27.11.11

सब व्यर्थ है न प्राची..

मेरे लहू ने पुकारना बंद कर दिया था..
क्योंकि तुम्हारा जमीर भी तो सुन्न हो गया था..
और मेरा खून - पानी .
जैसे खून का दौरा बंद हो जाना... धमनियों में..
या फिर राजमार्गों पर एक के बाद एक
गाड़ियों का थम जाना..
और जाम की स्थिति का बन जाना..
इस जमीर पर विचारों के जाम होने
और मेरे खून के के पानी बनने में..
बहुत कुछ है प्राची...
क्या क्या बताऊँ तुम्हें.
क्या क्या समझाऊं तुम्हे..



जमीर यूँ ही नहीं सुन्न होता ..
क्योंकि उसे पता होता है -
 सुन्न होने की अगली स्थिति क्या होगी..
जानती हो प्राची..

मैं उसे मृत्यु नाम दूंगा..
पर वो जीवित रहता हैं..
खाते है  - पीते है ... पैसा कमाता है .. और
पैसे से ओरों का जमीर खरीदते है ..
खुद का जमीर गिरवी रख के ..
 प्राची...
क्यों यहीं न..
ये चाँद, ये घटा, ये सावन की छटा ..
किसी चित्रकार की कूची ..
सब व्यर्थ है न प्राची..
सब व्यर्थ है ..

क्योंकि वो चित्रकार
जिसने इतना विशाल चित्र बनाया..
लाल और हरे रंग से इतनी उर्जा और
इतनी वैभवता उसमे भर दी
इन्सानियत और मानवता के शब्दों द्वारा..
उसे मूल्यवान होने का संकेत दिया.
पर और कुछ  विस्तार देने हेतु ..
कुछ और ..
कुछ और काले रंग में डुबो कर
अपनी कुची वहीँ कहीं चलाई
अमां यार कभी खुश भी रहा करो.
तफसील से..
और पुत गया जमीर भी.. काले रंग में.
प्राची..
वो दिखना ... महकना ... बंद हो गया..
जमीर मात्र
इन्सानियत और मानवता
को विस्तार देने के लिए..
पुत गया ... फना हो गया
प्राची..
सुनती हो तुम..
गर सुन सको तो ..
नहीं पढ़ लेना.