18.3.11

ब्लॉग्गिंग में मेरा सफ़र.........

कई बार अपने निर्णय पर दुःख नहीं होता, (वैसे तो कभी भी नहीं होता) लेकिन कई बार होता भी है - काश अमुक व्यक्ति की बात मान ली होती. पर एक निर्णय सोच विचार कर लिया था... और उस पर फक्र होता है - श्रीयुत  जी को आचार्य की पदवी देकर. आज मैं याद कर रहा हूँ अपने ब्लॉग जगत में पुराने दिनों को. 

दिसंबर २००७ में ब्लॉग बनाया था. कभी कभी दिल की भड़ास निकाल देता था. पर एक दिन इसी ब्लॉग जगत में डूबा हुवा था की अपने पूर्विया जी (कौशल मिश्र) प्रेस में आये ......... और मैं भी बहुत ही तन्मयता से उनको लप्पझनू  की पोस्ट पढ़ने लगा........ कौशल जी ठहरे पुराने लंठ........ लगे उसकाने ..... तुम क्यों नहीं लिखते....... 

अब मैं क्या जवाब देता, मैं तो इस विद्वासभा में खुद को उपेक्षित सा महसूस करता था, पर कौशल जी का हौसला था, लिखो यार कुछ तो लिखो ........ और क्रिस्पी पकौड़े ...... तुरंत लिखे गए. और लगे हाथ पूर्विया ब्लॉ भी बन गया .......... और ब्लोगवाणी भी बंद हो गई.... कहते है न ....... साडी वारी आयी ते प्रसाद ही ख़त्म हो गया....... :)

तब याद आये , उड़नतस्तरी ....... और नीरज जी, खूब कहते थे, कुछ लिखो कुछ लिखो.......... पर लंठ महाराज .... लिखे भी तो क्या........ टाइप करते .... और डिलीट कर देते........ पर पढ़ते रोज़ ही रहे.

जुलाई  २०१० से ढंग से ब्लॉग फिर से चालू हुवा.......... पता ही नहीं चला कब संजय (मो सम कौन........) से दोस्ती हो गई...... कई बार चेत्तिंग हुई........ संजय (माफ़ करना संजय 'जी' नहीं कह रहा, हमउम्र है न और हाँ हम ख़याल भी ) ने कई बार संभाला और ब्लॉग्गिंग के टिप्स भी दिए.......

फिर एक अच्छी रात ? रात को सतीश सक्सेना जी ने हमारी बक बक को खंगाला ...... और सर्टिफिकट दे दिया ......... बाबा आश्रम बहुत अच्छा चलेगा...... और हम निहाल हो गए..... और मैं ये सर्टिफिकट देना चाहता हूँ की जिस ब्लॉग को लाइमलाईट में लाना हो ..... सतीश जी से संपर्क करें ..... उनके हाथों में ऐसा जादू है जिस ब्लॉग पर फ्लोवेर्स बनते है .. उस ब्लॉग के भाग खुल जाते है. 

फंसते फंसते फंस गया ....... सफ़ेदघ, जी हाँ वही अपने सतीश पंचम जी, में, अनूठी बोली मैं बहुत कुछ अपनापण था, लिखा बढ़िया लगा..... औहथकड़ में शायाद सफ़ेद घर से कुछ क्लू मिला था......... ये दोनों ब्लॉग की जिस दिन दैनिक हिन्दुस्तान में रवीश ने चर्चा की तो शायाद किशोर चौधरी और सतीश पंचम से ज्यादा ख़ुशी मुझे हुई.........  और हाँ इन्ही सतीश पंचम जी से कुछ तकरार भी हुई क़स्बा पर...... 

पता नहीं कैसे आलसी  के चिट्ठे तक पहुंचा .... और मन्नू-उर्मी प्रसंग हाथ लग गया...... रात ११ बज गए  पढ़ते पढ़ते ....... घर से फोन आने लगे...... दिल वहीँ बंध गया. उसके बाद बाऊ प्रसंग...... 

