25.3.11

ब्लॉग्गिंग में मेरा सफ़र.........3

ब्लॉग्गिंग में यूँ तो कई तरह का लेखन हो रहा है, बहुत महीन से लेकर बहुत मोटा, संस्कृत निषठ शब्दों वाले शुद्ध व्याकरण के आजकल की बोलचाल वाली हिंदी (हिंगलिश) तक.

जाहिर है, जब मैंने इस ब्लॉग दुनिया और आसिलियत वाली दुनिया से मिलाने की कोशिश की या फिर ऐसा है भी. फिर जैसे की दुनिया में कुछ मोरल थानेदारी (कुछ देशों ने ठेका ले रखा है) हो रही है – तो फिर ब्लॉग जगत में भी होगी. यहाँ पर भी कुछ मठाधीशों ने ऐसा ही ठेका ले रखा है. पर शुक्र है यहाँ कोई ठेकेदारी (संयुक्त राष्ट्र) नहीं है........

कल ही सलिलजी ने टीप द्वारा मुझे चेताया था, की ब्लॉगलेखन कोई सामान्य लेखन नहीं है, उन्होंने मिश्र का उधारहण भी दिया था. और वाकाई मैं मानता हूँ की ये कोई साधारण लेखन नहीं है, मात्र एक पुश बटन द्वारा ही आपका मेसेज ग्लोबल हो जाता है. और आपके निजी विचार – निजी नहीं रहते ....... जैसा की व्यक्तिगत दायारी में लिखा होता है........ कोई भी नहीं पढ़ सकता, आप खुद ही पढते है और सिसक सिसक कर तकिये के नीचे रख देते हैं.

आज हमारी सोच कैसी है और कल कैसी होगी..... ये समझ पाना बहुत मुश्किल है. सुनने में आया है की भारत सरकार भी ब्लॉग्गिंग को सेंसर करने के मूड में हैं. करना ही चाहिए. पर वो तो जब भी करेंगे.... तब करेंगे.... पर उससे पहले ब्लॉग जगत के कुछ मठाधीशों ने मोरल मुद्दे को उठाते हुए एक आगाज़ किया है की लेखन की एक मर्यादा होनी चाहिए........ यानी आप परिवार के साथ बैठकर किसी के भी ब्लॉग को पढ़ सकें.

लेकिन एक बात है, जिस भी बच्चे के घर में अगर नेट कनेशन है, तो वो मात्र ब्लॉग जगत का मोहताज़ नहीं है. गूगल बाबा की कृपा से अपना मनोवांछित शब्द लिख देने से ही सेकडों साईट खुल कर आ जाती हैं...... आप बच्चे पर सेंसर नहीं कर सकते......... हाँ उसे कुछ अच्छी शिक्षा दे सकते है की हर वक्त ऐसे ही साईट खोल का न देखे.

मैं पिछले ३ वर्षों से ब्लॉग जगत को बारीकी से तो नहीं, पर मोटा मोटा जरूर देख रहा हूँ, और जो सबसे ज्यादा परेशान करती है वो है अपनी कारीगरी (लेखन) द्वारा किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना. खासकर ये आदत कुछ मुस्लिम ब्लोग्गर भाइयों की है. आज तक किसी भी मठाधीश ने उन पर कोई पोस्ट नहीं लिखी...... . क्यों नहीं लिखी इसका भी कारण है...... उन धर्मान्ध लोगो के आक्रमण से सभी घबराते हैं. – और बर्रे के छते में हाथ नहीं देना चाहते.

वैश्विक और हिंदी साहित्य में नए नए प्रयोग हो रहे है....... मन की वो गहन/महीन भावना जो मात्र मन मैं ही रहती थी, अब उसे कागज/रील या फिर कहें धरातल पर उतरा जा रहा है...... बहुत कुछ नए नए अनुभव हो रहे हैं – देखना ये है या फिर हम खुले दिल से उसका स्वागत करते हैं या फिर हमेशा की तरह आँख बंद करके शुचितावादी बनाने का ढोंग करते हुए उसके खिलाफ खड़े होते हैं.

आज जिसको हम अश्लील कह कर हीय दृष्टी से देखते है...... आने वाली पीढ़ी के लिए मजाक का विषय हो....... और अपने मित्रों के साथ विवेचना करे....... हमारे पूर्वज कितने भोले थे......... 


फिलहाल जय राम जी की.