अगर प्याज ७० रुपे किलो मिल रहे हैं तो जरूरी है खाना ....... मेरी तरह मटर की चटट्नी बना के खा लो...... ये देखो (वो अपना टिफिन निकलता है उसमे एक छोटी सी डिबिया में हरे रंग की चटट्नी है) कुछ अभी दोपहर को रोटी के साथ खाऊंगा और बाकि रात को कहाँ है मंहगाई. ये भी तंत्र के गण हैं.

कल जब शान से हमारे सेना अर्धसैनिक बलों और के जवान सीना चौड़ा कर के राजपथ पर सलामी देंगे तो हो सकता है कुछ देर के लिए ये सभी गम भुला दिए जाएँ..... अत: रात को ही ये पोस्ट लिखी जा रही है.

आप किस तरह के गण है इस तंत्र के? या फिर गण के लिए कैसा तंत्र रचा जा रहा है? जब तक इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलेंगे तब तक ये गणतंत्र अधूरा है.


बहुत दिन बाद आज आना हुवा, सर्वाइकल हो गया है पर दर्द २-३ दिन से नहीं है. डाक्टर ने कम्प्युटर पर ज्यादा बैठने को मना किया ...... पर दिल है के मानता नहीं.
बहरहाल जय राम जी की.