20.6.13

नहीं दिख रही लाशें


भूल गए थे, ये इंडिया है, जहाँ जिन्दा लोगों की गिनती, बस, वोटिंग के समय पार्टी के कार्यकर्ताओं को पड़ती है, या फिर रेलवे में टिकस बुकिंग के समय या किसी शिक्षण संस्थान में फ़ार्म जमा कराते समय अम्मुमन लोग बताते हैं की इतने लोग अभी मेरे से पहले हैं. उसके अलावा गिनती होती है तो लाशों की. कहीं भी कोई हादसा होता है तो लाशों की गिनती से ही उसकी भयावता का अंदाजा लगाया जाता है. और उतराखंड में जो हुआ, पहले १ दिन तक तो लाशों की गिनती से ही अंदाज़ा हो रहा था... हाँ ५० लोग मर गए, अगले दिन ये आकड़ा १०० पार गया, तीसरे दिन पता १२० थे. जब देश के प्रधानमंत्री और सप्रग अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी उतराखंड के हवाई दौरे पर निकले तो मात्र अफ़सोस जाहिर ही कर सकते क्योंकि तब तक भी १२० शव बरामद (सरकारी भाषा में) हो चुके थे. जब ये जलजला फूटा तब लाखों लोग वहाँ किसी न किसी के रूप (श्रद्धालु, लोकल, वहां दुकानदार इतियादी) में थे – उस के बाद आप कैसे लाशों को गिन रहे हैं. क्यों नहीं गिनते कि हजारों लोग नहीं मिल रहे .. और जो मिल नहीं रहे वो जिन्दा नहीं है, ये तय है, ... पर सरकार को जब तक डेड बॉडी नहीं मिले ... सबूत नहीं मिले, मौत को मौत नहीं मानती. और वही उतराखंड में हो रहा है.
मीडिया मात्र भोले बाबा की गंगा में आकंठ डूबी भोले बाबा की मूर्ति दिखा रहा है, ताश के पत्तों की तरह ढ़हते घर दिखा रहा है, बहती कार, मोटर साइकल सब दिख रहा है, पर नहीं दिख रहे लोग – जो आराध्य पूजन हेतु आये थे. बचने वालों के अतरिक्त मरने वालों में भी कुछ भाग्यशाली थे, जिनकी मिटटी उनके घर/गाँव पहुँच गयी. बाकी उनका क्या जिनकी मिटटी तक नहीं मिली. सरकार खुश है.... बिहार कब्ज़े में कर लिया. बिहारी दुविधा में है – हरा या केसरिया .... दिल्ली के दोनों पड़ोसी राज्य हरियाणा और यु पी... दिल्ली को बचाते बचाते खुद शहादत के रस्ते चल दिए. ... दिल्ली कीमती है बचनी ही चाहिए – हरियाणा में यमुना काबू में नहीं रही और युपी में बंध टूट गए पर दिल्ली बच गयी मेरी जान बच गयी – सरकार बच गयी. पंजाब और एम् पी ने अर्थ देकर मोक्ष प्राप्त किया और राजस्थान, मेरे ख्याल से वहीँ के श्रद्धालु सबसे ज्यादा रहे होंगे (मारवाड़ी और बनिया तबका) खामोश रहा. क्यों खामोश रहा ये राम जाने – देश को मनोमोह्नी विद्या मिल गयी है कि कुर्सी को ख़ामोशी से ही बचाया जा सकता है.
यूपीए को कोई चिंता नहीं है पैसे का अम्बार जमा है, विपक्ष को अपने पाले में आने की देरी है पैसे दिल खोल कर दिया जाएगा – बिहार को ही देख लीजिये – पैसे का ही बल है की १७ साल की दोस्ती मात्र ३ महीने (दिल्ली में नितीश की रैली) में खत्म हो गयी – बहाने कोई भी हों. आप बात कर रहे हैं आर्थिक सहायता देने की ... .किस बिनाह पर... ये वो कौम है जो अपने ही बल बूते शताब्दियों से अमर है.. बिना किसी सरकारी सरक्षण के. केदारनाथ में भोले बाबा अभी भी विराजमान है, और रहेंगे, बात मंदिर की है वो भी बन जाएगा. बेघर लोगों को घर देना सरकार की जिम्मेवारी है – वो देगी – चाहे मीडिया को विज्ञापन बंद करना पड़े. जिन्दा लोगों को बचाने के लिए सेना के सक्षम जवान है... कोई नहीं बता रहा तो उन लोगो को - जो मर गए खप गए – मंदाकिनी की धारा में.  
वो जमाने गए जब सरकार को मदद की जरूरत होती थी... ‘भारत एक कल्याणकारी राज्य....” होता था – पर जमाना बदल गया है, सरकार एक व्यापारिक परिष्ठान में बदल चुकी है, बिजली और पीने का पानी छोड़ दीजिए (क्योंकि मिलता ही नहीं) हगने मुत्त्ने तक का पैसा जल बोर्ड वसूल कर रहा है... कुछ करना ही है तो कीजिए, आगे से कहीं पहाड़ पर जाना हो तो बिना पेट्रोल /डीज़ल की मदद से जाइए, पक्का खाना वहां बनाने की जरूरत नहीं, सत्तू और चनेबा से गुजारा कीजिए, प्लास्टिक की पन्नी और थैले यहीं मैदान में छोड़ जाईये... पुरखो को याद कीजिए कैसे वो तीर्थ यात्रा पर निकला करते थे – वही रास्ता सही था और सही है.
जय राम जी की. 
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P.S. : विनीत -वैसे तो तुम्हारा ब्लॉग में काफी अरसे से पढता आ रहा हूँ, पर आजकी के लिए शुक्रिया.... फिल्म , क्रिकेट और राजनीति के घालमेल से अलग, हट कर पोस्ट लिखी. हुंकार सार्थक रही.