11.5.12

मेरे दोस्त, मैं एक बार तो मरना चाहता हूँ

नहीं नहीं, तुम गलत समझे मेरे दोस्त,  
मैं मरना तो चाहता हूँ, पर मर कर दुबारा जिन्दा भी होना चाहता हूँ,
मैं देखना चाहता हूँ, कैसे और क्यों मुझे कोई कंधे पर उठता है, बवजूद इसके कि मैं जानता हूँ, कि अब कंधे किसी भी अर्थी कर वज़न नहीं उठा पायेंगे, क्योंकि वो त्रस्त है,
पहले ही झुके हैं वो कंधे, परिवार के अरमानो को झूलते झुलाते,
दूध सब्जी और राशन के थोडा सा बौझ पर इतने पैसे लुटाते, सिगरेट का कश भी गिन गिन पीते, 
झुके झुके से चल कुछ गुनगुनाते बडबडाते, बुदबुदाते,मन ही मन, मन को समझाते, गिरे नयनो से घर को आते, उनके कंधो का वज़न और तोलना चाहता हूँ,



मेरे दोस्त, मैं एक बार मारना तो चाहता हूँ, पर मर कर दुबारा जिन्दा भी होना चाहता हूँ,
चाहता हूँ, कि देखूं, उन दुशालों के रंग - जो मेरी महायात्रा के दौरान मेरे को उडाई गई, जिसको जीते जी तरसा था, उन इत्र, मखाना, नारियल को, उसी सम्मान को, उस नमन को, देखना चाहता हूँ,
उस पवित्र अग्नि की दहकती प्रचंड लपटों को कुछ कुछ मैं महसूस करना चाहता हूँ, कि मेरे भी दिल में दहकते थे कुछ सवाल जो अनुतरित रह गए, क्या वो ऊष्मा कुछ अलग थी, और ये कुछ अलग सी है,
मित्र, वास्तव में, मैं एक बार मरना चाहता हूँ, पर दुबारा जिन्दा भी होना चाहता हूँ,


जिन्दा इसलिए कि समझा सकूं, सब व्यर्थ था,
मेरी कोठी, कार, मेरा वैभव, मेरा कुटुंब - जिसके लिए मैंने वो सब किया जो नहीं करना चाहिए था, मेरे षडयंत्र, मेरे काले कारनामे सब व्यर्थ था, सब व्यर्थ, मेरे दोस्त सब समझाऊंगा तुम्हे, फिर से जिन्दा होकर.