18.5.12

जीव ज्ञानोदय (कहानी)

तुम अपनी तीव्रता और मेघा खोते जा रहे हो मिस्टर आनंद, रतलाम डेवेलोपेर्स प्रोजेक्ट में तुमने जो भूलें की वो बर्शास्त से बाहर है, इससे पहले भी कई बार में तुम्हे चेतावनी दे चूका हूँ, पर तुम्हारे कानो में जूँ तक नहीं रेंगती ..

सर झटक दिया आनंद ने , और पूर्व की भांति ही गंगा को देखते हुए, हर की पौड़ी से चल दिया. दिमाग में मिस्टर घई का क्रोध से तमतमाया हुआ चेहरा उसके जेहन में जीवन्त हो उठता है.

पता नहीं क्यों, ऐसा कैसे हो गया, आनंद जैसे कॉपी राइटर कम विजुलाजर कम ग्राफिक डिजाइनर का दिमाग भनभनाता रहा, मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है, कहाँ जीरो आइडिया से में काम शुरू करता हूँ, और पूर्ण होते होते क्लाईंट और एम् डी  की कितनी शाबाशी मुझे मिलती है ... पर जब फाइनल विज्ञापन अखबार में छप कर आता है तो कोई न कोई ऐसी गलती छप जाती है कि जितनी शाबाशी मिली थी उससे कहीं ज्यादा गालियाँ सुननी पड़ती हैं.

फक आल दीज़ थिंग्स एंड एन्जॉय योरसेल्फ.... सोच  कर उसने सर पटका  डेव की पेत प्लास्टिक बोतल को मुंह से लगा कर एक चुस्की ली. सुबह ही एक अद्धा जिन का उस ने डेव में मिक्स कर दिया था, ताकि धार्मिक स्थल पर कुछ ऐसा न हो जाए जिसके लिए समाज उसका तिस्कार कर दे. वैसे अब तक घर क्या, कम्पनी से लेकर समाज तक हर जगह उसका तिस्कार हो चूका था.


पता नहीं क्यों लोग शादी करते हैं और शादी करने के बाद संयुक्त परिवार में रहते हैं. पता नहीं क्यों. कितने अरमान होते हैं, परिवार के. पर शादी के १ माह के अंदर ही पता चल जाता है कि वो माँ अब माँ नहीं रही और वो बहिन अब बहिन, और जिस अपरचित लड़की को परिवार के कहने पर पत्नी बना कर लाया था, जिसकी बात को वो इग्नोर करते आया, वही कई बार सही लगती है पर उसका दिल नहीं मानता ... .पता नहीं क्यों, ऐसा क्या परिवर्तन आ जाता है परिवार में ... 

गंगा के बहाव से विपरीत दिशा में आती ठंडी हवा उसे झंझ्कोर जाती है...  उम्मीदें... और कामयाबी की ख्वाईशये.. वही सब उसमे तब थी जब वो बी एफ कर के निकला था, और जब स्मृति से शादी हुई थी तब भी एक बार खामख्वाह ही उसकी ख्वाइशो ने जोर मारा था... 

पीर पैगम्बर - देवता सब सामने दीखते प्रतीत होते है, जीने तो नहीं दिया, सुसरे - शान्ति से मरने भी नहीं देते....
कहता हुआ फिर एक घूँट डेव की बोतल से भरता है पर उस जिन को महसूस नहीं कर पता जो वो डेस्क पर करता था.  गंगा जी शान्ति को बहा ले गयी - बाकी गंदगी की तरह - मन की शांति भी एक मात्र शरीर के गंदगी बन के रह गयी है. 

उन्ह :) तुम फिलोसफर बहुत बनते हो पर मृत्यु को लेकर ही.. दीन दुनिया की कुछ खबर रखनी रही, मृत्यु के बारे में क्या सोचना वो आचानक आती है... जिंदगी को एन्जॉय करो आनंद - सर के बालों में हाथ फेराती हुई संलमा उसे कहती है. और वो याद कर के अचानक सेहर उठता है... हाँ क्यों मैं मृत्यु को याद करता हूँ,  क्यों. जबकि मालूम है कि उसका एक तयशुदा दिन है, और उसी दिन ही वो आयेगी. गर सभी कष्टों से निजात पानी है तो उसी कर वरन करना है,   

एवं मृत्यु जायमान विदित्वा
ज्ञाने तिष्ठन न विभेतीह मृत्यो: |
विन्श्यते विषये तस्य मृत्यु-
मृत्योयर्था विषयम प्राप्य मर्त्य: ||

इस प्रकार मोह से होने वाली मृत्यु को जानकार जो ज्ञाननिष्ट हो जाता है, वो इस लोक में मृत्यु से कभी नहीं डरता| उसके समीप आकार मृत्यु उसी प्रकार नष्ट हो जाती, जैसे मृत्यु के अधिकार में आया हुआ मरनधर्मा मानव.


बाबा शायद भागवत का पाठ कर रहे हैं, उस भी घर परिवार का मोह छोडना ही होगा, गर - शान्ति को प्राप्त करना है, मृत्यु के आगोश में जाना है, जैसे भी, उसे सब छोडना होगा, 

सोचता सोचता वो चला जा रहा है गंगा किनारे किनारे.  जारी.