2.11.11

शराबी लात पर रखता है दुनिया को.

राणो... यारां दा टशन..
देसी दारू..

फोटू कर्टसी http://www.saanj.net
साहेब, शराबखोरी का कोई नियम नहीं होता, न ही इसके लिए देश काल का ध्यान रखा जाता है... शराबखोरी के लिए २ बातें आवश्यक होती हैं - शराब और शराबी... इसमें तीसरा पक्ष है बेमानी. चाहे क्यों न हो वो पानी. नमकीन का क्या हुआ, कहाँ बैठ कर पियेंगे...... यार अभी टाइम क्या हुआ है... सूरज देवता सर पर चमकते हुए मुंह चिढा रहे हैं... इ भी सब है बेमानी....
तु ला बस पानी....
वो भी न मिले तो कोई दिक्कत नहीं,
सरसों को पानी लग रहा है, 
क्या कहा, ट्यूबवेल बहुत दूर है,
कोई नहीं, धोरे (खेत की मुंडेर के साथ साथ पानी की नाली) से पानी ले लेंगे.
प्याला ?
क्या प्याला?
वो भी मिला तो कोई बात नहीं,
साइकल की घंटी उतार कर प्याला बना लेंगे, पौव्वा तो मेरी अंटी में हेगा. बस 'तु' आ.
'तु' यानी, मित्र, सखा, बंधू, प्रियतमा, परमेश्वर...... बस 'तेरा' साथ चाहिए, तु सामने होना चाहिए... मुझे किसी और की जरूरत नहीं.... मैं लात मारता हूँ इस दुनिया को...

जी शराबी लात पर रखता है दुनिया को.

इसे एक शाराबी का आईकार्ड मानिए. और जब दो घोषित शराबी स्कूटर में बैठ कर जा रहे हों, तो चिंता कुछ और भी बड जाती ... घर पहुंचेगे या नहीं भी.

"चलो भाई देर हो गयी ... घर चलते हैं." उस्ताद करू पांडे ने स्कूटर को किक लगते हुए चेले सुन्नु पांडे को कहा तो सुन्नु पांडे एक दम भौचक रह गया... आज उस्ताद ने प्रसाद वितरण किया नहीं और घर चलने को कह रहे हैं. करू पांडे के कई चेलों में असल चेले यही सुन्नु पांडे ही थे, कुछ न बोले लब सी लिए, चोट दिल पर झेल गए - ख़ामोशी से, सारा दिन सेवा करी और परसाद की बारी आई तो उस्ताद बोले - सुन्नु अब घर चलते हैं... चलो जी घर... आज राम जी की यही मर्ज़ी. भैरो बाबा कोतवाल काशी के... उसके राज़ में ऐसी दुर्दशा. कोई बात नहीं. आज ऐसे ही सही.

उस्ताद जी मगन और उनका स्कूटर भी, मन और स्कूटर की एक गति.... रास्ते में एक देसी सरकारी (जी हाँ, वही नीली पगड़ी वाली सरकार) की  अंग्रेजी दारू की दूकान दिखाई पर, न स्कूटर रुका और न ही उस्ताद जी कुछ बोले.... और समय निकल गया...

सुन्नु पांडे का माथा ठनका ... खैरियत तो है, श्रद्धालू मंदिर के सामने से निकल गए ... बिना परसाद ग्रहण किये... बिना मंदिर की चौखट को सर नवाए, कोई बात नहीं... लगता है उस्ताद आज कुछ काम में ज्यादा ही उलझ गए हैं.. याद नहीं रहा. दिल्ली शहर है बाबू - अगली दूकान सही.

और देखते देखते दूसरे मंदिर के सामने से भी निकल गए....