सफ़ेदघर और आलसी के चिट्ठे के पढने के साथ पूर्विया का संग ...... मेरे पर भी बहुत कुछ पूर्व रंग चढ़ गया....
नहीं आये तो श्री अनूप शुक्ल जी, माने फुरसतिया...... कभी भी नहीं....

हाँ याद आया, आदरणीय ज्ञानदत्त पाण्डेय जी की हलचल..... गंगा किनारे तो मन पहले ही लगता था.... पर एक दिन कुछ इर्ष्य हुई ..... पंडित जी कुछ लिखते नहीं थे ..... और ३०-४० टीप उनके ब्लॉग पर हो जाती थी..... मैंने भी टीप दे दी ..... पाण्डेय जी ट्वीट करते है ........ और बाकि लोग ट्वीट पर ट्वीट करते है..... 
पता नहीं कैसे डॉ दिव्या जी (जील) ने उसी पोस्ट में 'अंतिम प्रणाम' कह दिया... और मैं भी निशाने पर था..... 
बहुत दुःख हुआ........ बहुत ही .... कई बार पंडित जी से माफ़ी मांगी...... और किस्मत को कौसा .... उसी पोस्ट पर ही जील ने अंतिम प्रणाम  कहना था.

डॉ अरविन्द मिश्र से प्रभावित था, तार्किक ब्लॉग्गिंग करते थे..... अजोध्या मुद्दे पर कुछ तकरार भी हुई........ ख़ुशी हुई की एक ही पथ के राही है........ 

या आया वो दिल्ली में ब्लोग्गर मीट, कौशल जी के कहने पर जाना हुआ, १०-१५ मिनट लेट पहुंचे ........ दाखिल हुए तो लगा की प्रधानआध्यापक के कमरे में दाखिल हुए है..... सामने थे समीर लाल जी और सतीश सक्सेना जी. कुछ भी नहीं कह पाए....... हमेशा की तरह एक इन्फेरिरेती काम्प्लेक्स था........ 

ब्लॉग्गिंग का इतना प्रभाव था , प्रेस में कई ग्राहक मित्र समय कम होने का बहाना कह का खिसक जाते और कविता नहीं सुनना चाहते थे, एक मित्र रवि रस्तोगी जी की बातों ने तो पोस्ट लिखने पर मजबूर कर दिया.

जून से शुरू हुई यात्रा जनवरी आते आते सर्विकल के रूप से सामने आयी....... डॉ से सकत हिदायत दी की कम्पूटर पर कम से कम बैठना....... और ... इसो ला नतीजा है की पढता तो बहुत कुछ रहा पर लिखने पर बचा का ले गया ..... सबूत हो जाएगा की अभी भी कम्पुटर पर बैठ रहे है. :)

कई ब्लॉग इतना अच्छा काम कर रहे है ---- की खुद का लिखा कुछ भी झूठा लगता है...... और आचार्य  का ये  कथन की इक्सेलेंस ही साध्य होना चाहिए........ सोच सोच कर ही रह जाता .. पर कुछ न लिख पता था......

आज होली और  १०० वी पोस्ट पर आचार्य की मेल प्राप्त हुई.............. जो कई मायने में १०वी के सन्नद माफिक है........ लम्बी है पर इस पोस्ट को लिखने का मोह उसी मेल से प्राप्त हुआ.....

