13.3.11

मय दे साकी, तेरे मयखाने में आये हैं..



मय दे साकी, तेरे मयखाने में आये हैं..
कई दिनों से गम अपना छुपाये हुए हैं.

छलकती है मय जो तेरी इन आँखों से.
कसम से कल से मयखाना भुलाए हुए हैं.

आ पी ओ मय पीने वाले....  यूँ लब तेरे बुलाते है.
तेरे दर पर ही आकर जीने की कसम खाए हुए हैं.

इस जमाने ने बेवफाई के सिवा भी बहुत कुछ दिया है...
बैठ मेरे पास साकी, कब से सीने में ये गुबार छुपाये हुए है.

तेरी अदा जो  क़त्ल-ओ-गैरत करती है ज़माने में...
हाय हम तो - बस दिल अपना बचाए हुए है. 

वादे, कसमे, रिश्ते नाते - झूठ सभी कसम से साकी..
बस ये मय और प्याला ही - इक डोर बनाए हुए हैं.



कुछ भी ,..... यूँ ही लिख दिया.... बस ... बहुत दिन हो गए थे ... सोचते है की तमाम विद्जनो में बैठना अच्छी बात नहीं, पर  इतनी दूरी भी तो ठीक नहीं..... आप सभी विद्वान लोगों में कोई न कोई बक बक करने वाला भी तो होना चाहिए :)  

तो लिख दिया - बस, यूँ ही लिख दिया.....

जय राम जी की.