5.12.08

मेरे एक मुरीद के कमेंट्स

समुन्द्र पूछता है वो दोनों क्यों नहीं आते - इस कविता पर मेरे एक मुरीद की कमेंट्स आई थी - अच्छी लगी अतः अक्षरत प्रकाशित कर रहा हूँ :

मैं एक सेहरा में कश्ती चलता रहा .....
आंसूयों का समंदर बहेता रहा
दिन गुजरते गए वक्त जाता रहा
आंसूयों का समंदर बहेता रहा

दिल की धरकन में वो, मेरे तनमन में वो
चाँद को दिखा कर, चांदनी रात में
मुझ को बिछडा सनम - याद आता रहा
आंसूयों का समंदर बहेता रहा

बस इसी आस में दिन गुज़रते रहे
क्या तू मरा है, यह सोच कर दिल रुबा
दिल को अपने तस्सल्ली दिलाता रहा
आंसूयों का समंदर बहेता रहा

वो भी क्या दिन थे जब बेकारी में तुम
मुझे हर बात सच सच बताते रहे, or
आंसूयों का समंदर बहेता रहा

तू बना मेरे और मैं तेरे वास्ते
एक नगमा फिजाओं में बिखरा हुआ
तुझ को शाम-ओ-सेहर गुनगुनाता रहा
आंसूयों का समंदर बहेता रहा

जिंदगी मेरी मानिंद-ऐ-तरीक शुब,
जिस में तेरी हो यादों के चंद एक दिए
बस जलाता रहा और बुझाता रहा
आंसूयों का समंदर बहेता रहा

एक तूफान उठा, जो उड़ा ले गया
जिंदगी के वरक, बादलों की तरह
तुझ को भी ले गया, में बुलाता रहा
आंसूयों का समंदर बहेता रहा

में अपने मुक़द्दर से हूँ शिकवा ज़रूर
था किसी और से मुन्सल्क तेरा नाम
में तो बस यूही लिखता - मिटाता रहा
आंसूयों का समंदर बहेता रहा

आंसूयों का समंदर बहेता रहा
मैं एक सेहरा में कश्ती चलता रहा .....