4.4.11

नव संवत २०६८ - शुभ, मंगल और शांतिदायक हो.


     नव वर्ष है..... हाँ, बस घर में रसोई से उठते कुछ पकवानों की महक... और माताजी की प्रात: जल्दी जागने की तक्सीद, या फिर बीते कल (पिछले संवत की आखिरी सुबह) कुछ लोग, (ह्रदय से नौजवान – और शरीर से अधेड), द्वारा एकत्रीकरण में देश समाज के बारे में सामूहीक विचार विमर्श, बस. ......
........... नव संवत है, बस यहीं से पता चलता है, न टीवी पर कोई झिक झिक, न मध्य रात्री में मोबाईल फोन पर सरकते मैसेज........ भारतीयता के सादे ढंग की तरह सादा हमारा नववर्ष – वर्ष प्रतिपदा .....
   क्या क्या सोचते है और कर्म की गति कहाँ ले जाकर पटकती है, कोई नहीं जानता.
मैं तो बनसा राम दा पुजारी ...
पर चा बैठा हाँ ऐ गठरी भारी..
    ये भारी गठरी खुद ही तो उठाई है, दीन-दुनिया की, माया की... सभी कुछ.  धीरे धीरे सामान इकठ्ठा किया, फिर जोड़ जोड़ कर गठरी में भरता गया..... कुछ और सामान.... और उसके बाद और, माया ..... और ... ताकि गठरी को आसानी से उठा लूं, भाड़े के बंदे बुला लूँगा ... स्वयं तो बस राम का पुजारी ही रहूँगा न.

और वो भाड़े के बंदे भी तो मेरी गठरी भारी करने पर लगे है....

अपनी ख्वाईशों को पूर्ण करने के लिए ... और सामान, अपने परिवार के लिए और सामान.... समाज में रुतबा बढ़ाने के लिए और, और सही में राम जी के लिए भी ....... पता नहीं क्या क्या..... घर मकान, फैक्टरी गोदाम, घोडा गाडी... बंगला जमीन....... कहीं भी अंत नहीं ..... गठरी तो वजनदार होगी ही न....

कैसे उठेगी, कैसे चलूँगा......... तपस्या बहुत है..... गृहस्थ का तप है ... किसी तपस्या से थोड़े कम है....  आदिवासी.... वनवासी सभी तो मिशिनरी या फिर नक्सली के रहमोकरम पर है..... बाकि तो सब ने अपनी गठरी उठा रखी है.

कहीं नीमघनी छाँव भी तो नहीं .......... कि गठरी नीचे रख ले और घडी-दो-घडी बैठ सुस्ता लें...

आज नव वर्ष पर बस यही सोच है...... भारी सामान है और दूर तक जाना है.....

नव संवत २०६८ आप और आपके परिवार के लिए शुभ, मंगल और शांतिदायक हो.

जय राम जी की.