आचार्य की मेल : 

सौवीं पोस्ट की बधाइयाँ।
प्रकृति को खालीपन पसन्द नहीं, भर देती है। यह अच्छे लोगों का कर्तव्य है
कि खालीपन को भरने के लिये स्वयं को प्रस्तुत रखें। इसलिये सर्वाइकल पेन
के बावजूद जब भी आराम मिले लिखते रहियेगा। लेकिन पहले स्वास्थ्य ही रहना
चाहिये।

अब आप की ब्लॉग यात्रा:

जफर की ग़जल के बाद दिनांक 16 दिसम्बर 2007 की पोस्ट, जिस कोमलता के साथ
आप प्रेम का चित्रण करते हैं, कसम से ईर्ष्य़ा हो गई:

समंदर पूछता है अब वो दोंनो क्यों नही आते
जो आते थे तो अपने साथ कितने ख्वाब लाते थे
कभी साहिल से ढेरों सीपियाँ चुनते
नंगे पाँव पानी में चले आते थे
भीगी रेत से नन्हें घरोंदे भी बनाते थे
और उनमे सीपियाँ,रंगीन से कुछ संगीत यू सजाते थे
के जैसे आज के जुगनूमय लम्हे
आने वाली कल कि मूठ्ठी में छुपाते थे। ...कुछ इसी तासीर की मेरी पहली
पोस्ट थी, जो प्रेम से इतर विषय पर थी। आश्चर्य नहीं कि आप के ब्लॉग पर
पहली बार आते ही 'सट' गया :) 

कसम से मुझे मालूम नहीं की ये ग़ज़ल ज़फर की थी. एक याहू ग्रुप से प्राप्त हुई थी..... अच्छी लगी अत: ठेल दी.

और यह तेवर तो एकदम ही अलग है (दिनांक 13/12/08)
:

ये दुनिया
इसी मायावी दुनिया में रह कर जी रहे हैं हम
हम तो शायद सूरज से भी ज्यादा प्रचंड है
 ढीठ भी सूरज से ज्यादा।
....
इस बार नहीं बनने दूँगा उसे इतना लाचार
की पान की पीक और खून का फर्क ही ख़त्म हो जाए
इस बार नहीं
इस बार घावों को देखना है
गौर से थोड़ा लंबे वक्त तक
कुछ फैसले
और उसके बाद हौसले... 

ये कविता बहुत पहले एक डायरी में लिखी थी..... एक दिन ठेल दी.

मजे की बात यह है कि टाइपिंग की कठिनाइयों का जिक्र प्रेस बाबा भी करते हैं :) आचार्य को ये मालूम हो की मैं रेमिंटन की टाइपिंग करता था ..... और इनस्क्रिप्ट मेरे लिए नया अनुभव था.... और आज भी है. 

प्रधानमंत्री से अपील करते जलते हुये सच को कहने से बाबा को परहेज नहीं:
.. देही शिवा वर मोहे एही
शुभ कर्मन से कबहूँ न टरों
न डरों अरि जब जाय लरों
निश्चय कर अपनी जीत करूँ
पड़ोसी की नियत शुरू से ही खोटी रही है. आज की बात नहीं है ... हरामजादे
शुरू से ही उर्दू की मुशायेरे और क्रिकेट की बातें करते करते पीठ में
छुरी घोंप जाते है (दिनांक 12/03/08).

केरल के सी एम की कारस्तानी पर तीखापन एक आम अबौद्धिक सीधे साधे आदमी का
है (दि. 12/02/08)
... भारत वंशी का होश नहीं गंगा की सोच नहीं मिटटी का लगाव नही वतन पर
नाज़ नही बस राज करना चाहते हैं - दोस्तों मेरा ये वादा है की जिस दिन ये
लोग आपने तरीके से इस देश पर राज करने लगे तो भारत के ३८० टुकड़े होंगे
और इनका मुख्यालय पेचिंग (चाइना) में होगा। ....

