8.7.11

मनमोहनी कालिमायुक्त माया


वो संगीत बुनता था और सुनता था...... सारा दिन बैठ कर संगीत बुनता रहता, और गाँव वालों को सुनाता था.... थके हारे किसान ... उसके संगीत का आनंद लेते .... वो बुलबुल मैना और कोयल को अपने संगीत की धुनें देता और वो बुलबुल मैना कोयल मिल कर गया करती थी........ बहुत ही हसीन दिन थे... जब सूरज भी चमकने से पहले गाया करता था........
किसान अलसुबह संगीत की लय में गाते .... बैलों के गले बंधी खनखनाती घंटियों के साथ लय मिलते जंगल के मध्य होकर दूर खेतों तक जाते थे दूर .. और वो उन खेतों से कोई रास्ता शहर की तरफ से नहीं जाता था....... न ही वह खेत किन्हीं दो शहरों के बीच आते. वहाँ रहंट से निकलते पानी का संगीत भी उसी संगीतकार से बैलों के गले बंधी घंटियों की मार्फ़त मिला करते... गंवाई आदमी, पशु और प्राकृति, सभी लयबदध होकर कोरस गाते... 
रात को संगीतकार नये नए ख्याल बुनता . उनको शब्द देता ... आकार देता और लय देता  ... नया संगीत बनाकर उन सुहानी एकांत रातों में तारों को गवाह बनाकर चंदा को सुनाया करता ... चंदा भी गुनगुनाता हुवा ... सूरज को सिखा जाता बिना किसी गवाही के.... और सुबह पक्षी उसी संगीत को सूरज की लय में लय मिला कर गाया करते थे.  संगीतकार बहुत खुश था, किसान भी......... मजदूर भी... ओरतें और बच्चे भी खुश रहते थे.
दिन सुहाने जल्दी बीतते हैं अत: बीत रहे थे, और बीत गए......... 
सुहानी तस्वीरे दिखाते दिखाते मनमोहनी कालिमायुक्त माया छा गयी ....... दूर पश्चिम से चली कालिमा पूर्व तक फ़ैल गयी...... किसानो ने हल फैंक दिए, रहंट को धरती ने पानी देने से मना कर दिया ...... वो बुलबुल मैना और कोयल बस कैद होकर रह गयी. सभी जंगल और गाँव शहरों के मध्य पीसने लगे...... जो नहीं थे, नए शहर बस गए .... गाँवों को पीसने के लिए.......   
अब ओरतों और बच्चों ने भी मुस्कुराना गुनगुनाना छोड़ दिया था.... और उस क्षितिज के पार से घनी कालिमा आती दिखती...... और पूर्व को अपने आगोश में लेने को तत्पर थी,  
वो संगीतकार उदास हो गया....... दूर कहीं बैठ कर मातमी धुन बनाता – जो राजनेताओं के काम आती........ जब जब वो नेता लोग किसानो के घरों में खाना खाते... वहाँ की वीरान गलियों में पदयात्रा करने जाते तो वो धुन बजायी जाती ..........और फिर बजती ही रही . 

अस्तु, जय राम जी की............