7.12.08

जय जय राजस्थान बनाम जाट गुज़र मीणा बामण और बनिया

पिछले दिनों राजस्थान के अलवर खैरथल और इनके समीप के गांवों में गया था। कुछ चक्कर अक्टोबर के शुरू में लगे थे - जब चुनाव के बारे में ज्यादा शोर नहीं मचा था गया था। जिस गाँव में मैं गया था - उधर के एक पंच से बात चल रही. मेरे पूछने पर की सरकार कैसी चल रही है - बिजली, सड़क आदि - पंचायत के बारे में। पञ्च साहिब एक दम उछल पड़े और राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा tअरीफों के पूल बाँध दिए । हमारी मैडम ... हमारी मैडम ... और हमारी मैडम। अच्छा लगा .... जो जो उन्होंने बतया सड़क बिजली के बारे मैं --- और वेह पञ्च साहिब खुश दिखे सरकार के काम और मुख्यमंत्री के विषय मैं।
चांस की बात है की चुनाव से ठीक दो दिन पहेले उनसे फ़िर मुलाकात हुई। .... भाई मैडम के क्या हाल हैं । साहेब एकदम भिफर पड़े ... मैडम बिक गई गत्तों के भावः ... क्या मतलब... भाई उनसे गूजर नाराज़ हैं, जाटों को उसने नाराज़ कर दिया ... मीना पहेले से बिदके बेठे हैं ... पञ्जाबी किसी टोल में नहीं । साडी बीजेपी में फूट पड़ गई है .... भाई कांग्रेस आएगी।
बहुत ही दुःख होता है ... एक मुख्यमंत्री का पैमाना क्या है । jahan dekho जाट गुज़र मीणा बामण और बनिया की बात .... क्या इसे राज चलेगा। इसका मतलब लालू जी , मुलयम जी, रामनिवास पासवान और मायावती का एजेंडा ठीक है । कम करो या मत करो जाट पात का तिगदम फंसा कर रखो। एक महिला मुख्यमंत्री ने सदियों के बाद राजेस्थान को नइ पहचान देने की बात की पहली बार एक नया नारा - जय जय राजेस्थान सुनने को मिला ... पहली बार जातपट से उठ कर बात की गई । लेकिन इस बार भी राजस्थान में जातपात हावी रही ।
एक बात यहाँ कबीले तारीफ है की राजस्थान के मतदाता राजनीति से जातिवाद की बुराई को तोड़ने को आतुर दिखाई देते हैं, लेकिन इससे निपटने का उनके पास कोई तरीका भी नहीं बचा है। कारण यह है कि प्रमुख राजनीतिक दल इसे हतोत्साहित करने के बजाय जातीय मकड़जाल में जकडे़ हुए हैं। रही बात बड़े नेतायों की उन्हें कोई फरक नहीं पड़ता पूर्व मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी, हीरालाल देवपुरा और शिवचरण माथुर भी ऐसे बड़े नेता हैं, जिनके जातिगत समीकरण आड़े नहीं आए। प्रद्युम्न सिंह के राजाखेड़ा में स्वजातीय मतदाताओं का प्रतिशत काफी कम होने के बावजूद सात बार निर्वाचित हुए। पूर्व उप राष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत ने तो प्रदेश के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों से, जहाँ विभिन्न जातियों का प्रतिनिध्त्वा अलग अलग था , चुनाव जीत कर रिकॉर्ड बनाया है।
आज इसे नेता की आवश्कता है जो जातपात के जाल को तोड़ कर राजस्थान की बात करे - हर जात के कल्याण की बात करे ... नहीं तो आने वाले समय में अलवर जिला - भरतपुर जिला, उदयपुर जिल न होकर गुज़र जिला, मीणा जिला, ठाकर जिला, बामन जिला और बनिया जिला न बन जाए। हम जाट गुज़र मीणा बामण और बनिया न होकर राजस्थानी बने और प्रदेश के विकास के बारे में सोचे ... आज एक मजबूत राजस्थान की जरूरत है । प्रदेश की शान्ति .... सुरक्षा और दिल्ली से नजदीकी विदेशियों को भी राजस्थान के तरफ़ आकर्षित करती है । जाट गुज़र मीणा बामण और बनिया से उपर उठ कर जय जय राजेस्थान के नारे पर अमल करने की जरूरत है .