5.4.12

देखन आये जगत तमाशा.

      दायें बाएं देखता हूँ, कुछ कोशिश जारी रखता हूँ, अपने वजूद को पहचाने की - उस बच्चे मानिंद जो देखता है छूता  है - और वस्तु को उसकी प्रकुति के हिसाब से पहचानता है... पर क्या किया जाय कि बच्चे जितनी जिज्ञासा भी खत्म हो चुकी है. फिर किसी उदासीन बाबा की तरह दुनिया को देखता भालता हूँ, कोशिश करता हूँ - समझना चाहता हूँ

मेरे पात्र बैताल की तरह चढ़ जाते हैं सिर और कंधे परपूछते हैं हजार सवाल।

मुझमें इतना कहाँ विक्रम जो दे सकूं जवाब ...रोज़ मेरा सिर हजार टुकड़े होता है।

      क्या बताऊँ, ये पात्र है, कई बार कहना मान भी जाते हैं  - पर इस दीन दुनिया का क्या किया जाए, ये तो रोज ही मेरे वजूद के हज़ार टुकड़े करती है, और मैं रोज मर मर जाता हूँ, और फिर जीवित हो उठ भागता हूँ, गिरता हूँ, संभलता हूँ, फिर भागता हूँ, भागते भागते रुक कर हाँफते हाँफते सोचता हूँ, कि जीवन एक जिद्द है - पूर्ण करना है, आनंद है - परमआनंद होना है, कि रास है - महारास तक पहुंचना है, - जीवित रहना है अत: बहुत कुछ सहना है...  और दिन को फिर से एक धक्का लगाना है... कि आज तो जा - कल फिर देखेंगे.... जय राम जी की .