9.6.12

शंघाई - राजनीति का स्टिंग ओप्रेशन करती फिल्म.

फिल्मे तो बहुत देखता हूँ, चोरी छुपे - : ) इस उम्र में भी  पर कभी किसी फिल्म की समीक्षा नहीं की. बक बक करने की आदत है तो शंघाई पर कर रहे हैं - 

दिबाकर बनर्जी के निर्देशन में बनी फिल्म शंघाई पुरानी कला फिल्म की तरह लगती है... याद कीजिए उन फिल्मो को जब तक दर्शक कुछ समझने की चेष्टा करते थे, परदे पर कलाकारों के नाम दिखने शुरू हो जाते थे, माने फिल्म खत्म हो जाती थी. कुछ वैसे ही.

जहां तक एक्टिंग की बात है, इमरान हाशमी, मुझे पहली बार एक अच्छे एक्टर के रूप में नज़र आया है, भट्ट खेमे की इमेज से उलट. दूसरा एक समय बाद सुप्रिया पाठक और फारूक शेख दिखे है. तीसरे अभय देओल – हाँ, आईएएस ऑफिसर टीए कृष्णन की भूमिका में अभय देओल जानदार अभिनय किया है.

सत्ताधारी पार्टी के IBP के पोस्टरों के साथ फिल्म शुरू हुई थी, और इस फिल्म में जिस डॉ अहमदी कार्यकर्ता (इन्ही के इर्द गिर्द कहानी की शुरुआत होती है) की मौत हो जाती है, उसकी पत्नी को ही अंत में उसी IBP पोस्टरों के साथ दिखाया गया है यानी राजनीति करती हुई अब वो सत्ता में आ गयी है. इस फिल्म में जो गुंडा डॉ अहमदी का मिनी ट्रक एक्सीडेंट से क़त्ल करता है वही अंत में भारत नगर को ढहाने के लिए जे सी बी चला रहा होता है – जो एक व्यक्ति के गिरगिट जैसे रंग बदलने की पराकाष्ठा है.


देखिये शंघाई,


राजनैतिक जलसे, जलूस, पोस्टर सभी कुछ मिलेगा, एम्बेसडर गाडी में काले शीशे के अंदर बैठे अफसर को देखिये – जो देश चलाने की कवायत में लगा है. किसी घटना के बाद जब सरकार कमेटी का गठन करती है ओर मनमाफिक रिपोर्ट न आने पर उस कमेटी का क्या हर्ष होता है - ये इस फिल्म में देखने को मिलेगा. नेता को देखिये – उपर से लेकर नीचे तक सत्ता की भागेदारी देखिये. सभी रंग है – अद्भुत. राजनीति – बिल्डर – अफसर और जनता. हाँ इस फिल्म में जनता का भी एक घिनोना पक्ष दिखाया गया है. उन्मादी जनता – वो नहीं जानती कल क्या होने वाला है – उसे नहीं मालूम की उसी की ही घर-जमीन उसके हाथों से निकलने वाली है. – पर वो अपने नेता की बातों में आती है. – चिकन दारू के चक्कर में कल को भूलती है – कहीं न कहीं कुछ लोगों को भी मोहल्ले स्तर पर सत्ता का स्वाद पहुँचता है.. यही फिल्म है जहाँ आप महसूस करेंगे.

अभिनेत्री के रूप में कल्कि है – ठीक ठाक काम किया है... पहले उसे अभय के साथ देव डी में देखा था. गाने शाने अपनी समझ से बाहर हैं. एक गीत है भारत माता की जय - इसका फिल्मांकन फूहड़ डांस के साथ किया गया है. सुना है इस गीत को लेकर कोई सामाजिक संगठन कोर्ट गया था – खाली हाथ लौट आया – अत: आप ये गीत उसी ट्यून में देख सकते हैं. देखिये भारत माता की जय. पहले ये नारा लगते समय अंदर के जज्बात जाग जाते थे, - अन्ना की तरह J अब देखिएगा – कुछ और ही जागने वाले एक्शन हैं. बाकि रिवाज़ के मुताबिक आइटम सोंग भी है – इम्पोर्टेड कमरिया - किसी विदेश अदाकारा ने जलवे बिखेरे हैं. 

फिर कहता हूँ, देखिये शंघाई ....

सुना है बम्बई ओर शंघाई एक जैसे शहर माना जाता था, अब शंघाई शंघाई है – दूसरे किसी विकसित देश की तरह – और बम्बई अब मुंबई हो चुका है – शंघाई से काफी पीछे – नेता लोग शंघाई का ख्वाब दिखाते रहे है – ओर दिखाते रहेंगे. मेरे ख्याल से इस फिल्म का नाम यहीं कहीं सोचा गया होगा.

देखिये, पास न लिखने को शब्द है – न किसी फिल्म की समीक्षा करने लायक मैं कभी रहा नहीं. हाँ एक बात, सिनेमा हाल का टार्चमैन बगल में ही बैठ गया था और उसके कमेंट्स थे – बोरिंग है यार. ...... पब्लिक को पसंद नहीं आएगी.
अंत में बधाई – शंघाई फिल्म के निर्माण में लगी पूरी टीम को. क्या है कि जो दिख रहे होते है वो तो ताली बटोर लेते हैं पर फिल्म निर्माण में कई लोगो की फौज होती है – स्पोट बॉय से लेकर एक्स्ट्रा भीड़ तक – हरेक का अहम रोल होता है फिल्म में. उन सभी को बधाई – 

आप भी देख आइये .......
न न न न पैसा ज्यादा नहीं लगता.

दिल्ली जैसे शहर में – मैं एक मित्र तो साथ ले गया और बालकोनी की टिकट ९० रुपये में खरीद कर मिलन सिनेमा (कर्मपूरा - मोती नगर) में जम गए.

जय राम जी की.