सुन्नु पांडे का दिमाग एक दम सुन्न हो गया.... हिम्मत बटोरने लगे, इतने भी बुरे दिन नहीं आये हैं की परम प्रेयसी अंगूर की बेटी को यूँ छोड़ दिया जाए.... खुद खरीद सकते हैं और पी सकते है... पर ठेके पर रोकना तो चाहिए.
ये तो दिल्ली राज्य की मुख्यमत्री का बहुत आभार है की हर १ - १.५ किलोमीटर पर ठेका उपलब्ध करवा रखा है, और जब तक तीसरा ठेका आया, सुन्नु पांडे की दिमाग की बत्ती जली, न चूको चौहान मन्त्र अपनाते हुए एक दम बोले, उस्ताद जी ब्रेक लगाओ... 'सामान' खरीदना है..

चेलों की आजकल वैसे भी बहुत किल्लत है और सुन्नु पांडे तो पक्का चेला है, ये सोच कर  उस्ताद को स्कूटर रोकना पड़ा, और उस्तादी की लाज बचाने के लिए अपने जेब से रूपये निकालते हुए बोले जाओ बिटवा दू ठो पोव्वे ले आओ ... पैसा हम देते हैं...

मारे खुशी के सुन्नु के चेहरे पर ऐसे भाव बने जैसे अमर सिंह के चेहरे पर जमानत मिलते समय बने थे. करू पांडे को भी अहसास हुआ, आज चेला के साथ गलत किये, परसाद पर उसका अधिकार ... राज परिवार के शासन करने के अधिकार समान ही ... जैसे युवराज को दलित के घर का भोजन - उसी परकार सुन्नु पांडे को 'परसाद' चाहिए.

अब घर जायेंगे, और बैठ कर शराब पियेंगे तो श्रीमती और बच्चो की फिर से वही पुरानी किटकिट शुरू हो जायेगी.... इस से अच्छ यही है कि यही भैरो परसाद को ग्रहण किया जाए ऐसा मन में विचार कर के करू पांडे पनवाडी की दूकान के एक 'बिसलरी' की गंगा ब्रांड बोतल मय एक ग्लास और ५ का नमकीन पैक्ट भी ले आया.

सुन्नु खुशी से उछलते हुए, मन ही मन उस्ताद को दुआए देते हुए आया और उस्ताद के हाथों पुरे अस्त्र देख कर आचाम्भित हुआ...

अरे सुन्नुआ यहीं लगा लेते हैं एक एक ... बाकि देखि जायेगी...
उस्ताद जी यहीं.. रोड पर..
अरे यार रोड पर क्या दिक्कत है, हमरी मुख्यमंत्री साहिबा की मेहरबानी है... सिपाही कुछ नहीं कहते... और हम  'पहुंचे' हुए शराबी है... हमें कौन सी देर लगेगी.. 
ठीक है उस्ताद जी..
वही एक पोव्वे से २ पेग बनते है, बारी बारी उस्ताद और चेला भैरो बाबा के जय कह ... परसाद ग्रहण करते हैं..
उस्ताद जी, दूसरा खूलूं,
नहीं, सुन्नुआ, दूसरा जेब में ही धरो... 
क्यों, नहीं क्यों नहीं निपटा देते...
सुन्नुआ, पहला इसलिए खुलवाया... कि इसका एक राज है...

इ दिल्ली शहर है, जहाँ बात बात पर रोड पर गोली चल जाती है, छुरा घोंप दिया जाता है... मौत यहाँ मिस काल मार के नहीं आती, घर अभी ३ एक किलोमीटर दूर है, बाई चांस रास्ते में कोई घटना हो गयी और दुनो बिना टिकस कटाये 'निकल' लिए ... और पंचनामे में पुलिस को पोव्वे मिले तो दिक्कत बहुत हो जायेगी...

कैसी दिक्कत उस्ताद जी,

दिक्कत... वही जो यदुरप्पा को हो गयी, बेचारा १-२ पेग (थोडा बहुत भ्रष्टाचार) लगाया ही था कि धर लिया गया और कहीं बिना पीये हमें कुछ हो जाता ... लोग बाग कहते सुसरे बुरबक थे, २ पौव्वा जेब में रखते ही एक्स्सिदेंट कर बैठे - बिना पिए ही... गर पी रखी होती तो कईयों को ले जाते... :)

जय राम जी की....