17.8.13

हाल ऐ जिन्दगी

पार्क, गाँव, पहाड़ बारस्ता खेत , मकान दूकान से सरकते सरकते , गूगलिंग कर सर पटकते चश्मे के नम्बर बडवाते, कविता गुनगुनाते, लेख पढ़ते, गीत गाते, औरों से गिरते रूपये को थामते, कागज़ कागज़, प्रेस - प्लेट, स्याही, बिजली, लेबर, मंदी का रुदन करते, पर फिर से गर्दन झटक दो पैग लगा, बाईक उड़ा, बच्चों संग हंसी ठिठोली करते,  लेफ्ट राईट में टाईट होकर पैर पटक पटक जूता घिसाते फिरते,  देर शाम तक किसी भी नशेडी से हँसी ठठा करते ...  देश समाज चिंता से बेखबर, प्याज, आटा नून तेल, शेयर मार्किट, सोना, प्रोपर्टी को अस्सी पर बिठा, सदा मुस्कुराते बतियाते विजेता बन घूमते ......


मखा, आनंद बाबु कभी हमारी गली भी आया करो - रामा शामा कर जाया करो.