14.6.12

६० साल के जवान या बूढ़े.

“मौत” शब्द सुनते ही कई बार शरीर में झुनझुनी सी लहर जाती है. और कहीं हंसी ठहाकों के बीच मौत शब्द का उच्चारण भी अगर कर लिया जाये तो महफ़िल एक दम संजीदा हो उठती है. पर अपने अस्सी का क्या किया जाए... काशी सिंह के नहीं. तिहाड गाँव में झीलवाले पार्क में लगने वाली सुबह की महफ़िल की बात कर रहा हूँ. जहाँ नजदीक ही शमशान घाट है. और मौत, फट्टा, चादर, घाट नो. ३६ जैसे शब्दों का प्रयोग ऐसे किया जाता मानो फन सिनेमा में लगी किसी फिल्म का.
सायं को जब पैसे मिला कर दारू के व्यवस्था तो हो गयी, पर जब शीतल जल खरीदने की बारी आई तो मितर बोला, खाम्खावाह पैसे खराब करने वाली बात है. शमशान में से ही चिल्ड वाटर भर लाते है. रात के ८ बजे . तो क्या- सब तो जल गए – उठ थोड़े जायेंगे. हम कौन सा सेब आम लीची उठाने जा रहे हैं (चौथे कर्म निमित रखे गए फल एवं मिठाई) J और उठ भी गए तो क्या, दो पेग वो भी ले लेगा.
और सुबह ..
मितर एक बात बताऊं, जब तुम मरोगे तो मैं सुंदर सी चादर कम से कम ग्यारह सौ वाली तुम्हारे पर चढाऊंगा. सच्ची, हाँ मितर... दुनिया भी याद करेगी, कि यारी सी यारां दी.
पर मितर क्या करे आदत से मजबूर, पूरा दिन जुआ खेलने में निकल गया और किस्मत तो शुरू से ही पाण्डुओं वाली, शाम तक खाली हाथ. पुरे दिन की मेहनत और हार के गम को सहन करने के लिए फिर से एक हरे गांधी की दरकार हो उठी, कहीं कोई रास्ता नहीं सूझा तो, देर रात मितर के दरवाजे पर ही आस ले पहुंचे,
देखो मितर, तेरा प्रेम बिलकुल पवितर उन्दे विच कोई दो राय नई. पर जो ग्यारह सौ रूपए मेरी चादर वास्ते संभाल रखे हन, उन्दे विच पंच सौ रुपये मेनू हुने दे दे. कल किसने देखा है यार – मैंने मरुँ या न मरुँ. J
साहेब रोज २-३ ग़ालिब के शेर अपनी मर्ज़ी से सुनाते हैं, और जब चलने लगते है तो पीछे से आवाज़ दी जाती है साहेब, एक शेर तो ओर सुनाते जाइए, ओर मज़े की बात, इनकी ये ग़ालिब शायरी सभी के उपर से निकल जाती है. और इनके जाने के बाद कभी कभी ऐसे ऐसे शेर सुनने को मिल जाते हैं कि ग़ालिब गर कब्र से उठ बैठा तो अपना सर पीटने लगेगा, बेशक ये लोग उसको फ्री में दारू पिलायें.

विशेष नोट : पोस्ट का  का चित्र से कोई सम्बन्ध नहीं, आप चाहे तो बना सकते हैं ये आपके  विवेक पर निर्भर करता है, मुझे कोई दिक्कत नहीं, पर साहेब लोगों को हो सकती है.
दूसरा: 
यार मेरी शुगर २२० पहुँच गयी है, ७० साल के सिंह साहेब ने कहा, ये कंजरखाना (दारू-मुर्गे की पार्टी) बंद करना पड़ेगा. नहीं, यार. शुगर की गोली आती है – वो शुरू कर दो. उससे क्या होगा. 
मेरे यार का फ्लेट खाली है, बच्चे बाहर गए है, आज का कन्जरखाना वहीँ. रोयल स्टेग की बोतल मेरी तरफ से.
यारों तुम मुझे मार के ही मानोगे. और मेरी मैय्यत पर शामिल होने भी नहीं आओगे. तुम्हे तो पता भी १०-१५ दिन बाद लगेगा.
नहीं सिंह साब, कैसी बातें करते हैं हर कंजरखाने सजाने के बाद अगले दिन आपका हाल पूछने आयेगे, और गर मर गए तो एक चादर पार्क के कंजरखाने वाली पार्टी की तरफ से आपके शववाहन पर चढाएंगे. आप चिंता मत कीजिए – बस शाम को ही शुरुआत कीजिए.
रहने दो, कल लोग तुम लोग मेरी चादर के कंट्रीबुशन के लिए फिर से लड़ाई झगडा करोगे, रहने दो.
कैसी बातें करते हैं सिंह साब, जब तक आपके रिश्तेदार पहुंचेगे तब तक तो हम चादर के लिए कंट्रीब्यूट कर चुके होंगे,
अरे छोडो, सब पुराने के पुराने कंजर हो जानता हूँ,
अरे नहीं सिंह साब, गर देर भी हो गयी तो ३-४ बंदे आपके घर वालों को रोकेंगे, और २-३ लोग यहीं से (शमशान की तरफ इशारा करते हुए) यूज की हुई चादर और नारियल उठा लायेंगे, यार यही तो सब जाकर दुबारा मार्किट में बिक जाते हैं.

ठीक है फिर शामी कित्थे मिलना है ते केडे टेम. रिंग करना, हूँन चलदा हाँ.

जी ये जिंदादिल लोग ठहाकों के बीच अपना रिटायर्ड जीवन व्यतीत रहे हैं....
तय कीजिए ६० साल के जवान या बूढ़े.

जय राम जी की.