और हास्य का यह रंग (दि. 13/07/10)
मोटी मोटी स्त्रियों को पार्क में यूँ भाग रही होती हैं की मनो आज ही
सारा कोलेस्ट्रोल ख़त्म कर देंगी और नयी उम्र की लोंदियों की नज़र आएँगी.
कुछेक के साथ उनके टौमी को और कुछ एक के साथ तो उनके 'उनके' को भी मजबूरी
वश हाँफते हाँफते भागना पड़ता है। जो की सब से नज़र बचा कर और झुका कर चल
रहे होते है.फिर थोड़ी ही दूर ... उम्र के अंतिम पड़ाव पर कुछ बुजुर्ग
जोर जोर से ठहाके लगा रहे होते है : जोर जोर से ठहाके लगाने से या तो
उनके नकली दांत गिर गए होते हैं या फिर पहेले से ही घर में रख कर आते है.
वहां रुक कर देखने में बड़ा ही आनंद आता है. थोडा आगे जाने पर ....
मोर्निग वाल्क का बहाना कर के निकली मेनका ... किसी इंद्र को लुभा रही
होती है या फिर कोई देवदास पारो नयनो के तीर एक दुसरे पर चला रहे होते
हैं। दूर एक बेंच पर एक सरदार जी, जिनकी नज़ारे तो उक्त प्रेमी युगल पर
होती पर साँसे बाबा रामदेव का आलोम वियोम कर रही होती है। :) अनुलोम
विलोम लिखना था बाबा!

तिहाड़ गाँव के जोहड़ की यह कविता( 12/07/10) सोचने पर मजबूर करती है:
पानी का लबालब तालाब -
तब बिना टेंडर के भी मछलियाँ उपजता था
जहाँ सर्दियों में सारस अपने वतन से दूर
मेरे गाँव आते थे.
उन सारस को देखने की चाहत
फिर बन जाती है
इन कड़कती बिज़लियों को देखकर
एक दिन बारिश जोर से हो रही थी, और प्रेस में मैं खिड़की से देख रहा था..... और तालाब की याद आई..... 

लंठई (दि. 19/06/10)
... पकोड़े का लिफाफा हिलाते हुवे स्कूल ला रहे थे की लिफाफा हाथ से छूट
कर रोड पर गिर गया और पकोड़े बिखर गए. अब बिखर गए तो कोई बात नहीं - पर
बिखरे वहां थे जहाँ पर गोबर (सुखा) पड़ा था. हमने बड़े जतन से पकोड़े
एकठे किये पर उनमें गोबर का बुरादा लग गया था. समझ नहीं आया क्या करें.
फिर भी दिमाग(?) था .. पकोड़े दूकानदार को वापिस दे कर बोले की मा'साब
नें बोला है दुबारा गर्म कर दो. दूकानदार नें दुबारा गर्म के दे दिए और
हमने कांपते हाथों से मा'साब को दिए. शुक्र है पकोड़े ज्यादा क्रिस्पी बन
गए थे...यह किस्सा तो एफ एम के 'सुड' को भेजना चाहिये ;)

अब बीच में गोल कर मेरी प्रिय
पोस्ट - बापू की बकरी से कुछ अंश:
पंडित नेहरु को भी बकरी में विशेष दिलचस्पी थी. वो बापू को खुश रखने के
लिए अधिकतर बकरी को अपने हाथ से बादाम खिलाते...
..

इस कथा ने जाने कितने आयामों से परिचय करा कर आप की प्रतिभा से परिचय करा
दिया। ... अनवरत लेखन और उत्तम स्वास्थ्य के लिये शुभकामनायें। 

बहुत बहुत आभार आचार्य...... बस आपसे एक निवेदन है..... टीप बॉक्स को खुला रखिये. और दुसरे ब्लॉग पर भी टीप दीजिए......... 

ब्लॉग्गिंग का एक असर मेरे पर ये भी हुवा की जब सुबह अखबार पढता था तो हर खबर पर टीप देने का मन करता था.

मन में बहुत अरमान थे...... पर कम लिख पाया......... कई मित्रो से और भी बढ़िया अनुभव थे....... जो श्याद इस पोस्ट में समेत नहीं पाया.... कोशिश करूंगा कल... काश कोशिश सफल हो... नहीं तो ये पोस्ट अधूरी ही रहेगी. 

जय राम जी की.