20.7.11

वक्त का तकाज़ा था, और हम निभाते चले गए.

हम और तुम 
यूँ साथ साथ चलते रहे ..
ताउम्र ...
बिना किसी शिकवे शिकायत के...

वक्त का तकाज़ा था, और हम निभाते चले गए.


हम और तुम 
बैठे रहे दरिया किनारे...
नयनो की भाषा जब नयन समझते रहे...
हरदय के तार दूर तक खनकते रहे..
कितनी विराट जलराशि थी 
दोनों किनारों की बीच ..
और दिलों में - भावनाओं का समुन्द्र ...

वक्त का तकाज़ा था, और हम निभाते चले गए.

हम और तुम 
हाथों में लिए वो एन-सीरीज
हम अपने ऑफिस में और 
तुम आलिशान उस मॉल में 
पढ़ते रहे दिलों में आये तुफानो को.
लूटा दिया अपने दिल के अरमानो को..
उस सुहानी शाम को 
तुम भी अपने 'उनके' साथ चल दी 
और हम भी अपनी उनके लिए चल दिए ..

वक्त का तकाज़ा था, और हम निभाते चले गए.