15.11.11

सावधान .. कुत्ते काले कपडे देख कर भड़क जाते हैं..

कलयुग है जी,
मैं तो कहता हूँ – घोर कलयुग...
"रंडियों ने रंडियों को और भिखारियों ने भिखारियों को लताड़ना शुरू कर दिया, नाइ कहाँ नाइ की हजामत मुफ्त में करेगा... पैसे दो मिंया....."
एक मोडर्न सैल्यून में ये बात सुनी थी, .... मैं तो कहता हूँ जी ... घोर कलयुग है...

फोटू आभार : hindustaantimes.com
ब्लॉग जगत में आने के बाद एक शब्द सुना था – कटहई कुतिया .... पर वास्ता नहीं पड़ा, पर टीवी पर देखा तो मालूम हुआ कुछ कंफुज़न हुई होगी ... कुतिया नहीं... कुत्ते होंगे - कटहए कुत्ते.. जो काले कपडे को देख कर भड़क जाते हैं,.... वैसे लाल कपड़ों को देख कर सांड भडकता है.... साक्षात तो नहीं देखा, पर कई फिल्मो में देखा है... और काले कपडे को देख कर कुत्तों का भडकना भी टीवी पर देखा...


फोटू आभार : hindustaantimes.com
सत्य लगा – तो मान गए जी, एक ही काली पेंट थी, कल रात तुरंत निकाल कर बाहर फैंक दी..... पता नहीं कब काली पेंट कांग्रेसी देख लें और लग जाए पीटने...
पुरातन काल में ही विद्या और धन अर्जन करने साहसी लोग देशाटन करते थे, नहीं साहेब, देखा नहीं, पर पढा है – सुना है...... .और कुछ न कुछ नया ले कर आते थे, और वो नयी जानकारी या फिर नयी वस्तुएं, गाँव वालों को बताते/दिखाते थे, पर उस समय लगता है कलयुग नहीं होगा – जोन सा मर्ज़ी युग हो – पर कलयुग नहीं होगा....

जरूरी नहीं है कि साहसी लोग ही ऐसी यात्रा करते थे, अंग्रेजी हुकूमत में कुछ लोगों को जबरिया विदेशों में मजदूरी करने भेजा गया जो गिरमिटिया कहलाये...... इनकी बहुत मजबूरियां रही होंगी जो देश से दूर कहीं विदेशों में मजदूरी करने गए......... साहेब, उनका जाना भी व्यर्थ नहीं हुआ, अपने साथ रामायण और भगवत गीता ले गए, और आज भी कई देशों में अपनी भारतीय संस्कृति की छाप उन मुल्कों पर मात्र इन गिरमिटिया मजदूरों की वजह से है...  
गिरमिटिया – साहेब, आप लोगों का बाप (क्या कहते हैं, राष्ट्रपिता) भी एक गिरमिटिया था, क्या कहते हैं पहला गिरमिटिया.... गर आज वो जिन्दा होता तो आप उनको भी भिखमंगे के खिताब से नवाज़ देते ....
क्या आप इन्हें भिखमंगे की संज्ञा दे सकते हैं... जी हो सकता है आप इन्हें भिखमंगा कह भी दें, और कह रहे है... पर आप की संज्ञा पर प्रशन चिन्ह लग जाता है... विद्वजन आपको संज्ञाहीन कहेंगे....  

फोटू साभार... msn.com
आज समय बदल गया है, घर-गाँव छोड़ कर जाने वालों को ‘भिखमंगा’ करार दे दिया गया है... भिखमंगा... गोया १२-१४ घंटे हाड-तौड महनत के बाद भी तमगा मिला भिखमंगे का ... तो क्या जरूरत थी – इतनी कशमकश करने की... क्यों न इस धर्म-जाति वहीन परिवार में जन्म ले लिया जाता... रीढ़वहीन लोग बाप का पता नहीं, दादा का ऐतबार नहीं... किताबें उतेलते फिरते हैं... कहीं परिवार का अता-पता मिल जाए....
सौ-सौ जूते खा – तमाशा उछल उछल कर देखते हैं.... जी, यही बात है जो आम हिन्दुस्तानी को अलग करती है... और कुछ न कुछ तो यही हिन्दुस्तानी गुण आपने में भी है... पिछले कई सालों से आप पर जूते पड़ रहे हैं... इसी उत्तर प्रदेश से... क्या कहते हैं ह्रदय स्थल से... और आप को शर्म नहीं... घुस घुस कर वहीँ तमाशा देखने पहुँच जाते हो...

बेशर्मी जब हद से बड जाती है तो बंद बेशर्म हो जाता है.... और गर यही बन्दा गर राजनीति में हो तो कहने ही क्या ... जो नग्न नाच संसद में होता था.... अब सड़कों पर होगा... आप तैयार रहिये.. और जी को कडा कीजिए ये सब देखने के लिए.. बाकी जब गुरु ही इतने हाथपैर चला रहा हो तो चेले कहाँ पीछे हटेंगे....

फोटू आभार : http://www.indianexpress.com 
२०१४ आने में देर नहीं है...

या तो जाग जायो या फिर अभी से सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाएँ और गायें, 
भारत भाग्य विधाता..
जय हो, जय हो, जय हो.....


जय राम जी ...
बैचेनी जब हद से बड ज़ाती है तो बन्दा बक बक करने लग जाता है...